भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1002

भविष्यपर्व ] त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ९७७


कहते हैं कि वे दोनों महान् देवता एक ही हैं, किंतु दो स्वरूपोंमें विभक्त हो गये हैं। उनका आत्मा (स्वरूप) एक ही है, तो भी कार्यभेदसे भिन्न-भिन्न शरीर धारण करते हैं। दोनों ही जगत्‌की उत्पत्तिके कारण हैं और दोनों ही सृष्टि, पालन एवं संहार करनेवाले हैं (यह बात कैसे समझी जाय ? ) ॥ ५ ॥

परस्परसमावेशाज्जगतः पालने स्थितौ।
तयोस्तत्र यथावृत्तं कैलासे पर्वतोत्तमे ॥ ६ ॥

वे परस्पर समाविष्ट होकर जगत्‌के पालन-कर्ममें स्थित रहते हैं। उत्तम पर्वत कैलासपर एकत्र हुए उन दोनोंका जैसा वृत्तान्त हो, वह बताइये ॥ ६ ॥

ऋषयः किमचेष्टन्त दृष्ट्वा तौ पुरुषोत्तमौ ।
एतत् सर्वमशेषेण वक्तुमर्हसि सत्तम ॥ ७ ॥

साधुशिरोमणे ! उन दोनों पुरुषोत्तमोंको देखकर ऋषियोंने कैसी चेष्टा की ? यह सब वृत्तान्त पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ७ ॥

यथा गतो हरिर्विष्णुः कृष्णो जिष्णुः पुरातनः।
यथा च शंकरः साक्षात् कृतवान् नागभूषणः ।
एतत् सर्वं विप्रवर्य ब्रूहि तत्त्वेन यत्नतः ॥ ८ ॥

विप्रवर ! सर्वव्यापी, पापहारी, पुरातन पुरुष और विजयशील सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण जिस प्रकार कैलास पर्वतपर गये और सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित भगवान् शङ्करने जिस प्रकार उनका साक्षात्कार किया, यह सब मुझे यत्नपूर्वक ठीक-ठीक बताइये ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् यथा कृष्णो गतो नगम् ।
यथा च दृष्टो देवेशः शंकरो वृषवाहनः ॥ ९ ॥
यथा चचार स तपो यथा ते मुनयो गताः ।
एवं तयोर्यथावृत्तं तथा शृणु नरोत्तम ॥ १० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! नरश्रेष्ठ ! भगवान् श्रीकृष्ण जिस प्रकार कैलासपर्वतपर गये, जिस प्रकार उन्होंने देवेश्वर वृषभवाहन भगवान् शङ्करका दर्शन किया, जिस तरह वे तपस्यामें संलग्न हुए, जिस प्रकार वे मुनिलोग वहाँ गये और जिस तरह उन दोनों देवताओंका वृत्तान्त वहाँ घटित हुआ, वह सब सावधान होकर सुनो ॥ ९-१० ॥

द्वैपायनोऽथ भगवान् यथा प्रोवाच मां तथा।
नमस्कृत्य प्रवक्ष्यामि केशवं खगवाहनम् ॥ ११॥
यथाशक्ति यथाप्रज्ञं शृणु यत्नेन सुव्रत ।

भगवान् वेदव्यासने यह प्रसङ्ग जिस प्रकार मुझसे कहा था, उसी प्रकार मैं गरुड़वाहन भगवान् केशवको नमस्कार करके अपनी बुद्धि और शक्तिके अनुसार कहूँगा । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश ! तुम यत्नपूर्वक सुनो ॥

न चाशुश्रूषवे वाच्यं नृशंसायातपस्विने ॥ १२ ॥
नानधीताय वक्तव्यं पुण्यं पुण्यवता सदा।

जिसमें सेवा करनेका भाव न हो, जो नृशंस तथा तपस्यासे दूर रहनेवाला हो और जिसने कुछ भी अध्ययन न किया हो, ऐसे पुरुषको पुण्यात्मा विद्वान् इस पवित्र प्रसंगका उपदेश कभी न दे ॥ १२ ॥

स्वर्ग्यं यशस्यं धन्यं च बुद्धिशुद्धिकरं सदा ॥ १३॥
ध्येयं पुण्यात्मनां नित्यमिदं वेदार्थनिश्चितम् ।

यह विषय स्वर्गप्रद, यशोवर्धक, धनकी प्राप्ति करानेवाला तथा सदा ही बुद्धिको शुद्ध करनेवाला है; यह (भगवान् विष्णु और शिवकी एकता) वेदार्थका निश्चित सिद्धान्त है और पुण्यात्मा पुरुषोंके लिये सदा ही चिन्तन करने योग्य है ॥ १३ ॥

अनेकारण्यसंयुक्तं सेवन्ते नित्यमीदृशम् ॥ १४॥
मुनयो वेदनिरता नारदाद्यास्तपोधनाः।

अनेक आरण्यकग्रन्थों (उपनिषदों) ने इसका अनुमोदन किया है। वेदपरायण नारद आदि तपोधन मुनि नित्य इसका सेवन (चिन्तन) करते हैं ॥ १४ ॥

अत्यद्भुतं महापुण्यं वृत्तं कैलासपर्वते ॥ १५॥
शिवयोर्देवयोस्तत्र हरेश्चैव भवस्य च ।

भगवान् विष्णु और शिव दोनों कल्याणकारी देवताओंके कैलास पर्वतपर एकत्र होनेका यह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त परम पुण्यमय है ॥ १५ ॥

हतेष्वसुरसंघेषु नरकादिषु भूमिप ॥ १६॥
हतेष्वथ नृपेष्वेवं किंचिच्छिष्टेषु शत्रुपु ।
शासति स्म सदा विष्णुः पृथिवीं पुरुषोत्तमः ॥ १७॥
द्वारवत्यां जगन्नाथो वसन् वृष्णिभिरीश्वरः ।
रुक्मिण्या संगतो देवो वसंतत्र पुरे हरिः ॥ १८॥

राजन् ! नरक आदि असुरसमूहों तथा अन्यान्य राजाओंके मारे जानेपर जब थोड़े-से ही शत्रु शेष रह गये, उन दिनों वृष्णिवंशियोंके साथ द्वारकापुरीमें निवास करते हुए सर्वसमर्थ जगन्नाथ पुरुषोत्तम श्रीहरि पृथिवीका सदा शासन करने लगे। भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीसे संयुक्त होकर उस नगरमें निवास करते थे ॥ १६–१८ ॥

कदाचिच्च तया सार्धं शेते रात्रौ जगत्पतिः ।
विहरंश्च यथायोगं प्रीतः प्रीतियुजा तया ॥१९॥

एक दिनकी बात है, जगदीश्वर श्रीकृष्ण प्रीतिमती रुक्मिणीदेवीके साथ रातमें यथोचित विहार करते हुए प्रसन्नतापूर्वक सो रहे थे ॥ १९ ॥