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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व ] त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ९७७


कहते हैं कि वे दोनों महान् देवता एक ही हैं, किंतु दो स्वरूपोंमें विभक्त हो गये हैं। उनका आत्मा (स्वरूप) एक ही है, तो भी कार्यभेदसे भिन्न-भिन्न शरीर धारण करते हैं। दोनों ही जगत्‌की उत्पत्तिके कारण हैं और दोनों ही सृष्टि, पालन एवं संहार करनेवाले हैं (यह बात कैसे समझी जाय ? ) ॥ ५ ॥

परस्परसमावेशाज्जगतः पालने स्थितौ।
तयोस्तत्र यथावृत्तं कैलासे पर्वतोत्तमे ॥ ६ ॥

वे परस्पर समाविष्ट होकर जगत्‌के पालन-कर्ममें स्थित रहते हैं। उत्तम पर्वत कैलासपर एकत्र हुए उन दोनोंका जैसा वृत्तान्त हो, वह बताइये ॥ ६ ॥

ऋषयः किमचेष्टन्त दृष्ट्वा तौ पुरुषोत्तमौ ।
एतत् सर्वमशेषेण वक्तुमर्हसि सत्तम ॥ ७ ॥

साधुशिरोमणे ! उन दोनों पुरुषोत्तमोंको देखकर ऋषियोंने कैसी चेष्टा की ? यह सब वृत्तान्त पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ७ ॥

यथा गतो हरिर्विष्णुः कृष्णो जिष्णुः पुरातनः।
यथा च शंकरः साक्षात् कृतवान् नागभूषणः ।
एतत् सर्वं विप्रवर्य ब्रूहि तत्त्वेन यत्नतः ॥ ८ ॥

विप्रवर ! सर्वव्यापी, पापहारी, पुरातन पुरुष और विजयशील सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण जिस प्रकार कैलास पर्वतपर गये और सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित भगवान् शङ्करने जिस प्रकार उनका साक्षात्कार किया, यह सब मुझे यत्नपूर्वक ठीक-ठीक बताइये ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् यथा कृष्णो गतो नगम् ।
यथा च दृष्टो देवेशः शंकरो वृषवाहनः ॥ ९ ॥
यथा चचार स तपो यथा ते मुनयो गताः ।
एवं तयोर्यथावृत्तं तथा शृणु नरोत्तम ॥ १० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! नरश्रेष्ठ ! भगवान् श्रीकृष्ण जिस प्रकार कैलासपर्वतपर गये, जिस प्रकार उन्होंने देवेश्वर वृषभवाहन भगवान् शङ्करका दर्शन किया, जिस तरह वे तपस्यामें संलग्न हुए, जिस प्रकार वे मुनिलोग वहाँ गये और जिस तरह उन दोनों देवताओंका वृत्तान्त वहाँ घटित हुआ, वह सब सावधान होकर सुनो ॥ ९-१० ॥

द्वैपायनोऽथ भगवान् यथा प्रोवाच मां तथा।
नमस्कृत्य प्रवक्ष्यामि केशवं खगवाहनम् ॥ ११॥
यथाशक्ति यथाप्रज्ञं शृणु यत्नेन सुव्रत ।

भगवान् वेदव्यासने यह प्रसङ्ग जिस प्रकार मुझसे कहा था, उसी प्रकार मैं गरुड़वाहन भगवान् केशवको नमस्कार करके अपनी बुद्धि और शक्तिके अनुसार कहूँगा । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश ! तुम यत्नपूर्वक सुनो ॥

न चाशुश्रूषवे वाच्यं नृशंसायातपस्विने ॥ १२ ॥
नानधीताय वक्तव्यं पुण्यं पुण्यवता सदा।

जिसमें सेवा करनेका भाव न हो, जो नृशंस तथा तपस्यासे दूर रहनेवाला हो और जिसने कुछ भी अध्ययन न किया हो, ऐसे पुरुषको पुण्यात्मा विद्वान् इस पवित्र प्रसंगका उपदेश कभी न दे ॥ १२ ॥

स्वर्ग्यं यशस्यं धन्यं च बुद्धिशुद्धिकरं सदा ॥ १३॥
ध्येयं पुण्यात्मनां नित्यमिदं वेदार्थनिश्चितम् ।

यह विषय स्वर्गप्रद, यशोवर्धक, धनकी प्राप्ति करानेवाला तथा सदा ही बुद्धिको शुद्ध करनेवाला है; यह (भगवान् विष्णु और शिवकी एकता) वेदार्थका निश्चित सिद्धान्त है और पुण्यात्मा पुरुषोंके लिये सदा ही चिन्तन करने योग्य है ॥ १३ ॥

अनेकारण्यसंयुक्तं सेवन्ते नित्यमीदृशम् ॥ १४॥
मुनयो वेदनिरता नारदाद्यास्तपोधनाः।

अनेक आरण्यकग्रन्थों (उपनिषदों) ने इसका अनुमोदन किया है। वेदपरायण नारद आदि तपोधन मुनि नित्य इसका सेवन (चिन्तन) करते हैं ॥ १४ ॥

अत्यद्भुतं महापुण्यं वृत्तं कैलासपर्वते ॥ १५॥
शिवयोर्देवयोस्तत्र हरेश्चैव भवस्य च ।

भगवान् विष्णु और शिव दोनों कल्याणकारी देवताओंके कैलास पर्वतपर एकत्र होनेका यह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त परम पुण्यमय है ॥ १५ ॥

हतेष्वसुरसंघेषु नरकादिषु भूमिप ॥ १६॥
हतेष्वथ नृपेष्वेवं किंचिच्छिष्टेषु शत्रुपु ।
शासति स्म सदा विष्णुः पृथिवीं पुरुषोत्तमः ॥ १७॥
द्वारवत्यां जगन्नाथो वसन् वृष्णिभिरीश्वरः ।
रुक्मिण्या संगतो देवो वसंतत्र पुरे हरिः ॥ १८॥

राजन् ! नरक आदि असुरसमूहों तथा अन्यान्य राजाओंके मारे जानेपर जब थोड़े-से ही शत्रु शेष रह गये, उन दिनों वृष्णिवंशियोंके साथ द्वारकापुरीमें निवास करते हुए सर्वसमर्थ जगन्नाथ पुरुषोत्तम श्रीहरि पृथिवीका सदा शासन करने लगे। भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीसे संयुक्त होकर उस नगरमें निवास करते थे ॥ १६–१८ ॥

कदाचिच्च तया सार्धं शेते रात्रौ जगत्पतिः ।
विहरंश्च यथायोगं प्रीतः प्रीतियुजा तया ॥१९॥

एक दिनकी बात है, जगदीश्वर श्रीकृष्ण प्रीतिमती रुक्मिणीदेवीके साथ रातमें यथोचित विहार करते हुए प्रसन्नतापूर्वक सो रहे थे ॥ १९ ॥

९७८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

अथोवाच तदा देवी रुक्मिणी रुक्मभूषणा।
पुत्रमिच्छामि देवेश त्वत्तो माधव नन्दनम् ॥२०॥

उस समय सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हुई रुक्मिणी-देवीने भगवान्‌से कहा—'देवेश्वर ! माधव ! मैं आपसे आनन्ददायक पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ ॥ २० ॥

बलिनं रूपसम्पन्नं त्वयैव सदृशं प्रभो।
वृष्णीनामपि नेतारं वीर्यवन्तं तपोनिधिम् ॥२१॥

'प्रभो ! वह पुत्र आपके ही समान रूपवान्, बलवान्, पराक्रमी, तपोनिधि तथा वृष्णिकुलका नेता हो ॥ २१ ॥

सर्वशास्त्रार्थकुशलं राजविद्यापुरस्कृतम् ।
एवमादिगुणैर्युक्तं दातुमर्हसि सत्तम ॥२२॥

'वह सभी शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें निपुण तथा राजविद्या (ब्रह्मविद्या) के ज्ञाताओंमें अग्रगण्य हो सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पतिदेव ! आप मुझे ऐसे ही गुणोंसे सम्पन्न पुत्र प्रदान कीजिये ॥

त्वयि सर्वस्य दातृत्वं नित्यमेव प्रतिष्ठितम् ।
त्वं हि सर्वस्य कर्ता च दाता भोक्ता जगत्पतिः ॥२३॥

'आपमें सदा ही सब कुछ देनेकी शक्ति विद्यमान है; क्योंकि आप ही सबके दाता, कर्ता, भोक्ता और जगदी-श्वर हैं ॥ २३ ॥

विशेषतस्तु भृत्यानां शुश्रूषानियतात्मनाम् ।
वक्तव्यं किमु देवेश यदि भक्तास्मि केशव ॥२४॥
अनुग्रहो यदि स्यान्मे देवदेव जगत्पते ।
दातुमर्हसि पुत्रं त्वं वीर्यवन्तं जनार्दन ॥२५॥

'देवेश्वर ! केशव ! विशेषतः जो आपके भृत्य हैं, सदा नियमपूर्वक आपकी सेवामें मन लगाये रहते हैं, उन्हें आप अभीष्ट वस्तु प्रदान करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है। देवदेव ! जगत्पते ! जनार्दन ! यदि मैं आपकी भक्त हूँ और यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो आप मुझे पराक्रमी पुत्र प्रदान करें' ॥ २४-२५ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तो देवदेवेशः प्रियया प्रीयमाणया ।
तया महिष्या रुक्मिण्या रुक्मिशत्रुर्यदूद्वहः ॥२६॥
प्रोवाच वचनं काले रुक्मिणीं यादवेश्वरः ।
दातास्मि तादृशं पुत्रं यं त्वमिच्छसि भामिनि ॥२७॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अपनी प्रसन्न हुई प्यारी रानी रुक्मिणीदेवीके ऐसा कहनेपर रुक्मीके शत्रु, यदुकुलतिलक, देवदेवेश्वर, यादवपति श्रीकृष्णने रुक्मिणीसे यह समयोचित बात कही—'भामिनि ! तुम जैसा चाहती हो, वैसा ही पुत्र मैं तुम्हे प्रदान करूँगा ॥ २६-२७ ॥

नित्यं भक्तासि मे देवि नात्र कार्या विचारणा ।
अवश्यं तव दास्यामि पुत्रं शत्रुनिबर्हणम् ॥२८॥

'देवि ! तुम सदा ही मेरी भक्त हो, इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं अवश्य ही तुम्हें शत्रुनाशक पुत्र प्रदान करूँगा ॥ २८ ॥

पुत्रेण लोकाञ्जयति सतां कामदुघा हि ये ।
नरकं पुदिति ख्यातं दुःखं च नरकं विदुः ॥२९॥

'गृहस्थ पुरुष पुत्रद्वारा उन लोकोंपर विजय पाता है, जो पुरुषोंको उनकी इच्छाके अनुसार फल देनेवाले होते हैं। नरक 'पुत्' नामसे विख्यात है, दुःखको भी नरक ही माना गया है ॥ २९ ॥

पुद्त्राणात् ततः पुत्रमिहेच्छति परत्र च ।
अनन्ताः पुत्रिणो लोकाः पुरुषस्य प्रिये शुभाः ॥३०॥

'उस पुत्-नामक नरक या दुःखसे वह पिता-माताका परित्राण करता है, इसलिये सारा जगत् इहलोक और परलोक-के लिये पुत्रकी अभिलाषा रखता है। प्रिये ! पुत्रवान् पुरुषके लिये अनन्त शुभ लोक विद्यमान हैं ॥ ३० ॥

पतिर्जायां प्रविशति गर्भो भूत्वा स मातरम् ।
तस्यां पुनर्नवो भूत्वा दशमे मासि जायते ॥३१॥

'पति ही गर्भ बनकर पत्नीके भीतर प्रवेश करता है, उस गर्भकी वह माता (जननी) होती है। उसके गर्भमें नूतन शरीर धारण करके वह (पति) पुनः दसवें मासमें जन्म लेता है ॥ ३१ ॥

पुत्रवन्तं बिभेतीन्द्रः किं नु तेनाशितं भवेत् ।
नापुत्रो विन्दते लोकान् कुपुत्राद् वन्ध्यतावरा ॥३२॥

'पुत्रवान्‌को देखकर इन्द्र भी डरते हैं। वे सोचते हैं, पता नहीं, यह मेरे किस वैभवका उपभोग करेगा ? पुत्रहीन मनुष्य पुण्यलोकोंको नहीं पाता है; परंतु कुपुत्र पैदा करनेकी अपेक्षा तो बाँझ रह जाना ही अच्छा है ॥ ३२ ॥

कुपुत्रो नरके यस्मात् सुपुत्रात् स्वर्ग एव हि ।
तस्माद् विनीतं सत्पुत्रं श्रुतवन्तं दयापरम् ॥३३॥

'कुपुत्र नरकमें गिराता है और सुपुत्रसे स्वर्ग भी सुलभ होता है। अतः विनयशील, विद्वान् और दयालु सत्पुत्रकी इच्छा करनी चाहिये ॥ ३३ ॥

विद्यया विनयो यस्माद् विद्यायुक्तं सुधार्मिकम् ।
इच्छेत् पुत्रं पुत्रकामः पुरुषो यत्नवान् बुधः ॥३४॥

'विद्यासे विनयकी प्राप्ति होती है, अतः पुत्रकी कामना-वाला प्रयत्नशील विद्वान् पुरुष विद्यायुक्त परम धार्मिक पुत्र पानेकी इच्छा करे ॥ ३४ ॥

तस्माद् दास्यामि ते पुत्रं विद्यावन्तं सुधार्मिकम् ।
एष गच्छामि पुत्रार्थं कैलासं पर्वतोत्तमम् ॥३५॥

'अतः मैं तुम्हें विद्वान् एवं परम धर्मात्मा पुत्र प्रदान

भविष्यपर्व ]चतुःसप्ततितमोऽध्यायः९७९

करूँगा। पुत्रकी प्राप्तिके लिये मैं अभी उत्तम पर्वत कैलासको जा रहा हूँ ॥ ३५ ॥

तत्रोपास्य महादेवं शंकरं नीललोहितम्।
ततो लब्धास्मि पुत्रं ते भवाद् भूतहिते रतात् ॥ ३६॥
'वहाँ नीललोहित वर्णवाले महान् देवता भगवान् शङ्करकी उपासना करके प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् शिवसे तुम्हारे लिये पुत्र प्राप्त करूँगा ॥ ३६ ॥

तपसा ब्रह्मचर्येण भवं शंकरमव्ययम्।
तोषयित्वा विरूपाक्षमादिदेवमजं विभुम् ॥३७॥
'तपस्या और ब्रह्मचर्य-पालनके द्वारा सबके उत्पादक अविनाशी अजन्मा सर्वव्यापी आदिदेव विरूपाक्ष भगवान् शंकरको संतुष्ट करके मैं उनसे पुत्र होनेका वर प्राप्त करूँगा ॥ ३७ ॥

गमिष्याम्यहमद्यैव द्रष्टुं शंकरमव्ययम्।
स च मे दास्यते पुत्रं तोषितस्तपसा मया ॥३८॥
'मैं आज ही अविनाशी भगवान् शङ्करका दर्शन करनेके लिये जाऊँगा। मेरेद्वारा किये गये तपसे संतुष्ट होकर वे मुझे पुत्र देंगे ॥ ३८ ॥

तत्र गत्वा महादेवं नमस्कृत्य सहोमया।
प्रविश्य बदरीं पुण्यां मुनिजुष्टां तपोमयीम् ॥ ३९॥
अग्निहोत्राकुलां दिव्यां गङ्गाम्बुप्प्लावितां सदा।
मृगपक्षिसमायुक्तां सिंहद्वीपिशताकुलाम् ॥४०॥
'वहाँ जाकर उमासहित महादेवजीको नमस्कार करके उन्हें संतुष्ट करूँगा। वहाँ पहुँचनेसे पहले मैं मुनियोंद्वारा सेवित तपोमयी पुण्यभूमि बदरीमें प्रवेश करूँगा, जो अग्निहोत्रके धूमसे व्याप्त है। वह दिव्य भूमि सदा गङ्गाजीके जलसे प्लावित रहती है। वहाँ पशु और पक्षियोंके समुदाय सब ओर विचरते हैं और सैकड़ों सिंह तथा व्याघ्र भरे रहते हैं ॥ ३९-४० ॥

बदरीफलसम्पूर्णां वानरक्षोभितद्रुमाम्।
वेत्रारूढमहावृक्षां कदलीखण्डमण्डिताम् ॥४१॥
'वह स्थान बेरके फलोंसे परिपूर्ण है। वानर वहाँके वृक्षोंको कम्पित करते रहते हैं। वहाँके विशाल वृक्षोंपर बेंतकी लताएँ फैली होती हैं। जहाँ-तहाँ केलोंके बगीचे उस स्थानकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ ४१ ॥

मुनिभिर्वेदतत्त्वार्थविचारनिपुणैः सदा।
वेदनिश्चिततत्त्वार्थैः प्रमाणकुशलैर्युताम् ॥४२॥
'वेदके तात्त्विक अर्थोंका विचार करनेमे निपुण, वेदके सुनिश्चित सिद्धान्तके ज्ञाता और प्रमाणकुशल मुनि सदा वहाँ निवास करते हैं ॥ ४२ ॥

इदमेकमिदं तत्त्वमिति निश्चितमानसैः।
उपास्यमानामन्यत्र सिद्धैः सिद्धार्थतत्परैः ॥४३॥
'यह एकमात्र अद्वितीय तत्त्व है, यही परमार्थ है, इस प्रकार मनसे निश्चय करनेवाले सिद्धार्थपरायण सिद्धजन जहाँ-तहाँ उस भूमिकी उपासना करते हैं ॥ ४३ ॥

इतिहासपुराणज्ञैः सेव्यमानां महर्षिभिः।
गच्छद्भिः खर्गनिलयं परित्यज्य कलेवरम् ॥४४॥
'इतिहास-पुराणके ज्ञाता महर्षि, जो शरीर छोड़नेके बाद स्वर्गलोकको जानेवाले हैं, उस भूमिकाय सेवन करते हैं ॥ ४४ ॥

प्रसिद्धां महतीं देवीं यास्यामि सुकृतालयाम्।
इत्युक्त्वा विररामैव देवदेवो जनार्दनः ॥४५॥
'इस प्रकार उस प्रसिद्ध पुण्यस्थली दिव्य एवं विशाल बदरीपुरीको जाऊँगा'—ऐसा कहकर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन चुप हो गये ॥ ४५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलास-यात्राविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥७३।


चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णका यादवसभामें अपनी कैलासयात्राका विचार प्रकट करते हुए नगरकी रक्षाके लिये यादवोंको सावधान रहनेका आदेश देना

वैशम्पायन उवाच

प्रभातायां तु शर्वर्यां गन्तुमैच्छज्जनार्दनः।
हुताग्निः कृतकल्याणः समाप्तवरदक्षिणः ॥ १ ॥
गाश्च दत्त्वाथ विप्रेभ्यो नमस्कृत्य द्विजोत्तमान्।
आस्थानमण्डपं कृष्णः प्रविवेश जगत्पतिः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब भगवान् श्रीकृष्णने अग्निहोत्र करके मङ्गलाचारके पश्चात् ब्राह्मणोंको उत्तम दक्षिणाएँ देकर उन्हें बहुत-सी गौएँ दीं और उन श्रेष्ठ द्विजोंको नमस्कार करके जगत्पति श्रीकृष्णने आस्थानमण्डप (सभाभवन) में प्रवेश किया ॥ १-२ ॥

आसनं महदास्थाय वृष्णीनाहूय सर्वशः।
बलभद्रं शिनेः पौत्रं हार्दिक्यं शुकसारणौ ॥ ३ ॥

९८० -श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


उग्रसेनं महाबुद्धिमुद्धवं नीतिमत्तरम्।
यस्य बुद्धिं समाश्रित्य जीवन्ते यादवाः सुखम् ॥ ४ ॥
वहाँ महान् सिंहासनपर बैठकर उन्होंने समस्त वृष्णिवंशी वीरोंको बुलाया। बलभद्र, सात्यकि, कृतवर्मा, शुक, सारण, राजा उग्रसेन तथा उन महाबुद्धिमान् एवं नीतिशास्त्रके महान् पण्डित उद्धवको भी बुलाया, जिनकी बुद्धिका आश्रय लेकर समस्त यादव सुखसे रहते थे ॥ ३-४ ॥

नेता च यदुवृष्णीनां स तु धर्मपरः सदा।
यस्य विभ्यति देवाश्च नीतेस्तस्य महात्मनः ॥ ५ ॥
वे सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले और वृष्णिवंशी यादवोंके नेता थे। उन महात्माकी नीतिसे देवता भी सदा भयभीत रहते थे ॥ ५ ॥

यस्य बुद्धिवलाद् विष्णुः शशास पृथिवीं सदा।
तं च वृष्णिवरं वीरमुद्धवं देवसुप्रभम् ॥ ६ ॥
अन्यांनपि यदून सर्वानुवाच भगवान् हरिः।
जिनके बुद्धिवलसे भगवान् श्रीकृष्ण सदा पृथिवीका शासन करते थे तथा जो देवताओंके समान परम कान्तिमान् एवं वृष्णिवंशके प्रमुख वीर थे, उन उद्धवको तथा अन्य यादवोंको भी बुलाकर भगवान् श्रीहरिने उन सबसे कहा—॥ ६½ ॥

श‍ृण्वन्तु मम वाक्यानि यादवाः सर्व एव हि।
श‍ृणु चापि वचो मह्यं पितुरुद्धव मे सखे ॥ ७ ॥
'समस्त यादव मेरी बातें सुनें ! मेरे पिताके मित्र उद्धवजी ! आप भी मेरा वचन सुनिये ॥ ७ ॥

बाल्यात्प्रभृति यो यत्नो मम दुष्टनिबर्हणे।
प्रत्यक्षं भवता दृष्टं पूतनानेधनं नृप ॥ ८॥
केशी च निहतो बाल्ये मया बालेन यादवाः।
गोवर्धनो धृतः शैलो गावश्च परिपालिताः ॥ ९ ॥
'नरेश्वर उग्रसेन ! बाल्यकालसे लेकर अबतक दुष्टोंका संहार करनेके लिये मेरेद्वारा जो प्रयत्न हुआ है, उसे आपने प्रत्यक्ष देखा है। यादवो ! बाल्यावस्थामें बालकरूपसे मैंने पूतनाको मारा, केशीका संहार किया, गोवर्धन पर्वत उठाया और गौओंकी रक्षा की ॥ ८-९ ॥

अभिषिक्तोऽस्मि शक्रेण देवानांमग्रतः स्थितः।
कंसोऽपि निधनं नीतो मया चाणूरमुष्टिकौ ॥१०॥
'मुझे देवताओंके आगे खड़ा करके देवराज इन्द्रने मेरा अभिषेक किया। मेरे हाथसे कंस मारा गया और चाणूर तथा मुष्टिकका भी संहार हुआ ॥ १० ॥

उग्रसेनोऽभिषिक्तश्च कृता द्वारवती मया।
अन्ये चापि नृपा राजन् बलिनो निहता मया ॥११॥
'महाराज उग्रसेनका अभिषेक हुआ और मैंने द्वारकापुरीका नवनिर्माण किया। राजन् ! अन्य बलवान् नरेश भी मेरेद्वारा मारे गये ॥ ११ ॥

योऽपि वीरो जरासंधो निगृहीतो बलान्मया।
भीमेन बलिना राजन्नयने मम यादवाः ॥१२॥
'यादवो ! और राजन् ! जो वीर राजा जरासंध था, उसका भी मैंने बलवान् भीमसेनके द्वारा बलपूर्वक दमन किया। मेरी नीतिके अनुसार ही जरासंधका संहार हुआ ॥ १२ ॥

शृगालो निहतः संख्ये गोमन्ताद् गच्छता मया।
योऽपि वीरो दुरात्मासौ दानवो नरको हतः ॥१३॥
'गोमन्त पर्वतसे जाते समय मैंने युद्धमें राजा शृगालका वध किया और वह जो वीर दुरात्मा दानव नरकासुर था, वह भी मेरे हाथसे मारा गया ॥ १३ ॥

निष्कण्टकमिमं लोकं कृतवान् राजसत्तमाः।
किं तु वीरो नृपो जज्ञे सखा भौमस्य यादवाः ॥१४॥
पौण्ड्रो वीर्यवतां नेता द्वेष्टा चासौ सदा मम।
'क्षत्रियशिरोमणि यादवो ! इस प्रकार मैंने इस लोकको निष्कण्टक (शत्रुहीन) बना दिया है। परंतु जो नरकासुरका सखा है, वह वीर राजा पौण्ड्रक अबतक शेष है। वह बलवानोंका नेता और मुझसे सदा द्वेष रखनेवाला है ॥१४½॥

शिष्यो द्रोणस्य राजेन्द्रो बली ब्रह्मास्त्रवित् कृती ॥१५॥
शास्त्रज्ञो नीतिमान् साक्षान्नेता सर्वस्य यत्नवान्।
योद्धा युद्धप्रियो राजा जामदग्न्य इवापरः ॥१६॥
'राजेन्द्र पौण्ड्रक द्रोणाचार्यका शिष्य, बलवान्, ब्रह्मास्त्रवेत्ता, रणकर्मकुशल, शास्त्रज्ञ, नीतिमान्, सबका साक्षात् नेता, यत्नशील, योद्धा और दूसरे परशुरामकी भाँति युद्धप्रेमी राजा है ॥ १५-१६ ॥

एकान्तशत्रुरस्माकं छिद्रान्वेपी सदा मम।
वाधिष्यते पुरीं योद्धाच्छिद्रं यदि लभेत सः ॥१७॥
'वह मेरा एकान्त शत्रु है और सदा मेरे छिद्र ढूँढ़ता रहता है। यदि वह थोड़ा-सा भी छिद्र पा जाय तो युद्धके लिये उद्यत होकर द्वारकापुरीको सताने लग जाय ॥१७॥

न ह्यल्पसाध्यो बलवान् पुण्ड्रस्येशो नृपोत्तमः।
यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु प्रगृहीतशरासनाः ॥१८॥
यथा न बाधते राजा पुरीं यदुकुलाश्रयाम्।
'श्रेष्ठ नरेशो ! पुण्ड्र देशका बलवान् राजा पौण्ड्रक थोड़े-से साधनोंद्वारा वशमें आनेवाला नहीं है। अतः आपलोग सदा धनुष लेकर युद्धके लिये तैयार खड़े रहें, जिससे यदुकुलकी निवासभूमि द्वारकापुरीको वह राजा पौण्ड्रक बाधा न दे सके ॥ १८½ ॥

अहं तु यास्ये कैलासं कुतश्चित् कारणान्नृपाः ॥१९॥

भविष्यपर्व ] पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः [ ९८१


शङ्करं द्रष्टुकामोऽस्मि भूतभावनभावनम् ।
यावदागमनं मह्यं तावद् यत्ता भवन्त्विह ॥२०॥

'नरेशो ! मैं किसी कारणवश कैलास पर्वतको जाऊँगा । वहाँ जाकर समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले भगवान् शंकरका दर्शन करना चाहता हूँ । जबतक मैं लौट न आऊँ तबतक आपलोग यहाँ नगरकी रक्षाके लिये सतत सावधान रहें ॥ १९-२० ॥

मया विरहितां चेमां यदि जानाति पुण्ड्रकः ।
आगमिष्यति राजेन्द्रो योत्स्यते च पुरीमिमाम् ॥२१॥

'यदि राजेन्द्र पौण्ड्रक यह जान लेगा कि मैं द्वारकापुरीमें नहीं हूँ तो वह अवश्य आक्रमण करेगा और इस नगरीके साथ युद्ध छेड़ देगा ॥ २१ ॥

इमां निर्यादवीं कर्तुं शक्नोतीति च मे मतिः ।
यत्ता भवत राजेन्द्र्राः खड्गैः पाशैः परश्वधैः ॥२२॥

'राजेन्द्रगण ! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि पौण्ड्रक इस पुरीको यादवोंसे सूनी कर सकता है; अतः आपलोग खड्ग, पाश और फरसे लेकर युद्धके लिये सदा तैयार रहें ॥ २२ ॥

पाषाणैः कर्षणीयैश्च सन्नद्धा भवत स्वकैः ।
पिधाय च कपाटानि महाद्वाराणि यत्नतः ॥२३॥

'पाषाणों तथा आकर्षण करनेवाले अपने यन्त्रोंके द्वारा आपलोग सदा सन्नद्ध रहें । बड़े-बड़े फाटकोंकी किवाड़ें बंद करके यत्नपूर्वक पुरीकी रक्षा करें ॥ २३ ॥

एक एव महाद्वारो गमनागमने सदा ।
मुद्रया सह गच्छन्तु राज्ञो ये गन्तुमीप्सवः ॥२४॥

'नगरसे बाहर आने-जानेके लिये एक ही सदा बड़ा फाटक काममें लाया जाय। जो बाहर जाना चाहते हों, वे राजाकी मुद्रा (पास) लेकर उसके साथ जा सकते हैं॥ २४॥

न चामुद्रः प्रवेष्टव्यो द्वारपालस्य पश्यतः ।
यावदागमनं मह्यं तावदेवं भविष्यति ॥२५॥

'जिसके पास राजाकी मुद्रा न हो, वह द्वारपालके देखते-देखते नगरमें प्रवेश न करने पावे। जबतक मैं लौटकर न आऊँ, तबतक ऐसी ही व्यवस्था रहेगी ॥ २५ ॥

मृगया नात्र कर्तव्या न च क्रीडा बहिः पुरात् ।
ज्ञातव्याश्च परे स्वे च गमनागमने सदा ॥२६॥

'इस बीचमें शिकार खेलना बंद कर दिया जाय, नगरसे बाहर जाकर क्रीड़ा न की जाय। गमनागमनके समय सदा अपने और परायेकी पहिचान की जाय ॥ २६ ॥

एवमादिक्रिया कार्या यावदागमनं मम ।
इत्युक्त्वा यादवान् सर्वान् सात्यकिं पुनराह च ॥२७॥

'जबतक मेरा आना न हो तबतक इसी तरहकी व्यवस्था करनी चाहिये।' समस्त यादवोंसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने पुनः सात्यकिसे इस प्रकार कहा ॥२७॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलास-यात्राविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥


पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णकी सात्यकि और उद्धवसे नगरकी रक्षाके विषयमें बातचीत तथा बलराम आदि यादवोंको भी रक्षाका भार सौंपकर उनका कैलासयात्राके लिये उद्यत होना

श्रीभगवानुवाच
सात्यके शृणु मद्वाक्यं यत्तो भव युधां वर ।
त्वं तु खड्गी गदी भूत्वा चापपाणिस्तनुत्रवान् ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले—योद्धाओंमें श्रेष्ठ सात्यके ! मेरी बात सुनो। तुम स्वयं कवच पहनकर तलवार, गदा और धनुष हाथमें लिये नगरकी रक्षाके लिये प्रयत्नशील रहो ॥ १ ॥

तिष्ठ यत्नेन रक्षस्व पुरीं बह्वनृपाश्रयाम् ।
न च निद्रा त्वया कार्या रात्रौ यदुनृप प्रभो ॥ २ ॥

यदुकुलतिलक प्रभावशाली वीर ! द्वारकापुरी बहुसंख्यक क्षत्रियोंकी निवासभूमि है । तुम यत्नपूर्वक खड़े रहो और इसकी रक्षा करो। तुम्हें रातभर नींद नहीं लेनी चाहिये ॥ २ ॥

न च व्याख्या त्वया कार्या शास्त्राणां शास्त्रतत्पर ।
न च वादस्त्वया कार्यों वादिभिः सह वृष्णिप ॥ ३ ॥

शास्त्रपरायण सात्यके ! आजसे तुम्हें शास्त्रोंकी व्याख्यामें भी नहीं लगना चाहिये । वृष्णिवंशका पालन करनेवाले वीर ! अब तुम्हें वादियोंके साथ वाद भी नहीं करना चाहिये ॥ ३ ॥

त्वं हि योद्धा बली ज्ञाता धनुर्वेदस्यवेदवित् ।
तथा कुरु यथा वीर नोपहास्या भवेदियम् ॥ ४ ॥

वीर ! तुम योद्धा, बलवान्, ज्ञानवान् और धनुर्वेद-

९८२ श्रीमद्भागवते खिलभागे [ हरिवंशे


नामक उपवेदके विद्वान् हो। अतः ऐसा प्रयत्न करो, जिससे यह पुरी उपहासका पात्र न बने ॥ ४ ॥

सात्यकिरुवाच

करिष्यामि वचस्तुभ्यं यथाशक्ति जनार्दन ।
आज्ञा तव जगन्नाथ धार्या यत्नेन मे सदा ॥ ५ ॥

जनार्दन ! मैं यथाशक्ति आपके इन वचनोंका पालन करूँगा । जगन्नाथ ! मुझे सदा यत्नपूर्वक आपकी आज्ञाको शिरोधार्य करना चाहिये ॥ ५ ॥

भृत्यवत् प्रचरिष्यामि कामपालस्य माधव ।
यावदागमनं तुभ्यं तावत्स्थास्यामि यत्नतः ॥ ६ ॥

माधव ! मैं भृत्यकी भाँति बलरामजीकी आज्ञाका अनुसरण करूँगा । जबतक आपका आना होगा, तबतक मैं यत्नपूर्वक पुरीकी रक्षामें लगा रहूँगा ॥ ६ ॥

प्रसादस्तव गोविन्द यदि स्यान्मयि माधव ।
किं नाम मे च दुःसाध्यं शत्रूणां निग्रहे रणे ॥ ७ ॥

गोविन्द ! माधव ! यदि आपकी कृपा मुझपर बनी रहे तो रणभूमिमें शत्रुओंका दमन करनेके लिये कौन-सा ऐसा कार्य है, जो मेरे लिये दुःसाध्य हो ॥ ७ ॥

यदि शक्रं यमं वापि कुवेरमपि पाशिनम् ।
सर्वानैतान् विजेष्यामि किमु पौण्ड्रं नृपोत्तमम् ॥ ८ ॥
गच्छ कार्यं कुरुष्वेदं यत्तोऽहं सततं हरे ।

यदि इन्द्र, यम, कुवेर अथवा पाशधारी वरुण भी युद्धके लिये आ जायें तो आपकी कृपासे इन सबपर विजय पा जाऊँगा; फिर नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकको पराजित करना कौन बड़ी बात है । हरे ! जाइये, अपना यह कार्य कीजिये । मैं सतत सावधान रहूँगा ॥ ८½ ॥

उद्धवं पुनराहेदं कृष्णः पद्मानिभेक्षणः ॥ ९ ॥
शृणूद्धव त्वं वाक्यं मे कुर्यास्त्वेतत् प्रयत्नवान् ।

तत्पश्चात् कमलनयन श्रीकृष्णने पुनः उद्धवसे इस प्रकार कहा—'उद्धवजी ! मेरी यह बात सुनिये और इसका प्रयत्नपूर्वक पालन कीजिये ॥ ९½ ॥

रक्ष्या नयेन राजेन्द्र पुरी द्वारवती त्वया ॥ १० ॥
यत्तो भव सदा तात कुरु साह्यमत्र नः ।
लज्जा मम समुत्पन्ना वदतस्तव साम्प्रतम् ॥ ११ ॥

'राजेन्द्र ! आपको अपनी नीतिसे द्वारकापुरीकी रक्षा करनी चाहिये । तात ! आप सदा सावधान रहें और इस विषयमें हमलोगोंकी सहायता करें । इस समय यहाँ सब बातें कहनेमें मुझे बड़ा संकोच होता है ॥ १०-११ ॥

त्वं हि नेता समस्तस्य विद्यापारस्य सर्वतः ।
को नु शक्ष्यति मेधावी वक्तुं विद्यावतः पुरः ॥ १२ ॥

'जो सब प्रकारसे विद्याओंमें पारंगत हैं, उन सबके आप ही नेता हैं । कौन मेधावी पुरुष आप-जैसे विद्वान्‌के समक्ष कोई बात कह सकेगा ॥ १२ ॥

यत् कार्यं तद् भवान् वेत्ति ह्यकार्यं वापि सर्वतः ।
अतोऽहं विरमे तात वक्तुं सम्प्रति वृष्णिप ॥ १३ ॥

'जो करनेयोग्य कार्य है, उसे आप जानते हैं । जो सर्वथा नहीं करनेयोग्य है, वह भी आपसे अज्ञात नहीं है; अतः वृष्णिवंशका पालन करनेवाले तात ! मैं इस समय कुछ कहनेसे विराम लेता हूँ' ॥ १३ ॥

उद्धव उवाच

किमिदं तव गोविन्द वर्तते मां प्रति प्रभो ।
अहो प्रसन्नता मह्यं किंतु प्रीतिरियं तव ॥ १४ ॥

उद्धव बोले—गोविन्द ! प्रभो ! मेरे प्रति आपके मुँहसे यह कैसी बात निकल रही है ? अहो ! यह मेरे लिये प्रसन्नताकी बात है; किंतु यह आपका प्रेम ही इस रूपमें प्रकट हुआ है ॥ १४ ॥

जानाम्यहं जगन्नाथ प्रसादस्यैष विस्तरः ।
यस्य प्रसन्नो भवति तस्य किं नास्ति केशव ॥ १५ ॥

जगन्नाथ ! मैं समझता हूँ कि यह मुझपर आपकी कृपाका विस्तार ही व्यक्त हुआ है । केशव ! जिसपर आप प्रसन्न होते हैं, उसमें कौन-सी विशेषता नहीं है ॥ १५ ॥

त्वं हि सर्वस्य जगतः कर्ता हर्ता प्रधानतः ।
प्रभवः सर्वकार्याणां वक्ता श्रोता प्रमाणवित् ॥ १६ ॥

आप ही समस्त जगत्‌के प्रधानतः स्रष्टा और संहारक हैं । आप ही समस्त कार्योंके कारण, वक्ता, श्रोता और प्रमाणवेत्ता हैं ॥ १६ ॥

ध्याता ध्यानमयो ध्येय इति ब्रह्मविदो विदुः ।
जेता देवरिपूणां च गोप्ता नाकसदाम् भवान् ॥ १७ ॥

ब्रह्मज्ञानी मुनि आपको ही ध्याता, ध्यान और ध्येयरूपमें जानते हैं । आप देवद्रोहियोंको जीतनेवाले और स्वर्गवासियोंके रक्षक हैं ॥ १७ ॥

त्वन्नाथा वयमेवेति जीवामो निहतद्विषः ।
इयं नीतिरहं मन्ये नेता नीतेर्यतो भवान् ॥ १८ ॥

हमारे तो आप ही स्वामी और संरक्षक हैं; इसीलिये हम जी रहे हैं और हमारे शत्रु मारे गये हैं । यही मेरी नीति है और इसीको मैं मानता हूँ, क्योंकि आप ही नीतिके नेता हैं।

को नु नाम नयो वेद त्वां विना साम्प्रतं वद ।
नीतिस्त्वं सर्वकार्याणामिति मे निश्चिता मतिः ॥ १९ ॥

वेदस्वरूप परमात्मन् ! कहिये, इस समय आपके सिवा दूसरा कौन नीतिमार्गका दर्शन करानेवाला है । मेरा तो यह निश्चित विचार है कि आप ही समस्त कार्योंकी नीति हैं ॥

भविष्यपर्व ] षट्सप्ततितमोऽध्यायः ९८३

दुर्गाढो नयमार्गोऽयमित्याहुस्तद्विदो जनाः।
चतुर्धा प्रोच्यते नीतिः सामदाने जनार्दन ॥२०॥
दण्डो भेदो मनुष्याणां निग्राहावग्रहे सदा।
दण्ड्येषु दण्डमिच्छन्ति समान्यं तु नये हरे ॥२१॥

इस नीतिमार्गमें प्रवेश करना बहुत ही कठिन है, ऐसा नीतिज्ञ पुरुष कहते हैं। जनार्दन ! चार प्रकारकी नीति बतलायी जाती है—साम, दान, दण्ड और भेद। मनुष्योंके निग्रह (दूसरेके द्वारा अपना अवरोध) और अवग्रह (अपने द्वारा दूसरोंका अवरोध) होनेपर सदा इन्हीं चार नीतियोंका प्रयोग होता है। हरे ! जो दण्डनीय (दुर्बल) हों, उन शत्रुओंके प्रति नीतिज्ञ पुरुष दण्ड-नीतिके ही प्रयोगकी इच्छा करते हैं और नीतिकी समता होनेपर अर्थात् शत्रु-के अपने समान बलशाली होनेपर उसके प्रति साम नीतिका ही प्रयोग अभीष्ट माना जाता है ॥ २०-२१ ॥

बलवत्स्वथ दानं तु त्रयाणामप्यगोचरे।
प्रयोक्तव्यो महाभेद इति नीतिमतां मतम् ॥२२॥

शत्रु बलवान् हों तो उनके प्रति दान-नीतिका प्रयोग उचित होता है (अर्थात् उन्हे कुछ भेंट देकर शान्त कर देना आवश्यक समझा जाता है)। जहाँ साम, दान और दण्ड—इन तीनों नीतियोंकी पहुँच न हो सके, वहाँ महान् 'भेद' का प्रयोग करना चाहिये, यह नीतिज्ञ पुरुषोंका मत है ॥ २२ ॥

तेषु तेष्वथ सर्वेषु प्रमाणं त्वां विदुर्बुधाः।
किमत्र बहुनोक्तेन सर्वं त्वयि समर्पितम् ॥२३॥

उन-उन सभी नीतियोंमें विद्वान् पुरुष आपको ही प्रमाण मानते हैं (आपने जिस अवसरपर जैसी नीतिका प्रयोग किया है, वहाँ वही उचित था, ऐसा लोगोंका मत है)। यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ ? सारा ज्ञान आपमें ही समर्पित है ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा विररामैव उद्धवो नीतिमत्तरः।
ततः स भगवान् विष्णुरेवमेव नृपोत्तम ॥२४॥
कामपालं महाबाहुमुवाच यदुसंसदि।
उग्रसेनं नृपं राजंस्तथा हार्दिक्यमेव च ॥२५॥
कामपालं पुनर्विष्णुरिदं प्रोवाच तत्त्ववित् ।
न प्रमादस्त्वया कार्यः सर्वदा यत्नवान् भव ॥२६॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर अतिशय नीतिमान् उद्धवजी चुप हो गये। राजन् ! तदनन्तर वे तत्त्ववेत्ता भगवान् श्रीकृष्णने इसी तरह यादव सभामें महाबाहु बलराम, महाराज उग्रसेन तथा कृतवर्मासे पूर्वोक्त बात कही। इसके बाद वे पुनः बलरामजीसे बोले—'भैया ! आपको प्रमाद नहीं करना चाहिये। आप सदा नगरकी रक्षाके लिये यत्नशील बने रहिये ॥ २४-२६ ॥

स्थिते त्वयि महाबाहो का पीडा जगतो भवेत्।
गदी भव सदा त्वार्य न क्रीडा सर्वदा भवेत् ॥२७॥

'महाबाहो ! आप रक्षाके लिये खड़े हो जायँ तो जगत्‌को क्या पीड़ा हो सकती है ? आर्य ! अब गदा उठाइये, सदा क्रीडा और मनोरञ्जनका ही अवसर नहीं होता है ॥

रक्ष त्वं सर्वदा यत्नात् पुरीं द्वारवतीं प्रभो।
नोपहास्या यथा स्याम तथा कुरु गदी भव ॥२८॥

'प्रभो ! आप सदा यत्नपूर्वक द्वारकापुरीकी रक्षा करें। हमें उपहासका पात्र न बनना पड़े, ऐसा प्रयत्न कीजिये और गदा लिये सदा रक्षाके लिये उद्यत रहिये ॥ २८ ॥

उत्साहः सर्वदा कार्यो निरुत्साहो न यत्नतः।
बाढमित्यब्रवीद् रामः कृष्णं वृष्णिकुलोद्भवम् ॥२९॥

'आपको सदा उत्साह बनाये रखना चाहिये। कभी उत्साहका अभाव न हो, इसके लिये यत्नशील रहना चाहिये।' तब बलरामजीने वृष्णिवंशावतंस श्रीकृष्णसे कहा—'बहुत अच्छा' ॥ २९ ॥

वृष्णयः सर्व एवैते स्वं स्वं सद्य समाययुः।
गन्तुमैच्छज्जगन्नाथः कैलासं पर्वतोत्तमम् ॥३०॥

उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके सभी वृष्णिवंशी अपने-अपने घरको लौट गये। तब जगन्नाथ श्रीकृष्णने पर्वतप्रवर कैलासको जानेका विचार किया ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलास-यात्रा-विषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥


षट्सप्ततितमोऽध्यायः

गरुड़पर आरूढ़ होकर श्रीकृष्णका बदरिकाश्रममें जाना, मार्गमें देवताओं-मुनियोंद्वारा उनकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच
ततः संचिन्तयामास गरुडं पक्षिपुङ्गवम्।
आगच्छ त्वरितं तार्क्ष्य इति विष्णुर्जगत्पतिः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर जगदीश्वर श्रीकृष्णने मन-ही-मन पक्षिराज गरुड़का चिन्तन करते हुए कहा—'तार्क्ष्य ! शीघ्र आओ' ॥ १ ॥

ततः स भगवांस्तार्क्ष्यो वेदराशिरिति स्मृतः।
बलवान् विक्रमी योगी शास्त्रनेत्रा कुरुद्वह ॥ २ ॥

९८४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

कुरुश्रेष्ठ ! तब भगवान् गरुड़ वहाँ आ पहुँचे, जिन्हें वेदकी राशिमाना गया है; वे बलवान्, पराक्रमी, योगी तथा शास्त्रों (शास्त्रज्ञों) के नेता हैं ॥ २ ॥
यज्ञमूर्तिः पुराणात्मा साममूर्द्धा च पावनः ।
ऋग्वेदपक्षवान् पक्षी पिङ्गलो जटिलाकृतिः ॥ ३ ॥
यज्ञ उनका स्वरूप है, वे पुराणात्मा और पावन हैं, सामवेद उनका मस्तक है, ऋग्वेद उनकी पाँखें हैं, पक्षधारी गरुड पिङ्गलवर्णके हैं, उनकी आकृति जटिल दिखायी देती है॥
ताम्रतुण्डः सोमहरः शक्रजेता महाशिराः ।
पन्नगारिः पद्मनेत्रः साक्षाद् विष्णुरिवापरः ॥ ४ ॥
उनकी चोंच ताँबेके समान लाल है । वे अमृतका हरण करनेवाले हैं । उन्होंने युद्धमें इन्द्रको जीत लिया था। उनका मस्तक विशाल है । वे सर्पोंके शत्रु हैं और साक्षात् दूसरे विष्णुकी भाँति कमलसदृश नेत्रोंसे सुशोभित होते हैं ॥ ४ ॥
वाहनं देवदेवस्य दानवीगर्भकृन्तनः ।
राक्षसासुरसंघानां जेता पक्षबलेन यः ॥ ५ ॥
वे देवाधिदेव भगवान् विष्णुके वाहन तथा दानव-पत्नियोंके गर्भका उच्छेद करनेवाले हैं । वे अपने पंखोंके बलसे राक्षसों और असुरोंके समूहपर विजय पाते हैं ॥ ५ ॥
प्रादुरासीन्महावीर्यः केशवस्याग्रतस्तदा ।
जानुभ्यामपतद् भूमौ नमो विष्णो जगत्पते ॥ ६ ॥
नमस्ते देवदेवेश हरे स्वामिन्निति ब्रुवन् ।
उस समय महापराक्रमी गरुड़ भगवान् केशवके सम्मुख प्रकट हुए और घुटनोंके बल पृथ्वीपर पड़पर प्रणाम करते हुए बोले—'जगत्पते ! विष्णो ! आपको नमस्कार है । देवदेवेश्वर ! हरे ! स्वामिन् ! आपके चरणोंमें मेरा प्रणाम है',॥
पस्पर्श पाणिना कृष्णः स्वागतं तार्क्ष्यपुङ्गवम् ॥ ७ ॥
इत्युवाच तदा तार्क्ष्यं यास्ये कैलासपर्वतम् ।
शूलिनं द्रष्टुमिच्छामि शङ्करं शाश्वतं शिवम् ॥ ८ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने गरुड़-जातिके पक्षियोंमें प्रधान गरुड़का अपने हाथसे स्वागतपूर्वक स्पर्श किया और उनसे तत्काल कहा—'मैं कैलासपर्वतको चलूँगा। सनातन देवता कल्याणस्वरूप भगवान् शङ्करका दर्शन करना चाहता हूँ' ॥
बाढमित्यब्रवीत् तार्क्ष्य आरुहौषं जनार्दनः ।
तिष्ठध्वमिति होवाच यादवान् पार्श्ववर्तिनः ॥ ९ ॥
तब गरुड़ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की । गरुड़पर आरूढ़ होकर भगवान् जनार्दनने आस-पास खड़े हुए यादवोंसे कहा—'तुम सब सतत सावधान रहना' ॥ ९ ॥
ततो ययौ जगन्नाथो दिशं प्रागुत्तरां हरिः ।
रवेण महता तार्क्ष्यस्त्रैलोक्यं समकम्पयत् ॥ १० ॥
तदनन्तर जगदीश्वर श्रीहरि पूर्वोत्तर दिशाकी ओर चले। गरुड़ने अपने महानादसे तीनों लोकोंको कम्पित कर दिया ॥
सागरं क्षोभयामास पद्भ्यां पक्षी व्रजंस्तदा ।
पक्षेण पर्वतान् सर्वान् वहन् देवं जनार्दनम् ॥ ११ ॥
भगवान् श्रीकृष्णका भार वहन करके आगे बढ़ते हुए पक्षी गरुड़ने अपने पैरोंसे समुद्रको क्षुब्ध कर दिया और पंखोंकी हवासे समस्त पर्वतोंको कम्पित कर दिया ॥ ११ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वा आकाशेऽधिष्ठितास्तदा ।
तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षं वाग्भिरिष्टाभिरीश्वरम् ॥ १२ ॥
उस समय गन्धर्वोसहित देवता आकाशमें खड़े हो प्रिय वचनोंद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे थे ॥ १२ ॥
जय देव जगन्नाथ जय विष्णो जगत्पते ।
जयाजेय नमो देव भूतभावनभावन ॥ १३ ॥
(वे कहते थे—) 'जगन्नाथ ! देव ! आपकी जय हो ! जगत्पते ! विष्णो ! आपकी जय हो ! अजेय परमेश्वर ! आपकी जय हो ! देव ! भूतभावनभावन ! आपको नमस्कार है ॥
नमः परमसिंहाय दैत्यदानवनाशन ।
जयाजेय हरे देव योगिध्येय परागत ॥ १४ ॥
'उत्तम नृसिंहरूपधारी आपको नमस्कार है । आप दैत्यों और दानवोंका नाश करनेवाले हैं । अजेय हरे ! आपकी जय हो ! देव ! आप योगियोंके ध्येय और परमगति-स्वरूप हैं ॥ १४ ॥
नारायण नमो देव कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
आदिकर्त्तः पुराणात्मन् ब्रह्मयोने सनातन ॥ १५ ॥
'नारायण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हरे ! हरे ! आदिकर्त्ता ! पुराणात्मन् ! ब्रह्मयोने ! सनातन देव ! आपको नमस्कार है ॥
नमस्ते सकलेशाय निर्गुणाय गुणात्मने ।
भक्तिप्रियाय भक्ताय नमो दानवनाशन ॥ १६ ॥
'सर्वेश्वर ! आपको नमस्कार है । आप निर्गुण एवं गुणस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है । आप भक्तिप्रिय और भक्तस्वरूप हैं । दानवनाशन ! आपको नमस्कार है ॥ १६ ॥
अचिन्त्यमूर्तये तुभ्यं नमस्ते सकलेश्वर ।
इत्यादिभिस्तदा देवं वाग्भिरीशानमव्ययम् ॥ १७ ॥
तुष्टुवुर्देवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः ।
'सकलेश्वर ! आपका स्वरूप अचिन्त्य है, आपको नमस्कार है ।' इस प्रकारके वचनोंद्वारा देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों, सिद्धों और चारणोंने अविनाशी ईश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया ॥ १७ १/२ ॥
शृण्वन्नेवं जगन्नाथः स्तुतिवाक्यानि तानि च ॥ १८ ॥
ययौ सार्धं सुरगणैर्मुनिभिर्वेदपारगैः ।
यत्र पूर्वं स्वयं विष्णुस्तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ १९ ॥
लोकवृद्धिकरः श्रीमांल्लोकानां हितकाम्यया ।
जगदीश्वर श्रीकृष्ण उन स्तुतिवचनोंको सुनते हुए वेदपारंगत मुनियों और देवताओंके साथ उस स्थानपर गये,

भविष्यपर्व ] षट्सप्ततितमोऽध्यायः [ ९८५


जहाँ पूर्वकालमें लोकवृद्धि करनेवाले साक्षात् भगवान् विष्णुने लोकहितकी कामनासे अत्यन्त कठोर तप किया था ॥
वर्षायुतं तपस्तप्तं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ २० ॥
यत्र विष्णुर्जगन्नाथस्तपस्तप्त्वा सुदारुणम् ।
द्विधाकरोत् स्वमात्मानं नरनारायणाख्यया ॥ २१ ॥
प्रभावशाली भगवान् विष्णुने दस हजार वर्षोंतक वहाँ तपस्या की थी। जगदीश्वर विष्णुने अत्यन्त कठोर तप करके वहाँ अपने-आपको नर और नारायण नामसे विख्यात दो स्वरूपोंमें अभिव्यक्त किया था ॥ २०-२१ ॥
गङ्गा यत्र सरिच्छ्रेष्ठा मध्ये धावति पावनी ।
यत्र शक्रः स्वयं हत्वा वृत्रं वेदार्थतत्त्वगम् ॥ २२ ॥
ब्रह्महत्याविनाशार्थं तपो वर्षायुतं चरत् ।
उस क्षेत्रके मध्यभागमें सरिताओंमें श्रेष्ठ पावनी गङ्गा प्रखर गतिसे प्रवाहित होती रहती हैं। जहाँ इन्द्रने वेदार्थतत्त्वके ज्ञाता वृत्रासुरका वध करके लगी हुई ब्रह्महत्याका विनाश करनेके लिये दस हजार वर्षोंतक तप किया था ॥
यत्र सिद्धाश्च सिद्धाः स्युर्ध्यात्वा देवं जनार्दनम् ॥ २३ ॥
यत्र हत्वा रणे रामो रावणं लोकरावणम् ।
एतच्छासनमिच्छंश्च तपो घोरमतप्यत ॥ २४ ॥
जहाँ भगवान् जनार्दनका ध्यान करनेसे ही सिद्ध पुरुषोंको सिद्धि प्राप्त हुई है। रणभूमिमें लोकको रुलानेवाले रावणका वध करके भगवान् श्रीरामने इन्द्रद्वारा पालित हुई शास्त्राज्ञाका पालन करनेकी इच्छासे जहाँ घोर तपस्या की थी॥
देवाश्च मुनयश्चैव सिद्धिं यान्ति शुचिव्रताः ।
यत्र नित्यं जगन्नाथः साक्षाद् वसति केशवः ॥ २५ ॥
देवता और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनि जहाँ सिद्धिको प्राप्त होते हैं और जहाँ जगदीश्वर केशव साक्षात् रूपसे नित्य निवास करते हैं ॥ २५ ॥
यत्र यज्ञाः प्रवर्तन्ते नित्यं मुनिगणैः सह ।
यस्याः स्मरणमात्रेण नरः स्वर्गं गमिष्यति ॥ २६ ॥
जहाँ मुनियोंके साथ यज्ञ नित्य होते रहते हैं। जिसके स्मरणमात्रसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है ॥ २६ ॥
स्वर्गसोपानमिच्छन्ति यां पुण्यां मुनिसत्तमाः ।
शत्रवो मित्रतां यान्ति यत्र नित्यं नृपोत्तम ॥ २७ ॥
यामाहुः पुण्यशीलानां स्थानमुत्तमधर्मिणाम् ।
यत्र विष्णुं समाराध्य देवाः स्वर्गं समाययुः ॥ २८ ॥
नृपोत्तम ! मुनिश्रेष्ठगण जिस पुण्यभूमिको स्वर्गकी सीढ़ी समझ उसे पानेकी इच्छा करते हैं तथा जहाँ शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। जिसे पुण्यशील उत्तम धर्मात्मा मनुष्योंका स्थान बताया गया है। जहाँ भगवान् विष्णुकी आराधना करके देवता स्वर्गलोकको प्राप्त होते हैं ॥ २७-२८ ॥
सिद्धक्षेत्रमिदं प्राहुर्ऋषयो वीतमत्सराः ।
विशालां बदरीं विष्णुस्तां द्रष्टुं सकलेश्वरः ॥ २९ ॥
सायाह्ने चामरगणैर्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
प्रविवेश महापुण्यमृषिजुष्टं तपोवनम् ॥ ३० ॥
मात्सर्यरहित ऋषि-मुनि जिसे सिद्ध पुरुषोंका क्षेत्र कहते हैं, उस विशाला बदरीका दर्शन करनेके लिये सर्वेश्वर श्रीकृष्णने सायंकालमें तत्त्वदर्शी मुनियों और देवताओंके साथ वहाँके परम पवित्र ऋषि-मुनिसेवित तपोवनमें प्रवेश किया ॥ २९-३० ॥
अग्निहोत्राकुले काले पक्षिव्याहारसंकुले ।
नीडस्थेषु विहङ्गेषु दुह्यमानासु गोषु च ॥ ३१ ॥
ऋषिष्वप्यथ तिष्ठत्सु मुनिवरेषु सर्वतः ।
समाधिस्थेषु सिद्धेषु चिन्तयत्सु जनार्दनम् ॥ ३२ ॥
अधिश्रितेषु हविषु ज्वाल्यमानेषु चाग्निषु ।
हूयमानेषु तत्रैव पावकेषु समन्ततः ॥ ३३ ॥
अतिथौ पूज्यमाने च संध्याविष्टे जगन्मणौ ।
स तस्यामथ वेलायां देवैः सह जनार्दनः ॥ ३४ ॥
विवेश बदरीं विष्णुर्मुनिजुष्टां तपोमयीम् ।
जिस समय सब ओर अग्निहोत्रकी आग प्रज्वलित हो चुकी थी, पक्षियोंके कलरवसे तपोवन गूंज रहा था, विहङ्गम अपने-अपने घोंसलोंमें आ बैठे थे, गौएँ दुही जा रही थीं, मुनियोंमें उत्साही ऋषि-महर्षि सब ओर खड़े थे, सिद्धलोग समाधिस्थ होकर भगवान् जनार्दनका चिन्तन करते थे, हवनीय घृत आगपर चढ़ा दिये गये थे, सब ओर अग्निहोत्रकी अग्नियाँ प्रज्वलित हो उठी थीं और उन अग्नियोंमें सब ओर आहुतियाँ दी जा रही थीं, अतिथियोंका सत्कार हो रहा था और जगत्को प्रकाशित करनेवाले सूर्य संध्याकालमें अस्त हो रहे थे, उसी वेलामें देवताओंके साथ सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्णने मुनिसेवित तपोमयी बदरीतीर्थकी भूमिमें प्रवेश किया ॥ ३१—३४ १/२ ॥
आश्रमस्याथ मध्यं तु प्रविश्य हरिरीश्वरः ॥ ३५ ॥
गरुडादवरुह्याथ दीपिकादीपिते तदा ।
प्रदेशे पुण्डरीकाक्षः स्थितस्तावत् सहामरैः ॥ ३६ ॥
बदरिकाश्रमके मध्यभागमें प्रवेश करके कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण दीपकोंसे प्रकाशित प्रदेशमें गरुड़से उतरकर देवताओंसहित खड़े हुए ॥ ३५-३६ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥

९८६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

देवताओंसहित श्रीकृष्णका बदरिकाश्रममें ऋषियोंद्वारा आतिथ्यसत्कार

वैशम्पायन उवाच

ततो मुनिगणा दृष्ट्वा देवदेवमुपस्थितम्।
समाप्य चाग्निहोत्राणि सम्पूज्यातिथिसत्तमान्॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तदनन्तर मुनि-गण देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णको उपस्थित हुआ देख अग्निहोत्र पूरा करके उनके पास आये और उन श्रेष्ठतम अतिथियोंके स्वागत-सत्कारमें लग गये ॥ १ ॥

मुनयो दीर्घतपसः समाधौ कृतनिश्चयाः।
जटिनो मुण्डिनः केचिच्छिद्राधमनिसंतताः॥ २ ॥

वे मुनि दीर्घकालतक तपस्या करनेवाले और समाधिमें दृढ़ निश्चयके साथ लगे रहनेवाले थे। किन्हींके सिरपर बड़ी-बड़ी जटाएँ थीं और बहुत-से मुनि मूँड़ मुड़ाये हुए थे। कितने ही इतने दुर्बल हो गये थे कि उनका सारा शरीर नस-नाड़ियोंसे व्याप्त दिखायी देता था (उसपर रक्त और मांसका आवरण नहीं था) ॥ २ ॥

निर्मज्जा नीरसाः केचिद् वेताला इव केचन।
अश्मकुट्टाशनपराः पर्णभक्षास्तथा परे॥ ३ ॥

कितने ही रक्त और मज्जासे हीन थे। कितने ही वेतालों-के समान दृष्टिगोचर होते थे। कुछ लोग पत्थरसे कूट-कूटकर खाद्यपदार्थोंको खाते थे। बहुत-से मुनि पत्ते चबाकर रहते थे ॥ ३ ॥

वेदविद्याव्रतस्नाता निराहारा महातपाः।
स्मरन्तः सर्वदा विष्णुं तद्भक्तास्तत्परायणाः॥ ४ ॥

कितने ही वेदविद्याके व्रतको पूर्ण करके स्नातक हो चुके थे। कितने ही निराहार रहकर महान् तप करते थे। वे भगवान् विष्णुके भक्त थे और सदा उन्हींका स्मरण करते हुए उन्हींके भजन-चिन्तनमें तत्पर रहते थे ॥ ४ ॥

आसन्नमुक्तयः केचित् केचिद् ध्यानैकतत्पराः।
ध्यानेन मनसा विष्णुं दृष्टवन्तस्तपोधनाः॥ ५ ॥

किन्हींकी मुक्ति संनिकट थी। कितने ही एकमात्र ध्यानमें ही संलग्न रहते थे। कितने ही तपोधन ध्यानमग्न चित्तसे भगवान् विष्णुका साक्षात् दर्शन करते थे ॥ ५ ॥

संवत्सराशिनः केचित् केचिज्जलविहारिणः।
शक्रस्य भयदातारः श्रुतिस्मृतिपरायणाः॥ ६ ॥

कोई एक वर्षपर आहार करनेवाले थे। कोई जलके भीतर निवास या जलमात्रका आहार करनेवाले थे। कोई श्रौत-स्मार्त शुभ कर्मोंमें तत्पर रहकर इन्द्रको भी भय प्रदान करते थे ॥ ६ ॥

वसिष्ठो वामदेवश्च रैभ्यो धूम्रस्तथैव च।
जावालिः कश्यपः कण्वो भरद्वाजोऽथ गौतमः॥ ७ ॥
अत्रिरश्वशिरा भद्रः शङ्खः शङ्खनिधिः कुणिः।
पाराशर्यः पवित्राक्षो याज्ञवल्क्यो महामनाः॥ ८ ॥
कक्षीवानङ्गिरश्चैव मुनिर्दीप्ततपास्तथा।
असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः॥ ९ ॥
एते चान्ये च मुनयो द्रष्टुमीश्वरमव्ययम्।
आदायार्घ्यं यथायोगमुटजात्स्वात्समाययुः॥ १० ॥

तात ! वसिष्ठ, वामदेव, रैभ्य, धूम्र, जावालि, कश्यप, कण्व, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, अश्वशिरा, भद्र, शङ्ख, शङ्खनिधि, कुणि, पाराशर्य, पवित्राक्ष, महामना याज्ञवल्क्य, कक्षीवान्, अङ्गिरा मुनि, दीप्ततपा, असित, देवल तथा महातपस्वी वाल्मीकि—ये और दूसरे मुनि अविनाशी ईश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये यथायोग्य अर्घ्य लिये अपनी-अपनी कुटियासे आये ॥ ७-१० ॥

ते च गत्वा हरिं कृष्णं विष्णुमीशं जनार्दनम्।
भक्तिनम्रास्तदा देवं प्रणेमुर्भक्तवत्सलम्॥ ११ ॥

उन्होंने वहाँ जाकर उस समय भक्तिभावसे विनम्र हो पापहारी सर्वव्यापी ईश्वर भक्तवत्सल जनार्दनदेव श्रीकृष्णको प्रणाम किया ॥ ११ ॥

नमोऽस्तु कृष्ण कृष्णेति देवदेवेति केशवम्।
प्रणवात्मञ्जगन्नाथ नताः स्म शिरसा हरे॥ १२ ॥

'श्रीकृष्ण ! आपको नमस्कार है। देवदेव ! कृष्ण ! केशव ! प्रणवात्मन् ! जगन्नाथ ! हरे ! हम आपके चरणोंमें सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं ॥ १२ ॥

कृष्ण विष्णो हृषीकेश केशवेति च सर्वदा।
प्रणामप्रवणा विप्राः प्राहुरित्यं जगत्पतिम्॥ १३ ॥

'कृष्ण ! विष्णो ! हृषीकेश ! केशव ! आपको सर्वदा नमस्कार है !' इस प्रकार उन जगदीश्वरको प्रणाम करते हुए ब्राह्मणोंने उपर्युक्त बात कही ॥ १३ ॥

इदमर्घ्यमिदं पाद्यमिदं विष्टरमेव च।
कृतार्थाः सर्वदा देव प्रसन्नो नो जगत्पतिः॥ १४ ॥

तत्पश्चात् वे कहने लगे—'भगवन् ! यह आपके लिये अर्घ्य है, यह पाद्य है और यह आसन है। देव ! आपके दर्शनसे हम सदाके लिये कृतार्थ हो गये। आप जगदीश्वर हमपर प्रसन्न हैं ॥ १४ ॥

किं कुर्मः किं नु नः कृत्यं कश्चिद् दोषः प्रभो हरे।
इति प्राञ्जलयः सर्वे प्राहुर्देवस्य पद्यतः॥ १५ ॥

'हम आपकी क्या सेवा करें ? हमारे लिये क्या कर्तव्य है ? प्रभो ! हरे ! हमसे कोई अपराध तो नहीं बन गया !' इस प्रकार सबने भगवान्‌के सामने हाथ जोड़कर यह विनययुक्त बात कही ॥ १५ ॥

भविष्यपर्व ] अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ९८७

कृष्णोऽपि तद् यथायोगमुपयुज्य सहामरैः।
कृतं सर्वं मुनिवरा वर्धतां तप उत्तमम्॥ १६॥
देवताओंसहित श्रीकृष्णने भी उनके दिये हुए अर्घ्य आदिका यथायोग्य उपयोग करके कहा—'मुनिवरो! आपलोगोंने हमारा पूरा सत्कार कर दिया। आपलोगोंका उत्तम तप बढ़े'॥
इति ब्रुवन् पुराणात्मा प्रीतस्तेन गरुत्मता।
आसनं लम्भयामास रात्रौ देवो जनार्दनः॥ १७॥
इस प्रकार कहते हुए पुराणपुरुष जनार्दनदेव श्रीकृष्णने गरुड़जीके साथ प्रसन्नतापूर्वक रात्रिमें आसन ग्रहण किया॥
कुशलं पृष्टवान् भूयो मुनीनां भावितात्मनाम्।
अग्निहोत्रेषु तपसि तथा भृत्येषु सर्वतः॥ १८॥
फिर उन्होंने पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंके अग्निहोत्र, तप और भृत्योंके भरण-पोषण आदि सभी कार्योंके विषयमें कुशल-समाचार पूछा ॥ १८ ॥
एवमादि जगन्नाथः पृष्टवानीश्वरस्तदा।
सर्वत्र कुशलं तेऽत्र ब्रूयुः कृष्णस्य सर्वतः॥ १९॥
इस तरह जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्णने जब उनसे कुशल-मङ्गल पूछा, तब वे श्रीकृष्णसे बोले--'प्रभो ! आपकी कृपासे हमें सर्वत्र कुशल है' ॥ १९ ॥
आतिथ्यं चक्रिरे ते तु नीवारैः फलमूलकैः।
देवानाम्थ सर्वेषां विष्णोः कृष्णस्य यत्नतः।
आतिथ्यमुपयुञ्जानस्ततः प्रीतोऽभवद्धरिः॥ २०॥
तत्पश्चात् उन ऋषियोंने नीवार और फल, मूल आदिके द्वारा समस्त देवताओं तथा विष्णुरूप श्रीकृष्णका यत्नपूर्वक आतिथ्य किया। उनका आतिथ्य ग्रहण करके भगवान् श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां सप्तसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७७ ॥


अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णकी समाधि, महान् कोलाहल और उनके पास भागते हुए मृग आदिका आगमन

वैशम्पायन उवाच

ततः स भगवान् विष्णुर्दुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः।
यत्र पूर्वं तपस्तप्तमात्मना यादवेश्वरः॥ १॥
गङ्गायाश्चोत्तरे तीरे देशं द्रष्टुमुपागतः।
स्वयमेव हरिः साक्षात् प्रविवेश तपोवनम्॥ २॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर जिनकी गतिका ज्ञान होना कठिन है, वे सर्वसमर्थ सर्वव्यापी भगवान् यदुनाथ गङ्गाजीके उत्तर तटपर उस स्थानको देखनेके लिये गये, जहाँ उन्होंने पूर्वकालमें स्वयं तप किया था। उन श्रीहरिने स्वयं ही उस साक्षात् तपोवनमे प्रवेश किया ॥ १-२ ॥
प्रविश्य सुचिरं देशं ददर्श च मनोरमम्।
निपसाद ततस्तस्मिन्नाश्रमे पुण्यवर्धनः॥ ३॥
उसमें प्रवेश करके वे उस परम सुन्दर एवं मनोरम देशका दर्शन करने लगे। तदनन्तर पुण्यकी वृद्धि करनेवाले भगवान् उस आश्रममें बैठे ॥ ३ ॥
समाधौ योजयामास मनः पद्मनिभेक्षणः।
किमप्येप जगन्नाथो ध्यात्वा देवेश्वरः स्थितः॥ ४॥
बैठनेके पश्चात् उन कमलनयन श्रीकृष्णने अपने मनको समाधिमें लगाया। वे देवेश्वर जगन्नाथ किसी अनिर्वचनीय तत्त्वका चिन्तन करते हुए उस समाधिमें दृढ़तापूर्वक स्थित हो गये ॥ ४ ॥
स्थिते देवगुरौ तत्र समाधौ दीपवद्धरौ।
तत्र शब्दो महाघोरः प्रादुरासीत् समन्ततः॥ ५॥
वायुशून्य स्थानमें निष्कम्पभावसे प्रज्वलित होनेवाले दीपकके समान जब वे देवगुरु श्रीहरि समाधिमें अविचलभावसे स्थित हो गये, तब वहाँ सब ओर बड़ा भयंकर शब्द प्रकट हुआ—॥ ५ ॥
खाद खादत मोदेत यात यात मृगानिमान्।
प्रेषयेह पुनः सर्वान् प्रसादाच्छार्ङ्गधन्वनः॥ ६॥
'खाओ ! खाओ ! मौज उड़ाओ ! जाओ ! जाओ इन मृगोंके पीछे। भगवान् श्रीहरिके प्रसादसे इन सबको फिर यहाँ हाँक लाओ ॥ ६ ॥
एष विष्णुरयं कृष्णो हरिरीश इतोऽच्युतः।
नमोऽस्तु विष्णो देवेश स्वामिन् माधव केशव॥ ७॥
'ये भगवान् विष्णु हैं ! ये श्रीकृष्ण हैं ! ये हरि ईश्वर अच्युत इधर बैठे हैं। विष्णो ! देवेश्वर ! स्वामिन् ! माधव ! केशव ! आपको नमस्कार है '॥ ७ ॥
इत्यादिशब्दः सुमहानाविरासीत् तदा निशि।
ततश्च सुमहानादः सिंहानां मृगविद्विषाम्॥ ८॥
इत्यादि रूपसे उस रातमें महान् कोलाहल होने लगा। तदनन्तर मृगद्रोही सिंह बड़े जोर-जोरसे दहाड़ने लगे ॥ ८ ॥
धावतां च शुनां राजन् मृगाननु विनर्दताम्।
मृगाणां भीतियुक्तानामृक्षाणां द्वीपिनां तथा॥ ९॥
गजानां नदतां राजन् बृंहितं च ततस्ततः।
महावातसमुद्भूतक्षुभितस्येव वारिधेः॥ १०॥

९८८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


राजन्! मृगोंके पीछे दौड़ते और भौंकते हुए कुत्तों, भयभीत मृगों, रीछों, व्याघ्रों और चिग्घाड़ते हुए हाथियोंका गर्जन चारों ओर इस प्रकार गूँजने लगा मानो प्रचण्ड वायुके वेगसे कम्पित एवं क्षुब्ध हुए महासागरका गम्भीर घोष सुनायी दे रहा हो॥ ९-१०॥

नादस्तैलोक्यवित्रासः प्रादुरासीत्तदा निशि।
श्रुत्वा शब्दं हरिर्देवस्तादृशं तत्र धिष्ठितः ॥ ११ ॥
समाधिक्षोभमासाद्य विश्वस्य च जगत्पतिः ।
ततः संचिन्तयामास कोऽयमेष महास्वनः ॥ १२ ॥

उस समय रात्रिमें तीनों लोकोंको भयभीत करनेवाला वह महानाद प्रकट हुआ। वैसे महान् कोलाहलको सुनकर वहाँ बैठे हुए सम्पूर्ण जगत्के अधिपति भगवान् श्रीकृष्णकी समाधि टूट गयी। वे सोचने लगे—'यह कैसा महान् कोलाहल हो रहा है ? ॥ ११-१२ ॥

कस्यायमीदृशः शब्दः स्तुतियुक्तो मम त्विति ।
अहोऽस्मिन् मृगयाशब्दः शुनां संचरतां वने ॥ १३ ॥
मृगाणामथ सर्वेषां नादश्च सुमहानयम्।
व्यामिश्रस्तुतियुक्ताभिर्वाग्भिर्मम समन्ततः ॥ १४ ॥

'यह किसका ऐसा शब्द सुनायी दिया है, जो मेरी स्तुतिसे युक्त है। अहो ! इस वनमें दौड़ते हुए कुत्ते और भागते हुए समस्त मृगोंका यह महान् कोलाहल, शिकार खेलनेकी यह बड़ी भारी आवाज आश्चर्यकी वस्तु है। चारों ओर फैला हुआ यह कोलाहल मेरी स्तुतिसे मिश्रित वचनों-द्वारा व्याप्त है' ॥ १३-१४ ॥

इति संचिन्त्य मनसा दिशो विप्रेक्ष्य सर्वतः ।
तत आस्ते हरिस्तत्र ज्ञातुं तस्य समुद्भवम् ॥ १५ ॥

मन-ही-मन ऐसा सोचकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर दृष्टि-पात करके उस महान् कोलाहलका कारण जाननेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ सावधान होकर बैठे ॥ १५ ॥

ततो मृगाः समाधावन् यत्र तिष्ठति केशवः ।
तांश्चैवानुचरो राजन् श्वगणः समपद्यत ॥ १६ ॥

राजन् ! इतनेहीमें बहुत-से मृग भागते हुए उधर ही आ निकले, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान थे। साथ ही उनका पीछा करता हुआ कुत्तोंका झुंड भी आ पहुँचा ॥

अथ वै दीपिका राजञ्छतशोऽथ सहस्रशः ।
ततस्तमोऽपि व्यनशद् दिवेव समपद्यत ॥ १७ ॥

राजन् ! तदनन्तर सैकड़ों और हजारों मशालें जल उठीं; जिनसे सारा अन्धकार नष्ट हो गया और दिनके समान प्रकाश फैल गया ॥ १७ ॥

ततो नु भूतसङ्घाश्च समदृश्यन्त तत्र ह ।
पिशाचाश्च महाघोरा नदन्तो बहु विस्वनम् ॥ १८ ॥
भक्षयन्तोऽथ पिशितं पिबन्तो रुधिरं बहु ।
प्रादुरासन् महाघोराः पिशाचा विकृताननाः ॥ १९ ॥

तत्पश्चात् वहाँ भूतोंके समुदाय दिखायी दिये । महा-भयंकर पिशाच गर्जते और भाँति-भाँतिके शब्द कर रहे थे। वे कच्चे मांस खाते और बहुत-सा रक्त पीते हुए वहाँ प्रकट हुए। उनका स्वरूप बड़ा भयंकर था। वे सभी पिशाच विकराल मुखवाले थे ॥ १८-१९ ॥

हन्यमाना हता राजन् पतन्तः पतिता मृगाः ।
इतश्चेतश्च धावन्तो बाणैर्विद्धा मृगा द्विपाः ॥ २० ॥

राजन् ! कितने ही मृग उन पिशाचोंद्वारा मारे गये और मारे जा रहे थे। कितने ही धराशायी हो चुके थे और बहुत-से तत्काल गिर रहे थे। बाणोंसे घायल हुए मृग और हाथी इधर-उधर भाग रहे थे ॥ २० ॥

ततो मृगसहस्राणि समुदीर्णानि भारत ।
यत्रासौ तिष्ठते देवस्तत्र याता निरन्तरम् ॥ २१ ॥
अन्तरीकृत्य देवेशं स्थितानीत्यनुशुश्रुम ।

भारत ! तत्पश्चात् जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण विराज रहे थे, वहाँ सहस्रों मृग लगातार भागते चले आये और देवेश्वर श्रीकृष्णको घेरकर खड़े हो गये। यह बात हमारे सुननेमें आयी है ॥ २१ १/२ ॥

पिशाच्यो विकृताकाराः कराला रोमहर्षणाः ॥ २२ ॥
पुत्रवत्यः समापेतुर्यत्र तिष्ठति केशवः ।

थोड़ी ही देरमें बहुत-सी विकृत आकारवाली विकराल पिशाचियाँ भी वहाँ आ पहुँचीं, जहाँ भगवान् केशव विराजमान थे। वे सब-की-सब पुत्रवती थीं, उनके दर्शनमात्रसे दूसरोंके रोंगटे खड़े हो जाते थे ॥ २२ १/२ ॥

श्वगणस्तत्र राजेन्द्र चरत्येवं ततस्ततः ॥ २३ ॥
ततः स भगवान् विष्णुः सर्वमालोक्य चेष्टितः ।
विस्मयं परमं गत्वा पश्यन्नास्ते स्म केशवः ॥ २४ ॥

राजेन्द्र ! इसी प्रकार कुत्तोंका समुदाय भी वहाँ आकर इधर-उधर विचरने लगा। तत्पश्चात् उन मृगोंद्वारा घिरे हुए वे विष्णुरूप भगवान् श्रीकृष्ण उन सबको वहाँ आया देख महान् आश्चर्यमें पड़कर उन सबकी ओर देखने लगे ॥ २३-२४ ॥

कस्यैष विस्तृतो नादः कस्य वायं जनोऽपतत् ।
को नु मां स्तौति भक्त्या वै भविष्ये प्रीतिमानहम् ॥ २५ ॥

वे सोचने लगे—'यह किसका महान् कोलाहल फैला हुआ है, अथवा यह किसका जन-समुदाय यहाँ आ पहुँचा है? कौन भक्तिभावसे मेरी स्तुति करता है? जिसके ऊपर मैं प्रसन्न होऊँगा ॥ २५ ॥

कस्य मुक्तिः समायाता प्रीते मयि सुदुर्लभा ।
इति संचिन्त्य भगवानास्ते प्राकृतवद्धरिः ॥ २६ ॥

'आज मेरे प्रसन्न होनेपर किसको परम दुर्लभ मुक्ति प्राप्त होना चाहती है।' इस प्रकार भगवान् श्रीहरि साधारण मनुष्य-के समान सोच-विचार करते हुए वहाँ बैठे रहे ॥ २६ ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्रा-विषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥

. भविष्यपर्व ] एकोनाशीतितमोऽध्यायः ९८९


एकोनाशीतितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णके समक्ष दो पिशाचोंका आगमन

वैशम्पायन उवाच
तेषामनु महाघोरौ पिशाचौ विकृताननौ ।
प्रांशू पिङ्गलरोमाणौ दीर्घजिह्वौ महाहनू ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन सबके पश्चात् दो महाभयंकर पिशाच वहाँ आये, जिनके मुख बड़े विकराल थे। वे दोनों ही ऊँचे कदके थे। उनके रोएँ पिङ्गल वर्णके थे। उनकी जिह्वाएँ बड़ी-बड़ी थीं और ठोड़ी बहुत चौड़ी थी ॥ १ ॥

लम्बकेशौ विरूपाक्षौ ही ही हा हेति वादिनौ ।
खादन्तौ मांसपिटकं पिबन्तौ रुधिरं बहु ॥ २ ॥
उन दोनोंके केश लंबे और नेत्र भयंकर थे। वे 'हा हा, ही ही' करते हुए बात करते थे और मांसकी पिटारीरूप शवका भक्षण करते तथा बहुत-सा रक्त पीते थे ॥ २ ॥

अन्त्रवेष्टितसर्वाङ्गौ दीर्घौ कृशकृशोदरौ ।
लम्बमानमहाप्रान्तशूलप्रोतशिरोधरौ ॥ ३ ॥
उनके सारे अङ्गोंमें दूसरे प्राणियोंकी आँतें लिपटी हुई थीं। वे विशालकाय थे; किंतु उनके पेट सटे हुए थे। वे लंबे और फैले हुए शूलोंमें पिरोये हुए नर-मुण्ड धारण किये हुए थे ॥ ३ ॥

कर्षन्तौ शवयूथानि बाहुभ्यां तत्र तत्र ह ।
हसन्तौ विविधं हासं स्वजातिसदृशं नृप ॥ ४ ॥
वदन्तौ बहुरूपाणि वचांसि प्राकृतानि च ।
और भुजाओं द्वारा जहाँ-तहाँसे झुंड-के-झुंड मुर्दे खींचे ला रहे थे। नरेश्वर ! वे दोनों पिशाच अपनी जातिके अनुरूप नाना प्रकारसे अट्टहास करते और भाँति-भाँतिके प्राकृत वचन बोलते थे ॥ ४ १/२ ॥

कम्पयन्तौ महावृक्षानूरुपादप्रघट्टनैः ॥ ५ ॥
सृक्किणी लेलिहन्तौ च दन्तान् कटकटायिनौ ।
अपनी जाँघों और पैरोंकी टक्करसे वे बड़े-बड़े वृक्षोंको भी हिला देते थे, जबड़े चाटते और दाँत कटकटाते थे ॥ ५ १/२ ॥

अस्थिस्नायुसमाकीर्णौ धमनीरज्जुसंततौ ॥ ६ ॥
वदन्तौ कृष्ण कृष्णेति माधवेति च संततम् ।
उनका सारा शरीर हड्डियों और स्नायुजालसे व्याप्त था; नस-नाड़ियाँ रस्सीकी भाँति सर्वत्र फैली दिखायी देती थीं। वे दोनों निरन्तर 'कृष्ण ! कृष्ण ! माधव !' इत्यादि नामोंका कीर्तन करते थे ॥ ६ १/२ ॥

कदा नु द्रक्ष्यते विष्णुः स इदानीं क्व तिष्ठति ॥ ७ ॥
स्वामिनः कुत्र वसतिः कुतो द्रष्टुं यतामहे ।
अत्र वा कुत्र देवेशः कुतो नु स्यात्सखे हरिः ॥ ८ ॥
वे कहते थे—'हमें भगवान् विष्णुका दर्शन कब होगा ? वे इस समय कहाँ होंगे ? हमारे स्वामी श्रीहरिका निवासस्थान कहाँ है ? हम किस तरह उनके दर्शनका प्रयत्न करें ? इस तपोवनमें देवेश्वर श्रीहरि कहाँ होंगे ? ॥ ७-८ ॥'

कुतः पद्मपलाशाक्षः साक्षादिन्द्रानुजो हरिः ।
यमाहुः पुण्डरीकाक्षं ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ ९ ॥
तमजं पुरुषं विष्णुं द्रष्टुमभ्युद्यता वयम् ।
'जो साक्षात् इन्द्रके छोटे भाई हैं तथा जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल हैं, वे श्रीहरि कहाँ मिलेंगे ? जिन्हें भक्तजन पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) कहते हैं और ब्रह्मज्ञानी पुरुष ब्रह्म कहते हैं, उन्हीं अजन्मा एवं सर्वव्यापी परम पुरुषका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं ॥ ९ १/२ ॥

अन्तकाले जगन्नाथं प्रविवेश जगत्त्रयम् ॥ १० ॥
तमजं विश्वकर्तारं कुतो द्रक्ष्याम साम्प्रतम् ।
'प्रलयकालमें ये तीनों लोक जिन जगदीश्वरमें प्रवेश कर जाते हैं, उन अजन्मा विश्वस्रष्टा श्रीहरिका हम इस समय कैसे दर्शन करेंगे ॥ १० १/२ ॥

यस्य विस्तार एवैष लोकः प्राणिनिवासिनः ॥ ११ ॥
तं द्रष्टुं देवमीशानं यतामः साम्प्रतं हरिम् ।
'जो समस्त प्राणियोंके निवासस्थान हैं, ये सम्पूर्ण लोक जिनका ही विस्तार (या विराट्रूप) है, उन्हीं सर्वेश्वर देव श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये इस समय हमलोग प्रयत्नशील हैं ॥ ११ १/२ ॥

दशा घोरतमा लोके विद्विष्टा सर्वजन्तुभिः ॥ १२ ॥
पैशाचीयं समुत्पन्ना कथं नौ प्राविशद् बलात् ।
नरमांसास्थिकलुषा सर्वभीतिप्रदायिनी ॥ १३ ॥
'सम्पूर्ण जन्तु जिससे द्वेष रखते हैं, जो जगत्में सबसे अधिक भयंकर अवस्था है, वही यह पिशाच-योनि न जानें हमें कैसे प्राप्त हुई ? और किस प्रकार बलपूर्वक हमारे भीतर प्रविष्ट हो गयी। यह मनुष्य और हड्डियोंको खानेके कारण कलुषित और सबको भय प्रदान करनेवाली है ॥ १२-१३ ॥

अहो नौ दुष्कृतं कर्म प्राक्तने कर्मसंचये ।
अत्रैव महती प्रीतिर्वर्तते सर्वदा तथा ॥ १४ ॥
'अहो ! हम दोनोंके पूर्वजन्मकी कर्मराशिमें केवल दुष्कर्मका ही संचय हुआ था, जिससे हमें यह कलङ्कित योनि प्राप्त हुई, तो भी हमें इसीमें सदा परम प्रसन्नता बनी रहती है ॥ १४ ॥

यावन्नौ दुष्कृतं कर्म तावत्स्थास्यति तादृशी ।
दशा सा सर्वविद्विष्टा प्राणिपीड़नकारिणी ॥ १५ ॥
जबतक हम दोनोंका दुष्कर्म शेष है, तबतक हमारी उन कर्मोंके अनुरूप ही यह पिशाचावस्था बनी रहेगी, जिससे

९९०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

समस्त प्राणी द्वेष रखते हैं तथा जो दूसरे जीवोंको केवल पीड़ा देनेवाली ही होती है ॥ १५ ॥

सर्वथा दुष्कृतं कर्म बहुभिर्जन्मसंचयैः ।
तथा हि तत्फलं घोरमद्यापि न निवर्तते ॥ १६ ॥
'निश्चय ही हमलोगों ने बहुत-से जन्मोंमें केवल पापकर्मों-का ही संचय किया है, तभी तो उसका घोर फल आजतक भी निवृत्त नहीं हुआ है ॥ १६ ॥

यतःस्म प्राणिनो हन्तुं श्वगणैः सह साम्प्रतम् ।
तथा हि प्राणिनो लोके बाल्यमादौ समास्थिताः ॥ १७ ॥
अज्ञानावृतचित्ताश्च कृत्याकृत्यं न जानते ।
तथा यौवनिनो भ्रान्ता विषयैर्बहुलीकृताः ॥ १८ ॥
यतन्ते श्रेयसे नैव ततो विषयसंस्थिताः ।
विषयाविष्टचित्ता हि मनुष्या न विजानते ॥ १९ ॥
'हम इस समय भी झुंड-के-झुंड कुत्ते साथ लिये प्राणियोंका वध करनेपर तुले हुए हैं। जगत्के प्राणी पहले बाल्यावस्थामें स्थित होते हैं, उस समय उनका चित्त अज्ञानसे आवृत्त होता है। इस कारण वे कर्तव्य और अकर्तव्यको नहीं जानते हैं। तदनन्तर जब वे युवावस्थामें प्रवेश करते हैं, उस समय विषयोंके आकर्षणसे उनकी बुद्धि भ्रान्त हो जाती है। साथ ही उनके पास विषयोंका संग्रह भी बढ़ जाता है। अतः विषयोंमें रचे-पचे रहकर वे कभी अपने कल्याणके लिये यत्न नहीं करते। जिनका चित्त विषयोंसे आविष्ट हो जाता है, वे मनुष्य यह नहीं समझ पाते कि कल्याणकारी कर्म क्या है ? ॥ १७-१९ ॥

तथा च वृद्धभावे तु व्याधिभिर्बहुभिर्वृताः ।
ज्वरादिभिर्महाघोरैर्नानादुःखविधायिभिः ॥ २० ॥
यतन्ते न हि वै श्रेयो विनष्टेन्द्रियगोचराः ।
'तत्पश्चात् जब वृद्धावस्था आती है, तब वे बहुत-सी व्याधियोंद्वारा घिर जाते हैं। नाना प्रकारके दुःख देनेवाले भयंकर ज्वर आदि रोग उन्हें धर दबाते हैं। फिर इधर-उधर भटकनेवाली इन्द्रियोंके वशीभूत होकर वे अपने कल्याणके लिये यत्न नहीं कर पाते ॥ २० १/२ ॥

ततो मृता गर्भवासे वसन्ति सततं नराः ॥ २१ ॥
विण्मूत्रकलिले घोरे दुःखैर्बहुभिरावृताः ।
'तदनन्तर मृत्यु हो जानेपर वे जीव गर्भवासमें आते हैं और विष्ठा एवं मूत्रकी कीचसे भरे हुए घोर गर्भाशयमें अनेक प्रकारके दुःखोंसे आक्रान्त होकर निरन्तर निवास करते हैं ॥ २१ १/२ ॥

च्यवन्ते तु ततो घोराद् गर्भात् संसारमण्डले ॥ २२ ॥
परस्परं विहिंसन्तः कुर्वन्तः कर्मसंचयम् ।
'इसके बाद वे उस घोर गर्भसे च्युत होकर पुनः संसार-चक्रमें पड़ जाते हैं। यहाँ भी वे एक दूसरेकी हिंसा करते हुए पापकर्मोंके ही संचयमें लगे रहते हैं ॥ २२ १/२ ॥

महत्येवं सदा घोरे संसारे दुःखसंकुले ॥ २३ ॥
पापानि बहुरूपाणि कुर्वतेऽज्ञानतस्तदा ।
'इस प्रकार दुःखोंसे भरे हुए महाघोर संसारमें वे अज्ञानवश सदा नाना प्रकारके पापकर्म ही किया करते हैं ॥ २३ १/२ ॥

संसारस्यैप महिमा विस्तृतः सर्वजन्तुषु ॥ २४ ॥
अच्छेद्यः शस्त्रसम्पातैरुपायैर्बहुभिः सदा ।
एतस्मान्न निवर्तन्ते मर्त्याः प्राकृतबुद्धयः ॥ २५ ॥
'संसारकी यह महत्ता (बन्धनकारी प्रभाव) सभी प्राणियोंमें विस्तारपूर्वक व्याप्त है। शस्त्रोंके प्रहारसे तथा और भी बहुत-से लौकिक उपायोंद्वारा इस संसारका उच्छेद नहीं किया जा सकता। ओछी बुद्धिवाले (देहात्मवादी) मनुष्य इस संसारसे विरक्त नहीं होते हैं ॥ २४-२५ ॥

इमं हत्वा मनुष्येन्द्रमिदमस्माद्धराम्यहम् ।
चोरयित्वा धनमिदं हरिष्याम्याददाम्यहम् ॥ २६ ॥
निर्भर्त्सयैनमिमं शान्तं हरिष्यामि धनं बली ।
इत्यादिव्याकुला मूर्खा यतन्ते प्राणिपीडनम् ॥ २७ ॥
'वे सोचते हैं कि—मैं इस नरेशका वध करके इससे यह धन हर लूँगा, इस धनको चुराकर घर ले जाऊँगा और उसे उपभोगमें लाऊँगा। यह शान्त और दुर्बल है और मैं बलवान् हूँ। मैं इसे डाँट-फटकारकर इसका धन हर लूँगा।' इन्हीं चिन्ताओंमें व्यग्र हुए मूर्ख मनुष्य दूसरे प्राणियोंको पीड़ा देनेका प्रयत्न करते रहते हैं ॥ २६-२७ ॥

अस्यैव दुःखमूलस्य संसारस्य सदा हरिः ।
भेषजं सर्वथा देवः शङ्खचक्रगदाधरः ।
आदिदेवः पुराणात्मा आत्मा ब्रह्मविदां सदा ॥ २८ ॥
'दुःखके मूल-कारण इस संसाररूपी रोगको सदाके लिये सब प्रकारसे मिटानेके निमित्त एकमात्र उत्तम ओषधि शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले, आदिदेव, पुराणपुरुष तथा ब्रह्मवेत्ताओंके आत्मा भगवान् श्रीहरि ही हैं ॥ २८ ॥

ते वयं सर्वयत्नेन द्रक्ष्यामः सर्वथा हरिम् ।
इत्थं पिशाचौ भाषन्तौ प्रादुरास्तां हरेः पुरः ॥ २९ ॥
'अतः हमलोग सर्वथा सम्पूर्ण प्रयत्न करके श्रीहरिका दर्शन करेंगे।' इस प्रकारकी बातें करते हुए वे दोनों पिशाच भगवान् श्रीकृष्णके सामने प्रकट हुए ॥ २९ ॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायामेकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राविषयक उन्नासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥

भविष्यपर्व ] अशीतितमोऽध्यायः ९९१


अशीतितमोऽध्यायः

घण्टाकर्ण और भगवान् श्रीकृष्णका एक दूसरेको अपना परिचय देना तथा घण्टाकर्णद्वारा भगवान् विष्णुका स्तवन एवं समाधि लाभ

वैशम्पायन उवाच
ततः स भगवान् विष्णुः पिशाचौ मांसभक्षकौ ।
ददर्शार्थ महाघोरौ दीपिकाधारिणौ हरिः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर उन भगवान् श्रीकृष्णने उन दोनों महाभयंकर मांसभक्षी पिशाचोंकी ओर देखा, जो हाथमें मशाल लिये वहाँ आये हुए थे ॥

विलोकर्याचक्रतुस्तौ पिशाचौ देवकीसुतम् ।
स्थितं सुखासने विष्णुं दृष्ट्वा लोकेश्वरेश्वरम् ॥ २ ॥
तौ च गत्वा समुद्देशं पिशाचौ केशवस्य ह ।
ततस्तावूचतुर्विष्णुमन्तरीकृत्य केशवम् ॥ ३ ॥

उन दोनों पिशाचोंने भी सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए लोकेश्वरोंके भी ईश्वर देवकीनन्दन श्रीकृष्णको देखा । उन्हें देखकर वे दोनों पिशाच उनके/केशवके निकट गये और उन्हें अपने बीचमे करके उनसे इस प्रकार बोले—॥ २-३ ॥

को भवान् कस्य वा मर्त्य कुतश्चागम्यते त्वया ।
किमर्थमिह सम्प्राप्तो वने घोरे मृगाकुले ॥ ४ ॥

'मानवप्रवर ! आप कौन हैं ? किसके पुत्र हैं ? कहाँसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है ? वन्यपशुओंसे भरे हुए इस घोर वनमें आप किस लिये आये हैं ? ॥ ४ ॥

निर्मनुष्ये द्वीपिवृते पिशाचगणसेविते ।
श्वापदैः सेव्यमाने च विपिने व्याघ्रसंकुले ॥ ५ ॥

'यह वन मनुष्योंसे रहित, चीतोंसे आवृत, पिशाचोंसे सेवित, हिंसक जन्तुओंका निवासस्थान तथा व्याघ्रोंसे भरा हुआ है ( इसमें आप क्यों आये ? ) ॥ ५ ॥

सुकुमारोऽनवद्याङ्गः साक्षाद् विष्णुरिवापरः ।
पद्मपत्रेक्षणः श्यामः पद्माभः श्रीपतिः स्वयम् ॥ ६ ॥

'आप बड़े सुकुमार प्रतीत होते हैं । आपका प्रत्येक अङ्ग अनिन्द्य सौन्दर्यसे सम्पन्न है । आप साक्षात् दूसरे विष्णुके समान जान पड़ते हैं । आपके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके सदृश सुन्दर एवं विशाल हैं । आपकी अङ्गकान्ति श्याम है । आप नील कमलके समान प्रकाशित होते हैं और साक्षात् श्रीपति-से प्रतीत होते हैं ॥ ६ ॥

अस्मत्प्रीतिकरः साक्षात् प्राप्तो विष्णुरिवापरः ।
देवो वा यदि वा यक्षो गन्धर्वः किन्नरोऽपि वा ॥ ७ ॥
इन्द्रो वा धनदो वापि यमोऽथ वरुणोऽपि वा ।
एकाकी विपिने घोरे ध्यानार्पितमना इव ॥ ८ ॥

'मानो हमे प्रसन्नता प्रदान करनेवाले साक्षात् भगवान् विष्णु दूसरा रूप धारण करके आपके रूपमे यहाँ पधारे हैं । आप देवता हैं या यक्ष, गन्धर्व हैं या किन्नर ? इन्द्र हैं या कुबेर ? अथवा यम हैं या वरुण ? जो इस भयंकर वनमें मनको ध्यानस्थ-सा करके अकेले बैठे हैं ॥ ७-८ ॥

ब्रूहि मर्त्य यथातत्त्वं ज्ञातुमिच्छामि मानद ।
एवं पृष्टः पिशाचाभ्यामाह विष्णुरुरुक्रमः ॥ ९ ॥
क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मनुष्याः प्रकृतिस्थिताः ।
यदुवंशे समुत्पन्नः क्षात्रं वृत्तममुष्ठितः ॥ १० ॥

'दूसरोंको मान देनेवाले मानव ! आप ठीक-ठीक बताइये, मैं यथार्थ रूपसे आपका परिचय जानना चाहता हूँ ।'

उन दोनों पिशाचोंके इस प्रकार पूछनेपर महान् डगवाले भगवान् विष्णु बोले—'मैं क्षत्रिय हूँ । प्राकृत मनुष्य मुझे ऐसा ही कहते और जानते हैं । यदुकुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिये क्षत्रियोचित कर्मका अनुष्ठान करता हूँ ॥ ९-१० ॥

लोकानामथ पातास्मि शास्ता दुष्टस्य सर्वदा ।
कैलासं गन्तुकामोऽस्मि द्रष्टुं देवमुमापतिम् ॥ ११ ॥

'मैं तीनों लोकोंका पालक तथा सदा ही दुष्टोंपर शासन करनेवाला हूँ । इस समय भगवान् उमापति देवका दर्शन करनेके लिये कैलासपर्वतपर जाना चाहता हूँ ॥ ११ ॥

इत्येवं मम वृत्तान्तः कथ्यतां कौ युवामिति ।
युवामिह समायातौ किमर्थं ब्राह्मणाश्रमम् ॥ १२ ॥

'यही मेरा वृत्तान्त है, अब अपना परिचय दो, तुम दोनों कौन हो ? यह तो ब्राह्मणका आश्रम है, यहाँ तुम किसलिये आये हो ? ॥ १२ ॥

एषा हि महती पुण्या नानाविप्रनिषेविता ।
बदरीयं समाख्याता न क्षुद्रैराश्रिता क्वचित् ॥ १३ ॥
तपस्विभिस्तपोयुक्तैर्जुष्टा सिद्धनिषेविता ।
श्वगणा नात्र दृश्यन्ते पिशाचा मांसभोजनाः ॥ १४ ॥

'यह महान् पुण्यमय स्थान है, इसे बदरी कहते हैं । बहुत-से ब्राह्मण यहाँ वास करते हैं, क्षुद्र स्वभाववाले दुष्टोंने कभी इस भूमिमे स्थान नहीं पाया है । सिद्ध पुरुषोने सदा इसका सेवन किया है, तपस्यामे लगे हुए तपस्वी यहाँ सब ओर निवास करते हैं । यहाँ आजकी तरह झुंड-के-झुंड कुत्ते कभी नहीं देखे गये और न कभी मांसभक्षी पिशाचोंका ही दर्शन हुआ ॥ १३-१४ ॥

न हन्तव्या मृगाश्चात्र मृगया नात्र वर्तते ।
न तु क्षुद्रैः प्रवेष्टव्या न कृतघ्नैर्न नास्तिकैः ॥ १५ ॥

'यहाँ मृगोंको नहीं मारना चाहिये, क्योंकि यहाँ कभी मृगया नहीं होती है । जो क्षुद्रस्वभाववाले कृतघ्न और नास्तिक मनुष्य हैं, उन्हें इस तीर्थमें कदापि प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥

९९२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

अहमस्य तु देशस्य रक्षिता नात्र संशयः।
व्यतिक्रमो यदि भवेत् तस्य शास्तास्मि यत्नतः ॥ १६ ॥
'मैं इस देशका रक्षक हूँ, इसमें संशय नहीं है। यदि किसीके द्वारा मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन हुआ तो मैं यत्नपूर्वक उसका शासन करूँगा ॥ १६ ॥

कौ भवन्तौ क्व नु युवां कस्येयं महती चमूः।
नातः परं प्रवेष्टव्यमृषयस्त्वत्र संस्थिताः ॥ १७ ॥
विघ्नस्तत्र प्रवर्तेत तपःसु च तपस्विनाम्।
'तुम दोनों कौन हो ? कहाँ रहते हो ? यह विशाल सेना किसकी है ? इससे आगे इस वनमें प्रवेश नहीं करना चाहिये, क्योंकि यहाँ ऋषि रहते हैं। उन तपस्वी ऋषियोंकी तपस्यामें विघ्न पड़ सकता है ॥ १७१/२ ॥

इहैव स्थीयतां तावद् वक्तव्यं च ततः सुखम् ॥ १८ ॥
अन्यथाहं निषेद्धा स्यां बलाद्वाक्यैस्तथैव च।
'सब लोग यहीं ठहर जायें और सुखपूर्वक बातें करें, अन्यथा मैं वाणीद्वारा तथा बलद्वारा भी रोकूँगा' ॥ १८१/२ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं पृष्टौ पिशाचौ तु वक्तुमेवोपचक्रतुः ॥ १९ ॥
तयोरेको महाघोरः पिशाचो दीर्घबाहुकः।
उवाच वचनं तत्र यथा हृदि समर्पितम् ॥ २० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार पूछे जानेपर उन दोनों पिशाचोंने उनके प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया। उन दोनोंमेंसे एक पिशाच बड़ा भयंकर और विशाल भुजाओंसे युक्त था। उसके हृदयमें जैसी बात थी, उसीको वह वहाँ सुनाने लगा ॥ १९-२० ॥

पिशाच उवाच
श्रूयतामभिधास्यामि समाहितमना भव।
नमस्कृत्य जगन्नाथं हरिं कृष्णं जगत्पतिम् ॥ २१ ॥
आदिदेवमजं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम्।
वक्ष्यामि सकलं यद्वत् तथा शृणु यदीच्छसि ॥ २२ ॥
पिशाच बोला—अच्छा ! बताता हूँ, सुनिये और अपने चित्तको एकाग्र कर लीजिये। मैं पहले आदिदेव, अजन्मा, सर्वश्रेष्ठ, निष्पाप, पवित्र, पापहारी, जगदीश्वर, विश्वपालक, सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् विष्णुको नमस्कार करके अपना सारा वृत्तान्त आपको ठीक-ठीक बताऊँगा, यदि आप सुनना चाहते हों तो सुनिये ॥ २१-२२ ॥

घण्टाकर्णोऽस्मि नाम्नाहं पिशाचो घोरदर्शनः।
मांसादो विकृतो घोरः साक्षान्मृत्युरिवापरः ॥ २३ ॥
मैं घण्टाकर्ण नामसे प्रसिद्ध पिशाच हूँ, मेरी दृष्टि बड़ी भयंकर है। मैं मांसभक्षी, विकृताङ्ग, घोर तथा साक्षात् दूसरे कालके समान प्राणियोंका हिंसक हूँ ॥ २३ ॥

धनदस्यानुगन्ताहं साक्षाद् रुद्रसखस्य च।
ममायमनुजः साक्षादन्तकस्यान्तको ह्ययम् ॥ २४ ॥
भगवान् शङ्करके सखा साक्षात् कुबेरका मैं अनुचर हूँ। यह मेरा सगा छोटा भाई है, जो कालका भी काल है ॥ २४ ॥

मृगयेयं सुमहती विष्णोः पूजार्थमुद्यता।
ममेयं वर्तते सेना श्वगणोऽपि ममैव तु ॥ २५ ॥
यह जो बड़ा भारी शिकार खेला जा रहा है, इसका उद्देश्य है भगवान् विष्णुकी पूजा। यह सेना मेरी है और यह कुत्तोंका झुंड भी मेरा ही है ॥ २५ ॥

आगतोऽहं महाशैलात् कैलासाद् भूतसेवितात्।
अहं पिशाचभावेन संविष्टः पापकर्मकृत् ॥ २६ ॥
मैं भूतोंसे सेवित महापर्वत कैलाससे यहाँ आया हूँ, पिशाच-वेषमें घिरा हुआ पापकर्मी हूँ ॥ २६ ॥

सततं दूषयन् विष्णुं घण्टामाबध्य कर्णयोः।
मम न प्रविशेन्नाम विष्णोरिति विचिन्तयन् ॥ २७ ॥
पहले मैं सदा विष्णुकी निन्दा करता था और कानोंमें घण्टा बाँधकर घूमता था कि कहीं मेरे इन कर्णकुहरोंमें विष्णुका नाम न प्रविष्ट हो जाय, मुझे सदा इसीकी चिन्ता बनी रहती थी ॥ २७ ॥

अहं कैलासनिलयमासाद्य वृषभध्वजम्।
आराध्य तं महादेवमस्तुवं सततं शिवम् ॥ २८ ॥
एक दिन कैलासवासी भगवान् शङ्करके पास पहुँचकर मैंने महादेव शिवकी आराधना की और तभीसे मैं निरन्तर उनके स्तवनमें लगा रहा ॥ २८ ॥

ततः प्रसन्नो मामाह वृणीष्वेति वरं हरः।
ततो मुक्तिर्मया तत्र प्रार्थिता देवसंनिधौ ॥ २९ ॥
इससे प्रसन्न हो भगवान् शङ्करने मुझसे कहा—'तुम कोई वर माँगो।' तब मैंने महादेवजीके समीप मुक्तिके लिये प्रार्थना की ॥ २९ ॥

मुक्तिं प्रार्थयमानं मां पुनराह त्रिलोचनः।
मुक्तिप्रदाता सर्वेषां विष्णुरेव न संशयः ॥ ३० ॥
मुक्तिके लिये प्रार्थना करते देख भगवान् त्रिलोचन फिर मुझसे बोले—'सबके लिये मुक्ति प्रदान करनेवाले तो केवल भगवान् विष्णु ही हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ ३० ॥

तस्माद् गत्वा च बदरीं तत्राराध्य जनार्दनम्।
मुक्तिं प्राप्नुहि गोविन्दान्नरनारायणाश्रमे ॥ ३१ ॥
'अतः तुम बदरीतीर्थमें जाकर वहाँ नर नारायणके आश्रममें श्रीजनार्दनकी आराधना करके उन्हीं गोविन्ददेवसे मोक्ष प्राप्त करो' ॥ ३१ ॥

इत्युक्तो देवदेवेन शूलिना शातवाहनम्।
तमेव परमं मन्वा गोविन्दं गरुडध्वजम् ॥ ३२ ॥
तस्मात् प्रार्थयमानः सन्मुक्तिं देशममुं गतः।
देवाधिदेव शूलधारी शिवके ऐसा कहनेपर मैंने गरुडध्वज गोविन्दके महत्त्वको समझा और उन्हींको सबसे श्रेष्ठ मानकर उनसे अपनी मुक्तिके लिये प्रार्थना करनेके उद्देश्यसे मैं इस देशमें आया हूँ ॥ ३२१/२ ॥

भविष्यपर्व ] अशीतितमोऽध्यायः ९९३


अन्यच्च शृणु मे कार्यं यदि कौतूहलं तव ॥ ३३ ॥
पुरी द्वारवती नाम पश्चिमस्योदधेस्तटे ।
यदुवृष्णिसमाकीर्णा सागरोर्मिसमाकुलाम् ॥ ३४ ॥
अध्यास्ते स हरिविष्णुस्तां पुरीं पुरुषोत्तमः ।
यदि तुम्हें कौतूहल हो, तो मेरे दूसरे कार्यको भी सुनो। पश्चिम समुद्रके तटपर द्वारवती नामसे प्रसिद्ध एक पुरी है, जिसमें यदु एवं वृष्णिवंशके लोग रहते हैं। वह पुरी समुद्रकी लहरोंसे व्याप्त है। उसीमें इस समय पुरुषोत्तम भगवान् श्रीहरि निवास करते हैं ॥ ३३-३४½ ॥

द्रष्टुं लोकहितार्थाय वसन्तं द्वारकापुरे ॥ ३५ ॥
निर्गतः साम्प्रतं मर्त्य वयमेतैः सहानुगैः ।
विष्णुः सर्वेश्वरः साक्षाद्द्रष्टव्योऽस्माभिरद्य वै ॥ ३६ ॥
मर्त्य ! लोकहितके लिये द्वारकापुरीमे निवास करनेवाले उन भगवान्का दर्शन करनेके उद्देश्यसे हम इन अनुचरोंके साथ इस समय निकले हैं। आज हमें साक्षात् सर्वेश्वर श्रीविष्णुका दर्शन करना है ॥ ३५-३६ ॥

लोकानां प्रभवः पाता कर्ता हर्ता जगत्पतिः ।
आदिः स हि समस्तस्य प्रभवः कारणं हरिः ॥ ३७ ॥
वे श्रीहरि ही सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके कारण, पालक, कर्ता, हर्ता, जगदीश्वर, सबके आदिपुरुष, उद्गमस्थान और बीज हैं ॥ ३७ ॥

कर्ता समस्तस्य हरिः पुरातनः
प्रभुः प्रभूणामपि यः सदात्मकः ।
तमादिदेवं वरदं वरेण्यं
द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः ॥ ३८ ॥
जो श्रीहरि समस्त जगत्के कर्ता, पुराण-पुरुष, प्रभुओंके भी प्रभु और सत्वरूप हैं, उन आदिदेव, वरदायक एवं वरेण्य भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये इस समय हम सब लोग उद्यत हैं ॥ ३८ ॥

यस्य प्रसादाज्जगदेवमासीत्
सप्राणिगन्धर्वमहोरगौघम् ।
देवं जगद्योनिमजं जनार्दनं
द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः ॥ ३९ ॥
जिनके कृपा-प्रसादसे प्राणियों, गन्धर्वों और बड़े-बड़े नागोंके समुदायसे युक्त यह जगत् इस रूपमें प्रकट हुआ था, उन जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत अजन्मा देव जनार्दन हरिका दर्शन करनेके लिये इस समय हम सब लोग उद्यत हैं ॥ ३९ ॥

यस्योदराद् विश्वमिदं प्रसूतं
लयं च तस्मिन् समुपैति कल्पे ।
तस्यैव साक्षाद् वशवर्ति विश्वं
द्रक्ष्याम देवं पुरुषोत्तमं हरिम् ॥ ४० ॥
कल्पके आरम्भमें जिनके उदरसे यह विश्व प्रकट होता है और कल्पके अन्तमें पुनः उसीमे लीन हो जाता है। स्थितिकालमें भी यह सारा विश्व जिन साक्षात् श्रीहरिके ही अधीन रहता है, उन पुरुषोत्तमदेव श्रीहरिका हम दर्शन करेंगे ॥

स्रष्टा च योऽसौ सकलस्य देवः
पाता च हर्ता च हरिः स एव ।
द्रक्ष्याम नित्यं भुवनेश्वरं हरिं
पुराणमार्यं प्रभविष्णुमव्ययम् ॥ ४१ ॥
जो विष्णुदेव इस सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा हैं तथा जो श्रीहरि ही इसका पालन और संहार करनेवाले भी हैं, उन आदिपुरुष, पुरातन देवता, प्रभावशाली, अविनाशी, नित्यस्वरूप, भुवनेश्वर श्रीहरिका हम नित्य दर्शन करेंगे ॥ ४१ ॥

अजस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता
भुवश्च कर्ता हरिरेक एव ।
तं योगिनो योगविशुद्धबुद्धिं
लभेम तेनैव मतिः समाकुला ॥ ४२ ॥
वे एकमात्र श्रीहरि ही अजन्मा ब्रह्माजीके भी उत्पादक, जगत्के रक्षक और भूतलके निर्माता हैं। योगसे विशुद्ध बुद्धिवाले उन परमेश्वरको हमलोग ध्यानयोगकी साधना करके प्राप्त करेंगे। हमारी चित्तवृत्ति उन्हींसे व्याप्त है ॥ ४२ ॥

निगीर्य विश्वं सकलं जगत्पतिः
शेते शिशुत्वं समवाप्य साक्षात् ।
वटस्य पत्रे जगतां निवासः
पादौ च विक्षिप्य करौ विधुन्वन् ॥ ४३ ॥
जगत्के पालक और तीनों लोकोंके निवास-स्थान श्रीहरि प्रलयकालमें सम्पूर्ण विश्वको अपने भीतर निगलकर साक्षात् शिशुभावको प्राप्त हो अक्षयवटके पत्रपर दोनों पैर फेंकते और हाथ हिलाते हुए शयन करते हैं ॥ ४३ ॥

यस्योदरे देवमुनिः पुरातनो
ददर्श लोकानखिलान् स मायया ।
प्रविश्य विश्वं सकलं यथावद्
बहिर्यथाभूतमभूदिदं महत् ॥ ४४ ॥
जिनके उदरमें प्रवेश करके पुरातन देवर्षि मार्कण्डेय मुनिने उन्हींकी मायासे इन सम्पूर्ण लोकोंका दर्शन किया था। उस समय वहाँ यह सारा महान् विश्व यथावत् रूपसे उसी प्रकार स्थित था, जैसा कि पहले उनके उदरसे बाहर अनुभवमें आया था ॥ ४४ ॥

निगीर्य विश्वं जगदादिकाले
शेते महात्मा जलधेर्घलौघे ।
देव्या श्रिया चामरलोलहस्तया
निषेव्यमाणः पुरुषोत्तमस्तदा ॥ ४५ ॥
पूर्वकालमें इस सम्पूर्ण जगत्को अपने भीतर लीन करके वे महात्मा पुरुषोत्तम एकार्णवके जलप्रवाहमें शयन करते थे और देवी लक्ष्मी हाथसे चँवर डुलाती हुई उनकी सेवा कर रही थीं ॥ ४५ ॥

नाभेश्च यस्याविरभूत् सपद्मं
पद्मं महत्कार्त्तस्वरप्रभं प्रभोः ।
जन्मास्पदं लोकगुरोर्यदासी-
द्विस्तारि पद्मं जगदादिसृष्टौ ॥ ४६ ॥


म० ६० ३२'-

१९४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

जगतकी सृष्टिके प्रारम्भकालमें जिन भगवान्‌की नाभिसे सुवर्णके समान कान्तिमान् एक विशाल कमल प्रकट हुआ, जो अपने दलोंके साथ सुशोभित होता था । वह विस्तृत कमल ही लोकगुरु ब्रह्माजीका जन्मस्थान था ॥ ४६ ॥

दधार यो भूतपतिर्महान्महीं दंष्ट्राग्रसंस्थापितरूढमूलम् । नादं महामेघ इवादिकाले कुर्वन् वराहो मुनिगीतमूर्तिः ॥ ४७ ॥ हरिः पुराणः पुरुषोत्तमः प्रभुः कर्ता समस्तस्य समस्तसाक्षी । यज्ञात्मको यज्ञपतिर्जगत्पति- र्द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः ॥ ४८ ॥

जिन महान् भूतनाथ विष्णुने आदिकालमें मुनियोंद्वारा प्रशंसित विग्रहवाले वराहरूप होकर महान् मेघके समान गर्जना करते हुए अपनी दाढ़के अग्रभागपर पृथ्वीके मूल भागको स्थापित करके उसे जलसे ऊपर उठाया था, जो पुराण-पुरुषोत्तम प्रभु श्रीहरि समस्त जगत्के कर्ता, साक्षी, यज्ञरूप एवं यज्ञके अधिपति हैं और समस्त जगत्का पालन करते हैं, उन्हीं परमेश्वरका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं ॥ ४७-४८ ॥

केचिद् बहुत्वेन वदन्ति देव- मेकात्मना केचिदिमं पुराणम् । वेदान्तसंस्थापितसत्त्वयुक्तं द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः ॥ ४९ ॥

कोई आराधक उन विष्णुदेवका इन्द्र आदि अनेक देवताओंके रूपमें वर्णन करते हैं और कोई उपासक इन पुराण-पुरुषका एक रूपमें ही चिन्तन करते हैं । वेदान्त-शास्त्रमें प्रतिपादित विशुद्ध अद्वैत सत्तासे युक्त उन परमेश्वर-का दर्शन करनेके लिये हमलोग उद्यत हुए हैं ॥ ४९ ॥

अनेकमेके बहुधा वदन्ति श्रुतिस्मृतिन्यायविविष्टचित्ताः । आहुर्यमात्मानमजं पुराविदो द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः ॥ ५० ॥

एक श्रेणीके विद्वान् श्रुति-स्मृति और न्यायमें अपने चित्तको लगाये रखकर जिन परमेश्वरका अनेक रूपोंमें अनेक प्रकारसे वर्णन करते हैं तथा पुराणवेत्ता पुरुष जिन्हें सबका आत्मा और अजन्मा बताते हैं, उन्हीं सर्वेश्वरका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं ॥ ५० ॥

यं प्राहुरीड्यं वरदं वरेण्य- मेकान्ततत्त्वं मुनयः पुरातनाः । यं सर्वगं देवमजं जनार्दनं द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः ॥ ५१ ॥

जिन्हें प्राचीन मुनि स्तुति करनेके योग्य, वरदायक, वरेण्य और परमतत्त्वरूप बताते हैं । साथ ही जिन्हें सर्वव्यापी और अजन्मा कहते हैं, उन्हीं जनार्दनदेव श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये हमलोग इस समय उद्यत हुए हैं ॥ ५१ ॥

यस्मिन् विश्वमिदं प्रोतमादिकाले जगत्पतौ । तं द्रष्टुमभिसंवृत्ताः किं नु वक्ष्याम साम्प्रतम् ॥ ५२ ॥

आदिकालमें जिन सूत्रस्वरूप जगदीश्वरमें यह सम्पूर्ण जगत् मनकेकी भाँति पिरोया गया था, उन्हीं भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं । अब इस समय और क्या कहें ? ॥ ५२ ॥

गच्छामो वयमन्यत्र गच्छ त्वं काममन्यतः । नियमोऽप्यस्ति नो मर्त्य यथेष्टं गच्छ साम्प्रतम् ॥ ५३ ॥ रात्रिमध्यमनुप्राप्तं नात्र कार्या विचारणा ।

मर्त्य ! अब हम अन्यत्र जाते हैं । तुम भी इच्छानुसार और कहीं जा सकते हो । हमारे नित्य नियमका भी समय आ गया है; क्योंकि आधी रात हो गयी, अतः इस समय तुम इच्छानुसार जहाँ चाहो, चले जाओ । इस विषयमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ५३३ ॥

इत्युक्त्वा घोररूपोऽसौ पिशाचो विकृताननः ॥ ५४ ॥ तस्मिन्नेव समे देशे पीत्वा च रुधिरं बहु । भक्षयित्वा यथाकामं मांसराशिं विचक्षणः ॥ ५५ ॥ अपः संस्पृश्य तत्रैव पार्श्वे संस्थाप्य साधनम् । अन्त्रपाशं महाघोरं संस्थाप्य विपुलं महत् ॥ ५६ ॥ आसनं कुशसंयुक्तं कृत्वा चाभ्युक्ष्य वारिणा । उत्सार्य श्वगणान् सर्वान् यत्नेन महता तदा ॥ ५७ ॥ सुखासनं समास्थाय समाधौ यतते श्वपः ।

ऐसा कहकर उस विकराल मुखवाले घोररूपधारी विचक्षण पिशाचने उसी समतल प्रदेशमें बहुत-सा रक्त पीकर इच्छानुसार मांसराशिका भक्षण किया । तत्पश्चात् जलका आचमन करके वहीं पार्श्वभागमें अपनी साधनसामग्री रख दी और अँतड़ियोंका महाभयंकर विशाल पाश भी वहीं बगलमें डाल दिया । इसके बाद कुशयुक्त आसन बिछाकर उसकी शुद्धिके लिये जल छिड़का और अपने सभी कुत्तोंको बड़े प्रयत्नसे दूर हटाया । तदनन्तर सुखासनपर बैठकर वह कुत्ता-पालक पिशाच समाधिके लिये यत्न करने लगा ॥ ५४-५७३ ॥

एकचित्तस्तदा भूत्वा नमस्कृत्य च केशवम् । इमं मन्त्रं पठन् घोरः पिशाचो भक्तवत्सलम् ॥ ५८ ॥

उस समय वह भयानक पिशाच एकचित्त हो भक्तवत्सल भगवान् केशवको नमस्कार करके इस मन्त्रमय स्तोत्रका पाठ करने लगा—॥ ५८ ॥

नमो भगवते तस्मै वासुदेवाय चक्रिणे । नमस्ते गदिने तुभ्यं वासुदेवाय धीमते ॥ ५९ ॥

'उन चक्रधारी भगवान् वासुदेवको नमस्कार है, सबके

भविष्यपर्व] अशीतितमोऽध्यायः १९५


भीतर निवास करनेवाले देवता आप बुद्धिमान् गदाधरको नमस्कार है॥ ५९॥
ओं नमो नारायणाय विष्णवे प्रभविष्णवे।
मम भूयान्मनःशुद्धिः कीर्तनात् तव केशव॥ ६०॥
'प्रभावशाली, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्दघन नारायणदेवको नमस्कार है। केशव ! आपके कीर्तनसे मेरे मनकी शुद्धि हो जाय॥ ६०॥
जन्मेदमीदृशं घोरं मा भून्मम दुरासदम्।
देवदूतो भविष्यामि स्मरणात् तव गोपते॥ ६१॥
'इन्द्रियोंके नियन्ता नारायण ! अब पुनः मुझे ऐसा दुःखप्रद भयङ्कर जन्म न प्राप्त हो। मैं आपके स्मरणसे देवदूत हो जाऊँ॥ ६१॥
तव चक्रप्रहारेण कायो नश्यतु मामकः।
मम भूयो भवो मा भूदेषा मे प्रार्थना विभो॥ ६२॥
'प्रभो ! आपके चक्रके प्रहारसे मेरा यह शरीर नष्ट हो जाय और फिर मुझे यह संसारबन्धन प्राप्त न हो, यही मेरी प्रार्थना है॥ ६२॥
अर्थिनां कल्पवृक्षोऽसि दाता सर्वस्य सर्वदा।
यत्र यत्र भवेज्जन्म तत्र तत्र भवान् हृदि॥ ६३॥
वर्त्ततां मम देवेश प्रार्थनैषा ममापरा।
'आप याचकोंके लिये कल्पवृक्ष हैं। सदा सबके दाता हैं। देवेश्वर ! जहाँ-जहाँ मेरा जन्म हो, वहाँ-वहाँ आप मेरे हृदयमें विराजमान रहें। यह मेरी दूसरी प्रार्थना है॥ ६३½॥
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं भवत्वेवं सदा मम॥ ६४॥
निर्विघ्ना प्रार्थना देव नमस्तेऽस्तु सदा मम।
'देव ! आपको नमस्कार है ! देव ! आपको नमस्कार है ! इस प्रकार मेरी प्रार्थना सदा निर्विघ्न चलती रहे। देव ! आपको सदा ही मेरा नमस्कार है॥ ६४½॥
यदा मे मरणं भूयात्तदा मा भूत् स्मृतिभ्रमः॥ ६५॥
दिने दिने क्षणं चित्तं त्वयि संस्थं भवत्विति।
एवं प्रेरय मां देव मा भूत् ते चित्तमीदृशम्॥ ६६॥
नृशंसोऽयं पिशाचोऽयं दयास्मिन् का भवेदिति।
'जब मेरा मरणकाल उपस्थित हो, उस समय मेरी स्मरणशक्तिमें भ्रम न उत्पन्न हो (मैं उस समय भी आपका ही स्मरण करता रहूँ)। देव ! प्रतिदिन और प्रतिक्षण मेरा चित्त आपमें ही स्थिर रहे। आप मुझे ऐसी ही प्रेरणा देते रहें। आपके चित्तमें कभी ऐसा भाव न आये कि 'यह क्रूर है, पिशाच है। इसपर क्या दया हो सकती है?'॥ ६५-६६½॥
एवं चिन्तय मां देव भृत्यो महामिति प्रभो॥ ६७॥
परपीडा न मत्तोऽस्तु नमस्ते भगवन् प्रभो।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु मा भूवन् साम्प्रतं हि मे॥ ६८॥
'प्रभो ! देव ! आप तो ऐसा ही विचार करें कि 'यह बेचारा मेरा सेवक है।' भगवन् ! प्रभो ! आपको नमस्कार है। आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरेद्वारा दूसरोंको पीड़ा न पहुँचे तथा अब मेरी इन्द्रियाँ विषयोंमें न फँसें॥ ६७-६८॥
अन्तकाले ममाप्येवं प्रसादात् तव केशव।
पृथिवी यातु मे घ्राणं रसनां यातु मे पयः॥ ६९॥
सूर्यश्च यातु मे चक्षुः स्पर्शं यातु च मारुतः।
श्रोत्रमाकाशमप्येतु मनः प्राणं च गच्छतु॥ ७०॥
'केशव ! अन्तकालमें आपकी कृपासे मेरी भी ऐसी स्थिति हो- पृथिवी मेरी घ्राणेन्द्रियको ग्रहण करे, जल मेरी रसनेन्द्रियको अपना ले, सूर्य मेरी नेत्रेन्द्रियको तथा वायु मेरी त्वचा अपनेमें संयुक्त कर लें। इसी तरह आकाश भी मेरी श्रवणेन्द्रियको अपनेमें मिला ले तथा प्राण (चन्द्रमा) मेरे मनसे संयुक्त हों॥ ६९-७०॥
जलं मां रक्षतां नित्यं पृथिवी रक्षतां हरे।
सूर्यो मां रक्षतां विष्णो नमस्ते सूर्यतेजसे॥ ७१॥
'हरे ! जल सदा मेरी रक्षा करे। पृथिवी भी रक्षा करे। विष्णो ! सूर्यदेव मेरी रक्षा करें। आप सूर्यके समान तेजस्वी हैं, आपको नमस्कार है॥ ७१॥
वायुर्मा रक्षतां दुःखादाकाशं च जनार्दन।
न मनः सर्वगं देव रक्षतां विषयान्तरे॥ ७२॥
'जनार्दन ! वायु और आकाश दुःखसे मेरी रक्षा करें। देव ! सर्वस्वरूप परमात्माके चिन्तनमें लगा हुआ मेरा मन विषय और भेद-बुद्धिकी रक्षा न करे (अर्थात् वह न तो विषयपरायण हो, न भेद-बुद्धिको ही अपनाये)॥ ७२॥
मनो विपर्यये घोरे पुरुषाञ् हन्ति नित्यशः।
पापेषु योजयेत् पुंसः परपीडात्मकेषु च॥ ७३॥
'इसके विपरीत यदि मन घोर विपर्यय (विषय-सेवन आदि) में फँस जाय तो वह पुरुषोंका नाश कर डालता है। दूसरोंके पीड़नरूप पापोंमें फँसा देता है॥ ७३॥
मनस्तद् रक्षतां देव भूयो भूयो जनार्दन।
मा भून्मनसि कालुष्यं मनो मे निर्मलं भवेत्॥ ७४॥
'देव जनार्दन ! आप मेरे उस मनकी बारंबार रक्षा करें, मेरे मनमें मलिनता न रहे, मेरा मन निर्मल हो जाय॥ ७४॥
कलुषं तस्य यच्चित्तं नरके पातयत्यमुम्।
बाह्यानि निर्मलान्येवमिन्द्रियाणि भवन्त्युत॥ ७५॥
न तानि कार्यवन्तीह मनश्चेत् कलुषं भवेत्।
'क्योंकि जीवका जो मलिन चित्त है, वह उसे नरकमें गिराता है। मनके शुद्ध होनेसे बाह्य इन्द्रियाँ भी निर्मल हो जाती हैं और यदि मन मलिन हो तो वे इन्द्रियाँ भी मलिन होनेके कारण इस जगत्में कोई सत्कार्य नहीं कर सकतीं॥ ७५½॥
नाङ्गानां मुष्टिनामेध्यं गृहीत्वा यो व्यवस्थितः॥ ७६॥
बहिः प्रक्षालनं कुर्वन् किं भवेत् तस्य केशव।

९९६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

व्यर्थो हि केवलं तस्य प्रग्रहो बाह्यगोचरः ॥ ७७ ॥ 'केशव ! जो मनुष्य अपने अपवित्र मनको मुट्ठीमें किये बिना केवल अङ्गोंका बाहरसे प्रक्षालन करता है, उसे क्या लाभ होगा ? उसका केवल बाहरसे शुद्धिके लिये आग्रह व्यर्थ ही है ॥ ७६-७७ ॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन चित्तं रक्ष जनार्दन ।
बलवानिन्द्रियग्रामो वारयैनं जनार्दन ॥ ७८ ॥
'अतः जनार्दन ! सम्पूर्ण प्रयत्नद्वारा आप मेरे चित्तकी रक्षा कीजिये। जीवोंकी याचना पूर्ण करनेवाले देव ! इन्द्रियोंका समूह बड़ा बलवान् है, इसे रोकिये ॥ ७८ ॥

परीवादाज्जगन्नाथ वाचं रक्ष दुरुद्वहाम् ।
परद्रव्यानन्मनो रक्ष परदाराज्जनार्दन ।
सर्वत्र मे दया भूयात् प्रसादात् तव केशव ॥ ७९ ॥
'जगन्नाथ ! मेरी दुर्बह वाणीको आप परनिन्दासे बचाइये। जनार्दन ! मेरे मनको पराये धन और परायी स्त्रीसे दूर रखिये। केशव ! आपकी कृपासे मेरे मनमें सब प्राणियोंके प्रति दया हो ॥ ७९ ॥

त्वय्येव भक्तिरचला भूयाद् भूतेषु मे दया ।
बहुनात्र किमुक्तेन शृणुष्वेदं वचो मम ॥ ८० ॥
'प्रभो ! आपमें ही मेरी अविचल भक्ति हो और समस्त प्राणियोंके प्रति दया हो । इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ ? मेरी यह एक ही बात सुन लीजिये ॥ ८० ॥

सुखे दुःखे च रागे च भोजने गमने तथा ।
जाग्रत्स्वप्नेषु सर्वत्र त्वय्येव रमतां मनः ॥ ८१ ॥
मामकं देवदेवेश नमस्तेऽस्तु जनार्दन ।
'देवदेवेश्वर ! जनार्दन ! सुखमें, दुःखमें, राग और भोजनमें, चलने-फिरनेमें तथा जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें सर्वत्र आपमें ही मेरा मन रमण करे, आपको नमस्कार है' ॥ ८१ १/२ ॥

इति ब्रुवन् घोरतमो जात्या हीनो न चित्ततः ॥ ८२ ॥
पिशाचो भगवद्भक्तः समाधिं समपद्यत ।
इस तरह बोलता हुआ वह अत्यन्त भयङ्कर पिशाच, जो केवल जातिसे निम्नकोटिका था, हृदयसे नहीं, समाधिस्थ हो गया । वह महान् भगवद्भक्त था ॥ ८२ १/२ ॥

दृढं बद्ध्वाऽऽत्मनः कायमान्त्रपाशेन मांसपः ॥ ८३ ॥
निश्चलेनैव मनसा सुखमास्ते स संयतः ।
ध्यायन् हरिं जगद्योनिं विष्णुं पीताम्बरं शिवम् ॥ ८४ ॥
वह मांसभक्षी पिशाच अपने शरीरको अँतड़ियोंके सुदृढ़ पाशसे बाँधकर निश्चलचित्तके द्वारा सुखपूर्वक संयतभावसे बैठ गया और जगत्‌की उत्पत्तिका कारणभूत, पीताम्बरधारी, मङ्गलकारी, सर्वव्यापी श्रीहरिका ध्यान करने लगा ॥ ८३-८४ ॥

मुकुन्दमादिपुरुषमेकाकारमनामयम् ।
नित्यं शुद्धं ज्ञानगम्यं कारणं सर्वदेहिनाम् ॥ ८५ ॥
जो नित्य, शुद्ध, ज्ञानगम्य, समस्त देहधारियोंके कारणभूत, रोग-शोकसे रहित, एकाकार (अद्वितीय) और आदिपुरुष हैं, उन मुकुन्ददेवका चिन्तन करने लगा ॥ ८५ ॥

नासिकाग्रं समालोक्य पठन् ब्रह्म सनातनम् ।
निर्वातस्थो यथा दीपः प्रोच्चरन् प्रणतः सदा ॥ ८६ ॥
नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाये सनातन ब्रह्मस्वरूप प्रणवका जप करते हुए, वायुशून्य प्रदेशमें जलनेवाले दीपककी भाँति अविचलभावसे स्थित हो, वह निरन्तर प्रणाम एवं मन्त्रपाठ करने लगा ॥ ८६ ॥

प्रणवं वाचकं मत्वा वाच्यं ब्रह्मेति निश्चितः ।
एकाग्रं सततं कृत्वा चित्तं विष्णौ समर्पितम् ॥ ८७ ॥
विकल्परहितं चित्तं हृदि मध्ये न्यवेशयत् ।
प्रणवको वाचक मानकर और परब्रह्म परमात्माको उसका वाच्यार्थ निश्चित करके उसने अपने चित्तको निरन्तर एकाग्र रखते हुए उसे भगवान् विष्णुमें समर्पित कर दिया । उस विकल्परहित चित्तको हृदयकमलके भीतर दृढ़तापूर्वक स्थापित कर दिया ॥ ८७ १/२ ॥

पुण्डरीके शुभदले समावेश्य जगत्पतिम् ॥ ८८ ॥
आस्ते सुखं महायोगी पिशिताशस्तदा महान् ।
त्रिधामानं जपंस्तत्र स्मरन् विष्णुं सनातनम् ॥ ८९ ॥
शुभ दलोंसे युक्त उस हृदयकमलके आसनपर जगदीश्वर श्रीहरिको प्रतिष्ठित करके वह महायोगी, महान् मांसभक्षी पिशाच वहाँ सुखपूर्वक बैठा रहा तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन रूपोंमें विराजमान सनातन विष्णुका वहाँ स्मरण करता रहा ॥ ८८-८९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां घण्टाकर्णचित्तसमाधावशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें घण्टाकर्णके चित्तकी समाधिविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥


एकाशीतितमोऽध्यायः

पिशाचको समाधि-अवस्थामें भगवान् विष्णुका साक्षात्कार

वैशम्पायन उवाच
ततः स भगवान् विष्णुः पिशाचं दृष्टवांस्तदा ।चिन्तयन्तं खमात्मानं शुद्धबुद्धिसमन्वितम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर उन