विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1001, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९७६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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पुत्रकी और कुमारी कन्याको मनके अनुरूप पतिकी प्राप्ति होती है ॥ १०१ ॥
सद्यो गर्भात् प्रमुच्येत गर्भिणी जनयेत् सुतम् ।
ये च मोक्षैषिणो लोके योगिनः सांख्यकापिलाः ॥ १०२ ॥
स्तवेनानेन गच्छन्ति श्वेतद्वीपमकल्मषाः ।
गर्भवती स्त्री इस स्तोत्रके पाठसे तत्काल गर्भकी वेदनासे छुटकारा पा जाती है और पुत्रको जन्म देती है। जो योगी और कपिल-सांख्यमतके अनुयायी पुरुष जगत्में भवबन्धनसे मोक्ष पानेकी अभिलाषा रखते हैं, वे इस स्तोत्रके पाठसे पाप-तापसे रहित हो (भगवान्के परमधाम) श्वेतद्वीपको चले जाते हैं ॥ १०२ १/२ ॥
सर्वकामप्रदो ह्येष स्तवोऽनन्तस्य कीर्त्यते ॥ १०३ ॥
यः पठेत् प्रातरुत्थाय शुचिः प्रयतमानसः ।
सर्वान् कामानवाप्नोति मानवो नात्र संशयः ॥ १०४ ॥
भगवान् अनन्तका यह स्तोत्र सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला बताया गया है। जो प्रातःकाल उठकर स्नान आदिसे शुद्ध एवं संयतचित्त हो इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १०३-१०४ ॥
एष वै वामनो नाम प्रादुर्भावो महात्मनः ।
वेदविद्भिरद्विजैरेवं पठ्यते वैष्णवं यशः ॥ १०५ ॥
यह परमात्मा श्रीहरिके वामन-अवतारका वर्णन किया गया। वेदवेत्ता ब्राह्मण इस प्रकार भगवान् विष्णुके सुयशका बखान करते हैं ॥ १०५ ॥
यस्त्विमं वामनं दिव्यं प्रादुर्भावं महात्मनः ।
शृणुयान्नियतो भक्त्या सदा पर्वसु पर्वसु ॥ १०६ ॥
परान् विजयते राजा यथा विष्णुर्महाबलः ।
यशो विमलमाप्नोति विपुलं चाप्नुते वसु ॥ १०७ ॥
जो राजा शौच-संतोषादि नियमोंके पालनपूर्वक भगवान् विष्णुके इस दिव्य वामनावतारकी कथाको सदा सभी पर्वोंपर भक्तिभावसे सुनता है, वह महाबली विष्णुके समान ही अपने समस्त शत्रुओंपर विजय पाता है, निर्मल यशका भागी होता है तथा विपुल धन-सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है ॥ १०६-१०७ ॥
प्रियो भवति भूतानां सर्वेषां वामनो यथा ।
पुत्रपौत्रांश्च वर्धन्ते आरोग्यं गुणसम्पदः ॥ १०८ ॥
वह भगवान् वामनकी ही भाँति समस्त प्राणियोंका प्रिय होता है तथा उसके पुत्र-पौत्र, आरोग्य एवं गुण-सम्पत्तियोंकी वृद्धि होती है ॥ १०८ ॥
प्रीयते पठतश्चास्य देवदेवो जनार्दनः ।
सर्वकामयुतश्चैव कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ १०९ ॥
इस स्तोत्रका पाठ करनेवाले पुरुषपर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन प्रसन्न होते हैं तथा वह सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न होता है—यह श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी महाराजका कथन है ॥ १०९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
रुक्मिणी देवीकी भगवान् श्रीकृष्णसे पुत्रके लिये प्रार्थना और भगवान्का उन्हें आश्वासन देते हुए कैलास जानेका विचार प्रकट करना
जनमेजय उवाच
किमर्थं भगवान् विष्णुर्देवदेवो जनार्दनः ।
गतः कैलासशिखरमालयं शंकरस्य च ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—मुने ! देवताओंके भी देवता, सर्वव्यापी भगवान् जनार्दन किस लिये शङ्करजीके निवासस्थान कैलासशिखरपर गये थे ? ॥ १ ॥
नारदाद्यैस्तपोवृद्धैर्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
तत्र दृष्टो महादेवः शंकरो नीललोहितः ॥ २ ॥
तपस्यामें चढ़े-बढ़े तत्त्वदर्शी नारद आदि मुनियोंने ही वहाँ नीललोहित वर्णवाले कल्याणकारी महादेवजीका दर्शन किया है ॥ २ ॥
केशवेन पुरा विप्र कुर्वता तप उत्तमम् ।
अर्चिता देवदेवेन शंकरश्चेति नः श्रुतम् ॥ ३ ॥
विप्रवर ! हमारे सुननेमें यह भी आया है कि पूर्वकालमें उत्तम तप करते हुए देवाधिदेव केशवने वहाँ भगवान् शङ्करका पूजन किया था ॥ ३ ॥
देवौ तत्र जगन्नाथौ दृष्टवन्तौ पुरातनौ ।
अर्चयांचक्रिरे देवा इन्द्राद्याः शंकरं हरिम् ॥ ४ ॥
वहाँ दोनों पुरातन देवता जगदीश्वर श्रीहरि और हरने एक दूसरेका दर्शन किया था। इन्द्र आदि देवताओंने वहाँ आकर भगवान् शङ्कर तथा श्रीहरिकी अर्चना की थी ॥ ४ ॥
तौ हि देवौ महादेवावेकीभूतौ द्विधा कृतौ ।
एकात्मानौ जगद्योनी सृष्टिसंहारकारकौ ॥ ५ ॥