भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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भविष्यपर्व ] द्विसप्ततितमोऽध्यायः [ ९७५


शङ्खं चक्रं गदां पद्मं शार्ङ्गं गरुडमेव च।
प्रसादयामि शिरसा ते बन्धान्मोक्षयन्तु माम्॥ ८६॥
मैं शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्गधनुष तथा गरुड़को भी सिर झुकाकर प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ, वे मुझे इस बन्धनसे छुटकारा दिलायें॥ ८६॥

शङ्खं चक्रं गदा पद्मं शार्ङ्गं च गरुडादयः।
हरिं प्रसादयामासुर्बलिं मोक्षय बन्धनात् ॥ ८७॥
तब शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्गधनुष और गरुड़ आदिने भगवान्‌को प्रसन्न किया और कहा—‘आप बलिको बन्धनसे मुक्त कीजिये’॥ ८७॥

ततः प्रसन्नो भगवानादिदेश खगेश्वरम्।
गरुडं नागहन्तारं बलिं मोक्षय बन्धनात् ॥ ८८॥
इससे प्रसन्न हो भगवान्‌ने नागहन्ता पक्षिराज गरुडको आज्ञा दी कि ‘तुम बलिको बन्धनसे छुड़ाओ’॥ ८८॥

ततो विक्षिप्य गरुडः पक्षावतुलविक्रमः।
जगाम वसुधामूलं यत्रास्ते संयतो बलिः॥ ८९॥
तब अतुल पराक्रमी गरुड अपनी पाँखें हिलाते हुए वसुधाके मूलप्रदेशमें जा पहुँचे, जहाँ राजा बलि नागपाशसे बँधे हुए बैठे थे॥ ८९॥

आगमं तस्य विज्ञाय नागा मुक्त्वा महासुरम्।
ययुः पुरीं भोगवतीं वैनतेयभयार्दिताः॥ ९०॥
उनका आगमन जानकर उन विनतानन्दन गरुडके भयसे पीड़ित हो वे नाग महान् असुर बलिको बन्धनमुक्त करके भोगवतीपुरीमें चले गये॥ ९०॥

मुक्तं कृष्णप्रसादेन चिन्तयानमधोमुखम्।
भ्रष्टश्रियमिवाचेदं गरुत्मान् पन्नगाशनः॥ ९१॥
राजा बलि भगवान् विष्णुके प्रसादसे बन्धनमुक्त होकर भी राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट होनेके कारण नीचे मुख किये चिन्ता-मग्न हो रहे थे, उस समय सर्पभोजी गरुडने उनसे इस प्रकार कहा—॥ ९१॥

गरुड उवाच
दानवेन्द्र महाबाहो विष्णुस्त्वामब्रवीत् प्रभुः।
मुक्तो निवस पाताले सपुत्रजनबान्धवः॥ ९२॥
गरुड बोले—महाबाहु दानवराज ! भगवान् विष्णुने तुम्हें यह संदेश दिया है कि तुम बन्धनमुक्त हो पुत्रों, स्वजनों और बन्धु-बान्धवोंके साथ पाताललोकमें निवास करो॥ ९२॥

इतस्त्वया न गन्तव्यं गव्यूतिमपि दानव।
समयं यदि भिन्द्यास्त्वं मूर्धा ते शतधा भवेत्॥ ९३॥
दानव ! तुम यहाँसे दो कोस भी बाहर न जाना। यदि इस मर्यादाको भंग करोगे तो तुम्हारे सिरके सैकड़ों टुकड़े हो जायेंगे॥ ९३॥

पक्षेन्द्रवचनं श्रुत्वा दानवेन्द्रोऽब्रवीदिदम्।
स्थितोऽस्मि समये तस्य अनन्तस्य महात्मनः॥ ९४॥
जीवोपायं तु भगवान् मम किंचित् करोतु सः।
इहस्थोऽहं सुखासीनो येनाप्याये खगेश्वर ॥ ९५॥
पक्षिराज गरुड़का यह कथन सुनकर दानवेन्द्र बलि-ने यह बात कही—‘खगेश्वर ! मैं उन महात्मा अनन्तकी बाँधी हुई मर्यादा में ही स्थित हूँ, किंतु वे भगवान् मेरे लिये जीविका चलानेका कोई उपाय नियत कर दें, जिससे यहाँ सुखपूर्वक रहकर मैं सदा तृप्ति एवं संतोषका अनुभव करता रहूँ’॥ ९४-९५॥

बलेस्तु वचनं श्रुत्वा गरुत्मानिदमब्रवीत्।
पूर्वमेव कृतस्तेन जीवोपायो महात्मना॥ ९६॥
बलिकी यह बात सुनकर गरुड बोले—‘उन परमात्माने पहलेसे ही तुम्हारे लिये जीविकाका उपाय नियत कर दिया है॥ ९६॥

वर्त्तयिष्यन्ति ये यज्ञान् विधिहीनामृत्विजः।
प्रायश्चित्तमजानन्तो यज्ञभागस्ततस्तव ॥ ९७॥
‘जो लोग प्रायश्चित्तसे अनभिज्ञ रहकर बिना ऋत्विजोंके ही विधिहीन यज्ञ करेंगे, उनके यज्ञका सारा भाग तुम्हारा ही होगा॥ ९७॥

न तेषां यज्ञभागं वै प्रतिगृह्णन्ति देवताः।
अनेनाप्यायितबलः सुखमात्रं निवत्स्यसि ॥ ९८॥
‘उनके यज्ञभागको देवता नहीं ग्रहण करेंगे। उससे तुम्हारे बलकी पुष्टि होगी और तुम सदा सुखसे रहोगे॥ ९८॥

संदेशमेतं भगवान् दत्तवान् कश्यपात्मजः।
दानवेन्द्र महाबाहो विष्णुस्त्रैलोक्यभावनः ॥ ९९॥
‘महाबाहु दानवराज ! त्रिभुवनपालक, कश्यपकुमार, वामनरूपधारी भगवान् विष्णुने तुमको यही संदेश दिया है’॥ ९९॥

वैशम्पायन उवाच
इमं स्तवमनन्तस्य सर्वपापप्रमोचनम्।
यः पठेत् नरो भक्त्या तस्य नश्यति किल्विषम्॥ १००॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—(ऐसा कहकर गरुडजी चले गये।) जो मनुष्य भगवान् अनन्तके इस सर्वपापहारी स्तोत्रका भक्तिपूर्वक पाठ करता है, उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है॥ १००॥

गोहत्यायाः प्रमुच्येत ब्रह्मघ्नो ब्रह्महत्यया।
अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या चैवेप्सितं पतिम् ॥ १०१॥
यदि उससे गोवध या ब्राह्मणवधका पाप बन गया है तो वह इस स्तोत्रके पाठसे उस गोहत्या और ब्राह्मणहत्यासे भी मुक्त हो सकता है। इस स्तोत्रके प्रभावसे पुत्रहीनको