विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 999, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें९७४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
एको विद्यासहायस्त्वं योगी योगमुपागतः।
पुनस्त्रैलोक्यमसृजस्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७१ ॥
आप योगी हैं और योगका आश्रय लेकर एकमात्र आप ही विद्या (योगमाया) की सहायतासे पुनः त्रिलोकीकी सृष्टि करके उसमें अन्तर्यामी आत्मारूपसे व्याप्त रहते हैं। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस नागपाशसे छुटकारा दिलावें ॥ ७१ ॥
जलशय्यामुपासीनो योगनिद्रामुपागतः।
लोकांश्चिन्तयसे भूयस्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७२ ॥
आप योगनिद्राका आश्रय ले जलकी शय्यापर सोकर पुनः लोकोंका चिन्तन करते हैं। उस सत्यके प्रभावसे मुझे बन्धनमुक्त कीजिये ॥ ७२ ॥
वाराहं रूपमास्थाय वेदद्यज्ञपुरस्कृतम्।
धरा जलोद्धृता येन तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७३॥
आपने वेद और यज्ञमय वाराहरूप धारण करके जिस सत्यके प्रभावसे इस पृथिवीका जलसे उद्धार किया था, उसी सत्यके द्वारा मुझे भी संकटसे छुड़ाइये ॥ ७३ ॥
उद्धृत्य दंष्ट्रया यज्ञांस्त्रीन् पिण्डान् कृतवानसि।
त्वं पितॄणामपि हरे तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७४ ॥
हरे! आपने अपनी दाढ़से यज्ञोंका उद्धार करके पितरोंके लिये भी तीन पिण्डोंकी व्यवस्था की है। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस नागपाशसे मुक्त कीजिये ॥ ७४ ॥
प्रदुद्रुवुः सुराः सर्वे हिरण्याक्षभयार्दिताः।
परित्रातास्त्वया देव तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७५ ॥
देव ! समस्त देवता जब हिरण्याक्षके भयसे पीड़ित होकर भाग गये थे, उस समय आपने ही उनकी रक्षा की थी। उस सत्यके बलसे आप मुझे बन्धनसे छुड़ाइये ॥ ७५ ॥
दीर्घवक्त्रेण रूपेण हिरण्याक्षस्य संयुगे।
शिरो जहार चक्रेण तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७६ ॥
लंबे मुँहवाले वाराहका रूप धारण करके आपने युद्धमें चक्रद्वारा हिरण्याक्षका सिर काट लिया था। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे बन्धनमुक्त कीजिये ॥ ७६ ॥
भग्नमूर्धास्थिमस्तिष्को हिरण्यकशिपुः पुरा।
हुंकारेण हतो दैत्यस्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७७ ॥
पूर्वकालमें आपने हुङ्कारमात्रसे हिरण्यकशिपु नामक दैत्यके मस्तककी हड्डी और मस्तिष्कको चूर-चूर करके उसे मार डाला था। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे भी सङ्कटसे छुड़ाइये ॥ ७७ ॥
दानवाभ्यां हृता वेदा ब्रह्मणः पश्यतः पुरा।
परित्रातास्त्वया देव तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७८ ॥
देव ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीके देखते-देखते मधु और कैटभ नामक दो दानवोंने सम्पूर्ण वेद हर लिये थे, जिनका आपने उद्धार किया। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस बन्धनसे छुटकारा दिलाइये ॥ ७८ ॥
कृत्वा हयशिरोरूपं हत्वा तु मधुकैटभौ।
ब्रह्मणे तेऽर्पिता वेदास्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७९ ॥
हयग्रीव-रूप धारण करके मधु और कैटभ नामक दानवोंको मारकर आपने सारे वेद पुनः ब्रह्माजीको अर्पित कर दिये। इस सत्यके प्रभावसे आप मुझे बन्धनसे छुड़ाइये ॥ ७९ ॥
देवदानवगन्धर्वा यक्षसिद्धमहोरगाः।
अन्तं तव न पश्यन्ति तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८० ॥
देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, सिद्ध और बड़े-बड़े नाग भी आपका अन्त नहीं देख पाते हैं। उस सत्यके प्रभावसे आप मेरा इस सङ्कटसे उद्धार कीजिये ॥ ८० ॥
अपान्तरतमा नाम जातो देवस्य वै सुतः।
कृताश्च तेन वेदार्थास्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८१ ॥
अपान्तरतमा नामसे विख्यात जो आपके पुत्र हुए थे, उन्होंने सम्पूर्ण वेदोंके अर्थ किये हैं। इस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस बन्धनसे छुड़ाइये ॥ ८१ ॥
वेदद्यज्ञाग्निहोत्राणि पितृयज्ञहवींषि च।
रहस्यं तव देवस्य तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८२ ॥
वेद, यज्ञ, अग्निहोत्र, पितृयज्ञ और हविर्यज्ञ—ये आपके रहस्य हैं। उस सत्यके द्वारा आप मुझे सङ्कटसे छुड़ाइये ॥ ८२ ॥
ऋषिर्दीर्घतमा नाम जात्यन्धो गुरुशापतः।
त्वत्प्रसादाच्च चक्षुष्मांस्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८३ ॥
दीर्घतमा नामक ऋषि अपने गुरु या पिताके शापसे जन्मान्ध हो गये थे, जो आपकी कृपासे ही नेत्रवान् हो गये। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे बन्धन-मुक्त कीजिये ॥ ८३ ॥
ग्राहग्रस्तं गजेन्द्रं च दीनं मृत्युवशं गतम्।
भक्तं मोक्षितवांस्त्वं हि तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८४ ॥
ग्राहसे ग्रस्त होकर गजराज अत्यन्त दीन हो मृत्युके वशमें पड़ गया था, परंतु आपने अपने उस भक्तको सङ्कटसे छुड़ा दिया। उस सत्यके प्रभावसे मुझे भी वर्तमान सङ्कटसे मुक्त कीजिये ॥ ८४ ॥
अक्षयश्चाव्ययश्च त्वं ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः।
उच्छ्रितानां नियन्तासि तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८५ ॥
आप अक्षय, अविनाशी, ब्राह्मणभक्त तथा भक्तवत्सल हैं, उच्छृङ्खल पुरुषोंका दमन करनेवाले हैं। उस सत्यके प्रभावसे मेरा सङ्कटसे उद्धार कीजिये ॥ ८५ ॥