विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 998, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| [ भविष्यपर्व ] | द्विसप्ततितमोऽध्यायः | ९७३ |
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महात्मा वरुणको पश्चिम दिशा तथा यक्षराज कुबेरको उत्तर दिशाका राज्य दिया ॥ ५५ ॥
अधःस्थां नागराजाय सोमायोर्ध्वां दिशं ददौ।
एवं विभज्य त्रैलोक्यं विष्णुर्बलवतां वरः ॥५६॥
जगाम त्रिदिवं देवः पूज्यमानो महर्षिभिः ।
नागराज अनन्तको नीचेकी दिशाका तथा सोमको ऊपरकी दिशाका राज्य अर्पित किया। इस प्रकार तीनों लोकोंके राज्यका विभाजन करके बलवानोंमें श्रेष्ठ भगवान् विष्णु महर्षियोंसे पूजित हो स्वर्गलोकमें गये ॥ ५६३ ॥
धामनः सर्वभूतेशः प्रतिष्ठाप्य च वासवम् ॥५७॥
तस्मिन् प्रयाते दुर्धर्षे वामनेऽमिततेजसि ।
सर्वे मुमुदिरे देवाः पुरस्कृत्य शतक्रतुम् ॥५८॥
वहाँ देवराज इन्द्रको स्वर्गके सिंहासनपर बिठाकर सर्व-भूतेश्वर भगवान् वामन अपने धामको चले गये। उन अत्यन्त तेजस्वी दुर्धर्ष देवता वामनके चले जानेपर सब देवता देवराज इन्द्रको आगे करके आनन्दमें मग्न हो गये ॥ ५७-५८ ॥
वैशम्पायन उवाच
गते तु त्रिदिवं कृष्णे बद्ध्वा वैरोचनिं बलिम् ।
नागैः सप्तशिरोभिश्च कम्बलाश्वतरादिभिः ॥५९॥
नागबन्धनदुःखार्तं बलिं वैरोचनिं ततः।
यदृच्छयासौ देवर्षिर्नारदः प्रत्यपद्यत ॥६०॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सात सिर-वाले कम्बल और अश्वतर आदि नागोंद्वारा विरोचनकुमार बलिको बाँधकर जब भगवान् विष्णु स्वर्गलोकको चले गये, तब नागबन्धनके दुःखसे पीड़ित हुए विरोचनपुत्र बलिके पास अकस्मात् घूमते हुए देवर्षि नारद आ पहुँचे ॥ ५९-६० ॥
स तं कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा कृपयाभिपरिप्लुतः ।
उवाच दानवश्रेष्ठं मोक्षोपायं ददामि ते ॥६१॥
नारदजीने बलिको संकटमें पड़ा देख दयासे द्रवित हो उन दानवशिरोमणिसे कहा—'मैं तुम्हें इस कष्टसे छूटनेका उपाय बताता हूँ ॥ ६१ ॥
स्तवं देवाधिदेवस्य वासुदेवस्य धीमतः।
अनादिनिधनस्यास्य अक्षयस्याव्ययस्य च ॥६२॥
'जो आदि और अन्तसे रहित, अक्षय, अविनाशी, बुद्धिमान्, देवाधिदेव भगवान् वासुदेव हैं, उनका स्तोत्र ही वह उपाय है ॥ ६२ ॥
तमधीष्व दैत्येन्द्र विशुद्धेनान्तरात्मना ।
तद्गतस्तन्मना भूत्वा द्रुतं मोक्षमवाप्स्यसि ॥६३॥
'दैत्यराज ! तुम विशुद्ध हृदयसे उन्हीं भगवान्में मन लगाकर तन्मय हो उस स्तोत्रका पाठ करो। ऐसा करनेसे शीघ्र ही छुटकारा पा जाओगे' ॥ ६३ ॥
ततो विरोचनसुतः प्रयतः प्राञ्जलिः शुचिः ।
मोक्षविंशकमव्यग्रो नारदात् समधीतवान् ॥६४॥
तब विरोचनकुमार बलिने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर हाथ जोड़ पवित्र हो शान्तभावसे मोक्षविंशक नामक स्तोत्रका नारदजीसे अध्ययन किया ॥ ६४ ॥
तमधीत्य स्तवं दिव्यं नारदेन समीरितम् ।
पृथिवी चोद्धृता येन तं जजाप महासुरः ॥६५॥
नारदजीके बताये हुए उस दिव्य स्तोत्रका अध्ययन करके महान् असुर बलिने, जिन्होंने इस पृथिवीका उद्धार किया था, उन भगवान्का जप आरम्भ किया ॥ ६५ ॥
ॐ नमोऽस्त्वनन्तपतये अक्षयाय महात्मने।
जलेशयाय देवाय पद्मनाभाय विष्णवे ॥६६॥
(बलि बोले-जो) अनन्त नागके अधिपति, अविनाशी, महात्मा, जलमें शयन करनेवाले, दिव्यस्वरूप और अपनी नाभिसे कमल प्रकट करनेवाले हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ॥ ६६ ॥
सप्तसूर्यवपुः कृत्वा त्रींल्लोकान् क्रान्तवानसि ।
भगवन् कालकालस्त्वं तेन सत्येन मोक्षय ॥६७॥
भगवन् ! आप कालके भी काल हैं, आपने सात सूर्योंके समान तेजस्वी शरीर धारण करके तीनों लोकोंको नाप लिया है। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस बन्धनसे छुड़ाइये ॥ ६७ ॥
नष्टचन्द्रार्कगगने क्षीणयज्ञतपःक्रिये ।
पुनश्चिन्तयसे लोकांस्तेन सत्येन मोक्षय ॥६८॥
महाप्रलयके समय जब चन्द्रमा, सूर्य और आकाशका भी लय हो जाता है, यज्ञ और तपरूपी कर्म क्षीण हो जाते हैं, तब आप पुनः सृष्टिके आरम्भमें समस्त लोकोंका चिन्तन करते हैं (और अपने संकल्पसे ही सबको प्रकट कर देते हैं), उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस बन्धनसे मुक्त कीजिये ॥ ६८ ॥
ब्रह्मरुद्रेन्द्रवाय्वग्निसरिद्भुजगपर्वताः ।
त्वत्स्था दृष्टा द्विजेन्द्रेण तेन सत्येन मोक्षय ॥६९॥
प्रलयकालमें द्विजराज मार्कण्डेयने ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वायु, अग्नि, नदी, सर्प और पर्वत आदिको आपके भीतर स्थित देखा था। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस कष्टसे छुड़ाइये ॥ ६९ ॥
मार्कण्डेय पुरा कल्पे प्रविश्य जठरं तव ।
चराचरगतं दृष्टं तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७० ॥
पूर्वकल्पमें मार्कण्डेयजीने आपके उदरमें प्रवेश करके वहाँ चर और अचर प्राणियोंसे व्याप्त सम्पूर्ण जगत्का दर्शन किया था। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस बन्धनसे मुक्त कीजिये ॥ ७० ॥