विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 997, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९७२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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सुतलं नाम पातालं तत्र त्वं सानुगो वस।
सर्वदैत्यगणैः सार्धं मत्प्रसादान्महासुर ॥४०॥
'महान् असुर ! सुतल नामवाला जो पाताल है, उसमें मेरी कृपासे तुम समस्त दैत्यों और सेवकोंके साथ निवास करो ॥ ४० ॥
न च ते देवदेवस्य शक्रस्यामिततेजसः।
शासनं प्रतिहन्तव्यं स्मरता शासनं मम ॥४१॥
'मेरे शासनका स्मरण करते हुए तुम्हें अमित तेजस्वी देवाधिदेव इन्द्रकी आज्ञाका कभी विरोध नहीं करना चाहिये ॥ ४१ ॥
देवताश्चापि ते सर्वाः पूज्या एव महासुर।
भोगांश्च विविधान् सम्यग्यज्ञांश्च सहदक्षिणान् ॥४२॥
प्राप्स्यसे च महाभाग दिव्यान् कामान् यथेप्सितान्।
इह चामुत्र चाक्षय्यान् विविधांश्च परिच्छदान् ॥४३॥
'महान् असुर ! समस्त देवता भी तुम्हारे लिये पूजनीय ही हैं। महाभाग ! तुम वहाँ रहकर नाना प्रकारके भोग, दक्षिणासहित उत्तम यज्ञ, मनोवाञ्छित दिव्य काम (मनोरथ) तथा इस लोक और परलोकमें भाँति-भाँतिकी अक्षय भोग-सामग्री प्राप्त करोगे ॥ ४२-४३ ॥
दैत्याधिपत्यं च सदा मत्प्रसादादवाप्स्यसि।
यदा च तां मया प्रोक्तां मर्यादां चालयिष्यसि ॥४४॥
बधिष्यन्ति तदा हि त्वां नागपाशैर्महाबलाः।
वहाँ तुम्हें मेरी कृपासे सदा ही दैत्योंका आधिपत्य प्राप्त होगा। जब तुम मेरी बतायी हुई उस मर्यादाको भङ्ग करोगे, तब महाबली देवता नागपाशसे तुम्हें बाँध लेंगे ४४॥
नमस्कार्याश्च ते नित्यं महेन्द्राद्या दिवौकसः ॥४५॥
मम ज्येष्ठः सुरश्रेष्ठः शासनं प्रतिगृह्यताम्।
तुम्हें इन्द्र आदि देवताओंको सदा नमस्कार करना चाहिये। सुरश्रेष्ठ इन्द्र मेरे बड़े भाई हैं, अतः उनका शासन स्वीकार करो ॥ ४५॥
बलिरुवाच
देवदेव महाभाग शङ्खचक्रगदाधर ॥४६॥
सुरासुरगुरो श्रेष्ठ सर्वलोकमहेश्वर।
तत्रासतो मे पाताले भागं ब्रूहि सुरोत्तम ॥४७॥
बलि बोले--शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महाभाग देवदेव ! सुरासुरगुरो ! सर्वश्रेष्ठ ! सर्वलोकमहेश्वर ! सुरोत्तम ! वहाँ पातालमें रहते समय मुझे जीवन-निर्वाहके लिये कौन-सा भाग प्राप्त होगा। यह बताइये ॥ ४६-४७ ॥
ममान्नमशनं देव प्राणानार्थमरिंदम।
तद् वदस्व सुरश्रेष्ठ तृप्तिर्येन ममाक्षया ॥४८॥
शत्रुदमन देव ! सुरश्रेष्ठ ! मेरा अन्न-मेरे भोजनके लिये भोज्य पदार्थ क्या होगा ? यह बताइये। जिससे मुझे अक्षय तृप्ति प्राप्त हो ॥ ४८ ॥
श्रीभगवानुवाच
अश्रोत्रियं श्राद्धमधीतमव्रत-
मदक्षिणं यज्ञमनृत्विजा हुतम्।
अश्रद्धया दत्तमसंस्कृतं हवि-
रेते प्रदत्तास्तव दैत्य भागाः ॥४९॥
श्रीभगवान् बोले--दैत्य ! श्रोत्रिय ब्राह्मणके बिना किये हुए श्राद्ध, ब्रह्मचर्य-पालनके बिना किये गये अध्ययन, बिना दक्षिणाके यज्ञ, बिना ऋत्विजके होम, बिना श्रद्धाके दान और संस्कारहीन हविष्य-ये सब तुम्हें तुम्हारे भागके रूपमें अर्पित हैं ॥ ४९ ॥
पुण्यं मद्द्वेषिणां यच्च मद्द्भक्तद्वेषिणां तथा।
क्रयविक्रयसक्तानां पुण्यं यच्चाग्निहोत्रिणाम् ॥५०॥
अश्रद्धया च यद् दानं ददतां यजतां तथा।
तत् सर्वं तव दैत्येन्द्र मत्प्रसादाद् भविष्यति ॥५१॥
दैत्यराज ! मुझसे और मेरे भक्तोंसे द्वेष रखनेवालोंका जो पुण्य है, क्रय-विक्रयमें आसक्त हुए अग्निहोत्रियोंका जो पुण्य है, बिना श्रद्धाके दान देने और यज्ञ करनेवालोंका जो सत्कर्म है, वह सब मेरी कृपासे तुम्हारा हो जायगा ॥ ५०-५१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं बलिर्विष्णोर्महात्मनः।
एवमस्त्विति तं प्रोक्त्वा पातालमसुरोत्तमः।
प्रविवेश महानादो देवाज्ञां प्रतिपालयन् ॥५२॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! महात्मा भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर असुरराज बलिने उनसे 'ऐसा ही होगा' यह कहकर भगवान्की आज्ञाका पालन करते हुए महान् गर्जनाके साथ पाताललोकमें प्रवेश किया ॥ ५२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे चापि विष्णुस्त्रिदशपूजितः।
भगवानपि राज्यानां प्रविभागांश्चकार ह ॥५३॥
इसी बीचमें देवपूजित भगवान् विष्णुने भी राज्योंके कई विभाग किये ॥ ५३ ॥
ददौ पूर्वा दिशं चैन्द्रीं शक्रायामिततेजसे।
याम्यों यमाय देवाय पितृराज्ञे महात्मने ॥५४॥
उन्होंने अमित तेजस्वी इन्द्रको ऐन्द्री अर्थात् पूर्वदिशा-का राज्य दिया। पितरोंके राजा महात्मा यमदेवताको दक्षिण-दिशाका राज्य अर्पित किया ॥ ५४ ॥
पश्चिमां तु दिशं प्रादाद् वरुणाय महात्मने।
उत्तरां च कुबेराय यक्षाधिपतये दिशम् ॥५५॥