विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 996, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] द्विसप्ततितमोऽध्यायः ९७१
दूसरे अनेक दैत्य गिरगिट और बाघके समान मुखवाले थे। कितनोंके मुख रीछों, शार्दूलों और सिंहोंके समान थे ॥
गजेन्द्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनाम्बराः ।
चीरसंवृतगात्राश्च तथा फलकवाससः ॥२४॥
कोई हाथीकी खाल पहने हुए थे तो कोई काले मृगचर्म-को ही वस्त्रके समान धारण करते थे। बहुतोंने अपने अङ्गोंमें चिथड़े लपेट रखे थे तथा कितने ही दैत्य पत्तोंको ही वस्त्रके रूपमें धारण करते थे ॥ २४ ॥
उष्णीषिणो मुकुटिनस्तथा कुण्डलिनोऽसुराः ।
किरीटिनो लम्बशिखाः कम्बुग्रीवाः सुवर्चसः ॥२५॥
वे असुर पगड़ी, मुकुट, कुण्डल, और किरीटसे अलंकृत थे। उनकी शिखाएँ बड़ी-बड़ी और ग्रीवा शङ्खके समान थी। वे उत्तम तेजसे सम्पन्न थे ॥ २५ ॥
नानावेषधरा दैत्या नानामाल्यानुलेपनाः ।
स्वान्यायुधानि दीप्तानि प्रगृह्यासुरसत्तमाः ॥२६॥
क्रममाणं हृषीकेशमुपातिष्ठन्त दानवाः ।
नाना प्रकारके वेश, माला और अनुलेप धारण करने-वाले असुरशिरोमणि दैत्य और दानव अपने-अपने चमकीले अस्त्र-शस्त्र लेकर त्रिलोकीको नापनेके लिये उद्यत हुए भगवान् हृषीकेशके समीप आ पहुँचे ॥ २६ १/२ ॥
प्रमथ्य सर्वान् दैतेयान् पादहस्ततलैः प्रभुः ॥२७॥
रूपं कृत्वा महाकायं जहाराशु स मेदिनीम् ।
भगवान्ने लातों और थप्पड़ोंसे उन सब दैत्योंको रौंदकर विशालकाय रूप धारण करके पृथ्वीको तत्काल हर लिया ॥
त्रैलोक्यं क्रममाणस्य द्युतिरादित्यसम्भवा ॥२८॥
तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे ।
नभः प्रक्रममाणस्य सक्थिदेशे व्यवस्थितौ ॥२९॥
त्रिलोकीको मापते समय भगवान् वामनकी कान्ति सूर्यकी प्रभाके समान प्रकाशित हो रही थी। जिस समय वे भूमिको लाँघ रहे थे, उस समय चन्द्रमा और सूर्य उनके दोनों स्तनोंके बीचमें आ गये थे। फिर जब वे आकाशको लाँघने लगे, तब वे दोनों उनकी जाँघोंके स्थानमे स्थित हुए थे ॥ २८-२९ ॥
परं विक्रममाणस्य जानुदेशे व्यवस्थितौ ।
विष्णोरमितवीर्यस्य वदन्त्येवं द्विजातयः ॥३०॥
उससे भी ऊपर स्वर्गलोकको लाँघते समय वे दोनों सूर्य और चन्द्रमा भगवान्के घुटनोंमें स्थित हुए देखे गये थे। ब्राह्मणलोग अमित पराक्रमी भगवान् विष्णुके उस विराट्-रूपका ऐसा ही वर्णन करते हैं ॥ ३० ॥
जित्वा लोकत्रयं कृत्स्नं हत्वा चासुरपुङ्गवान् ।
ददौ शक्राय वसुधां हरिलोंकनमस्कृतः ॥३१॥
उस समय विश्ववन्दित श्रीहरिने समस्त त्रिलोकीको जीत-कर और मुख्य-मुख्य असुरोंका वध करके वसुधाका राज्य इन्द्रको दे दिया ॥ ३१ ॥
सुतलं नाम पातालमधस्ताद् वसुधातले ।
बलेर्दत्तं भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना ॥३२॥
फिर प्रभावशाली भगवान् विष्णुने पृथ्वीके नीचे जो सुतल नामक पाताल लोक है, उसे बलिको दे दिया ॥ ३२ ॥
तदवाप्यासुरश्रेष्ठश्चकार मतिमुत्तमाम् ।
रसातलतले वासमकरोदसुराधिपः ॥३३॥
उसे पाकर असुरश्रेष्ठ असुरराज बलिने उत्तम बुद्धिका आश्रय लिया और वे उस रसातल-तलमें निवास करने लगे ॥
तत्रस्थश्च महातेजा ध्यानं परमाम्स्थितः ।
उवाच वचनं धीमान् विष्णुं लोकनमस्कृतम् ॥३४॥
वहाँ रहकर महातेजस्वी बुद्धिमान् बलि उत्तम ध्यानमें स्थित हो विश्ववन्दित भगवान् विष्णुसे इस प्रकार बोले—॥३४॥
किं मया देव कर्तव्यं ब्रूहि सर्वमशेषतः ।
ततो दैत्याधिपं प्राह देवो विष्णुः सुरोत्तमः ॥३५॥
‘देव ! मुझे क्या करना चाहिये ? यह सब पूर्णरूपसे मुझे बताइये।' तब सुरश्रेष्ठ विष्णुदेवने दैत्यराज बलिसे कहा ॥
विष्णुरुवाच
ददामि ते महाभाग परितुष्टोऽस्मि तेऽसुर ।
वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥३६॥
भगवान् विष्णु बोले—महाभाग असुर ! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ, अतः तुम्हें वर देता हूँ। तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो और मनोवाञ्छित कामना प्राप्त करो ॥
मा च शुक्रस्य वचनं प्रतिहासीः कथंचन ।
अहमाज्ञापयामि त्वां श्रेयश्चैवमवाप्स्यसि ॥३७॥
तुम्हें अपने गुरु शुक्राचार्यकी आज्ञाका किसी प्रकार उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। इसके लिये मैं तुम्हें आदेश देता हूँ। इसके पालनसे तुम्हें कल्याणकी प्राप्ति होगी ॥३७॥
अथ दैत्याधिपं प्राह विष्णुर्देवाधिपानुजः ।
वाचा परमया देवो वरेण्यः प्रभुरीश्वरः ॥३८॥
तदनन्तर देवराज इन्द्रके छोटे भाई श्रेष्ठ देवता तथा सर्वसमर्थ ईश्वर श्रीविष्णुने दैत्यराज बलिसे उत्तम वाणीमें कहा—॥ ३८ ॥
यत् त्वया सलिलं दत्तं गृहीतं पाणिना मया ।
तस्मात् ते दैत्य देवेभ्यो नास्ति जातु भयं क्वचित् ॥३९॥
‘दैत्य ! तुमने जो मेरे हाथपर संकल्पका जल दिया और मैंने जो ग्रहण किया, उसके प्रभावसे तुम्हें देवताओंकी ओरसे कभी कोई भय नहीं प्राप्त होगा ॥ ३९ ॥