भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 995

९७०. श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


वृधत्कीर्तिर्महागर्भः शङ्कुकर्णो महाध्वनिः।
दीर्घजिह्वोऽर्कवदनो मृदुबाहुर्मृदुप्रियः ॥ ७ ॥
वायुर्गविष्ठो नमुचिः शम्बरो विक्षरो महान्।
चन्द्रहन्ता क्रोधहन्ता क्रोधवर्धन एव च ॥ ८ ॥
कालकः कालकाक्षश्च वृत्रः क्रोधो विमोक्षणः।
गविष्ठश्च हविष्ठश्च प्रलम्बो नरकः पृथुः ॥ ९ ॥
चन्द्रतापनवातापी केतुमान् बलदर्पितः।
असिलोमा पुलोमा च वाष्कलः प्रमदो मदः ॥ १० ॥
शृगालवदनश्चैव करालः केशिरेव च।
एकाक्षश्चैकबाहुश्च तुहुण्डः सुमलः सृपः ॥ ११ ॥
एते चान्ये च बहवः क्रममाणं त्रिविक्रमम्।
उपतस्थुर्महात्मानं विष्णुं दैत्यगणास्तदा ॥ १२ ॥

विप्रचित्ति, शिवि, शङ्कुरय, शङ्कु, अयःशिरा, अश्वशिरा, पराक्रमी हयग्रीव, वेगवान्, केतुमान्, महान् असुर उग्र और उग्रव्यग्र, पुष्कर, पुष्कल, अश्व, अश्वपति, प्रह्लाद, अश्वशिरा (द्वितीय), कुम्भ, संह्लाद, गगनप्रिय, अनुह्लाद, हरि, हर, वाराह, संहर, रुज, वृषपर्वा, विरूपाक्ष, अतिचन्द्र, सुलोचन, निष्प्रभ, सुप्रभ, श्रीमान्, निरुदर, एकवक्त्र, महावक्त्र, द्विवक्त्र, कालसंनिभ, शरभ, शलभ, कुणप, कुलप, क्रथ, वृहत्कीर्ति, महागर्भ, शङ्कुकर्ण, महाध्वनि, दीर्घजिह्व, अर्कवदन, मृदुबाहु, मृदुप्रिय, वायु, गविष्ठ, नमुचि, शम्बर, महान् असुर विक्षर, चन्द्रहन्ता, क्रोधहन्ता, क्रोधवर्द्धन, कालक, कालकाक्ष, वृत्र, क्रोध, विमोक्षण, गविष्ठ (द्वितीय), हविष्ठ, प्रलम्ब, नरक, पृथु, चन्द्रतापन, वातापि, बलाभिमानी केतुमान् (द्वितीय), असिलोमा, पुलोमा, वाष्कल, प्रमद, मद, शृगालवदन, कराल, केशी, एकाक्ष, एकबाहु, तुहुण्ड, सुमल तथा सृप—ये और दूसरे भी बहुत-से दैत्यगण उस समय अपना पग बढ़ानेवाले महात्मा त्रिविक्रम विष्णुके पास आ पहुँचे ॥ २—१२ ॥

प्रासोद्यतकराः केचिद् व्यादितास्याः खरस्वनाः।
शतघ्नीचक्रहस्ताश्च वज्रहस्तास्तथा परे ॥ १३ ॥

किन्हीं दैत्यों ने अपने हाथोंमें प्रास उठा रखे थे। वे मुँह बाये हुए थे और गधोंके रेंकनेकी भाँति गर्जना करते थे। कितने ही दैत्य अपने हाथोंमें शतघ्नी और चक्र लिये हुए थे तथा दूसरोंने हाथोंमें वज्र उठा रक्खे थे ॥ १३ ॥

खड्गपट्टिशहस्ताश्च परश्वधधराः परे।
प्रासमुद्गरहस्ताश्च तथा परिघपाणयः ॥ १४ ॥

किन्हींके हाथोंमें खड्ग और पट्टिश थे। दूसरोंने फरसे धारण किये थे। कितनोंने अपने-अपने हाथोंमें प्रास, मुद्गर और परिघ ले रखे थे ॥ १४ ॥

महाशनिव्यग्रकरा मौशलास्तु महाबलाः।
महावृक्षोद्यतकरास्तथैव च धनुर्धराः ॥ १५ ॥

किन्हींके हाथ बहुत बड़ी अशनिसे व्यग्र दिखायी देते थे। दूसरे महाबली दैत्य मूसल लिये हुए थे। कितने ही हाथोंमें विशाल वृक्ष उठाये हुए थे और कितनोंने धनुष धारण किये थे ॥ १५ ॥

गदाभुशुण्डिहस्ताश्च वज्रहस्तास्तथा परे।
महापट्टिशहस्ताश्च तथा परिघपाणयः ॥ १६ ॥

बहुत-से दैत्य हाथोंमें गदा, भुशुण्डि, वज्र, महापट्टिश और परिघ लिये हुए थे ॥ १६ ॥

असिकम्पनहस्ताश्च दानवा युद्धदुर्मदाः।
नानाप्रहरणा घोरा नानावेषा महाबलाः ॥ १७ ॥

बहुत-से रणदुर्मद दानव हाथोंमें खड्ग और कम्पन धारण किये हुए थे। नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये और भाँति-भाँतिके वेश धारण किये महाबली भयंकर दैत्य वहाँ उपस्थित थे ॥ १७ ॥

कूर्मकुक्कुटवक्त्राश्च हस्तिवक्त्रास्तथा परे।
खरोष्ट्रवदनाश्चैव वराहवदनास्तथा ॥ १८ ॥

किन्हींके मुख कछुओंगे समान थे तो किन्हींके मुर्गोंके समान। कोई हाथी-जैसे मुखवाले थे तो कोई गदहे, ऊँट और सूअर-जैसे ॥ १८ ॥

भीमा मकरवक्त्राश्च शिशुमारमुखास्तथा।
मार्जारशुकवक्त्राश्च दीर्घवक्त्राश्च दानवाः ॥ १९ ॥

कितने ही भयंकर दैत्य मगर, सूँस, बिल्ली और तोते-जैसे मुखवाले थे। किन्हीं-किन्हीं दानवोंके मुख बड़े विशाल थे ॥ १९ ॥

गरुडाननाः खड्गमुखा मयूरवदनास्तथा।
अश्ववक्त्रा वभ्रुवक्त्रा घोरा मृगमुखास्तथा ॥ २० ॥

कुछ घोर दैत्य गरुड़, गैंडे और मोरके समान मुखवाले थे। बहुतोंके मुख घोड़े, नेवले और मृगोंके समान थे ॥

उष्ट्रशल्यकवक्त्राश्च दीर्घवक्त्राश्च दानवाः।
नकुलस्येव वक्त्राश्च पारावतमुखास्तथा ॥ २१ ॥

बहुत-से दानव ऊँटों और स्याहियोंके समान मुखवाले थे। कितनोंके मुख लंबे दिखायी देते थे। किन्हींके मुख नेवलोंके समान थे तो किन्हींके परेवोंके समान ॥ २१ ॥

चक्रवाकमुखाश्चैव गोधवक्त्रास्तथा परे।
तथा मृगाननाः शूरा गोऽजादिमहिषाननाः ॥ २२ ॥

किन्हींके मुख चकवेके समान थे। कोई गोहके समान मुख धारण करते थे तथा बहुत-से शूरवीर दानव मृग, गौ, बकरे, भेड़ और भैंसोंके समान मुखवाले थे ॥ २२ ॥

कृकलासमुखाश्चैव व्याघ्रवक्त्रास्तथा परे।
ऋक्षशार्दूलवक्त्राश्च सिंहवक्त्रास्तथा परे ॥ २३ ॥

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