विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 994, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] [ द्विसप्ततितमोऽध्यायः ९६९
दिशाएँ कान और विदिशाएँ उनकी भुजाएँ थीं। अश्विनीकुमार उनके श्रवणरन्ध्र तथा महाबली वायुदेव उनकी नासिका थे ॥ ४७ ॥
प्रसादश्चन्द्रमाश्चैव मनो धर्मस्तथैव च।
सत्यमस्याभवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती ॥ ४८ ॥
चन्द्रमा उनके प्रसाद, धर्म मन, सत्य वाणी और देवी सरस्वती जिह्वा थीं ॥ ४८ ॥
ग्रीवा दितिर्महादेवी तालुः सूर्यश्च दीप्तिमान्।
द्वारं स्वर्गस्य नाभिर्वै मित्रस्त्वष्टा च वै ध्रुवौ ॥ ४९ ॥
महादेवी दिति ग्रीवा, दीप्तिमान् सूर्य तालु, स्वर्गद्वार नाभि और मित्र तथा त्वष्टा दोनों भौंहें थे ॥ ४९ ॥
मुखं वैश्वानरश्चास्य वृषणौ तु प्रजापतिः।
हृदयं भगवान् ब्रह्मा पुंस्त्वे वै कश्यपो मुनिः ॥ ५० ॥
अग्नि मुख, प्रजापति अण्डकोश, भगवान् ब्रह्मा हृदय तथा कश्यप मुनि जननेन्द्रियके स्थानमें थे ॥ ५० ॥
पृष्ठेऽस्य वसवो देवा मरुतः पादसंधिषु।
सर्वच्छन्दांसि दशना ज्योतींषि विमलाः प्रभाः॥ ५१॥
उनके पृष्ठभागमें वसुदेवता और पैरोंकी संधियोंमें मरुद्गण थे। सम्पूर्ण छन्द दाँत और ग्रह-नक्षत्र निर्मल प्रभाएँ थे ॥ ५१ ॥
ऊरू रुद्रो महादेवे धैर्यं चास्य महार्णवः।
उदरे चास्य गन्धर्वा भुजगाश्च महाबलाः ॥ ५२ ॥
उनके दोनों ऊरु (जाँघें) महादेव रुद्र थे। धैर्यका स्थान महासागरने ले लिया था। उदरमें गन्धर्व और महाबली सर्प निवास करते थे ॥ ५२ ॥
लक्ष्मीर्मेधा धृतिः कान्तिः सर्वविद्या च वै कटिः।
ललाटमस्य परमस्थानं च परमात्मनः ॥ ५३ ॥
लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति और सम्पूर्ण विद्याएँ उनका कटि-प्रदेश थीं। उन परमात्माका परमधाम ही उनका ललाट था ॥ ५३ ॥
सर्वज्योतींषि यानीह तपः शक्रस्तु देवराट्।
तस्य देवाधिदेवस्य तेजो ह्याहुर्महात्मनः ॥ ५४ ॥
सम्पूर्ण ज्योतिर्गण, तप और देवराज इन्द्र—सबको उन देवाधिदेव परमात्माका तेज कहा गया है ॥ ५४ ॥
स्तनौ कक्षौ च वेदाश्च ओष्ठौ चास्य मखाः स्थिताः।
इष्टयः पशुबन्धाश्च द्विजानां चेष्टितानि च ॥ ५५ ॥
चारों वेद उनके स्तन और कक्ष थे। यज्ञ उनके ओष्ठके स्थानमें स्थित थे। इष्टियाँ पशुबन्ध और द्विजोंकी चेष्टाएँ सभी उनके विभिन्न अङ्ग थे ॥ ५५ ॥
तस्य देवमयं रूपं दृष्ट्वा विष्णोर्महासुराः।
अभ्यसर्पन्त संक्रुद्धाः पतङ्गा इव पावकम् ॥ ५६ ॥
भगवान् विष्णुके उस देवमय रूपको देखकर सभी महान् असुर अत्यन्त कुपित हो उसी प्रकार उनकी ओर बढ़े, जैसे पतिंगे जलती आगपर टूटे पड़ते हैं ॥ ५६ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे विश्वरूपप्रकाशे एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें वामनके विश्वरूपका प्रकाशविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७१ ॥
द्विसप्ततितमोऽध्यायः
विराट् रूपधारी वामनपर आक्रमण करनेवाले दैत्योंके नाम, रूप और आयुधोंका परिचय, भगवान्का तीनों लोकोंको नापकर राज्यका विभाजन करना, बलिको पातालका राज्य दे मर्यादा बाँधकर उन्हें वहाँ भेजना, जीविकाकी व्यवस्था करना, नारदजीका बलिको मोक्षविंशक स्तोत्रका उपदेश देना, उसके प्रभावसे बलिका बन्धन-मुक्त होना और उस स्तोत्रकी महिमा
वैशम्पायन उवाच
शृणु नामानि सर्वेषां रूपाण्यभिजनानि च।
आयुधानि च मुख्यानि दानवानां महात्मनाम् ॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अब तुम समस्त महामनस्वी दानवोंके नाम, रूप, कुल और मुख्य-मुख्य आयुधोंका वर्णन सुनो ॥ १ ॥
विप्रचित्तिः शिविः शङ्कुरयः शङ्कुस्तथैव च।
अयःशिरा अश्वशिरा हयग्रीवश्च वीर्यवान् ॥ २॥
वेगवान् केतुमानुग्रः सोग्रव्यग्रो महासुरः।
पुष्करः पुष्कलश्चैव साश्वोऽश्वपतिरेव च ॥ ३॥
प्रह्लादोऽश्वशिराः कुम्भः संह्रादो गगनप्रियः।
अनुह्रादो हरिरहौ वाराहः संहरो रजः ॥ ४॥
वृषपर्वा विरूपाक्षो अतिचन्द्रः सुलोचनः।
निष्प्रभः सुप्रभः श्रीमांस्तथैव च निरूदरः ॥ ५०॥
एकवक्त्रो महावक्त्रो द्विवक्त्रः कालसंनिभः।
शरभः शलभश्चैव कुणपः कुलपः क्रथः ॥ ६॥