विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 993, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें९६८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
यजमानको इन वामनदेवके लिये अवश्य दान देना चाहिये ॥ २९-३० ॥
इत्युक्त्वासुरसंघानां मध्ये वैरोचनिस्तदा ।
देवाय प्रददौ तस्मै पदानि त्रीणि विष्णवे ॥ ३१ ॥
असुरसमूहोंके बीचमें ऐसी बात कहकर विरोचनकुमार बलि उस समय उन विष्णुदेवको तीन पग भूमिको दान देने लगे ॥ ३१ ॥
प्रह्राद उवाच
दानवेश्वर मा दास्त्वं विप्रायस्मै प्रतिग्रहम् ।
नेमं विप्रशिशुं मन्ये नेदृशो भवति द्विजः ॥ ३२ ॥
तब प्रह्लादने फिर कहा—दानवेश्वर ! तुम इन ब्राह्मणको प्रतिग्रह न दो। मैं इन्हें ब्राह्मणका बालक नहीं मानता; क्योंकि ब्राह्मणका बालक ऐसा नहीं होता ॥ ३२ ॥
रूपेणानेन दैत्येन्द्र सत्यमेव ब्रवीमि ते ।
नारसिंहमहं मन्ये तमेव पुनरागतम् ॥ ३३ ॥
दैत्येन्द्र ! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ । इनके इस रूपसे मुझे यही अनुमान होता है कि पुनः वे नरसिंहदेव ही यहाँ आ गये हैं ॥ ३३ ॥
एवमुक्तस्तदा तेन प्रह्लादेनामितौजसा ।
प्रह्लादमब्रवीद् वाक्यमिदं निर्भर्त्सयन्निव ॥ ३४ ॥
अमित तेजस्वी प्रह्लादके ऐसा कहनेपर उस समय बलिने प्रह्लादको फटकारते हुए-से इस प्रकार कहा ॥ ३४ ॥
बलिरुवाच
देहीति याचते यो हि प्रत्याख्याति च योऽसुर ।
उभयोरप्यलब्धव्या वै भागस्तं विशते नरम् ॥ ३५ ॥
बलि बोले--असुर ! जो 'दीजिये' कहकर याचना करता है तथा जो उस याचकको ठुकरा देता है, उस मनुष्यको उस याचक और ठुकरानेवाले दोनोंकी दरिद्रताका भाग प्राप्त होता है ॥ ३५ ॥
प्रतिज्ञाय तु यो विप्रे न ददाति प्रतिग्रहम् ।
स याति नरकं पापी मित्रगोत्रसमन्वितः ॥ ३६ ॥
जो प्रतिज्ञा करके भी ब्राह्मणको दान नहीं देता है, वह पापी मित्र और कुटुम्बी जनोंसहित नरकमें जाता है॥३६॥
अलक्ष्मीभयभीतोऽहं ददाम्यस्मै वसुंधराम् ।
प्रतिग्रहीता चाप्यन्यः कश्चिदस्माद् द्विजोऽथवै ॥ ३७ ॥
नाधिको विद्यते यस्मात् तद् ददामि वसुंधराम् ।
हृदयस्य च मे तृप्तिः परा भवति दानव ॥ ३८ ॥
दृष्ट्वा वामनरूपेण याचन्तं द्विजपुङ्गवम् ।
एष तस्मात् प्रदास्यामि न स्थास्यामि निवारितः॥ ३९ ॥
मैं अलक्ष्मी ( दरिद्रता ) के भयसे डरकर इन्हें पृथ्वीका दान देता हूँ । दूसरा कोई दान लेनेवाला ब्राह्मण इनसे बढ़कर नहीं मिल सकता, इसलिये मैं इन्हींको पृथ्वीका दान देता हूँ । दानव ! इन ब्राह्मण-शिरोमणिको वामनरूपसे याचना करते देख मेरे हृदयको बड़ा संतोष प्राप्त होता है, इसलिये मैं इन्हें अवश्य दान दूँगा, आपके रोकनेपर भी रुक नहीं सकूँगा ॥ ३७-३९ ॥
भूयश्च प्राब्रवीद्देवं वामनं विप्ररूपिणम् ।
स्वल्पैः स्वल्पमते किं ते पदैस्त्रिभिरनुत्तमम् ॥ ४० ॥
कृत्स्नां ददामि ते विप्र पृथिवीं सागरैर्वृताम् ।
तदनन्तर उन्होंने ब्राह्मणरूपधारी वामनसे पुनः इस प्रकार कहा--'मन्दबुद्धि ब्राह्मण ! तुम्हारे इन छोटे-छोटे तीन पदोंसे कौन-सा परम उत्तम भूभाग प्राप्त हो सकेगा ? मैं तुम्हें समुद्रोंसे घिरी हुई सारी पृथ्वी देता हूँ' ॥ ४० ॥
वामन उवाच
न पृथ्वीं कामये कृत्स्नां संतुष्टोऽस्मि पदैस्त्रिभिः।
एष एव रुचिष्यो मे वरो दानवसत्तम ॥ ४१ ॥
वामनने कहा--दानवशिरोमणे ! मैं सारी पृथ्वीकी कामना नहीं करता । तीन पगोंसे ही संतुष्ट हूँ। यही मेरी रुचिके अनुकूल वर है ॥ ४१ ॥
वैशम्पायन उवाच
तथास्त्विति बलिः प्रोच्य स्पर्शयामास दानवः।
पदानि त्रीणि देवाय विष्णवेऽमिततेजसे ॥ ४२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तब दानवराज बलिने 'तथास्तु' कहकर उन महातेजस्वी विष्णुदेवको तीन पग भूमिका दान कर दिया ॥ ४२ ॥
तोये तु पतिते हस्ते वामनोऽभूदवामनः।
सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास वै विभुः ॥ ४३ ॥
हाथपर संकल्पका जल पड़ते ही वामनजी विराट् बन गये । उन भगवान्ने वहाँ अपने सर्वदेवमय रूपका दर्शन कराया ॥ ४३ ॥
भूः पादौ द्यौः शिरश्चास्य चन्द्रादित्यौ च चक्षुषी।
पादाङ्गुल्यः पिशाचाश्च हस्ताङ्गुल्यश्च गुह्यकाः॥ ४४ ॥
भूलोक उनका पैर था और स्वर्गलोक सिर । चन्द्रमा और सूर्य उनके नेत्रोंके स्थानमें थे । पिशाच इनके पैरोंकी अङ्गुलियाँ थे तो गुह्यक हाथोंकी ॥ ४४ ॥
विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः ।
यक्षा नखेषु सम्भूता लेखाश्चाप्सरसस्तथा ॥ ४५ ॥
विश्वेदेव उनके घुटनोंमें स्थित थे । श्रेष्ठ देवता साध्यगण उनकी दोनों पिण्डलियों थे । यक्ष, लेखनामक देवता तथा अप्सराएँ उनके नखोंमें स्थित थीं ॥ ४५ ॥
तडिद् दृष्टिः सुविपुला केशाः सूर्यांशवस्तथा ।
तारका रोमकूपाणि रोमाणि च महर्षयः ॥ ४६ ॥
विद्युत् उनकी विशाल दृष्टि थी । सूर्यकी किरणें उनके केश थीं। तारे उनके रोमकूप और महर्षि उनके रोम थे ॥४६॥
वाहवो विदिशश्चास्य दिशः श्रोत्रे तथैव च ।
अश्विनौ श्रवणौ चास्य नासा वायुर्महाबलः ॥ ४७ ॥