विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 992, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | एकसप्ततितमोऽध्यायः | ९६७ |
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बलिरुवाच
विप्रेन्द्र प्राङ्मुखस्तिष्ठ स्थितोऽस्मि कमलेक्षण॥ १६ ॥
प्रतीच्छ देहि किं भूमिं किं मात्रा भोः पदत्रयम् ।
दत्तं च पातय जलं नैव मिथ्या भवेद् गुरुः ॥ १७ ॥
बलिने कहा—'विप्रवर ! पूर्वाभिमुख होकर खड़े हो जाइये !' (वामन बोले—) 'खड़ा हूँ !' (बलि बोले—) 'कमलनयन ! लीजिये !' (वामन बोले—) 'दीजिये !' (बलि बोले—) 'क्या दूँ ?' (वामन बोले—) 'भूमि !' (बलिबोले—) 'ब्रह्मन् ! उस भूमिकी मात्रा कितनी है ?' (वामन बोले—) 'तीन पग !' (बलि बोले—) 'दे दिया !' (वामन बोले—) 'संकल्पकर जल गिराइये, जिससे मेरे गुरुकी माँग व्यर्थ न हो जाय' ॥ १६-१७ ॥
शुक्र उवाच
भो न देयं कुतो दैत्य विज्ञातोऽयं मया ध्रुवम् ।
कोऽयं विष्णुरहो प्रीतिर्वञ्चितस्त्वं न वञ्चितः ॥ १८ ॥
शुक्र बोले--'अजी ! यह दान नहीं देना चाहिये।' (बलि० ) 'क्यों ?' (शुक्र० ) 'दैत्य ! मैंने निश्चय ही इन्हें पहचान लिया है।' (बलि० ) 'कौन हैं ये ?' (शुक्र० ) 'अहो ! यह विष्णु हैं।' (बलि० ) 'तब तो बड़ी प्रसन्नताकी बात है।' (शुक्र० ) 'फिर तो तुम ठगे गये।' (बलि० ) 'नहीं ! मैं ठगा नहीं गया' ॥ १८ ॥
बलिरुवाच
कथं सनाथोऽयं विष्णुर्यज्ञे स्वयमुपस्थितः ।
दास्यामि देवदेवाय यद् यदिच्छत्ययं विभुः ॥ १९ ॥
बलि बोले—अहो ! यह भगवान् विष्णु तो सर्वथा सनाथ (कृतकृत्य) हैं। फिर यह मेरे यज्ञमें याचनाके लिये स्वयं कैसे उपस्थित हो गये ? यदि आ ही गये तो यह भगवान् जो-जो चाहते हैं, वह सब मैं इन देवाधिदेवको समर्पित करूँगा ॥ १९ ॥
को वान्यः पात्रभूतोऽस्माद् विष्णोः परतरो भवेत् ।
एवमुक्त्वा बलिः शीघ्रं पातयामास वै जलम् ॥ २० ॥
'इन विष्णुसे बढ़कर दूसरा कौन श्रेष्ठतर पात्र हो सकता है'—ऐसा कहकर बलिने शीघ्र ही जल गिराया ॥ २० ॥
वामन उवाच
पदानि त्रीणि दैत्येन्द्र पर्याप्तानि ममानघ ।
यन्मया पूर्वमुक्तं हि तत् तथा न तदन्यथा ॥ २१ ॥
वामन बोले—निष्पाप दैत्यराज ! मेरे लिये तीन पग पर्याप्त हैं ! मैंने पहले जो कुछ कहा है, वह ठीक है। मिथ्या नहीं है ॥ २१ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा वामनस्य महौजसः ।
कृष्णाजिनोत्तरीयं स कृत्वा वैरोचनिस्तदा ॥ २२ ॥
एवमस्त्विति दैत्येशो वाक्यमुक्त्वाऽरिसूदनः ।
ततो वारिसमापूर्णं भृङ्गारं स परामृशत् ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! महातेजस्वी वामनका यह वचन सुनकर शत्रुसूदन विरोचनकुमार दैत्यराज बलिने उस समय काले मृगचर्मको उत्तरीय बनाकर कहा—'एवमस्तु' ऐसा कहकर उन्होंने जलसे भरे हुए गडूएको हाथमें लिया ॥ २२-२३ ॥
वामनो ह्यसुरेन्द्रस्य चिकीर्षुः कदनं महत् ।
क्षिप्रं प्रसारयामास दैत्यक्षयकरं करम् ॥ २४ ॥
भगवान् वामन असुरराज बलिकी यही भारी हानि करना चाहते थे; अतः उन्होंने अपने दैत्यविनाशक हाथको शीघ्र उनके आगे फैला दिया ॥ २४ ॥
प्राङ्मुखश्चापि दैत्येशस्तस्मै सुमनसा जलम् ।
दातुकामः करे यावत् तावत् तं प्रत्यपेधयत् ॥ २५ ॥
दैत्येश्वर बलि पूर्वाभिमुख होकर शुद्ध हृदयसे वामनजीके हाथमें ज्यों ही जल देनेको उद्यत हुए त्यों ही प्रह्लादने उन्हें रोका ॥ २५ ॥
तस्य तद् रूपमालोक्य ह्यचिन्त्यं च महात्मनः ।
अभूतपूर्वं च हरेर्जिहीर्षोः श्रियमासुरीम् ॥ २६ ॥
इङ्गितज्ञोऽग्रतः स्थित्वा प्रह्रादस्त्वब्रवीद् वचः ।
असुरोंकी सम्पत्तिको हर लेनेकी इच्छावाले उन परमात्मा श्रीहरिके उस अभूतपूर्व एवं अचिन्त्य रूपको देखकर उनकी चेष्टाको समझनेवाले प्रह्लाद बलिके सामने खड़े हो गये और इस प्रकार बोले ॥ २६ १/२ ॥
प्रह्राद उवाच
मा ददस्व जलं हस्ते घटोर्वामनरूपिणः ॥ २७ ॥
स त्वसौ येन ते पूर्वं निहतः प्रपितामहः ।
विष्णुरेष महाप्राज्ञस्त्वां वञ्चयितुमागतः ॥ २८ ॥
प्रह्लादने कहा—दैत्यराज ! तुम इन वामनरूपधारी ब्रह्मचारीके हाथमें जल न दो। ये वे ही हैं, जिन्होंने पूर्वकालमें तुम्हारे प्रपितामहको मार डाला था। ये महाबुद्धिमान् विष्णु ही तुम्हें ठगनेके लिये आये हैं ॥ २७-२८ ॥
बलिरुवाच
हन्त तस्मै प्रदास्यामि देवायैमं प्रतिग्रहम् ।
अनुग्रहकरं देवमीदृशं जगतः प्रभुम् ॥ २९ ॥
ब्रह्मणोऽपि गरीयांसं पात्रं लप्स्यामहे वयम् ।
अवश्यं चासुरश्रेष्ठ दातव्यं दीक्षितेन वै ॥ ३० ॥
बलिने कहा—असुरश्रेष्ठ ! यदि ऐसी बात है तब तो बड़े हर्षका विषय है। मैं उन नारायणदेवको यह प्रतिग्रह अवश्य दूँगा। जो ब्रह्माजीसे भी अधिक गौरवशाली और अनुग्रह करनेवाले हैं, ऐसे जगदीश्वरदेवको हमलोग दानपात्रके रूपमें प्राप्त करेंगे ( इससे बढ़कर सौभाग्यकी बात और क्या हो सकती है)। अतः यज्ञमें दीक्षित हुए मुझ