भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 991

९६६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

वरुणका जो यज्ञ हुआ था, तुमने उससे भी बढ़कर यह यज्ञ किया है ॥ २ ॥
यजता वाजिमेधेन क्रतूनां प्रवरेण तु ।
सर्वपापविनाशाय त्वया स्वर्गप्रदर्शिना ॥ ३ ॥
स्वर्गलोकका दर्शन करानेवाला ऋतुश्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ समस्त पापोंके विनाशमें कारण है। तुमने इसके द्वारा यजन करके अपने इस यशका महत्त्व बढ़ा दिया है ॥ ३ ॥
सर्वकाममयो ह्येष सम्मतो ब्रह्मवादिनाम् ।
ऋतूनां प्रवरः श्रीमानश्वमेध इति श्रुतिः ॥ ४ ॥
ऋतुश्रेष्ठ श्रीमान् अश्वमेध सर्वकाममय है, यह ब्रह्मवादियोंको भी मान्य है, ऐसा श्रुतिका कथन है ॥ ४ ॥
सुवर्णशृङ्गो हि महानुभावो
लोहक्षुरो वायुजवो महात्मा ।
स्वर्गेक्षणः काञ्चनगर्भगौरः
स विश्वयोनिः परमो हि मेध्यः ॥ ५ ॥
विश्वका कारणभूत वह उत्तम यज्ञ परम पवित्र है, उस अश्वरूपधारी यज्ञका शृङ्ग (मस्तक) सुवर्णमय है, उसका प्रभाव महान् है, खुर लोहेके समान कठोर हैं, वेग वायुके समान तीव्र है, शरीर विशाल है, वह स्वर्गलोककी ओर दृष्टि रखनेवाला है और उसकी कान्ति सुवर्णमिश्रित गौरवर्णकी है ॥ ५ ॥
आस्थाय वै वाजिनमश्वमेध-
मिष्ट्वा नरा दुष्कृतमुत्तरन्ति ।
आहुश्च यं वेदविदो द्विजेन्द्रा
वैश्वानरं वाजिनमश्वमेधम् ॥ ६ ॥
उस अश्वमेधरूपी अश्वका आश्रय लेकर यज्ञ करनेके पश्चात् मनुष्य पापसे पार हो जाते हैं। वेदवेत्ता विप्रवर अश्वमेधयज्ञसम्बन्धी अश्वको वैश्वानर (अग्निरूप) कहते हैं ॥
यथाऽऽश्रमाणां प्रवरो गृहाश्रमो
यथा नराणां प्रवरा द्विजातयः ।
यथासुराणां प्रवरो भवानिह
तथा क्रतूनां प्रवरोऽश्वमेधः ॥ ७ ॥
जैसे गृहस्थ-आश्रम सब आश्रमोंमें श्रेष्ठ है, जैसे ब्राह्मण सब मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं और जैसे आप यहाँ असुरोंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार अश्वमेध सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वामनेन समीरितम् ।
मुदा परमया युक्तः प्राह दैत्यपतिर्बलिः ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वामनके कहे हुए इस वचनको सुनकर दैत्यराज बलि बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले ॥ ८ ॥

बलिरुवाच
कस्यासि ब्राह्मणश्रेष्ठ किमिच्छसि ददामि ते ।
वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥ ९ ॥
बलिने कहा—विप्रवर ! आप किसके पुत्र हैं और क्या चाहते हैं ? मैं आपको मुँहमाँगी वस्तु देता हूँ। आपका भला हो, कोई वर माँगिये और अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त कीजिये ॥ ९ ॥

वामन उवाच
न राज्यं न च यानानि न रत्नानि न च स्त्रियः ।
कामये यदि तुष्टोऽसि धर्मे च यदि ते मतिः ॥ १० ॥
गुर्वर्थे मे प्रयच्छस्व पदानि त्रीणि दानव ।
त्वमग्निशरणार्थाय एष मे प्रवरो वरः ॥ ११ ॥
वामन बोले—दनुनन्दन ! मैं न तो राज्य चाहता हूँ, न वाहन। न रत्नकी इच्छा रखता हूँ, न स्त्रियोंकी। यदि आप प्रसन्न हैं और यदि आपका मन धर्ममें लगता है तो मुझे गुरुके लिये अग्निशाला बनवानेके निमित्त तीन पग भूमि दे दीजिये, यही मेरे लिये सर्वोत्तम वर है ॥ १०-११ ॥
वामनस्य वचः श्रुत्वा प्राह दैत्यपतिर्बलिः ।
वामनजीकी यह बात सुनकर दैत्यराज बलि बोले ॥ १११/२ ॥

बलिरुवाच
त्रिभिः किं तव विप्रेन्द्र पदैः प्रवदतां वर ।
शतं शतसहस्राणां पदानां मार्गतां भवान् ॥ १२ ॥
बलिने कहा—वक्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर ! तीन पग भूमिसे आपका क्या होगा ? लाखों करोड़ों पग भूमि माँग लीजिये ॥ १२ ॥

शुक्र उवाच
मा ददस्व महाबाहो न त्वं वेत्सि महासुर ।
एष मायाप्रतिच्छन्नो भगवान् प्रवरो हरिः ॥ १३ ॥
यह देख शुक्राचार्यने कहा—महाबाहो ! महान् असुर ! तुम इन्हें कुछ न दो। तुम्हें पता नहीं कि ये कौन हैं ? ये देवशिरोमणि भगवान् विष्णु हैं, जो मायासे अपने स्वरूपको छिपाकर आये हैं ॥ १३ ॥
वामनं रूपमास्थाय शक्रप्रियहितेप्सया ।
त्वां वञ्चयितुमायातो बहुरूपधरो विभुः ॥ १४ ॥
अनेक रूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णु इन्द्रका प्रिय और हित करनेकी इच्छासे वामनरूप धारण करके तुम्हें ठगनेके लिये यहाँ आये हैं ॥ १४ ॥
एवमुक्तः स शुक्लेन चिरं संचिन्त्य वै बलिः ।
प्रहर्षेण समायुक्तः 'किमतः पात्रमिष्यते ॥ १५ ॥
शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर बलिने चिरकालतक सोच-विचार करके बड़े हर्षके साथ कहा—'इनसे बढ़कर उत्तम पात्र और कौन हो सकता है ? ॥ १५ ॥
प्रगृह्य हस्ते सम्भ्रान्तो भृङ्गारं कनकोद्भवम् ।
ऐसा कहकर बलिने वेगपूर्वक हाथमें सोनेकी झारी उठा ली ॥ १५१/२ ॥