विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 990, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] एकसप्ततितमोऽध्यायः [ ९६५
ऋषिभिश्चैव मन्त्राद्यैः सर्वतः परिवारितम्।
दैत्यदानवराजेन्द्रमुपतस्थे बलिं बली ॥ ६२॥
ऋषियोंने मन्त्र आदिके द्वारा सब ओरसे उन्हें घेर रखा था, तथापि बलवान् भगवान् वामन दैत्य-दानवराज बलिके पास पहुँच ही गये ॥ ६२ ॥
वर्णयित्वा यथान्यायं यज्ञं यज्ञः सनातनः।
विस्तरेण नरश्रेष्ठ प्रयोगैर्विविधैस्तथा ॥ ६३॥
शुक्रादीनृत्विजश्चापि यज्ञकर्मविचक्षणान्।
सर्वानैव निजग्राह चकार च निरुत्तरान् ॥६४॥
नरश्रेष्ठ ! उन सनातन यज्ञपुरुषने उस यज्ञका नाना प्रकारके प्रयोगोंद्वारा विस्तारपूर्वक यथोचित वर्णन करके यज्ञकर्ममें कुशल शुक्राचार्य आदि समस्त ऋत्विजोंको निगृहीत करते हुए उन्हें निरुत्तर कर दिया ॥ ६३-६४ ॥
आरादथ वलेस्तस्य ऋत्विजामभितस्तथा।
यज्ञमात्मानमेवासौ हेतुभिः कारणं विभुः ॥६५॥
वैदिकैरप्रकाशैश्च पुनरप्यथ भारत।
प्रत्यक्षमृषिसंघानां वर्णयामास चित्रगुः ॥६६॥
भारत ! विचित्र वाणीवाले उन सर्वव्यापी भगवान्ने बलिके समीप, ऋत्विजोंके निकट तथा ऋषि समुदायोंके समक्ष अपने ही स्वरूपभूत कारणात्मा यज्ञका अप्रकाशित वैदिक युक्तियोंद्वारा बारंबार वर्णन किया ॥ ६५-६६ ॥
ततो निरुत्तरान् दृष्ट्वा सोपाध्यायानृषींश्च तान्।
अवृद्धेनापि वृद्धांस्तान् वामनेन महौजसा ॥६७॥
अद्भुतं चापि मेने स विरोचनसुतो बली।
मूर्ध्ना कृताञ्जलिश्श्चेदमब्रवीद् विस्मितो वचः ॥६८॥
महान् तेजस्वी बालक वामनके द्वारा उपाध्यायोंसहित उन वृद्ध महर्षियोंको भी निरुत्तर हुआ देख विरोचन-कुमार बलवान् बलिने उसे अद्भुत चमत्कार माना। फिर वे हाथ जोड़े मस्तक झुका विस्मित होकर इस प्रकार बोले—॥ ६७-६८ ॥
कुतस्त्वं कोऽसि कस्यासि किं तेहास्ति प्रयोजनम्।
नैवंविधः परिज्ञातो दृष्टपूर्वी मया द्विजः ॥६९॥
'विप्रवर ! आप कहाँसे आये हैं ? कौन हैं ? किसके पुत्र हैं ? यहाँ पधारनेमें आपका क्या प्रयोजन है ? मैंने आप-जैसे द्विजको न तो पहले कभी देखा था और न जाना ही था ॥ ६९ ॥
बालो मतिमतां श्रेष्ठो ज्ञानविज्ञानकोविदः।
शिष्टवाग्रूपसम्पन्नो मनोज्ञः प्रियदर्शनः ॥७०॥
'आप बाल होकर भी बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। ज्ञान-विज्ञानमें प्रवीण हैं। आपकी वाणी शिष्टतापूर्ण है। आप रूपवान् और मनोहर हैं। देखनेमें प्रिय लगते हैं ॥ ७० ॥
नेदृशाः सन्ति देवानासृषीणामपि सूनवः।
न नागानां न यक्षाणां नासुराणां न रक्षसाम् ॥७१॥
न- पितॄणां न सिद्धानां गन्धर्वाणां तथैव च।
योऽसि सोऽसि नमस्तेऽस्तु ब्रूहि किं करवाणि ते ॥
'देवताओं तथा ऋषियोंके पुत्र भी ऐसे नहीं हैं। न नागोंके, न यक्षोंके, न असुरोंके, न राक्षसोंके, न पितरोंके, न सिद्धोंके और न गन्धर्वोंके ही पुत्र ऐसे हैं। आप जो हों, सो हों, आपको नमस्कार है। बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?' ॥ ७१-७२ ॥
वैशम्पायन उवाच
उक्त एवं ह्यचिन्त्यात्मा बलिना वामनस्तदा।
प्रोवाचोपायतत्त्वज्ञः स्मितपूर्वमिदं वचः ॥७३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बलिके ऐसा कहनेपर अचिन्त्यस्वरूप भगवान् वामन, जो कार्यसिद्धिके तात्त्विक उपायको जाननेवाले थे, मुसकराकर इस प्रकार बोले ॥ ७३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥
एकसप्ततितमोऽध्यायः
वामनद्वारा बलिके यज्ञकी प्रशंसा, बलिसे माँगनेके लिये प्रेरित होनेपर वामनका उनसे तीन पग भूमि माँगना, शुक्राचार्य और प्रह्लादका बलिको दान देनेसे रोकना, बलिद्वारा दानका समर्थन तथा दान पाते ही वामनका अपने विराट्रूपको प्रकट करना
विष्णुरुवाच
अहो यज्ञोऽसुरेशस्य बहुभक्षः सुसंस्कृतः।
पितामहस्येव पुरा यजतः परमेष्ठिनः ॥ १॥
भगवान् विष्णु बोले—अहो ! असुरेश्वर बलिको यह यज्ञ अद्भुत है। इसमें भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंकी बहुलता है तथा यह यज्ञ सुन्दर संस्कारसे सम्पन्न है। पूर्वकालमें यज्ञपरायण परमेष्ठी ब्रह्माने जैसा यज्ञ किया था, वैसा ही यह भी है ॥१॥
सुरेशस्य च शक्रस्य यमस्य वरुणस्य च।
विशेषितस्त्वया यज्ञो दानवेन्द्र महाबल ॥ २ ॥
महाबली दानवराज ! पूर्वकालमें देवराज इन्द्र, यम और