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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व ] एकसप्ततितमोऽध्यायः [ ९६५


ऋषिभिश्चैव मन्त्राद्यैः सर्वतः परिवारितम्।
दैत्यदानवराजेन्द्रमुपतस्थे बलिं बली ॥ ६२॥
ऋषियोंने मन्त्र आदिके द्वारा सब ओरसे उन्हें घेर रखा था, तथापि बलवान् भगवान् वामन दैत्य-दानवराज बलिके पास पहुँच ही गये ॥ ६२ ॥

वर्णयित्वा यथान्यायं यज्ञं यज्ञः सनातनः।
विस्तरेण नरश्रेष्ठ प्रयोगैर्विविधैस्तथा ॥ ६३॥
शुक्रादीनृत्विजश्चापि यज्ञकर्मविचक्षणान्।
सर्वानैव निजग्राह चकार च निरुत्तरान् ॥६४॥
नरश्रेष्ठ ! उन सनातन यज्ञपुरुषने उस यज्ञका नाना प्रकारके प्रयोगोंद्वारा विस्तारपूर्वक यथोचित वर्णन करके यज्ञकर्ममें कुशल शुक्राचार्य आदि समस्त ऋत्विजोंको निगृहीत करते हुए उन्हें निरुत्तर कर दिया ॥ ६३-६४ ॥

आरादथ वलेस्तस्य ऋत्विजामभितस्तथा।
यज्ञमात्मानमेवासौ हेतुभिः कारणं विभुः ॥६५॥
वैदिकैरप्रकाशैश्च पुनरप्यथ भारत।
प्रत्यक्षमृषिसंघानां वर्णयामास चित्रगुः ॥६६॥
भारत ! विचित्र वाणीवाले उन सर्वव्यापी भगवान्‌ने बलिके समीप, ऋत्विजोंके निकट तथा ऋषि समुदायोंके समक्ष अपने ही स्वरूपभूत कारणात्मा यज्ञका अप्रकाशित वैदिक युक्तियोंद्वारा बारंबार वर्णन किया ॥ ६५-६६ ॥

ततो निरुत्तरान् दृष्ट्वा सोपाध्यायानृषींश्च तान्।
अवृद्धेनापि वृद्धांस्तान् वामनेन महौजसा ॥६७॥
अद्भुतं चापि मेने स विरोचनसुतो बली।
मूर्ध्ना कृताञ्जलिश्श्चेदमब्रवीद् विस्मितो वचः ॥६८॥
महान् तेजस्वी बालक वामनके द्वारा उपाध्यायोंसहित उन वृद्ध महर्षियोंको भी निरुत्तर हुआ देख विरोचन-कुमार बलवान् बलिने उसे अद्भुत चमत्कार माना। फिर वे हाथ जोड़े मस्तक झुका विस्मित होकर इस प्रकार बोले—॥ ६७-६८ ॥

कुतस्त्वं कोऽसि कस्यासि किं तेहास्ति प्रयोजनम्।
नैवंविधः परिज्ञातो दृष्टपूर्वी मया द्विजः ॥६९॥
'विप्रवर ! आप कहाँसे आये हैं ? कौन हैं ? किसके पुत्र हैं ? यहाँ पधारनेमें आपका क्या प्रयोजन है ? मैंने आप-जैसे द्विजको न तो पहले कभी देखा था और न जाना ही था ॥ ६९ ॥

बालो मतिमतां श्रेष्ठो ज्ञानविज्ञानकोविदः।
शिष्टवाग्रूपसम्पन्नो मनोज्ञः प्रियदर्शनः ॥७०॥
'आप बाल होकर भी बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। ज्ञान-विज्ञानमें प्रवीण हैं। आपकी वाणी शिष्टतापूर्ण है। आप रूपवान् और मनोहर हैं। देखनेमें प्रिय लगते हैं ॥ ७० ॥

नेदृशाः सन्ति देवानासृषीणामपि सूनवः।
न नागानां न यक्षाणां नासुराणां न रक्षसाम् ॥७१॥
न- पितॄणां न सिद्धानां गन्धर्वाणां तथैव च।
योऽसि सोऽसि नमस्तेऽस्तु ब्रूहि किं करवाणि ते ॥
'देवताओं तथा ऋषियोंके पुत्र भी ऐसे नहीं हैं। न नागोंके, न यक्षोंके, न असुरोंके, न राक्षसोंके, न पितरोंके, न सिद्धोंके और न गन्धर्वोंके ही पुत्र ऐसे हैं। आप जो हों, सो हों, आपको नमस्कार है। बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?' ॥ ७१-७२ ॥

वैशम्पायन उवाच
उक्त एवं ह्यचिन्त्यात्मा बलिना वामनस्तदा।
प्रोवाचोपायतत्त्वज्ञः स्मितपूर्वमिदं वचः ॥७३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बलिके ऐसा कहनेपर अचिन्त्यस्वरूप भगवान् वामन, जो कार्यसिद्धिके तात्त्विक उपायको जाननेवाले थे, मुसकराकर इस प्रकार बोले ॥ ७३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥


एकसप्ततितमोऽध्यायः

वामनद्वारा बलिके यज्ञकी प्रशंसा, बलिसे माँगनेके लिये प्रेरित होनेपर वामनका उनसे तीन पग भूमि माँगना, शुक्राचार्य और प्रह्लादका बलिको दान देनेसे रोकना, बलिद्वारा दानका समर्थन तथा दान पाते ही वामनका अपने विराट्रूपको प्रकट करना

विष्णुरुवाच
अहो यज्ञोऽसुरेशस्य बहुभक्षः सुसंस्कृतः।
पितामहस्येव पुरा यजतः परमेष्ठिनः ॥ १॥
भगवान् विष्णु बोले—अहो ! असुरेश्वर बलिको यह यज्ञ अद्भुत है। इसमें भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंकी बहुलता है तथा यह यज्ञ सुन्दर संस्कारसे सम्पन्न है। पूर्वकालमें यज्ञपरायण परमेष्ठी ब्रह्माने जैसा यज्ञ किया था, वैसा ही यह भी है ॥१॥

सुरेशस्य च शक्रस्य यमस्य वरुणस्य च।
विशेषितस्त्वया यज्ञो दानवेन्द्र महाबल ॥ २ ॥
महाबली दानवराज ! पूर्वकालमें देवराज इन्द्र, यम और

९६६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

वरुणका जो यज्ञ हुआ था, तुमने उससे भी बढ़कर यह यज्ञ किया है ॥ २ ॥
यजता वाजिमेधेन क्रतूनां प्रवरेण तु ।
सर्वपापविनाशाय त्वया स्वर्गप्रदर्शिना ॥ ३ ॥
स्वर्गलोकका दर्शन करानेवाला ऋतुश्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ समस्त पापोंके विनाशमें कारण है। तुमने इसके द्वारा यजन करके अपने इस यशका महत्त्व बढ़ा दिया है ॥ ३ ॥
सर्वकाममयो ह्येष सम्मतो ब्रह्मवादिनाम् ।
ऋतूनां प्रवरः श्रीमानश्वमेध इति श्रुतिः ॥ ४ ॥
ऋतुश्रेष्ठ श्रीमान् अश्वमेध सर्वकाममय है, यह ब्रह्मवादियोंको भी मान्य है, ऐसा श्रुतिका कथन है ॥ ४ ॥
सुवर्णशृङ्गो हि महानुभावो
लोहक्षुरो वायुजवो महात्मा ।
स्वर्गेक्षणः काञ्चनगर्भगौरः
स विश्वयोनिः परमो हि मेध्यः ॥ ५ ॥
विश्वका कारणभूत वह उत्तम यज्ञ परम पवित्र है, उस अश्वरूपधारी यज्ञका शृङ्ग (मस्तक) सुवर्णमय है, उसका प्रभाव महान् है, खुर लोहेके समान कठोर हैं, वेग वायुके समान तीव्र है, शरीर विशाल है, वह स्वर्गलोककी ओर दृष्टि रखनेवाला है और उसकी कान्ति सुवर्णमिश्रित गौरवर्णकी है ॥ ५ ॥
आस्थाय वै वाजिनमश्वमेध-
मिष्ट्वा नरा दुष्कृतमुत्तरन्ति ।
आहुश्च यं वेदविदो द्विजेन्द्रा
वैश्वानरं वाजिनमश्वमेधम् ॥ ६ ॥
उस अश्वमेधरूपी अश्वका आश्रय लेकर यज्ञ करनेके पश्चात् मनुष्य पापसे पार हो जाते हैं। वेदवेत्ता विप्रवर अश्वमेधयज्ञसम्बन्धी अश्वको वैश्वानर (अग्निरूप) कहते हैं ॥
यथाऽऽश्रमाणां प्रवरो गृहाश्रमो
यथा नराणां प्रवरा द्विजातयः ।
यथासुराणां प्रवरो भवानिह
तथा क्रतूनां प्रवरोऽश्वमेधः ॥ ७ ॥
जैसे गृहस्थ-आश्रम सब आश्रमोंमें श्रेष्ठ है, जैसे ब्राह्मण सब मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं और जैसे आप यहाँ असुरोंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार अश्वमेध सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वामनेन समीरितम् ।
मुदा परमया युक्तः प्राह दैत्यपतिर्बलिः ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वामनके कहे हुए इस वचनको सुनकर दैत्यराज बलि बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले ॥ ८ ॥

बलिरुवाच
कस्यासि ब्राह्मणश्रेष्ठ किमिच्छसि ददामि ते ।
वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥ ९ ॥
बलिने कहा—विप्रवर ! आप किसके पुत्र हैं और क्या चाहते हैं ? मैं आपको मुँहमाँगी वस्तु देता हूँ। आपका भला हो, कोई वर माँगिये और अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त कीजिये ॥ ९ ॥

वामन उवाच
न राज्यं न च यानानि न रत्नानि न च स्त्रियः ।
कामये यदि तुष्टोऽसि धर्मे च यदि ते मतिः ॥ १० ॥
गुर्वर्थे मे प्रयच्छस्व पदानि त्रीणि दानव ।
त्वमग्निशरणार्थाय एष मे प्रवरो वरः ॥ ११ ॥
वामन बोले—दनुनन्दन ! मैं न तो राज्य चाहता हूँ, न वाहन। न रत्नकी इच्छा रखता हूँ, न स्त्रियोंकी। यदि आप प्रसन्न हैं और यदि आपका मन धर्ममें लगता है तो मुझे गुरुके लिये अग्निशाला बनवानेके निमित्त तीन पग भूमि दे दीजिये, यही मेरे लिये सर्वोत्तम वर है ॥ १०-११ ॥
वामनस्य वचः श्रुत्वा प्राह दैत्यपतिर्बलिः ।
वामनजीकी यह बात सुनकर दैत्यराज बलि बोले ॥ १११/२ ॥

बलिरुवाच
त्रिभिः किं तव विप्रेन्द्र पदैः प्रवदतां वर ।
शतं शतसहस्राणां पदानां मार्गतां भवान् ॥ १२ ॥
बलिने कहा—वक्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर ! तीन पग भूमिसे आपका क्या होगा ? लाखों करोड़ों पग भूमि माँग लीजिये ॥ १२ ॥

शुक्र उवाच
मा ददस्व महाबाहो न त्वं वेत्सि महासुर ।
एष मायाप्रतिच्छन्नो भगवान् प्रवरो हरिः ॥ १३ ॥
यह देख शुक्राचार्यने कहा—महाबाहो ! महान् असुर ! तुम इन्हें कुछ न दो। तुम्हें पता नहीं कि ये कौन हैं ? ये देवशिरोमणि भगवान् विष्णु हैं, जो मायासे अपने स्वरूपको छिपाकर आये हैं ॥ १३ ॥
वामनं रूपमास्थाय शक्रप्रियहितेप्सया ।
त्वां वञ्चयितुमायातो बहुरूपधरो विभुः ॥ १४ ॥
अनेक रूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णु इन्द्रका प्रिय और हित करनेकी इच्छासे वामनरूप धारण करके तुम्हें ठगनेके लिये यहाँ आये हैं ॥ १४ ॥
एवमुक्तः स शुक्लेन चिरं संचिन्त्य वै बलिः ।
प्रहर्षेण समायुक्तः 'किमतः पात्रमिष्यते ॥ १५ ॥
शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर बलिने चिरकालतक सोच-विचार करके बड़े हर्षके साथ कहा—'इनसे बढ़कर उत्तम पात्र और कौन हो सकता है ? ॥ १५ ॥
प्रगृह्य हस्ते सम्भ्रान्तो भृङ्गारं कनकोद्भवम् ।
ऐसा कहकर बलिने वेगपूर्वक हाथमें सोनेकी झारी उठा ली ॥ १५१/२ ॥

भविष्यपर्व ]एकसप्ततितमोऽध्यायः९६७

बलिरुवाच
विप्रेन्द्र प्राङ्मुखस्तिष्ठ स्थितोऽस्मि कमलेक्षण॥ १६ ॥
प्रतीच्छ देहि किं भूमिं किं मात्रा भोः पदत्रयम् ।
दत्तं च पातय जलं नैव मिथ्या भवेद् गुरुः ॥ १७ ॥
बलिने कहा—'विप्रवर ! पूर्वाभिमुख होकर खड़े हो जाइये !' (वामन बोले—) 'खड़ा हूँ !' (बलि बोले—) 'कमलनयन ! लीजिये !' (वामन बोले—) 'दीजिये !' (बलि बोले—) 'क्या दूँ ?' (वामन बोले—) 'भूमि !' (बलिबोले—) 'ब्रह्मन् ! उस भूमिकी मात्रा कितनी है ?' (वामन बोले—) 'तीन पग !' (बलि बोले—) 'दे दिया !' (वामन बोले—) 'संकल्पकर जल गिराइये, जिससे मेरे गुरुकी माँग व्यर्थ न हो जाय' ॥ १६-१७ ॥

शुक्र उवाच
भो न देयं कुतो दैत्य विज्ञातोऽयं मया ध्रुवम् ।
कोऽयं विष्णुरहो प्रीतिर्वञ्चितस्त्वं न वञ्चितः ॥ १८ ॥
शुक्र बोले--'अजी ! यह दान नहीं देना चाहिये।' (बलि० ) 'क्यों ?' (शुक्र० ) 'दैत्य ! मैंने निश्चय ही इन्हें पहचान लिया है।' (बलि० ) 'कौन हैं ये ?' (शुक्र० ) 'अहो ! यह विष्णु हैं।' (बलि० ) 'तब तो बड़ी प्रसन्नताकी बात है।' (शुक्र० ) 'फिर तो तुम ठगे गये।' (बलि० ) 'नहीं ! मैं ठगा नहीं गया' ॥ १८ ॥

बलिरुवाच
कथं सनाथोऽयं विष्णुर्यज्ञे स्वयमुपस्थितः ।
दास्यामि देवदेवाय यद् यदिच्छत्ययं विभुः ॥ १९ ॥
बलि बोले—अहो ! यह भगवान् विष्णु तो सर्वथा सनाथ (कृतकृत्य) हैं। फिर यह मेरे यज्ञमें याचनाके लिये स्वयं कैसे उपस्थित हो गये ? यदि आ ही गये तो यह भगवान् जो-जो चाहते हैं, वह सब मैं इन देवाधिदेवको समर्पित करूँगा ॥ १९ ॥
को वान्यः पात्रभूतोऽस्माद् विष्णोः परतरो भवेत् ।
एवमुक्त्वा बलिः शीघ्रं पातयामास वै जलम् ॥ २० ॥
'इन विष्णुसे बढ़कर दूसरा कौन श्रेष्ठतर पात्र हो सकता है'—ऐसा कहकर बलिने शीघ्र ही जल गिराया ॥ २० ॥

वामन उवाच
पदानि त्रीणि दैत्येन्द्र पर्याप्तानि ममानघ ।
यन्मया पूर्वमुक्तं हि तत् तथा न तदन्यथा ॥ २१ ॥
वामन बोले—निष्पाप दैत्यराज ! मेरे लिये तीन पग पर्याप्त हैं ! मैंने पहले जो कुछ कहा है, वह ठीक है। मिथ्या नहीं है ॥ २१ ॥

वैशम्पायन उवाच
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा वामनस्य महौजसः ।
कृष्णाजिनोत्तरीयं स कृत्वा वैरोचनिस्तदा ॥ २२ ॥
एवमस्त्विति दैत्येशो वाक्यमुक्त्वाऽरिसूदनः ।
ततो वारिसमापूर्णं भृङ्गारं स परामृशत् ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! महातेजस्वी वामनका यह वचन सुनकर शत्रुसूदन विरोचनकुमार दैत्यराज बलिने उस समय काले मृगचर्मको उत्तरीय बनाकर कहा—'एवमस्तु' ऐसा कहकर उन्होंने जलसे भरे हुए गडूएको हाथमें लिया ॥ २२-२३ ॥
वामनो ह्यसुरेन्द्रस्य चिकीर्षुः कदनं महत् ।
क्षिप्रं प्रसारयामास दैत्यक्षयकरं करम् ॥ २४ ॥
भगवान् वामन असुरराज बलिकी यही भारी हानि करना चाहते थे; अतः उन्होंने अपने दैत्यविनाशक हाथको शीघ्र उनके आगे फैला दिया ॥ २४ ॥
प्राङ्मुखश्चापि दैत्येशस्तस्मै सुमनसा जलम् ।
दातुकामः करे यावत् तावत् तं प्रत्यपेधयत् ॥ २५ ॥
दैत्येश्वर बलि पूर्वाभिमुख होकर शुद्ध हृदयसे वामनजीके हाथमें ज्यों ही जल देनेको उद्यत हुए त्यों ही प्रह्लादने उन्हें रोका ॥ २५ ॥
तस्य तद् रूपमालोक्य ह्यचिन्त्यं च महात्मनः ।
अभूतपूर्वं च हरेर्जिहीर्षोः श्रियमासुरीम् ॥ २६ ॥
इङ्गितज्ञोऽग्रतः स्थित्वा प्रह्रादस्त्वब्रवीद् वचः ।
असुरोंकी सम्पत्तिको हर लेनेकी इच्छावाले उन परमात्मा श्रीहरिके उस अभूतपूर्व एवं अचिन्त्य रूपको देखकर उनकी चेष्टाको समझनेवाले प्रह्लाद बलिके सामने खड़े हो गये और इस प्रकार बोले ॥ २६ १/२ ॥

प्रह्राद उवाच
मा ददस्व जलं हस्ते घटोर्वामनरूपिणः ॥ २७ ॥
स त्वसौ येन ते पूर्वं निहतः प्रपितामहः ।
विष्णुरेष महाप्राज्ञस्त्वां वञ्चयितुमागतः ॥ २८ ॥
प्रह्लादने कहा—दैत्यराज ! तुम इन वामनरूपधारी ब्रह्मचारीके हाथमें जल न दो। ये वे ही हैं, जिन्होंने पूर्वकालमें तुम्हारे प्रपितामहको मार डाला था। ये महाबुद्धिमान् विष्णु ही तुम्हें ठगनेके लिये आये हैं ॥ २७-२८ ॥

बलिरुवाच
हन्त तस्मै प्रदास्यामि देवायैमं प्रतिग्रहम् ।
अनुग्रहकरं देवमीदृशं जगतः प्रभुम् ॥ २९ ॥
ब्रह्मणोऽपि गरीयांसं पात्रं लप्स्यामहे वयम् ।
अवश्यं चासुरश्रेष्ठ दातव्यं दीक्षितेन वै ॥ ३० ॥
बलिने कहा—असुरश्रेष्ठ ! यदि ऐसी बात है तब तो बड़े हर्षका विषय है। मैं उन नारायणदेवको यह प्रतिग्रह अवश्य दूँगा। जो ब्रह्माजीसे भी अधिक गौरवशाली और अनुग्रह करनेवाले हैं, ऐसे जगदीश्वरदेवको हमलोग दानपात्रके रूपमें प्राप्त करेंगे ( इससे बढ़कर सौभाग्यकी बात और क्या हो सकती है)। अतः यज्ञमें दीक्षित हुए मुझ

९६८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


यजमानको इन वामनदेवके लिये अवश्य दान देना चाहिये ॥ २९-३० ॥
इत्युक्त्वासुरसंघानां मध्ये वैरोचनिस्तदा ।
देवाय प्रददौ तस्मै पदानि त्रीणि विष्णवे ॥ ३१ ॥
असुरसमूहोंके बीचमें ऐसी बात कहकर विरोचनकुमार बलि उस समय उन विष्णुदेवको तीन पग भूमिको दान देने लगे ॥ ३१ ॥

प्रह्राद उवाच
दानवेश्वर मा दास्त्वं विप्रायस्मै प्रतिग्रहम् ।
नेमं विप्रशिशुं मन्ये नेदृशो भवति द्विजः ॥ ३२ ॥
तब प्रह्लादने फिर कहा—दानवेश्वर ! तुम इन ब्राह्मणको प्रतिग्रह न दो। मैं इन्हें ब्राह्मणका बालक नहीं मानता; क्योंकि ब्राह्मणका बालक ऐसा नहीं होता ॥ ३२ ॥
रूपेणानेन दैत्येन्द्र सत्यमेव ब्रवीमि ते ।
नारसिंहमहं मन्ये तमेव पुनरागतम् ॥ ३३ ॥
दैत्येन्द्र ! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ । इनके इस रूपसे मुझे यही अनुमान होता है कि पुनः वे नरसिंहदेव ही यहाँ आ गये हैं ॥ ३३ ॥
एवमुक्तस्तदा तेन प्रह्लादेनामितौजसा ।
प्रह्लादमब्रवीद् वाक्यमिदं निर्भर्त्सयन्निव ॥ ३४ ॥
अमित तेजस्वी प्रह्लादके ऐसा कहनेपर उस समय बलिने प्रह्लादको फटकारते हुए-से इस प्रकार कहा ॥ ३४ ॥

बलिरुवाच
देहीति याचते यो हि प्रत्याख्याति च योऽसुर ।
उभयोरप्यलब्धव्या वै भागस्तं विशते नरम् ॥ ३५ ॥
बलि बोले--असुर ! जो 'दीजिये' कहकर याचना करता है तथा जो उस याचकको ठुकरा देता है, उस मनुष्यको उस याचक और ठुकरानेवाले दोनोंकी दरिद्रताका भाग प्राप्त होता है ॥ ३५ ॥
प्रतिज्ञाय तु यो विप्रे न ददाति प्रतिग्रहम् ।
स याति नरकं पापी मित्रगोत्रसमन्वितः ॥ ३६ ॥
जो प्रतिज्ञा करके भी ब्राह्मणको दान नहीं देता है, वह पापी मित्र और कुटुम्बी जनोंसहित नरकमें जाता है॥३६॥
अलक्ष्मीभयभीतोऽहं ददाम्यस्मै वसुंधराम् ।
प्रतिग्रहीता चाप्यन्यः कश्चिदस्माद् द्विजोऽथवै ॥ ३७ ॥
नाधिको विद्यते यस्मात् तद् ददामि वसुंधराम् ।
हृदयस्य च मे तृप्तिः परा भवति दानव ॥ ३८ ॥
दृष्ट्वा वामनरूपेण याचन्तं द्विजपुङ्गवम् ।
एष तस्मात् प्रदास्यामि न स्थास्यामि निवारितः॥ ३९ ॥
मैं अलक्ष्मी ( दरिद्रता ) के भयसे डरकर इन्हें पृथ्वीका दान देता हूँ । दूसरा कोई दान लेनेवाला ब्राह्मण इनसे बढ़कर नहीं मिल सकता, इसलिये मैं इन्हींको पृथ्वीका दान देता हूँ । दानव ! इन ब्राह्मण-शिरोमणिको वामनरूपसे याचना करते देख मेरे हृदयको बड़ा संतोष प्राप्त होता है, इसलिये मैं इन्हें अवश्य दान दूँगा, आपके रोकनेपर भी रुक नहीं सकूँगा ॥ ३७-३९ ॥

भूयश्च प्राब्रवीद्देवं वामनं विप्ररूपिणम् ।
स्वल्पैः स्वल्पमते किं ते पदैस्त्रिभिरनुत्तमम् ॥ ४० ॥
कृत्स्नां ददामि ते विप्र पृथिवीं सागरैर्वृताम् ।
तदनन्तर उन्होंने ब्राह्मणरूपधारी वामनसे पुनः इस प्रकार कहा--'मन्दबुद्धि ब्राह्मण ! तुम्हारे इन छोटे-छोटे तीन पदोंसे कौन-सा परम उत्तम भूभाग प्राप्त हो सकेगा ? मैं तुम्हें समुद्रोंसे घिरी हुई सारी पृथ्वी देता हूँ' ॥ ४० ॥

वामन उवाच
न पृथ्वीं कामये कृत्स्नां संतुष्टोऽस्मि पदैस्त्रिभिः।
एष एव रुचिष्यो मे वरो दानवसत्तम ॥ ४१ ॥
वामनने कहा--दानवशिरोमणे ! मैं सारी पृथ्वीकी कामना नहीं करता । तीन पगोंसे ही संतुष्ट हूँ। यही मेरी रुचिके अनुकूल वर है ॥ ४१ ॥

वैशम्पायन उवाच
तथास्त्विति बलिः प्रोच्य स्पर्शयामास दानवः।
पदानि त्रीणि देवाय विष्णवेऽमिततेजसे ॥ ४२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तब दानवराज बलिने 'तथास्तु' कहकर उन महातेजस्वी विष्णुदेवको तीन पग भूमिका दान कर दिया ॥ ४२ ॥
तोये तु पतिते हस्ते वामनोऽभूदवामनः।
सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास वै विभुः ॥ ४३ ॥
हाथपर संकल्पका जल पड़ते ही वामनजी विराट् बन गये । उन भगवान्‌ने वहाँ अपने सर्वदेवमय रूपका दर्शन कराया ॥ ४३ ॥
भूः पादौ द्यौः शिरश्चास्य चन्द्रादित्यौ च चक्षुषी।
पादाङ्गुल्यः पिशाचाश्च हस्ताङ्गुल्यश्च गुह्यकाः॥ ४४ ॥
भूलोक उनका पैर था और स्वर्गलोक सिर । चन्द्रमा और सूर्य उनके नेत्रोंके स्थानमें थे । पिशाच इनके पैरोंकी अङ्गुलियाँ थे तो गुह्यक हाथोंकी ॥ ४४ ॥
विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः ।
यक्षा नखेषु सम्भूता लेखाश्चाप्सरसस्तथा ॥ ४५ ॥
विश्वेदेव उनके घुटनोंमें स्थित थे । श्रेष्ठ देवता साध्यगण उनकी दोनों पिण्डलियों थे । यक्ष, लेखनामक देवता तथा अप्सराएँ उनके नखोंमें स्थित थीं ॥ ४५ ॥
तडिद् दृष्टिः सुविपुला केशाः सूर्यांशवस्तथा ।
तारका रोमकूपाणि रोमाणि च महर्षयः ॥ ४६ ॥
विद्युत् उनकी विशाल दृष्टि थी । सूर्यकी किरणें उनके केश थीं। तारे उनके रोमकूप और महर्षि उनके रोम थे ॥४६॥
वाहवो विदिशश्चास्य दिशः श्रोत्रे तथैव च ।
अश्विनौ श्रवणौ चास्य नासा वायुर्महाबलः ॥ ४७ ॥

भविष्यपर्व ] [ द्विसप्ततितमोऽध्यायः ९६९

दिशाएँ कान और विदिशाएँ उनकी भुजाएँ थीं। अश्विनीकुमार उनके श्रवणरन्ध्र तथा महाबली वायुदेव उनकी नासिका थे ॥ ४७ ॥

प्रसादश्चन्द्रमाश्चैव मनो धर्मस्तथैव च।
सत्यमस्याभवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती ॥ ४८ ॥
चन्द्रमा उनके प्रसाद, धर्म मन, सत्य वाणी और देवी सरस्वती जिह्वा थीं ॥ ४८ ॥

ग्रीवा दितिर्महादेवी तालुः सूर्यश्च दीप्तिमान्।
द्वारं स्वर्गस्य नाभिर्वै मित्रस्त्वष्टा च वै ध्रुवौ ॥ ४९ ॥
महादेवी दिति ग्रीवा, दीप्तिमान् सूर्य तालु, स्वर्गद्वार नाभि और मित्र तथा त्वष्टा दोनों भौंहें थे ॥ ४९ ॥

मुखं वैश्वानरश्चास्य वृषणौ तु प्रजापतिः।
हृदयं भगवान् ब्रह्मा पुंस्त्वे वै कश्यपो मुनिः ॥ ५० ॥
अग्नि मुख, प्रजापति अण्डकोश, भगवान् ब्रह्मा हृदय तथा कश्यप मुनि जननेन्द्रियके स्थानमें थे ॥ ५० ॥

पृष्ठेऽस्य वसवो देवा मरुतः पादसंधिषु।
सर्वच्छन्दांसि दशना ज्योतींषि विमलाः प्रभाः॥ ५१॥
उनके पृष्ठभागमें वसुदेवता और पैरोंकी संधियोंमें मरुद्गण थे। सम्पूर्ण छन्द दाँत और ग्रह-नक्षत्र निर्मल प्रभाएँ थे ॥ ५१ ॥

ऊरू रुद्रो महादेवे धैर्यं चास्य महार्णवः।
उदरे चास्य गन्धर्वा भुजगाश्च महाबलाः ॥ ५२ ॥
उनके दोनों ऊरु (जाँघें) महादेव रुद्र थे। धैर्यका स्थान महासागरने ले लिया था। उदरमें गन्धर्व और महाबली सर्प निवास करते थे ॥ ५२ ॥

लक्ष्मीर्मेधा धृतिः कान्तिः सर्वविद्या च वै कटिः।
ललाटमस्य परमस्थानं च परमात्मनः ॥ ५३ ॥
लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति और सम्पूर्ण विद्याएँ उनका कटि-प्रदेश थीं। उन परमात्माका परमधाम ही उनका ललाट था ॥ ५३ ॥

सर्वज्योतींषि यानीह तपः शक्रस्तु देवराट्।
तस्य देवाधिदेवस्य तेजो ह्याहुर्महात्मनः ॥ ५४ ॥
सम्पूर्ण ज्योतिर्गण, तप और देवराज इन्द्र—सबको उन देवाधिदेव परमात्माका तेज कहा गया है ॥ ५४ ॥

स्तनौ कक्षौ च वेदाश्च ओष्ठौ चास्य मखाः स्थिताः।
इष्टयः पशुबन्धाश्च द्विजानां चेष्टितानि च ॥ ५५ ॥
चारों वेद उनके स्तन और कक्ष थे। यज्ञ उनके ओष्ठके स्थानमें स्थित थे। इष्टियाँ पशुबन्ध और द्विजोंकी चेष्टाएँ सभी उनके विभिन्न अङ्ग थे ॥ ५५ ॥

तस्य देवमयं रूपं दृष्ट्वा विष्णोर्महासुराः।
अभ्यसर्पन्त संक्रुद्धाः पतङ्गा इव पावकम् ॥ ५६ ॥
भगवान् विष्णुके उस देवमय रूपको देखकर सभी महान् असुर अत्यन्त कुपित हो उसी प्रकार उनकी ओर बढ़े, जैसे पतिंगे जलती आगपर टूटे पड़ते हैं ॥ ५६ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे विश्वरूपप्रकाशे एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें वामनके विश्वरूपका प्रकाशविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७१ ॥


द्विसप्ततितमोऽध्यायः

विराट् रूपधारी वामनपर आक्रमण करनेवाले दैत्योंके नाम, रूप और आयुधोंका परिचय, भगवान्‌का तीनों लोकोंको नापकर राज्यका विभाजन करना, बलिको पातालका राज्य दे मर्यादा बाँधकर उन्हें वहाँ भेजना, जीविकाकी व्यवस्था करना, नारदजीका बलिको मोक्षविंशक स्तोत्रका उपदेश देना, उसके प्रभावसे बलिका बन्धन-मुक्त होना और उस स्तोत्रकी महिमा

वैशम्पायन उवाच
शृणु नामानि सर्वेषां रूपाण्यभिजनानि च।
आयुधानि च मुख्यानि दानवानां महात्मनाम् ॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अब तुम समस्त महामनस्वी दानवोंके नाम, रूप, कुल और मुख्य-मुख्य आयुधोंका वर्णन सुनो ॥ १ ॥

विप्रचित्तिः शिविः शङ्कुरयः शङ्कुस्तथैव च।
अयःशिरा अश्वशिरा हयग्रीवश्च वीर्यवान् ॥ २॥

वेगवान् केतुमानुग्रः सोग्रव्यग्रो महासुरः।
पुष्करः पुष्कलश्चैव साश्वोऽश्वपतिरेव च ॥ ३॥

प्रह्लादोऽश्वशिराः कुम्भः संह्रादो गगनप्रियः।
अनुह्रादो हरिरहौ वाराहः संहरो रजः ॥ ४॥

वृषपर्वा विरूपाक्षो अतिचन्द्रः सुलोचनः।
निष्प्रभः सुप्रभः श्रीमांस्तथैव च निरूदरः ॥ ५०॥

एकवक्त्रो महावक्त्रो द्विवक्त्रः कालसंनिभः।
शरभः शलभश्चैव कुणपः कुलपः क्रथः ॥ ६॥

९७०. श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


वृधत्कीर्तिर्महागर्भः शङ्कुकर्णो महाध्वनिः।
दीर्घजिह्वोऽर्कवदनो मृदुबाहुर्मृदुप्रियः ॥ ७ ॥
वायुर्गविष्ठो नमुचिः शम्बरो विक्षरो महान्।
चन्द्रहन्ता क्रोधहन्ता क्रोधवर्धन एव च ॥ ८ ॥
कालकः कालकाक्षश्च वृत्रः क्रोधो विमोक्षणः।
गविष्ठश्च हविष्ठश्च प्रलम्बो नरकः पृथुः ॥ ९ ॥
चन्द्रतापनवातापी केतुमान् बलदर्पितः।
असिलोमा पुलोमा च वाष्कलः प्रमदो मदः ॥ १० ॥
शृगालवदनश्चैव करालः केशिरेव च।
एकाक्षश्चैकबाहुश्च तुहुण्डः सुमलः सृपः ॥ ११ ॥
एते चान्ये च बहवः क्रममाणं त्रिविक्रमम्।
उपतस्थुर्महात्मानं विष्णुं दैत्यगणास्तदा ॥ १२ ॥

विप्रचित्ति, शिवि, शङ्कुरय, शङ्कु, अयःशिरा, अश्वशिरा, पराक्रमी हयग्रीव, वेगवान्, केतुमान्, महान् असुर उग्र और उग्रव्यग्र, पुष्कर, पुष्कल, अश्व, अश्वपति, प्रह्लाद, अश्वशिरा (द्वितीय), कुम्भ, संह्लाद, गगनप्रिय, अनुह्लाद, हरि, हर, वाराह, संहर, रुज, वृषपर्वा, विरूपाक्ष, अतिचन्द्र, सुलोचन, निष्प्रभ, सुप्रभ, श्रीमान्, निरुदर, एकवक्त्र, महावक्त्र, द्विवक्त्र, कालसंनिभ, शरभ, शलभ, कुणप, कुलप, क्रथ, वृहत्कीर्ति, महागर्भ, शङ्कुकर्ण, महाध्वनि, दीर्घजिह्व, अर्कवदन, मृदुबाहु, मृदुप्रिय, वायु, गविष्ठ, नमुचि, शम्बर, महान् असुर विक्षर, चन्द्रहन्ता, क्रोधहन्ता, क्रोधवर्द्धन, कालक, कालकाक्ष, वृत्र, क्रोध, विमोक्षण, गविष्ठ (द्वितीय), हविष्ठ, प्रलम्ब, नरक, पृथु, चन्द्रतापन, वातापि, बलाभिमानी केतुमान् (द्वितीय), असिलोमा, पुलोमा, वाष्कल, प्रमद, मद, शृगालवदन, कराल, केशी, एकाक्ष, एकबाहु, तुहुण्ड, सुमल तथा सृप—ये और दूसरे भी बहुत-से दैत्यगण उस समय अपना पग बढ़ानेवाले महात्मा त्रिविक्रम विष्णुके पास आ पहुँचे ॥ २—१२ ॥

प्रासोद्यतकराः केचिद् व्यादितास्याः खरस्वनाः।
शतघ्नीचक्रहस्ताश्च वज्रहस्तास्तथा परे ॥ १३ ॥

किन्हीं दैत्यों ने अपने हाथोंमें प्रास उठा रखे थे। वे मुँह बाये हुए थे और गधोंके रेंकनेकी भाँति गर्जना करते थे। कितने ही दैत्य अपने हाथोंमें शतघ्नी और चक्र लिये हुए थे तथा दूसरोंने हाथोंमें वज्र उठा रक्खे थे ॥ १३ ॥

खड्गपट्टिशहस्ताश्च परश्वधधराः परे।
प्रासमुद्गरहस्ताश्च तथा परिघपाणयः ॥ १४ ॥

किन्हींके हाथोंमें खड्ग और पट्टिश थे। दूसरोंने फरसे धारण किये थे। कितनोंने अपने-अपने हाथोंमें प्रास, मुद्गर और परिघ ले रखे थे ॥ १४ ॥

महाशनिव्यग्रकरा मौशलास्तु महाबलाः।
महावृक्षोद्यतकरास्तथैव च धनुर्धराः ॥ १५ ॥

किन्हींके हाथ बहुत बड़ी अशनिसे व्यग्र दिखायी देते थे। दूसरे महाबली दैत्य मूसल लिये हुए थे। कितने ही हाथोंमें विशाल वृक्ष उठाये हुए थे और कितनोंने धनुष धारण किये थे ॥ १५ ॥

गदाभुशुण्डिहस्ताश्च वज्रहस्तास्तथा परे।
महापट्टिशहस्ताश्च तथा परिघपाणयः ॥ १६ ॥

बहुत-से दैत्य हाथोंमें गदा, भुशुण्डि, वज्र, महापट्टिश और परिघ लिये हुए थे ॥ १६ ॥

असिकम्पनहस्ताश्च दानवा युद्धदुर्मदाः।
नानाप्रहरणा घोरा नानावेषा महाबलाः ॥ १७ ॥

बहुत-से रणदुर्मद दानव हाथोंमें खड्ग और कम्पन धारण किये हुए थे। नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये और भाँति-भाँतिके वेश धारण किये महाबली भयंकर दैत्य वहाँ उपस्थित थे ॥ १७ ॥

कूर्मकुक्कुटवक्त्राश्च हस्तिवक्त्रास्तथा परे।
खरोष्ट्रवदनाश्चैव वराहवदनास्तथा ॥ १८ ॥

किन्हींके मुख कछुओंगे समान थे तो किन्हींके मुर्गोंके समान। कोई हाथी-जैसे मुखवाले थे तो कोई गदहे, ऊँट और सूअर-जैसे ॥ १८ ॥

भीमा मकरवक्त्राश्च शिशुमारमुखास्तथा।
मार्जारशुकवक्त्राश्च दीर्घवक्त्राश्च दानवाः ॥ १९ ॥

कितने ही भयंकर दैत्य मगर, सूँस, बिल्ली और तोते-जैसे मुखवाले थे। किन्हीं-किन्हीं दानवोंके मुख बड़े विशाल थे ॥ १९ ॥

गरुडाननाः खड्गमुखा मयूरवदनास्तथा।
अश्ववक्त्रा वभ्रुवक्त्रा घोरा मृगमुखास्तथा ॥ २० ॥

कुछ घोर दैत्य गरुड़, गैंडे और मोरके समान मुखवाले थे। बहुतोंके मुख घोड़े, नेवले और मृगोंके समान थे ॥

उष्ट्रशल्यकवक्त्राश्च दीर्घवक्त्राश्च दानवाः।
नकुलस्येव वक्त्राश्च पारावतमुखास्तथा ॥ २१ ॥

बहुत-से दानव ऊँटों और स्याहियोंके समान मुखवाले थे। कितनोंके मुख लंबे दिखायी देते थे। किन्हींके मुख नेवलोंके समान थे तो किन्हींके परेवोंके समान ॥ २१ ॥

चक्रवाकमुखाश्चैव गोधवक्त्रास्तथा परे।
तथा मृगाननाः शूरा गोऽजादिमहिषाननाः ॥ २२ ॥

किन्हींके मुख चकवेके समान थे। कोई गोहके समान मुख धारण करते थे तथा बहुत-से शूरवीर दानव मृग, गौ, बकरे, भेड़ और भैंसोंके समान मुखवाले थे ॥ २२ ॥

कृकलासमुखाश्चैव व्याघ्रवक्त्रास्तथा परे।
ऋक्षशार्दूलवक्त्राश्च सिंहवक्त्रास्तथा परे ॥ २३ ॥

भविष्यपर्व ] द्विसप्ततितमोऽध्यायः ९७१


दूसरे अनेक दैत्य गिरगिट और बाघके समान मुखवाले थे। कितनोंके मुख रीछों, शार्दूलों और सिंहोंके समान थे ॥

गजेन्द्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनाम्बराः ।
चीरसंवृतगात्राश्च तथा फलकवाससः ॥२४॥

कोई हाथीकी खाल पहने हुए थे तो कोई काले मृगचर्म-को ही वस्त्रके समान धारण करते थे। बहुतोंने अपने अङ्गोंमें चिथड़े लपेट रखे थे तथा कितने ही दैत्य पत्तोंको ही वस्त्रके रूपमें धारण करते थे ॥ २४ ॥

उष्णीषिणो मुकुटिनस्तथा कुण्डलिनोऽसुराः ।
किरीटिनो लम्बशिखाः कम्बुग्रीवाः सुवर्चसः ॥२५॥

वे असुर पगड़ी, मुकुट, कुण्डल, और किरीटसे अलंकृत थे। उनकी शिखाएँ बड़ी-बड़ी और ग्रीवा शङ्खके समान थी। वे उत्तम तेजसे सम्पन्न थे ॥ २५ ॥

नानावेषधरा दैत्या नानामाल्यानुलेपनाः ।
स्वान्यायुधानि दीप्तानि प्रगृह्यासुरसत्तमाः ॥२६॥
क्रममाणं हृषीकेशमुपातिष्ठन्त दानवाः ।

नाना प्रकारके वेश, माला और अनुलेप धारण करने-वाले असुरशिरोमणि दैत्य और दानव अपने-अपने चमकीले अस्त्र-शस्त्र लेकर त्रिलोकीको नापनेके लिये उद्यत हुए भगवान् हृषीकेशके समीप आ पहुँचे ॥ २६ १/२ ॥

प्रमथ्य सर्वान् दैतेयान् पादहस्ततलैः प्रभुः ॥२७॥
रूपं कृत्वा महाकायं जहाराशु स मेदिनीम् ।

भगवान्‌ने लातों और थप्पड़ोंसे उन सब दैत्योंको रौंदकर विशालकाय रूप धारण करके पृथ्वीको तत्काल हर लिया ॥

त्रैलोक्यं क्रममाणस्य द्युतिरादित्यसम्भवा ॥२८॥
तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे ।
नभः प्रक्रममाणस्य सक्थिदेशे व्यवस्थितौ ॥२९॥

त्रिलोकीको मापते समय भगवान् वामनकी कान्ति सूर्यकी प्रभाके समान प्रकाशित हो रही थी। जिस समय वे भूमिको लाँघ रहे थे, उस समय चन्द्रमा और सूर्य उनके दोनों स्तनोंके बीचमें आ गये थे। फिर जब वे आकाशको लाँघने लगे, तब वे दोनों उनकी जाँघोंके स्थानमे स्थित हुए थे ॥ २८-२९ ॥

परं विक्रममाणस्य जानुदेशे व्यवस्थितौ ।
विष्णोरमितवीर्यस्य वदन्त्येवं द्विजातयः ॥३०॥

उससे भी ऊपर स्वर्गलोकको लाँघते समय वे दोनों सूर्य और चन्द्रमा भगवान्‌के घुटनोंमें स्थित हुए देखे गये थे। ब्राह्मणलोग अमित पराक्रमी भगवान् विष्णुके उस विराट्-रूपका ऐसा ही वर्णन करते हैं ॥ ३० ॥

जित्वा लोकत्रयं कृत्स्नं हत्वा चासुरपुङ्गवान् ।
ददौ शक्राय वसुधां हरिलोंकनमस्कृतः ॥३१॥

उस समय विश्ववन्दित श्रीहरिने समस्त त्रिलोकीको जीत-कर और मुख्य-मुख्य असुरोंका वध करके वसुधाका राज्य इन्द्रको दे दिया ॥ ३१ ॥

सुतलं नाम पातालमधस्ताद् वसुधातले ।
बलेर्दत्तं भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना ॥३२॥

फिर प्रभावशाली भगवान् विष्णुने पृथ्वीके नीचे जो सुतल नामक पाताल लोक है, उसे बलिको दे दिया ॥ ३२ ॥

तदवाप्यासुरश्रेष्ठश्चकार मतिमुत्तमाम् ।
रसातलतले वासमकरोदसुराधिपः ॥३३॥

उसे पाकर असुरश्रेष्ठ असुरराज बलिने उत्तम बुद्धिका आश्रय लिया और वे उस रसातल-तलमें निवास करने लगे ॥

तत्रस्थश्च महातेजा ध्यानं परमाम्स्थितः ।
उवाच वचनं धीमान् विष्णुं लोकनमस्कृतम् ॥३४॥

वहाँ रहकर महातेजस्वी बुद्धिमान् बलि उत्तम ध्यानमें स्थित हो विश्ववन्दित भगवान् विष्णुसे इस प्रकार बोले—॥३४॥

किं मया देव कर्तव्यं ब्रूहि सर्वमशेषतः ।
ततो दैत्याधिपं प्राह देवो विष्णुः सुरोत्तमः ॥३५॥

‘देव ! मुझे क्या करना चाहिये ? यह सब पूर्णरूपसे मुझे बताइये।' तब सुरश्रेष्ठ विष्णुदेवने दैत्यराज बलिसे कहा ॥

विष्णुरुवाच

ददामि ते महाभाग परितुष्टोऽस्मि तेऽसुर ।
वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥३६॥

भगवान् विष्णु बोले—महाभाग असुर ! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ, अतः तुम्हें वर देता हूँ। तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो और मनोवाञ्छित कामना प्राप्त करो ॥

मा च शुक्रस्य वचनं प्रतिहासीः कथंचन ।
अहमाज्ञापयामि त्वां श्रेयश्चैवमवाप्स्यसि ॥३७॥

तुम्हें अपने गुरु शुक्राचार्यकी आज्ञाका किसी प्रकार उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। इसके लिये मैं तुम्हें आदेश देता हूँ। इसके पालनसे तुम्हें कल्याणकी प्राप्ति होगी ॥३७॥

अथ दैत्याधिपं प्राह विष्णुर्देवाधिपानुजः ।
वाचा परमया देवो वरेण्यः प्रभुरीश्वरः ॥३८॥

तदनन्तर देवराज इन्द्रके छोटे भाई श्रेष्ठ देवता तथा सर्वसमर्थ ईश्वर श्रीविष्णुने दैत्यराज बलिसे उत्तम वाणीमें कहा—॥ ३८ ॥

यत् त्वया सलिलं दत्तं गृहीतं पाणिना मया ।
तस्मात् ते दैत्य देवेभ्यो नास्ति जातु भयं क्वचित् ॥३९॥

‘दैत्य ! तुमने जो मेरे हाथपर संकल्पका जल दिया और मैंने जो ग्रहण किया, उसके प्रभावसे तुम्हें देवताओंकी ओरसे कभी कोई भय नहीं प्राप्त होगा ॥ ३९ ॥

९७२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

सुतलं नाम पातालं तत्र त्वं सानुगो वस।
सर्वदैत्यगणैः सार्धं मत्प्रसादान्महासुर ॥४०॥

'महान् असुर ! सुतल नामवाला जो पाताल है, उसमें मेरी कृपासे तुम समस्त दैत्यों और सेवकोंके साथ निवास करो ॥ ४० ॥

न च ते देवदेवस्य शक्रस्यामिततेजसः।
शासनं प्रतिहन्तव्यं स्मरता शासनं मम ॥४१॥

'मेरे शासनका स्मरण करते हुए तुम्हें अमित तेजस्वी देवाधिदेव इन्द्रकी आज्ञाका कभी विरोध नहीं करना चाहिये ॥ ४१ ॥

देवताश्चापि ते सर्वाः पूज्या एव महासुर।
भोगांश्च विविधान् सम्यग्यज्ञांश्च सहदक्षिणान् ॥४२॥
प्राप्स्यसे च महाभाग दिव्यान् कामान् यथेप्सितान्।
इह चामुत्र चाक्षय्यान् विविधांश्च परिच्छदान् ॥४३॥

'महान् असुर ! समस्त देवता भी तुम्हारे लिये पूजनीय ही हैं। महाभाग ! तुम वहाँ रहकर नाना प्रकारके भोग, दक्षिणासहित उत्तम यज्ञ, मनोवाञ्छित दिव्य काम (मनोरथ) तथा इस लोक और परलोकमें भाँति-भाँतिकी अक्षय भोग-सामग्री प्राप्त करोगे ॥ ४२-४३ ॥

दैत्याधिपत्यं च सदा मत्प्रसादादवाप्स्यसि।
यदा च तां मया प्रोक्तां मर्यादां चालयिष्यसि ॥४४॥
बधिष्यन्ति तदा हि त्वां नागपाशैर्महाबलाः।

वहाँ तुम्हें मेरी कृपासे सदा ही दैत्योंका आधिपत्य प्राप्त होगा। जब तुम मेरी बतायी हुई उस मर्यादाको भङ्ग करोगे, तब महाबली देवता नागपाशसे तुम्हें बाँध लेंगे ४४॥

नमस्कार्याश्च ते नित्यं महेन्द्राद्या दिवौकसः ॥४५॥
मम ज्येष्ठः सुरश्रेष्ठः शासनं प्रतिगृह्यताम्।

तुम्हें इन्द्र आदि देवताओंको सदा नमस्कार करना चाहिये। सुरश्रेष्ठ इन्द्र मेरे बड़े भाई हैं, अतः उनका शासन स्वीकार करो ॥ ४५॥

बलिरुवाच

देवदेव महाभाग शङ्खचक्रगदाधर ॥४६॥
सुरासुरगुरो श्रेष्ठ सर्वलोकमहेश्वर।
तत्रासतो मे पाताले भागं ब्रूहि सुरोत्तम ॥४७॥

बलि बोले--शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महाभाग देवदेव ! सुरासुरगुरो ! सर्वश्रेष्ठ ! सर्वलोकमहेश्वर ! सुरोत्तम ! वहाँ पातालमें रहते समय मुझे जीवन-निर्वाहके लिये कौन-सा भाग प्राप्त होगा। यह बताइये ॥ ४६-४७ ॥

ममान्नमशनं देव प्राणानार्थमरिंदम।
तद् वदस्व सुरश्रेष्ठ तृप्तिर्येन ममाक्षया ॥४८॥

शत्रुदमन देव ! सुरश्रेष्ठ ! मेरा अन्न-मेरे भोजनके लिये भोज्य पदार्थ क्या होगा ? यह बताइये। जिससे मुझे अक्षय तृप्ति प्राप्त हो ॥ ४८ ॥

श्रीभगवानुवाच

अश्रोत्रियं श्राद्धमधीतमव्रत-
मदक्षिणं यज्ञमनृत्विजा हुतम्।
अश्रद्धया दत्तमसंस्कृतं हवि-
रेते प्रदत्तास्तव दैत्य भागाः ॥४९॥

श्रीभगवान् बोले--दैत्य ! श्रोत्रिय ब्राह्मणके बिना किये हुए श्राद्ध, ब्रह्मचर्य-पालनके बिना किये गये अध्ययन, बिना दक्षिणाके यज्ञ, बिना ऋत्विजके होम, बिना श्रद्धाके दान और संस्कारहीन हविष्य-ये सब तुम्हें तुम्हारे भागके रूपमें अर्पित हैं ॥ ४९ ॥

पुण्यं मद्द्वेषिणां यच्च मद्द्भक्तद्वेषिणां तथा।
क्रयविक्रयसक्तानां पुण्यं यच्चाग्निहोत्रिणाम् ॥५०॥
अश्रद्धया च यद् दानं ददतां यजतां तथा।
तत् सर्वं तव दैत्येन्द्र मत्प्रसादाद् भविष्यति ॥५१॥

दैत्यराज ! मुझसे और मेरे भक्तोंसे द्वेष रखनेवालोंका जो पुण्य है, क्रय-विक्रयमें आसक्त हुए अग्निहोत्रियोंका जो पुण्य है, बिना श्रद्धाके दान देने और यज्ञ करनेवालोंका जो सत्कर्म है, वह सब मेरी कृपासे तुम्हारा हो जायगा ॥ ५०-५१ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं बलिर्विष्णोर्महात्मनः।
एवमस्त्विति तं प्रोक्त्वा पातालमसुरोत्तमः।
प्रविवेश महानादो देवाज्ञां प्रतिपालयन् ॥५२॥

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! महात्मा भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर असुरराज बलिने उनसे 'ऐसा ही होगा' यह कहकर भगवान्‌की आज्ञाका पालन करते हुए महान् गर्जनाके साथ पाताललोकमें प्रवेश किया ॥ ५२ ॥

एतस्मिन्नन्तरे चापि विष्णुस्त्रिदशपूजितः।
भगवानपि राज्यानां प्रविभागांश्चकार ह ॥५३॥

इसी बीचमें देवपूजित भगवान् विष्णुने भी राज्योंके कई विभाग किये ॥ ५३ ॥

ददौ पूर्वा दिशं चैन्द्रीं शक्रायामिततेजसे।
याम्यों यमाय देवाय पितृराज्ञे महात्मने ॥५४॥

उन्होंने अमित तेजस्वी इन्द्रको ऐन्द्री अर्थात् पूर्वदिशा-का राज्य दिया। पितरोंके राजा महात्मा यमदेवताको दक्षिण-दिशाका राज्य अर्पित किया ॥ ५४ ॥

पश्चिमां तु दिशं प्रादाद् वरुणाय महात्मने।
उत्तरां च कुबेराय यक्षाधिपतये दिशम् ॥५५॥

[ भविष्यपर्व ]द्विसप्ततितमोऽध्यायः९७३

महात्मा वरुणको पश्चिम दिशा तथा यक्षराज कुबेरको उत्तर दिशाका राज्य दिया ॥ ५५ ॥ अधःस्थां नागराजाय सोमायोर्ध्वां दिशं ददौ।
एवं विभज्य त्रैलोक्यं विष्णुर्बलवतां वरः ॥५६॥
जगाम त्रिदिवं देवः पूज्यमानो महर्षिभिः ।
नागराज अनन्तको नीचेकी दिशाका तथा सोमको ऊपरकी दिशाका राज्य अर्पित किया। इस प्रकार तीनों लोकोंके राज्यका विभाजन करके बलवानोंमें श्रेष्ठ भगवान् विष्णु महर्षियोंसे पूजित हो स्वर्गलोकमें गये ॥ ५६३ ॥
धामनः सर्वभूतेशः प्रतिष्ठाप्य च वासवम् ॥५७॥
तस्मिन् प्रयाते दुर्धर्षे वामनेऽमिततेजसि ।
सर्वे मुमुदिरे देवाः पुरस्कृत्य शतक्रतुम् ॥५८॥
वहाँ देवराज इन्द्रको स्वर्गके सिंहासनपर बिठाकर सर्व-भूतेश्वर भगवान् वामन अपने धामको चले गये। उन अत्यन्त तेजस्वी दुर्धर्ष देवता वामनके चले जानेपर सब देवता देवराज इन्द्रको आगे करके आनन्दमें मग्न हो गये ॥ ५७-५८ ॥

वैशम्पायन उवाच
गते तु त्रिदिवं कृष्णे बद्ध्वा वैरोचनिं बलिम् ।
नागैः सप्तशिरोभिश्च कम्बलाश्वतरादिभिः ॥५९॥
नागबन्धनदुःखार्तं बलिं वैरोचनिं ततः।
यदृच्छयासौ देवर्षिर्नारदः प्रत्यपद्यत ॥६०॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सात सिर-वाले कम्बल और अश्वतर आदि नागोंद्वारा विरोचनकुमार बलिको बाँधकर जब भगवान् विष्णु स्वर्गलोकको चले गये, तब नागबन्धनके दुःखसे पीड़ित हुए विरोचनपुत्र बलिके पास अकस्मात् घूमते हुए देवर्षि नारद आ पहुँचे ॥ ५९-६० ॥
स तं कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा कृपयाभिपरिप्लुतः ।
उवाच दानवश्रेष्ठं मोक्षोपायं ददामि ते ॥६१॥
नारदजीने बलिको संकटमें पड़ा देख दयासे द्रवित हो उन दानवशिरोमणिसे कहा—'मैं तुम्हें इस कष्टसे छूटनेका उपाय बताता हूँ ॥ ६१ ॥
स्तवं देवाधिदेवस्य वासुदेवस्य धीमतः।
अनादिनिधनस्यास्य अक्षयस्याव्ययस्य च ॥६२॥
'जो आदि और अन्तसे रहित, अक्षय, अविनाशी, बुद्धिमान्, देवाधिदेव भगवान् वासुदेव हैं, उनका स्तोत्र ही वह उपाय है ॥ ६२ ॥
तमधीष्व दैत्येन्द्र विशुद्धेनान्तरात्मना ।
तद्गतस्तन्मना भूत्वा द्रुतं मोक्षमवाप्स्यसि ॥६३॥
'दैत्यराज ! तुम विशुद्ध हृदयसे उन्हीं भगवान्‌में मन लगाकर तन्मय हो उस स्तोत्रका पाठ करो। ऐसा करनेसे शीघ्र ही छुटकारा पा जाओगे' ॥ ६३ ॥

ततो विरोचनसुतः प्रयतः प्राञ्जलिः शुचिः ।
मोक्षविंशकमव्यग्रो नारदात् समधीतवान् ॥६४॥
तब विरोचनकुमार बलिने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर हाथ जोड़ पवित्र हो शान्तभावसे मोक्षविंशक नामक स्तोत्रका नारदजीसे अध्ययन किया ॥ ६४ ॥
तमधीत्य स्तवं दिव्यं नारदेन समीरितम् ।
पृथिवी चोद्धृता येन तं जजाप महासुरः ॥६५॥
नारदजीके बताये हुए उस दिव्य स्तोत्रका अध्ययन करके महान् असुर बलिने, जिन्होंने इस पृथिवीका उद्धार किया था, उन भगवान्‌का जप आरम्भ किया ॥ ६५ ॥
ॐ नमोऽस्त्वनन्तपतये अक्षयाय महात्मने।
जलेशयाय देवाय पद्मनाभाय विष्णवे ॥६६॥
(बलि बोले-जो) अनन्त नागके अधिपति, अविनाशी, महात्मा, जलमें शयन करनेवाले, दिव्यस्वरूप और अपनी नाभिसे कमल प्रकट करनेवाले हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ॥ ६६ ॥
सप्तसूर्यवपुः कृत्वा त्रींल्लोकान् क्रान्तवानसि ।
भगवन् कालकालस्त्वं तेन सत्येन मोक्षय ॥६७॥
भगवन् ! आप कालके भी काल हैं, आपने सात सूर्योंके समान तेजस्वी शरीर धारण करके तीनों लोकोंको नाप लिया है। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस बन्धनसे छुड़ाइये ॥ ६७ ॥
नष्टचन्द्रार्कगगने क्षीणयज्ञतपःक्रिये ।
पुनश्चिन्तयसे लोकांस्तेन सत्येन मोक्षय ॥६८॥
महाप्रलयके समय जब चन्द्रमा, सूर्य और आकाशका भी लय हो जाता है, यज्ञ और तपरूपी कर्म क्षीण हो जाते हैं, तब आप पुनः सृष्टिके आरम्भमें समस्त लोकोंका चिन्तन करते हैं (और अपने संकल्पसे ही सबको प्रकट कर देते हैं), उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस बन्धनसे मुक्त कीजिये ॥ ६८ ॥
ब्रह्मरुद्रेन्द्रवाय्वग्निसरिद्भुजगपर्वताः ।
त्वत्स्था दृष्टा द्विजेन्द्रेण तेन सत्येन मोक्षय ॥६९॥
प्रलयकालमें द्विजराज मार्कण्डेयने ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वायु, अग्नि, नदी, सर्प और पर्वत आदिको आपके भीतर स्थित देखा था। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस कष्टसे छुड़ाइये ॥ ६९ ॥
मार्कण्डेय पुरा कल्पे प्रविश्य जठरं तव ।
चराचरगतं दृष्टं तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७० ॥
पूर्वकल्पमें मार्कण्डेयजीने आपके उदरमें प्रवेश करके वहाँ चर और अचर प्राणियोंसे व्याप्त सम्पूर्ण जगत्‌का दर्शन किया था। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस बन्धनसे मुक्त कीजिये ॥ ७० ॥

९७४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


एको विद्यासहायस्त्वं योगी योगमुपागतः।
पुनस्त्रैलोक्यमसृजस्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७१ ॥

आप योगी हैं और योगका आश्रय लेकर एकमात्र आप ही विद्या (योगमाया) की सहायतासे पुनः त्रिलोकीकी सृष्टि करके उसमें अन्तर्यामी आत्मारूपसे व्याप्त रहते हैं। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस नागपाशसे छुटकारा दिलावें ॥ ७१ ॥

जलशय्यामुपासीनो योगनिद्रामुपागतः।
लोकांश्चिन्तयसे भूयस्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७२ ॥

आप योगनिद्राका आश्रय ले जलकी शय्यापर सोकर पुनः लोकोंका चिन्तन करते हैं। उस सत्यके प्रभावसे मुझे बन्धनमुक्त कीजिये ॥ ७२ ॥

वाराहं रूपमास्थाय वेदद्यज्ञपुरस्कृतम्।
धरा जलोद्धृता येन तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७३॥

आपने वेद और यज्ञमय वाराहरूप धारण करके जिस सत्यके प्रभावसे इस पृथिवीका जलसे उद्धार किया था, उसी सत्यके द्वारा मुझे भी संकटसे छुड़ाइये ॥ ७३ ॥

उद्धृत्य दंष्ट्रया यज्ञांस्त्रीन् पिण्डान् कृतवानसि।
त्वं पितॄणामपि हरे तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७४ ॥

हरे! आपने अपनी दाढ़से यज्ञोंका उद्धार करके पितरोंके लिये भी तीन पिण्डोंकी व्यवस्था की है। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस नागपाशसे मुक्त कीजिये ॥ ७४ ॥

प्रदुद्रुवुः सुराः सर्वे हिरण्याक्षभयार्दिताः।
परित्रातास्त्वया देव तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७५ ॥

देव ! समस्त देवता जब हिरण्याक्षके भयसे पीड़ित होकर भाग गये थे, उस समय आपने ही उनकी रक्षा की थी। उस सत्यके बलसे आप मुझे बन्धनसे छुड़ाइये ॥ ७५ ॥

दीर्घवक्त्रेण रूपेण हिरण्याक्षस्य संयुगे।
शिरो जहार चक्रेण तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७६ ॥

लंबे मुँहवाले वाराहका रूप धारण करके आपने युद्धमें चक्रद्वारा हिरण्याक्षका सिर काट लिया था। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे बन्धनमुक्त कीजिये ॥ ७६ ॥

भग्नमूर्धास्थिमस्तिष्को हिरण्यकशिपुः पुरा।
हुंकारेण हतो दैत्यस्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७७ ॥

पूर्वकालमें आपने हुङ्कारमात्रसे हिरण्यकशिपु नामक दैत्यके मस्तककी हड्डी और मस्तिष्कको चूर-चूर करके उसे मार डाला था। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे भी सङ्कटसे छुड़ाइये ॥ ७७ ॥

दानवाभ्यां हृता वेदा ब्रह्मणः पश्यतः पुरा।
परित्रातास्त्वया देव तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७८ ॥

देव ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीके देखते-देखते मधु और कैटभ नामक दो दानवोंने सम्पूर्ण वेद हर लिये थे, जिनका आपने उद्धार किया। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस बन्धनसे छुटकारा दिलाइये ॥ ७८ ॥

कृत्वा हयशिरोरूपं हत्वा तु मधुकैटभौ।
ब्रह्मणे तेऽर्पिता वेदास्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ७९ ॥

हयग्रीव-रूप धारण करके मधु और कैटभ नामक दानवोंको मारकर आपने सारे वेद पुनः ब्रह्माजीको अर्पित कर दिये। इस सत्यके प्रभावसे आप मुझे बन्धनसे छुड़ाइये ॥ ७९ ॥

देवदानवगन्धर्वा यक्षसिद्धमहोरगाः।
अन्तं तव न पश्यन्ति तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८० ॥

देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, सिद्ध और बड़े-बड़े नाग भी आपका अन्त नहीं देख पाते हैं। उस सत्यके प्रभावसे आप मेरा इस सङ्कटसे उद्धार कीजिये ॥ ८० ॥

अपान्तरतमा नाम जातो देवस्य वै सुतः।
कृताश्च तेन वेदार्थास्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८१ ॥

अपान्तरतमा नामसे विख्यात जो आपके पुत्र हुए थे, उन्होंने सम्पूर्ण वेदोंके अर्थ किये हैं। इस सत्यके प्रभावसे आप मुझे इस बन्धनसे छुड़ाइये ॥ ८१ ॥

वेदद्यज्ञाग्निहोत्राणि पितृयज्ञहवींषि च।
रहस्यं तव देवस्य तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८२ ॥

वेद, यज्ञ, अग्निहोत्र, पितृयज्ञ और हविर्यज्ञ—ये आपके रहस्य हैं। उस सत्यके द्वारा आप मुझे सङ्कटसे छुड़ाइये ॥ ८२ ॥

ऋषिर्दीर्घतमा नाम जात्यन्धो गुरुशापतः।
त्वत्प्रसादाच्च चक्षुष्मांस्तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८३ ॥

दीर्घतमा नामक ऋषि अपने गुरु या पिताके शापसे जन्मान्ध हो गये थे, जो आपकी कृपासे ही नेत्रवान् हो गये। उस सत्यके प्रभावसे आप मुझे बन्धन-मुक्त कीजिये ॥ ८३ ॥

ग्राहग्रस्तं गजेन्द्रं च दीनं मृत्युवशं गतम्।
भक्तं मोक्षितवांस्त्वं हि तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८४ ॥

ग्राहसे ग्रस्त होकर गजराज अत्यन्त दीन हो मृत्युके वशमें पड़ गया था, परंतु आपने अपने उस भक्तको सङ्कटसे छुड़ा दिया। उस सत्यके प्रभावसे मुझे भी वर्तमान सङ्कटसे मुक्त कीजिये ॥ ८४ ॥

अक्षयश्चाव्ययश्च त्वं ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः।
उच्छ्रितानां नियन्तासि तेन सत्येन मोक्षय ॥ ८५ ॥

आप अक्षय, अविनाशी, ब्राह्मणभक्त तथा भक्तवत्सल हैं, उच्छृङ्खल पुरुषोंका दमन करनेवाले हैं। उस सत्यके प्रभावसे मेरा सङ्कटसे उद्धार कीजिये ॥ ८५ ॥

भविष्यपर्व ] द्विसप्ततितमोऽध्यायः [ ९७५


शङ्खं चक्रं गदां पद्मं शार्ङ्गं गरुडमेव च।
प्रसादयामि शिरसा ते बन्धान्मोक्षयन्तु माम्॥ ८६॥
मैं शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्गधनुष तथा गरुड़को भी सिर झुकाकर प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ, वे मुझे इस बन्धनसे छुटकारा दिलायें॥ ८६॥

शङ्खं चक्रं गदा पद्मं शार्ङ्गं च गरुडादयः।
हरिं प्रसादयामासुर्बलिं मोक्षय बन्धनात् ॥ ८७॥
तब शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्गधनुष और गरुड़ आदिने भगवान्‌को प्रसन्न किया और कहा—‘आप बलिको बन्धनसे मुक्त कीजिये’॥ ८७॥

ततः प्रसन्नो भगवानादिदेश खगेश्वरम्।
गरुडं नागहन्तारं बलिं मोक्षय बन्धनात् ॥ ८८॥
इससे प्रसन्न हो भगवान्‌ने नागहन्ता पक्षिराज गरुडको आज्ञा दी कि ‘तुम बलिको बन्धनसे छुड़ाओ’॥ ८८॥

ततो विक्षिप्य गरुडः पक्षावतुलविक्रमः।
जगाम वसुधामूलं यत्रास्ते संयतो बलिः॥ ८९॥
तब अतुल पराक्रमी गरुड अपनी पाँखें हिलाते हुए वसुधाके मूलप्रदेशमें जा पहुँचे, जहाँ राजा बलि नागपाशसे बँधे हुए बैठे थे॥ ८९॥

आगमं तस्य विज्ञाय नागा मुक्त्वा महासुरम्।
ययुः पुरीं भोगवतीं वैनतेयभयार्दिताः॥ ९०॥
उनका आगमन जानकर उन विनतानन्दन गरुडके भयसे पीड़ित हो वे नाग महान् असुर बलिको बन्धनमुक्त करके भोगवतीपुरीमें चले गये॥ ९०॥

मुक्तं कृष्णप्रसादेन चिन्तयानमधोमुखम्।
भ्रष्टश्रियमिवाचेदं गरुत्मान् पन्नगाशनः॥ ९१॥
राजा बलि भगवान् विष्णुके प्रसादसे बन्धनमुक्त होकर भी राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट होनेके कारण नीचे मुख किये चिन्ता-मग्न हो रहे थे, उस समय सर्पभोजी गरुडने उनसे इस प्रकार कहा—॥ ९१॥

गरुड उवाच
दानवेन्द्र महाबाहो विष्णुस्त्वामब्रवीत् प्रभुः।
मुक्तो निवस पाताले सपुत्रजनबान्धवः॥ ९२॥
गरुड बोले—महाबाहु दानवराज ! भगवान् विष्णुने तुम्हें यह संदेश दिया है कि तुम बन्धनमुक्त हो पुत्रों, स्वजनों और बन्धु-बान्धवोंके साथ पाताललोकमें निवास करो॥ ९२॥

इतस्त्वया न गन्तव्यं गव्यूतिमपि दानव।
समयं यदि भिन्द्यास्त्वं मूर्धा ते शतधा भवेत्॥ ९३॥
दानव ! तुम यहाँसे दो कोस भी बाहर न जाना। यदि इस मर्यादाको भंग करोगे तो तुम्हारे सिरके सैकड़ों टुकड़े हो जायेंगे॥ ९३॥

पक्षेन्द्रवचनं श्रुत्वा दानवेन्द्रोऽब्रवीदिदम्।
स्थितोऽस्मि समये तस्य अनन्तस्य महात्मनः॥ ९४॥
जीवोपायं तु भगवान् मम किंचित् करोतु सः।
इहस्थोऽहं सुखासीनो येनाप्याये खगेश्वर ॥ ९५॥
पक्षिराज गरुड़का यह कथन सुनकर दानवेन्द्र बलि-ने यह बात कही—‘खगेश्वर ! मैं उन महात्मा अनन्तकी बाँधी हुई मर्यादा में ही स्थित हूँ, किंतु वे भगवान् मेरे लिये जीविका चलानेका कोई उपाय नियत कर दें, जिससे यहाँ सुखपूर्वक रहकर मैं सदा तृप्ति एवं संतोषका अनुभव करता रहूँ’॥ ९४-९५॥

बलेस्तु वचनं श्रुत्वा गरुत्मानिदमब्रवीत्।
पूर्वमेव कृतस्तेन जीवोपायो महात्मना॥ ९६॥
बलिकी यह बात सुनकर गरुड बोले—‘उन परमात्माने पहलेसे ही तुम्हारे लिये जीविकाका उपाय नियत कर दिया है॥ ९६॥

वर्त्तयिष्यन्ति ये यज्ञान् विधिहीनामृत्विजः।
प्रायश्चित्तमजानन्तो यज्ञभागस्ततस्तव ॥ ९७॥
‘जो लोग प्रायश्चित्तसे अनभिज्ञ रहकर बिना ऋत्विजोंके ही विधिहीन यज्ञ करेंगे, उनके यज्ञका सारा भाग तुम्हारा ही होगा॥ ९७॥

न तेषां यज्ञभागं वै प्रतिगृह्णन्ति देवताः।
अनेनाप्यायितबलः सुखमात्रं निवत्स्यसि ॥ ९८॥
‘उनके यज्ञभागको देवता नहीं ग्रहण करेंगे। उससे तुम्हारे बलकी पुष्टि होगी और तुम सदा सुखसे रहोगे॥ ९८॥

संदेशमेतं भगवान् दत्तवान् कश्यपात्मजः।
दानवेन्द्र महाबाहो विष्णुस्त्रैलोक्यभावनः ॥ ९९॥
‘महाबाहु दानवराज ! त्रिभुवनपालक, कश्यपकुमार, वामनरूपधारी भगवान् विष्णुने तुमको यही संदेश दिया है’॥ ९९॥

वैशम्पायन उवाच
इमं स्तवमनन्तस्य सर्वपापप्रमोचनम्।
यः पठेत् नरो भक्त्या तस्य नश्यति किल्विषम्॥ १००॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—(ऐसा कहकर गरुडजी चले गये।) जो मनुष्य भगवान् अनन्तके इस सर्वपापहारी स्तोत्रका भक्तिपूर्वक पाठ करता है, उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है॥ १००॥

गोहत्यायाः प्रमुच्येत ब्रह्मघ्नो ब्रह्महत्यया।
अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या चैवेप्सितं पतिम् ॥ १०१॥
यदि उससे गोवध या ब्राह्मणवधका पाप बन गया है तो वह इस स्तोत्रके पाठसे उस गोहत्या और ब्राह्मणहत्यासे भी मुक्त हो सकता है। इस स्तोत्रके प्रभावसे पुत्रहीनको

९७६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

पुत्रकी और कुमारी कन्याको मनके अनुरूप पतिकी प्राप्ति होती है ॥ १०१ ॥

सद्यो गर्भात् प्रमुच्येत गर्भिणी जनयेत् सुतम् ।
ये च मोक्षैषिणो लोके योगिनः सांख्यकापिलाः ॥ १०२ ॥
स्तवेनानेन गच्छन्ति श्वेतद्वीपमकल्मषाः ।

गर्भवती स्त्री इस स्तोत्रके पाठसे तत्काल गर्भकी वेदनासे छुटकारा पा जाती है और पुत्रको जन्म देती है। जो योगी और कपिल-सांख्यमतके अनुयायी पुरुष जगत्‌में भवबन्धनसे मोक्ष पानेकी अभिलाषा रखते हैं, वे इस स्तोत्रके पाठसे पाप-तापसे रहित हो (भगवान्‌के परमधाम) श्वेतद्वीपको चले जाते हैं ॥ १०२ १/२ ॥

सर्वकामप्रदो ह्येष स्तवोऽनन्तस्य कीर्त्यते ॥ १०३ ॥
यः पठेत् प्रातरुत्थाय शुचिः प्रयतमानसः ।
सर्वान् कामानवाप्नोति मानवो नात्र संशयः ॥ १०४ ॥

भगवान् अनन्तका यह स्तोत्र सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला बताया गया है। जो प्रातःकाल उठकर स्नान आदिसे शुद्ध एवं संयतचित्त हो इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १०३-१०४ ॥

एष वै वामनो नाम प्रादुर्भावो महात्मनः ।
वेदविद्भिरद्विजैरेवं पठ्यते वैष्णवं यशः ॥ १०५ ॥

यह परमात्मा श्रीहरिके वामन-अवतारका वर्णन किया गया। वेदवेत्ता ब्राह्मण इस प्रकार भगवान् विष्णुके सुयशका बखान करते हैं ॥ १०५ ॥

यस्त्विमं वामनं दिव्यं प्रादुर्भावं महात्मनः ।
शृणुयान्नियतो भक्त्या सदा पर्वसु पर्वसु ॥ १०६ ॥
परान् विजयते राजा यथा विष्णुर्महाबलः ।
यशो विमलमाप्नोति विपुलं चाप्नुते वसु ॥ १०७ ॥

जो राजा शौच-संतोषादि नियमोंके पालनपूर्वक भगवान् विष्णुके इस दिव्य वामनावतारकी कथाको सदा सभी पर्वोंपर भक्तिभावसे सुनता है, वह महाबली विष्णुके समान ही अपने समस्त शत्रुओंपर विजय पाता है, निर्मल यशका भागी होता है तथा विपुल धन-सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है ॥ १०६-१०७ ॥

प्रियो भवति भूतानां सर्वेषां वामनो यथा ।
पुत्रपौत्रांश्च वर्धन्ते आरोग्यं गुणसम्पदः ॥ १०८ ॥

वह भगवान् वामनकी ही भाँति समस्त प्राणियोंका प्रिय होता है तथा उसके पुत्र-पौत्र, आरोग्य एवं गुण-सम्पत्तियोंकी वृद्धि होती है ॥ १०८ ॥

प्रीयते पठतश्चास्य देवदेवो जनार्दनः ।
सर्वकामयुतश्चैव कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ १०९ ॥

इस स्तोत्रका पाठ करनेवाले पुरुषपर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन प्रसन्न होते हैं तथा वह सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न होता है—यह श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी महाराजका कथन है ॥ १०९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥


त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

रुक्मिणी देवीकी भगवान् श्रीकृष्णसे पुत्रके लिये प्रार्थना और भगवान्‌का उन्हें आश्वासन देते हुए कैलास जानेका विचार प्रकट करना

जनमेजय उवाच
किमर्थं भगवान् विष्णुर्देवदेवो जनार्दनः ।
गतः कैलासशिखरमालयं शंकरस्य च ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा—मुने ! देवताओंके भी देवता, सर्वव्यापी भगवान् जनार्दन किस लिये शङ्करजीके निवासस्थान कैलासशिखरपर गये थे ? ॥ १ ॥

नारदाद्यैस्तपोवृद्धैर्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
तत्र दृष्टो महादेवः शंकरो नीललोहितः ॥ २ ॥

तपस्यामें चढ़े-बढ़े तत्त्वदर्शी नारद आदि मुनियोंने ही वहाँ नीललोहित वर्णवाले कल्याणकारी महादेवजीका दर्शन किया है ॥ २ ॥

केशवेन पुरा विप्र कुर्वता तप उत्तमम् ।
अर्चिता देवदेवेन शंकरश्चेति नः श्रुतम् ॥ ३ ॥

विप्रवर ! हमारे सुननेमें यह भी आया है कि पूर्वकालमें उत्तम तप करते हुए देवाधिदेव केशवने वहाँ भगवान् शङ्करका पूजन किया था ॥ ३ ॥

देवौ तत्र जगन्नाथौ दृष्टवन्तौ पुरातनौ ।
अर्चयांचक्रिरे देवा इन्द्राद्याः शंकरं हरिम् ॥ ४ ॥

वहाँ दोनों पुरातन देवता जगदीश्वर श्रीहरि और हरने एक दूसरेका दर्शन किया था। इन्द्र आदि देवताओंने वहाँ आकर भगवान् शङ्कर तथा श्रीहरिकी अर्चना की थी ॥ ४ ॥

तौ हि देवौ महादेवावेकीभूतौ द्विधा कृतौ ।
एकात्मानौ जगद्योनी सृष्टिसंहारकारकौ ॥ ५ ॥

भविष्यपर्व ] त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ९७७


कहते हैं कि वे दोनों महान् देवता एक ही हैं, किंतु दो स्वरूपोंमें विभक्त हो गये हैं। उनका आत्मा (स्वरूप) एक ही है, तो भी कार्यभेदसे भिन्न-भिन्न शरीर धारण करते हैं। दोनों ही जगत्‌की उत्पत्तिके कारण हैं और दोनों ही सृष्टि, पालन एवं संहार करनेवाले हैं (यह बात कैसे समझी जाय ? ) ॥ ५ ॥

परस्परसमावेशाज्जगतः पालने स्थितौ।
तयोस्तत्र यथावृत्तं कैलासे पर्वतोत्तमे ॥ ६ ॥

वे परस्पर समाविष्ट होकर जगत्‌के पालन-कर्ममें स्थित रहते हैं। उत्तम पर्वत कैलासपर एकत्र हुए उन दोनोंका जैसा वृत्तान्त हो, वह बताइये ॥ ६ ॥

ऋषयः किमचेष्टन्त दृष्ट्वा तौ पुरुषोत्तमौ ।
एतत् सर्वमशेषेण वक्तुमर्हसि सत्तम ॥ ७ ॥

साधुशिरोमणे ! उन दोनों पुरुषोत्तमोंको देखकर ऋषियोंने कैसी चेष्टा की ? यह सब वृत्तान्त पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ७ ॥

यथा गतो हरिर्विष्णुः कृष्णो जिष्णुः पुरातनः।
यथा च शंकरः साक्षात् कृतवान् नागभूषणः ।
एतत् सर्वं विप्रवर्य ब्रूहि तत्त्वेन यत्नतः ॥ ८ ॥

विप्रवर ! सर्वव्यापी, पापहारी, पुरातन पुरुष और विजयशील सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण जिस प्रकार कैलास पर्वतपर गये और सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित भगवान् शङ्करने जिस प्रकार उनका साक्षात्कार किया, यह सब मुझे यत्नपूर्वक ठीक-ठीक बताइये ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् यथा कृष्णो गतो नगम् ।
यथा च दृष्टो देवेशः शंकरो वृषवाहनः ॥ ९ ॥
यथा चचार स तपो यथा ते मुनयो गताः ।
एवं तयोर्यथावृत्तं तथा शृणु नरोत्तम ॥ १० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! नरश्रेष्ठ ! भगवान् श्रीकृष्ण जिस प्रकार कैलासपर्वतपर गये, जिस प्रकार उन्होंने देवेश्वर वृषभवाहन भगवान् शङ्करका दर्शन किया, जिस तरह वे तपस्यामें संलग्न हुए, जिस प्रकार वे मुनिलोग वहाँ गये और जिस तरह उन दोनों देवताओंका वृत्तान्त वहाँ घटित हुआ, वह सब सावधान होकर सुनो ॥ ९-१० ॥

द्वैपायनोऽथ भगवान् यथा प्रोवाच मां तथा।
नमस्कृत्य प्रवक्ष्यामि केशवं खगवाहनम् ॥ ११॥
यथाशक्ति यथाप्रज्ञं शृणु यत्नेन सुव्रत ।

भगवान् वेदव्यासने यह प्रसङ्ग जिस प्रकार मुझसे कहा था, उसी प्रकार मैं गरुड़वाहन भगवान् केशवको नमस्कार करके अपनी बुद्धि और शक्तिके अनुसार कहूँगा । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश ! तुम यत्नपूर्वक सुनो ॥

न चाशुश्रूषवे वाच्यं नृशंसायातपस्विने ॥ १२ ॥
नानधीताय वक्तव्यं पुण्यं पुण्यवता सदा।

जिसमें सेवा करनेका भाव न हो, जो नृशंस तथा तपस्यासे दूर रहनेवाला हो और जिसने कुछ भी अध्ययन न किया हो, ऐसे पुरुषको पुण्यात्मा विद्वान् इस पवित्र प्रसंगका उपदेश कभी न दे ॥ १२ ॥

स्वर्ग्यं यशस्यं धन्यं च बुद्धिशुद्धिकरं सदा ॥ १३॥
ध्येयं पुण्यात्मनां नित्यमिदं वेदार्थनिश्चितम् ।

यह विषय स्वर्गप्रद, यशोवर्धक, धनकी प्राप्ति करानेवाला तथा सदा ही बुद्धिको शुद्ध करनेवाला है; यह (भगवान् विष्णु और शिवकी एकता) वेदार्थका निश्चित सिद्धान्त है और पुण्यात्मा पुरुषोंके लिये सदा ही चिन्तन करने योग्य है ॥ १३ ॥

अनेकारण्यसंयुक्तं सेवन्ते नित्यमीदृशम् ॥ १४॥
मुनयो वेदनिरता नारदाद्यास्तपोधनाः।

अनेक आरण्यकग्रन्थों (उपनिषदों) ने इसका अनुमोदन किया है। वेदपरायण नारद आदि तपोधन मुनि नित्य इसका सेवन (चिन्तन) करते हैं ॥ १४ ॥

अत्यद्भुतं महापुण्यं वृत्तं कैलासपर्वते ॥ १५॥
शिवयोर्देवयोस्तत्र हरेश्चैव भवस्य च ।

भगवान् विष्णु और शिव दोनों कल्याणकारी देवताओंके कैलास पर्वतपर एकत्र होनेका यह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त परम पुण्यमय है ॥ १५ ॥

हतेष्वसुरसंघेषु नरकादिषु भूमिप ॥ १६॥
हतेष्वथ नृपेष्वेवं किंचिच्छिष्टेषु शत्रुपु ।
शासति स्म सदा विष्णुः पृथिवीं पुरुषोत्तमः ॥ १७॥
द्वारवत्यां जगन्नाथो वसन् वृष्णिभिरीश्वरः ।
रुक्मिण्या संगतो देवो वसंतत्र पुरे हरिः ॥ १८॥

राजन् ! नरक आदि असुरसमूहों तथा अन्यान्य राजाओंके मारे जानेपर जब थोड़े-से ही शत्रु शेष रह गये, उन दिनों वृष्णिवंशियोंके साथ द्वारकापुरीमें निवास करते हुए सर्वसमर्थ जगन्नाथ पुरुषोत्तम श्रीहरि पृथिवीका सदा शासन करने लगे। भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीसे संयुक्त होकर उस नगरमें निवास करते थे ॥ १६–१८ ॥

कदाचिच्च तया सार्धं शेते रात्रौ जगत्पतिः ।
विहरंश्च यथायोगं प्रीतः प्रीतियुजा तया ॥१९॥

एक दिनकी बात है, जगदीश्वर श्रीकृष्ण प्रीतिमती रुक्मिणीदेवीके साथ रातमें यथोचित विहार करते हुए प्रसन्नतापूर्वक सो रहे थे ॥ १९ ॥

९७८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

अथोवाच तदा देवी रुक्मिणी रुक्मभूषणा।
पुत्रमिच्छामि देवेश त्वत्तो माधव नन्दनम् ॥२०॥

उस समय सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हुई रुक्मिणी-देवीने भगवान्‌से कहा—'देवेश्वर ! माधव ! मैं आपसे आनन्ददायक पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ ॥ २० ॥

बलिनं रूपसम्पन्नं त्वयैव सदृशं प्रभो।
वृष्णीनामपि नेतारं वीर्यवन्तं तपोनिधिम् ॥२१॥

'प्रभो ! वह पुत्र आपके ही समान रूपवान्, बलवान्, पराक्रमी, तपोनिधि तथा वृष्णिकुलका नेता हो ॥ २१ ॥

सर्वशास्त्रार्थकुशलं राजविद्यापुरस्कृतम् ।
एवमादिगुणैर्युक्तं दातुमर्हसि सत्तम ॥२२॥

'वह सभी शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें निपुण तथा राजविद्या (ब्रह्मविद्या) के ज्ञाताओंमें अग्रगण्य हो सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पतिदेव ! आप मुझे ऐसे ही गुणोंसे सम्पन्न पुत्र प्रदान कीजिये ॥

त्वयि सर्वस्य दातृत्वं नित्यमेव प्रतिष्ठितम् ।
त्वं हि सर्वस्य कर्ता च दाता भोक्ता जगत्पतिः ॥२३॥

'आपमें सदा ही सब कुछ देनेकी शक्ति विद्यमान है; क्योंकि आप ही सबके दाता, कर्ता, भोक्ता और जगदी-श्वर हैं ॥ २३ ॥

विशेषतस्तु भृत्यानां शुश्रूषानियतात्मनाम् ।
वक्तव्यं किमु देवेश यदि भक्तास्मि केशव ॥२४॥
अनुग्रहो यदि स्यान्मे देवदेव जगत्पते ।
दातुमर्हसि पुत्रं त्वं वीर्यवन्तं जनार्दन ॥२५॥

'देवेश्वर ! केशव ! विशेषतः जो आपके भृत्य हैं, सदा नियमपूर्वक आपकी सेवामें मन लगाये रहते हैं, उन्हें आप अभीष्ट वस्तु प्रदान करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है। देवदेव ! जगत्पते ! जनार्दन ! यदि मैं आपकी भक्त हूँ और यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो आप मुझे पराक्रमी पुत्र प्रदान करें' ॥ २४-२५ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तो देवदेवेशः प्रियया प्रीयमाणया ।
तया महिष्या रुक्मिण्या रुक्मिशत्रुर्यदूद्वहः ॥२६॥
प्रोवाच वचनं काले रुक्मिणीं यादवेश्वरः ।
दातास्मि तादृशं पुत्रं यं त्वमिच्छसि भामिनि ॥२७॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अपनी प्रसन्न हुई प्यारी रानी रुक्मिणीदेवीके ऐसा कहनेपर रुक्मीके शत्रु, यदुकुलतिलक, देवदेवेश्वर, यादवपति श्रीकृष्णने रुक्मिणीसे यह समयोचित बात कही—'भामिनि ! तुम जैसा चाहती हो, वैसा ही पुत्र मैं तुम्हे प्रदान करूँगा ॥ २६-२७ ॥

नित्यं भक्तासि मे देवि नात्र कार्या विचारणा ।
अवश्यं तव दास्यामि पुत्रं शत्रुनिबर्हणम् ॥२८॥

'देवि ! तुम सदा ही मेरी भक्त हो, इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं अवश्य ही तुम्हें शत्रुनाशक पुत्र प्रदान करूँगा ॥ २८ ॥

पुत्रेण लोकाञ्जयति सतां कामदुघा हि ये ।
नरकं पुदिति ख्यातं दुःखं च नरकं विदुः ॥२९॥

'गृहस्थ पुरुष पुत्रद्वारा उन लोकोंपर विजय पाता है, जो पुरुषोंको उनकी इच्छाके अनुसार फल देनेवाले होते हैं। नरक 'पुत्' नामसे विख्यात है, दुःखको भी नरक ही माना गया है ॥ २९ ॥

पुद्त्राणात् ततः पुत्रमिहेच्छति परत्र च ।
अनन्ताः पुत्रिणो लोकाः पुरुषस्य प्रिये शुभाः ॥३०॥

'उस पुत्-नामक नरक या दुःखसे वह पिता-माताका परित्राण करता है, इसलिये सारा जगत् इहलोक और परलोक-के लिये पुत्रकी अभिलाषा रखता है। प्रिये ! पुत्रवान् पुरुषके लिये अनन्त शुभ लोक विद्यमान हैं ॥ ३० ॥

पतिर्जायां प्रविशति गर्भो भूत्वा स मातरम् ।
तस्यां पुनर्नवो भूत्वा दशमे मासि जायते ॥३१॥

'पति ही गर्भ बनकर पत्नीके भीतर प्रवेश करता है, उस गर्भकी वह माता (जननी) होती है। उसके गर्भमें नूतन शरीर धारण करके वह (पति) पुनः दसवें मासमें जन्म लेता है ॥ ३१ ॥

पुत्रवन्तं बिभेतीन्द्रः किं नु तेनाशितं भवेत् ।
नापुत्रो विन्दते लोकान् कुपुत्राद् वन्ध्यतावरा ॥३२॥

'पुत्रवान्‌को देखकर इन्द्र भी डरते हैं। वे सोचते हैं, पता नहीं, यह मेरे किस वैभवका उपभोग करेगा ? पुत्रहीन मनुष्य पुण्यलोकोंको नहीं पाता है; परंतु कुपुत्र पैदा करनेकी अपेक्षा तो बाँझ रह जाना ही अच्छा है ॥ ३२ ॥

कुपुत्रो नरके यस्मात् सुपुत्रात् स्वर्ग एव हि ।
तस्माद् विनीतं सत्पुत्रं श्रुतवन्तं दयापरम् ॥३३॥

'कुपुत्र नरकमें गिराता है और सुपुत्रसे स्वर्ग भी सुलभ होता है। अतः विनयशील, विद्वान् और दयालु सत्पुत्रकी इच्छा करनी चाहिये ॥ ३३ ॥

विद्यया विनयो यस्माद् विद्यायुक्तं सुधार्मिकम् ।
इच्छेत् पुत्रं पुत्रकामः पुरुषो यत्नवान् बुधः ॥३४॥

'विद्यासे विनयकी प्राप्ति होती है, अतः पुत्रकी कामना-वाला प्रयत्नशील विद्वान् पुरुष विद्यायुक्त परम धार्मिक पुत्र पानेकी इच्छा करे ॥ ३४ ॥

तस्माद् दास्यामि ते पुत्रं विद्यावन्तं सुधार्मिकम् ।
एष गच्छामि पुत्रार्थं कैलासं पर्वतोत्तमम् ॥३५॥

'अतः मैं तुम्हें विद्वान् एवं परम धर्मात्मा पुत्र प्रदान

भविष्यपर्व ]चतुःसप्ततितमोऽध्यायः९७९

करूँगा। पुत्रकी प्राप्तिके लिये मैं अभी उत्तम पर्वत कैलासको जा रहा हूँ ॥ ३५ ॥

तत्रोपास्य महादेवं शंकरं नीललोहितम्।
ततो लब्धास्मि पुत्रं ते भवाद् भूतहिते रतात् ॥ ३६॥
'वहाँ नीललोहित वर्णवाले महान् देवता भगवान् शङ्करकी उपासना करके प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् शिवसे तुम्हारे लिये पुत्र प्राप्त करूँगा ॥ ३६ ॥

तपसा ब्रह्मचर्येण भवं शंकरमव्ययम्।
तोषयित्वा विरूपाक्षमादिदेवमजं विभुम् ॥३७॥
'तपस्या और ब्रह्मचर्य-पालनके द्वारा सबके उत्पादक अविनाशी अजन्मा सर्वव्यापी आदिदेव विरूपाक्ष भगवान् शंकरको संतुष्ट करके मैं उनसे पुत्र होनेका वर प्राप्त करूँगा ॥ ३७ ॥

गमिष्याम्यहमद्यैव द्रष्टुं शंकरमव्ययम्।
स च मे दास्यते पुत्रं तोषितस्तपसा मया ॥३८॥
'मैं आज ही अविनाशी भगवान् शङ्करका दर्शन करनेके लिये जाऊँगा। मेरेद्वारा किये गये तपसे संतुष्ट होकर वे मुझे पुत्र देंगे ॥ ३८ ॥

तत्र गत्वा महादेवं नमस्कृत्य सहोमया।
प्रविश्य बदरीं पुण्यां मुनिजुष्टां तपोमयीम् ॥ ३९॥
अग्निहोत्राकुलां दिव्यां गङ्गाम्बुप्प्लावितां सदा।
मृगपक्षिसमायुक्तां सिंहद्वीपिशताकुलाम् ॥४०॥
'वहाँ जाकर उमासहित महादेवजीको नमस्कार करके उन्हें संतुष्ट करूँगा। वहाँ पहुँचनेसे पहले मैं मुनियोंद्वारा सेवित तपोमयी पुण्यभूमि बदरीमें प्रवेश करूँगा, जो अग्निहोत्रके धूमसे व्याप्त है। वह दिव्य भूमि सदा गङ्गाजीके जलसे प्लावित रहती है। वहाँ पशु और पक्षियोंके समुदाय सब ओर विचरते हैं और सैकड़ों सिंह तथा व्याघ्र भरे रहते हैं ॥ ३९-४० ॥

बदरीफलसम्पूर्णां वानरक्षोभितद्रुमाम्।
वेत्रारूढमहावृक्षां कदलीखण्डमण्डिताम् ॥४१॥
'वह स्थान बेरके फलोंसे परिपूर्ण है। वानर वहाँके वृक्षोंको कम्पित करते रहते हैं। वहाँके विशाल वृक्षोंपर बेंतकी लताएँ फैली होती हैं। जहाँ-तहाँ केलोंके बगीचे उस स्थानकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ ४१ ॥

मुनिभिर्वेदतत्त्वार्थविचारनिपुणैः सदा।
वेदनिश्चिततत्त्वार्थैः प्रमाणकुशलैर्युताम् ॥४२॥
'वेदके तात्त्विक अर्थोंका विचार करनेमे निपुण, वेदके सुनिश्चित सिद्धान्तके ज्ञाता और प्रमाणकुशल मुनि सदा वहाँ निवास करते हैं ॥ ४२ ॥

इदमेकमिदं तत्त्वमिति निश्चितमानसैः।
उपास्यमानामन्यत्र सिद्धैः सिद्धार्थतत्परैः ॥४३॥
'यह एकमात्र अद्वितीय तत्त्व है, यही परमार्थ है, इस प्रकार मनसे निश्चय करनेवाले सिद्धार्थपरायण सिद्धजन जहाँ-तहाँ उस भूमिकी उपासना करते हैं ॥ ४३ ॥

इतिहासपुराणज्ञैः सेव्यमानां महर्षिभिः।
गच्छद्भिः खर्गनिलयं परित्यज्य कलेवरम् ॥४४॥
'इतिहास-पुराणके ज्ञाता महर्षि, जो शरीर छोड़नेके बाद स्वर्गलोकको जानेवाले हैं, उस भूमिकाय सेवन करते हैं ॥ ४४ ॥

प्रसिद्धां महतीं देवीं यास्यामि सुकृतालयाम्।
इत्युक्त्वा विररामैव देवदेवो जनार्दनः ॥४५॥
'इस प्रकार उस प्रसिद्ध पुण्यस्थली दिव्य एवं विशाल बदरीपुरीको जाऊँगा'—ऐसा कहकर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन चुप हो गये ॥ ४५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलास-यात्राविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥७३।


चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णका यादवसभामें अपनी कैलासयात्राका विचार प्रकट करते हुए नगरकी रक्षाके लिये यादवोंको सावधान रहनेका आदेश देना

वैशम्पायन उवाच

प्रभातायां तु शर्वर्यां गन्तुमैच्छज्जनार्दनः।
हुताग्निः कृतकल्याणः समाप्तवरदक्षिणः ॥ १ ॥
गाश्च दत्त्वाथ विप्रेभ्यो नमस्कृत्य द्विजोत्तमान्।
आस्थानमण्डपं कृष्णः प्रविवेश जगत्पतिः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब भगवान् श्रीकृष्णने अग्निहोत्र करके मङ्गलाचारके पश्चात् ब्राह्मणोंको उत्तम दक्षिणाएँ देकर उन्हें बहुत-सी गौएँ दीं और उन श्रेष्ठ द्विजोंको नमस्कार करके जगत्पति श्रीकृष्णने आस्थानमण्डप (सभाभवन) में प्रवेश किया ॥ १-२ ॥

आसनं महदास्थाय वृष्णीनाहूय सर्वशः।
बलभद्रं शिनेः पौत्रं हार्दिक्यं शुकसारणौ ॥ ३ ॥

९८० -श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


उग्रसेनं महाबुद्धिमुद्धवं नीतिमत्तरम्।
यस्य बुद्धिं समाश्रित्य जीवन्ते यादवाः सुखम् ॥ ४ ॥
वहाँ महान् सिंहासनपर बैठकर उन्होंने समस्त वृष्णिवंशी वीरोंको बुलाया। बलभद्र, सात्यकि, कृतवर्मा, शुक, सारण, राजा उग्रसेन तथा उन महाबुद्धिमान् एवं नीतिशास्त्रके महान् पण्डित उद्धवको भी बुलाया, जिनकी बुद्धिका आश्रय लेकर समस्त यादव सुखसे रहते थे ॥ ३-४ ॥

नेता च यदुवृष्णीनां स तु धर्मपरः सदा।
यस्य विभ्यति देवाश्च नीतेस्तस्य महात्मनः ॥ ५ ॥
वे सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले और वृष्णिवंशी यादवोंके नेता थे। उन महात्माकी नीतिसे देवता भी सदा भयभीत रहते थे ॥ ५ ॥

यस्य बुद्धिवलाद् विष्णुः शशास पृथिवीं सदा।
तं च वृष्णिवरं वीरमुद्धवं देवसुप्रभम् ॥ ६ ॥
अन्यांनपि यदून सर्वानुवाच भगवान् हरिः।
जिनके बुद्धिवलसे भगवान् श्रीकृष्ण सदा पृथिवीका शासन करते थे तथा जो देवताओंके समान परम कान्तिमान् एवं वृष्णिवंशके प्रमुख वीर थे, उन उद्धवको तथा अन्य यादवोंको भी बुलाकर भगवान् श्रीहरिने उन सबसे कहा—॥ ६½ ॥

श‍ृण्वन्तु मम वाक्यानि यादवाः सर्व एव हि।
श‍ृणु चापि वचो मह्यं पितुरुद्धव मे सखे ॥ ७ ॥
'समस्त यादव मेरी बातें सुनें ! मेरे पिताके मित्र उद्धवजी ! आप भी मेरा वचन सुनिये ॥ ७ ॥

बाल्यात्प्रभृति यो यत्नो मम दुष्टनिबर्हणे।
प्रत्यक्षं भवता दृष्टं पूतनानेधनं नृप ॥ ८॥
केशी च निहतो बाल्ये मया बालेन यादवाः।
गोवर्धनो धृतः शैलो गावश्च परिपालिताः ॥ ९ ॥
'नरेश्वर उग्रसेन ! बाल्यकालसे लेकर अबतक दुष्टोंका संहार करनेके लिये मेरेद्वारा जो प्रयत्न हुआ है, उसे आपने प्रत्यक्ष देखा है। यादवो ! बाल्यावस्थामें बालकरूपसे मैंने पूतनाको मारा, केशीका संहार किया, गोवर्धन पर्वत उठाया और गौओंकी रक्षा की ॥ ८-९ ॥

अभिषिक्तोऽस्मि शक्रेण देवानांमग्रतः स्थितः।
कंसोऽपि निधनं नीतो मया चाणूरमुष्टिकौ ॥१०॥
'मुझे देवताओंके आगे खड़ा करके देवराज इन्द्रने मेरा अभिषेक किया। मेरे हाथसे कंस मारा गया और चाणूर तथा मुष्टिकका भी संहार हुआ ॥ १० ॥

उग्रसेनोऽभिषिक्तश्च कृता द्वारवती मया।
अन्ये चापि नृपा राजन् बलिनो निहता मया ॥११॥
'महाराज उग्रसेनका अभिषेक हुआ और मैंने द्वारकापुरीका नवनिर्माण किया। राजन् ! अन्य बलवान् नरेश भी मेरेद्वारा मारे गये ॥ ११ ॥

योऽपि वीरो जरासंधो निगृहीतो बलान्मया।
भीमेन बलिना राजन्नयने मम यादवाः ॥१२॥
'यादवो ! और राजन् ! जो वीर राजा जरासंध था, उसका भी मैंने बलवान् भीमसेनके द्वारा बलपूर्वक दमन किया। मेरी नीतिके अनुसार ही जरासंधका संहार हुआ ॥ १२ ॥

शृगालो निहतः संख्ये गोमन्ताद् गच्छता मया।
योऽपि वीरो दुरात्मासौ दानवो नरको हतः ॥१३॥
'गोमन्त पर्वतसे जाते समय मैंने युद्धमें राजा शृगालका वध किया और वह जो वीर दुरात्मा दानव नरकासुर था, वह भी मेरे हाथसे मारा गया ॥ १३ ॥

निष्कण्टकमिमं लोकं कृतवान् राजसत्तमाः।
किं तु वीरो नृपो जज्ञे सखा भौमस्य यादवाः ॥१४॥
पौण्ड्रो वीर्यवतां नेता द्वेष्टा चासौ सदा मम।
'क्षत्रियशिरोमणि यादवो ! इस प्रकार मैंने इस लोकको निष्कण्टक (शत्रुहीन) बना दिया है। परंतु जो नरकासुरका सखा है, वह वीर राजा पौण्ड्रक अबतक शेष है। वह बलवानोंका नेता और मुझसे सदा द्वेष रखनेवाला है ॥१४½॥

शिष्यो द्रोणस्य राजेन्द्रो बली ब्रह्मास्त्रवित् कृती ॥१५॥
शास्त्रज्ञो नीतिमान् साक्षान्नेता सर्वस्य यत्नवान्।
योद्धा युद्धप्रियो राजा जामदग्न्य इवापरः ॥१६॥
'राजेन्द्र पौण्ड्रक द्रोणाचार्यका शिष्य, बलवान्, ब्रह्मास्त्रवेत्ता, रणकर्मकुशल, शास्त्रज्ञ, नीतिमान्, सबका साक्षात् नेता, यत्नशील, योद्धा और दूसरे परशुरामकी भाँति युद्धप्रेमी राजा है ॥ १५-१६ ॥

एकान्तशत्रुरस्माकं छिद्रान्वेपी सदा मम।
वाधिष्यते पुरीं योद्धाच्छिद्रं यदि लभेत सः ॥१७॥
'वह मेरा एकान्त शत्रु है और सदा मेरे छिद्र ढूँढ़ता रहता है। यदि वह थोड़ा-सा भी छिद्र पा जाय तो युद्धके लिये उद्यत होकर द्वारकापुरीको सताने लग जाय ॥१७॥

न ह्यल्पसाध्यो बलवान् पुण्ड्रस्येशो नृपोत्तमः।
यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु प्रगृहीतशरासनाः ॥१८॥
यथा न बाधते राजा पुरीं यदुकुलाश्रयाम्।
'श्रेष्ठ नरेशो ! पुण्ड्र देशका बलवान् राजा पौण्ड्रक थोड़े-से साधनोंद्वारा वशमें आनेवाला नहीं है। अतः आपलोग सदा धनुष लेकर युद्धके लिये तैयार खड़े रहें, जिससे यदुकुलकी निवासभूमि द्वारकापुरीको वह राजा पौण्ड्रक बाधा न दे सके ॥ १८½ ॥

अहं तु यास्ये कैलासं कुतश्चित् कारणान्नृपाः ॥१९॥

भविष्यपर्व ] पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः [ ९८१


शङ्करं द्रष्टुकामोऽस्मि भूतभावनभावनम् ।
यावदागमनं मह्यं तावद् यत्ता भवन्त्विह ॥२०॥

'नरेशो ! मैं किसी कारणवश कैलास पर्वतको जाऊँगा । वहाँ जाकर समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले भगवान् शंकरका दर्शन करना चाहता हूँ । जबतक मैं लौट न आऊँ तबतक आपलोग यहाँ नगरकी रक्षाके लिये सतत सावधान रहें ॥ १९-२० ॥

मया विरहितां चेमां यदि जानाति पुण्ड्रकः ।
आगमिष्यति राजेन्द्रो योत्स्यते च पुरीमिमाम् ॥२१॥

'यदि राजेन्द्र पौण्ड्रक यह जान लेगा कि मैं द्वारकापुरीमें नहीं हूँ तो वह अवश्य आक्रमण करेगा और इस नगरीके साथ युद्ध छेड़ देगा ॥ २१ ॥

इमां निर्यादवीं कर्तुं शक्नोतीति च मे मतिः ।
यत्ता भवत राजेन्द्र्राः खड्गैः पाशैः परश्वधैः ॥२२॥

'राजेन्द्रगण ! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि पौण्ड्रक इस पुरीको यादवोंसे सूनी कर सकता है; अतः आपलोग खड्ग, पाश और फरसे लेकर युद्धके लिये सदा तैयार रहें ॥ २२ ॥

पाषाणैः कर्षणीयैश्च सन्नद्धा भवत स्वकैः ।
पिधाय च कपाटानि महाद्वाराणि यत्नतः ॥२३॥

'पाषाणों तथा आकर्षण करनेवाले अपने यन्त्रोंके द्वारा आपलोग सदा सन्नद्ध रहें । बड़े-बड़े फाटकोंकी किवाड़ें बंद करके यत्नपूर्वक पुरीकी रक्षा करें ॥ २३ ॥

एक एव महाद्वारो गमनागमने सदा ।
मुद्रया सह गच्छन्तु राज्ञो ये गन्तुमीप्सवः ॥२४॥

'नगरसे बाहर आने-जानेके लिये एक ही सदा बड़ा फाटक काममें लाया जाय। जो बाहर जाना चाहते हों, वे राजाकी मुद्रा (पास) लेकर उसके साथ जा सकते हैं॥ २४॥

न चामुद्रः प्रवेष्टव्यो द्वारपालस्य पश्यतः ।
यावदागमनं मह्यं तावदेवं भविष्यति ॥२५॥

'जिसके पास राजाकी मुद्रा न हो, वह द्वारपालके देखते-देखते नगरमें प्रवेश न करने पावे। जबतक मैं लौटकर न आऊँ, तबतक ऐसी ही व्यवस्था रहेगी ॥ २५ ॥

मृगया नात्र कर्तव्या न च क्रीडा बहिः पुरात् ।
ज्ञातव्याश्च परे स्वे च गमनागमने सदा ॥२६॥

'इस बीचमें शिकार खेलना बंद कर दिया जाय, नगरसे बाहर जाकर क्रीड़ा न की जाय। गमनागमनके समय सदा अपने और परायेकी पहिचान की जाय ॥ २६ ॥

एवमादिक्रिया कार्या यावदागमनं मम ।
इत्युक्त्वा यादवान् सर्वान् सात्यकिं पुनराह च ॥२७॥

'जबतक मेरा आना न हो तबतक इसी तरहकी व्यवस्था करनी चाहिये।' समस्त यादवोंसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने पुनः सात्यकिसे इस प्रकार कहा ॥२७॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलास-यात्राविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥


पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णकी सात्यकि और उद्धवसे नगरकी रक्षाके विषयमें बातचीत तथा बलराम आदि यादवोंको भी रक्षाका भार सौंपकर उनका कैलासयात्राके लिये उद्यत होना

श्रीभगवानुवाच
सात्यके शृणु मद्वाक्यं यत्तो भव युधां वर ।
त्वं तु खड्गी गदी भूत्वा चापपाणिस्तनुत्रवान् ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले—योद्धाओंमें श्रेष्ठ सात्यके ! मेरी बात सुनो। तुम स्वयं कवच पहनकर तलवार, गदा और धनुष हाथमें लिये नगरकी रक्षाके लिये प्रयत्नशील रहो ॥ १ ॥

तिष्ठ यत्नेन रक्षस्व पुरीं बह्वनृपाश्रयाम् ।
न च निद्रा त्वया कार्या रात्रौ यदुनृप प्रभो ॥ २ ॥

यदुकुलतिलक प्रभावशाली वीर ! द्वारकापुरी बहुसंख्यक क्षत्रियोंकी निवासभूमि है । तुम यत्नपूर्वक खड़े रहो और इसकी रक्षा करो। तुम्हें रातभर नींद नहीं लेनी चाहिये ॥ २ ॥

न च व्याख्या त्वया कार्या शास्त्राणां शास्त्रतत्पर ।
न च वादस्त्वया कार्यों वादिभिः सह वृष्णिप ॥ ३ ॥

शास्त्रपरायण सात्यके ! आजसे तुम्हें शास्त्रोंकी व्याख्यामें भी नहीं लगना चाहिये । वृष्णिवंशका पालन करनेवाले वीर ! अब तुम्हें वादियोंके साथ वाद भी नहीं करना चाहिये ॥ ३ ॥

त्वं हि योद्धा बली ज्ञाता धनुर्वेदस्यवेदवित् ।
तथा कुरु यथा वीर नोपहास्या भवेदियम् ॥ ४ ॥

वीर ! तुम योद्धा, बलवान्, ज्ञानवान् और धनुर्वेद-

९८२ श्रीमद्भागवते खिलभागे [ हरिवंशे


नामक उपवेदके विद्वान् हो। अतः ऐसा प्रयत्न करो, जिससे यह पुरी उपहासका पात्र न बने ॥ ४ ॥

सात्यकिरुवाच

करिष्यामि वचस्तुभ्यं यथाशक्ति जनार्दन ।
आज्ञा तव जगन्नाथ धार्या यत्नेन मे सदा ॥ ५ ॥

जनार्दन ! मैं यथाशक्ति आपके इन वचनोंका पालन करूँगा । जगन्नाथ ! मुझे सदा यत्नपूर्वक आपकी आज्ञाको शिरोधार्य करना चाहिये ॥ ५ ॥

भृत्यवत् प्रचरिष्यामि कामपालस्य माधव ।
यावदागमनं तुभ्यं तावत्स्थास्यामि यत्नतः ॥ ६ ॥

माधव ! मैं भृत्यकी भाँति बलरामजीकी आज्ञाका अनुसरण करूँगा । जबतक आपका आना होगा, तबतक मैं यत्नपूर्वक पुरीकी रक्षामें लगा रहूँगा ॥ ६ ॥

प्रसादस्तव गोविन्द यदि स्यान्मयि माधव ।
किं नाम मे च दुःसाध्यं शत्रूणां निग्रहे रणे ॥ ७ ॥

गोविन्द ! माधव ! यदि आपकी कृपा मुझपर बनी रहे तो रणभूमिमें शत्रुओंका दमन करनेके लिये कौन-सा ऐसा कार्य है, जो मेरे लिये दुःसाध्य हो ॥ ७ ॥

यदि शक्रं यमं वापि कुवेरमपि पाशिनम् ।
सर्वानैतान् विजेष्यामि किमु पौण्ड्रं नृपोत्तमम् ॥ ८ ॥
गच्छ कार्यं कुरुष्वेदं यत्तोऽहं सततं हरे ।

यदि इन्द्र, यम, कुवेर अथवा पाशधारी वरुण भी युद्धके लिये आ जायें तो आपकी कृपासे इन सबपर विजय पा जाऊँगा; फिर नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकको पराजित करना कौन बड़ी बात है । हरे ! जाइये, अपना यह कार्य कीजिये । मैं सतत सावधान रहूँगा ॥ ८½ ॥

उद्धवं पुनराहेदं कृष्णः पद्मानिभेक्षणः ॥ ९ ॥
शृणूद्धव त्वं वाक्यं मे कुर्यास्त्वेतत् प्रयत्नवान् ।

तत्पश्चात् कमलनयन श्रीकृष्णने पुनः उद्धवसे इस प्रकार कहा—'उद्धवजी ! मेरी यह बात सुनिये और इसका प्रयत्नपूर्वक पालन कीजिये ॥ ९½ ॥

रक्ष्या नयेन राजेन्द्र पुरी द्वारवती त्वया ॥ १० ॥
यत्तो भव सदा तात कुरु साह्यमत्र नः ।
लज्जा मम समुत्पन्ना वदतस्तव साम्प्रतम् ॥ ११ ॥

'राजेन्द्र ! आपको अपनी नीतिसे द्वारकापुरीकी रक्षा करनी चाहिये । तात ! आप सदा सावधान रहें और इस विषयमें हमलोगोंकी सहायता करें । इस समय यहाँ सब बातें कहनेमें मुझे बड़ा संकोच होता है ॥ १०-११ ॥

त्वं हि नेता समस्तस्य विद्यापारस्य सर्वतः ।
को नु शक्ष्यति मेधावी वक्तुं विद्यावतः पुरः ॥ १२ ॥

'जो सब प्रकारसे विद्याओंमें पारंगत हैं, उन सबके आप ही नेता हैं । कौन मेधावी पुरुष आप-जैसे विद्वान्‌के समक्ष कोई बात कह सकेगा ॥ १२ ॥

यत् कार्यं तद् भवान् वेत्ति ह्यकार्यं वापि सर्वतः ।
अतोऽहं विरमे तात वक्तुं सम्प्रति वृष्णिप ॥ १३ ॥

'जो करनेयोग्य कार्य है, उसे आप जानते हैं । जो सर्वथा नहीं करनेयोग्य है, वह भी आपसे अज्ञात नहीं है; अतः वृष्णिवंशका पालन करनेवाले तात ! मैं इस समय कुछ कहनेसे विराम लेता हूँ' ॥ १३ ॥

उद्धव उवाच

किमिदं तव गोविन्द वर्तते मां प्रति प्रभो ।
अहो प्रसन्नता मह्यं किंतु प्रीतिरियं तव ॥ १४ ॥

उद्धव बोले—गोविन्द ! प्रभो ! मेरे प्रति आपके मुँहसे यह कैसी बात निकल रही है ? अहो ! यह मेरे लिये प्रसन्नताकी बात है; किंतु यह आपका प्रेम ही इस रूपमें प्रकट हुआ है ॥ १४ ॥

जानाम्यहं जगन्नाथ प्रसादस्यैष विस्तरः ।
यस्य प्रसन्नो भवति तस्य किं नास्ति केशव ॥ १५ ॥

जगन्नाथ ! मैं समझता हूँ कि यह मुझपर आपकी कृपाका विस्तार ही व्यक्त हुआ है । केशव ! जिसपर आप प्रसन्न होते हैं, उसमें कौन-सी विशेषता नहीं है ॥ १५ ॥

त्वं हि सर्वस्य जगतः कर्ता हर्ता प्रधानतः ।
प्रभवः सर्वकार्याणां वक्ता श्रोता प्रमाणवित् ॥ १६ ॥

आप ही समस्त जगत्‌के प्रधानतः स्रष्टा और संहारक हैं । आप ही समस्त कार्योंके कारण, वक्ता, श्रोता और प्रमाणवेत्ता हैं ॥ १६ ॥

ध्याता ध्यानमयो ध्येय इति ब्रह्मविदो विदुः ।
जेता देवरिपूणां च गोप्ता नाकसदाम् भवान् ॥ १७ ॥

ब्रह्मज्ञानी मुनि आपको ही ध्याता, ध्यान और ध्येयरूपमें जानते हैं । आप देवद्रोहियोंको जीतनेवाले और स्वर्गवासियोंके रक्षक हैं ॥ १७ ॥

त्वन्नाथा वयमेवेति जीवामो निहतद्विषः ।
इयं नीतिरहं मन्ये नेता नीतेर्यतो भवान् ॥ १८ ॥

हमारे तो आप ही स्वामी और संरक्षक हैं; इसीलिये हम जी रहे हैं और हमारे शत्रु मारे गये हैं । यही मेरी नीति है और इसीको मैं मानता हूँ, क्योंकि आप ही नीतिके नेता हैं।

को नु नाम नयो वेद त्वां विना साम्प्रतं वद ।
नीतिस्त्वं सर्वकार्याणामिति मे निश्चिता मतिः ॥ १९ ॥

वेदस्वरूप परमात्मन् ! कहिये, इस समय आपके सिवा दूसरा कौन नीतिमार्गका दर्शन करानेवाला है । मेरा तो यह निश्चित विचार है कि आप ही समस्त कार्योंकी नीति हैं ॥

भविष्यपर्व ] षट्सप्ततितमोऽध्यायः ९८३

दुर्गाढो नयमार्गोऽयमित्याहुस्तद्विदो जनाः।
चतुर्धा प्रोच्यते नीतिः सामदाने जनार्दन ॥२०॥
दण्डो भेदो मनुष्याणां निग्राहावग्रहे सदा।
दण्ड्येषु दण्डमिच्छन्ति समान्यं तु नये हरे ॥२१॥

इस नीतिमार्गमें प्रवेश करना बहुत ही कठिन है, ऐसा नीतिज्ञ पुरुष कहते हैं। जनार्दन ! चार प्रकारकी नीति बतलायी जाती है—साम, दान, दण्ड और भेद। मनुष्योंके निग्रह (दूसरेके द्वारा अपना अवरोध) और अवग्रह (अपने द्वारा दूसरोंका अवरोध) होनेपर सदा इन्हीं चार नीतियोंका प्रयोग होता है। हरे ! जो दण्डनीय (दुर्बल) हों, उन शत्रुओंके प्रति नीतिज्ञ पुरुष दण्ड-नीतिके ही प्रयोगकी इच्छा करते हैं और नीतिकी समता होनेपर अर्थात् शत्रु-के अपने समान बलशाली होनेपर उसके प्रति साम नीतिका ही प्रयोग अभीष्ट माना जाता है ॥ २०-२१ ॥

बलवत्स्वथ दानं तु त्रयाणामप्यगोचरे।
प्रयोक्तव्यो महाभेद इति नीतिमतां मतम् ॥२२॥

शत्रु बलवान् हों तो उनके प्रति दान-नीतिका प्रयोग उचित होता है (अर्थात् उन्हे कुछ भेंट देकर शान्त कर देना आवश्यक समझा जाता है)। जहाँ साम, दान और दण्ड—इन तीनों नीतियोंकी पहुँच न हो सके, वहाँ महान् 'भेद' का प्रयोग करना चाहिये, यह नीतिज्ञ पुरुषोंका मत है ॥ २२ ॥

तेषु तेष्वथ सर्वेषु प्रमाणं त्वां विदुर्बुधाः।
किमत्र बहुनोक्तेन सर्वं त्वयि समर्पितम् ॥२३॥

उन-उन सभी नीतियोंमें विद्वान् पुरुष आपको ही प्रमाण मानते हैं (आपने जिस अवसरपर जैसी नीतिका प्रयोग किया है, वहाँ वही उचित था, ऐसा लोगोंका मत है)। यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ ? सारा ज्ञान आपमें ही समर्पित है ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा विररामैव उद्धवो नीतिमत्तरः।
ततः स भगवान् विष्णुरेवमेव नृपोत्तम ॥२४॥
कामपालं महाबाहुमुवाच यदुसंसदि।
उग्रसेनं नृपं राजंस्तथा हार्दिक्यमेव च ॥२५॥
कामपालं पुनर्विष्णुरिदं प्रोवाच तत्त्ववित् ।
न प्रमादस्त्वया कार्यः सर्वदा यत्नवान् भव ॥२६॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर अतिशय नीतिमान् उद्धवजी चुप हो गये। राजन् ! तदनन्तर वे तत्त्ववेत्ता भगवान् श्रीकृष्णने इसी तरह यादव सभामें महाबाहु बलराम, महाराज उग्रसेन तथा कृतवर्मासे पूर्वोक्त बात कही। इसके बाद वे पुनः बलरामजीसे बोले—'भैया ! आपको प्रमाद नहीं करना चाहिये। आप सदा नगरकी रक्षाके लिये यत्नशील बने रहिये ॥ २४-२६ ॥

स्थिते त्वयि महाबाहो का पीडा जगतो भवेत्।
गदी भव सदा त्वार्य न क्रीडा सर्वदा भवेत् ॥२७॥

'महाबाहो ! आप रक्षाके लिये खड़े हो जायँ तो जगत्‌को क्या पीड़ा हो सकती है ? आर्य ! अब गदा उठाइये, सदा क्रीडा और मनोरञ्जनका ही अवसर नहीं होता है ॥

रक्ष त्वं सर्वदा यत्नात् पुरीं द्वारवतीं प्रभो।
नोपहास्या यथा स्याम तथा कुरु गदी भव ॥२८॥

'प्रभो ! आप सदा यत्नपूर्वक द्वारकापुरीकी रक्षा करें। हमें उपहासका पात्र न बनना पड़े, ऐसा प्रयत्न कीजिये और गदा लिये सदा रक्षाके लिये उद्यत रहिये ॥ २८ ॥

उत्साहः सर्वदा कार्यो निरुत्साहो न यत्नतः।
बाढमित्यब्रवीद् रामः कृष्णं वृष्णिकुलोद्भवम् ॥२९॥

'आपको सदा उत्साह बनाये रखना चाहिये। कभी उत्साहका अभाव न हो, इसके लिये यत्नशील रहना चाहिये।' तब बलरामजीने वृष्णिवंशावतंस श्रीकृष्णसे कहा—'बहुत अच्छा' ॥ २९ ॥

वृष्णयः सर्व एवैते स्वं स्वं सद्य समाययुः।
गन्तुमैच्छज्जगन्नाथः कैलासं पर्वतोत्तमम् ॥३०॥

उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके सभी वृष्णिवंशी अपने-अपने घरको लौट गये। तब जगन्नाथ श्रीकृष्णने पर्वतप्रवर कैलासको जानेका विचार किया ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलास-यात्रा-विषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥


षट्सप्ततितमोऽध्यायः

गरुड़पर आरूढ़ होकर श्रीकृष्णका बदरिकाश्रममें जाना, मार्गमें देवताओं-मुनियोंद्वारा उनकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच
ततः संचिन्तयामास गरुडं पक्षिपुङ्गवम्।
आगच्छ त्वरितं तार्क्ष्य इति विष्णुर्जगत्पतिः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर जगदीश्वर श्रीकृष्णने मन-ही-मन पक्षिराज गरुड़का चिन्तन करते हुए कहा—'तार्क्ष्य ! शीघ्र आओ' ॥ १ ॥

ततः स भगवांस्तार्क्ष्यो वेदराशिरिति स्मृतः।
बलवान् विक्रमी योगी शास्त्रनेत्रा कुरुद्वह ॥ २ ॥

९८४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

कुरुश्रेष्ठ ! तब भगवान् गरुड़ वहाँ आ पहुँचे, जिन्हें वेदकी राशिमाना गया है; वे बलवान्, पराक्रमी, योगी तथा शास्त्रों (शास्त्रज्ञों) के नेता हैं ॥ २ ॥
यज्ञमूर्तिः पुराणात्मा साममूर्द्धा च पावनः ।
ऋग्वेदपक्षवान् पक्षी पिङ्गलो जटिलाकृतिः ॥ ३ ॥
यज्ञ उनका स्वरूप है, वे पुराणात्मा और पावन हैं, सामवेद उनका मस्तक है, ऋग्वेद उनकी पाँखें हैं, पक्षधारी गरुड पिङ्गलवर्णके हैं, उनकी आकृति जटिल दिखायी देती है॥
ताम्रतुण्डः सोमहरः शक्रजेता महाशिराः ।
पन्नगारिः पद्मनेत्रः साक्षाद् विष्णुरिवापरः ॥ ४ ॥
उनकी चोंच ताँबेके समान लाल है । वे अमृतका हरण करनेवाले हैं । उन्होंने युद्धमें इन्द्रको जीत लिया था। उनका मस्तक विशाल है । वे सर्पोंके शत्रु हैं और साक्षात् दूसरे विष्णुकी भाँति कमलसदृश नेत्रोंसे सुशोभित होते हैं ॥ ४ ॥
वाहनं देवदेवस्य दानवीगर्भकृन्तनः ।
राक्षसासुरसंघानां जेता पक्षबलेन यः ॥ ५ ॥
वे देवाधिदेव भगवान् विष्णुके वाहन तथा दानव-पत्नियोंके गर्भका उच्छेद करनेवाले हैं । वे अपने पंखोंके बलसे राक्षसों और असुरोंके समूहपर विजय पाते हैं ॥ ५ ॥
प्रादुरासीन्महावीर्यः केशवस्याग्रतस्तदा ।
जानुभ्यामपतद् भूमौ नमो विष्णो जगत्पते ॥ ६ ॥
नमस्ते देवदेवेश हरे स्वामिन्निति ब्रुवन् ।
उस समय महापराक्रमी गरुड़ भगवान् केशवके सम्मुख प्रकट हुए और घुटनोंके बल पृथ्वीपर पड़पर प्रणाम करते हुए बोले—'जगत्पते ! विष्णो ! आपको नमस्कार है । देवदेवेश्वर ! हरे ! स्वामिन् ! आपके चरणोंमें मेरा प्रणाम है',॥
पस्पर्श पाणिना कृष्णः स्वागतं तार्क्ष्यपुङ्गवम् ॥ ७ ॥
इत्युवाच तदा तार्क्ष्यं यास्ये कैलासपर्वतम् ।
शूलिनं द्रष्टुमिच्छामि शङ्करं शाश्वतं शिवम् ॥ ८ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने गरुड़-जातिके पक्षियोंमें प्रधान गरुड़का अपने हाथसे स्वागतपूर्वक स्पर्श किया और उनसे तत्काल कहा—'मैं कैलासपर्वतको चलूँगा। सनातन देवता कल्याणस्वरूप भगवान् शङ्करका दर्शन करना चाहता हूँ' ॥
बाढमित्यब्रवीत् तार्क्ष्य आरुहौषं जनार्दनः ।
तिष्ठध्वमिति होवाच यादवान् पार्श्ववर्तिनः ॥ ९ ॥
तब गरुड़ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की । गरुड़पर आरूढ़ होकर भगवान् जनार्दनने आस-पास खड़े हुए यादवोंसे कहा—'तुम सब सतत सावधान रहना' ॥ ९ ॥
ततो ययौ जगन्नाथो दिशं प्रागुत्तरां हरिः ।
रवेण महता तार्क्ष्यस्त्रैलोक्यं समकम्पयत् ॥ १० ॥
तदनन्तर जगदीश्वर श्रीहरि पूर्वोत्तर दिशाकी ओर चले। गरुड़ने अपने महानादसे तीनों लोकोंको कम्पित कर दिया ॥
सागरं क्षोभयामास पद्भ्यां पक्षी व्रजंस्तदा ।
पक्षेण पर्वतान् सर्वान् वहन् देवं जनार्दनम् ॥ ११ ॥
भगवान् श्रीकृष्णका भार वहन करके आगे बढ़ते हुए पक्षी गरुड़ने अपने पैरोंसे समुद्रको क्षुब्ध कर दिया और पंखोंकी हवासे समस्त पर्वतोंको कम्पित कर दिया ॥ ११ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वा आकाशेऽधिष्ठितास्तदा ।
तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षं वाग्भिरिष्टाभिरीश्वरम् ॥ १२ ॥
उस समय गन्धर्वोसहित देवता आकाशमें खड़े हो प्रिय वचनोंद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे थे ॥ १२ ॥
जय देव जगन्नाथ जय विष्णो जगत्पते ।
जयाजेय नमो देव भूतभावनभावन ॥ १३ ॥
(वे कहते थे—) 'जगन्नाथ ! देव ! आपकी जय हो ! जगत्पते ! विष्णो ! आपकी जय हो ! अजेय परमेश्वर ! आपकी जय हो ! देव ! भूतभावनभावन ! आपको नमस्कार है ॥
नमः परमसिंहाय दैत्यदानवनाशन ।
जयाजेय हरे देव योगिध्येय परागत ॥ १४ ॥
'उत्तम नृसिंहरूपधारी आपको नमस्कार है । आप दैत्यों और दानवोंका नाश करनेवाले हैं । अजेय हरे ! आपकी जय हो ! देव ! आप योगियोंके ध्येय और परमगति-स्वरूप हैं ॥ १४ ॥
नारायण नमो देव कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
आदिकर्त्तः पुराणात्मन् ब्रह्मयोने सनातन ॥ १५ ॥
'नारायण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हरे ! हरे ! आदिकर्त्ता ! पुराणात्मन् ! ब्रह्मयोने ! सनातन देव ! आपको नमस्कार है ॥
नमस्ते सकलेशाय निर्गुणाय गुणात्मने ।
भक्तिप्रियाय भक्ताय नमो दानवनाशन ॥ १६ ॥
'सर्वेश्वर ! आपको नमस्कार है । आप निर्गुण एवं गुणस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है । आप भक्तिप्रिय और भक्तस्वरूप हैं । दानवनाशन ! आपको नमस्कार है ॥ १६ ॥
अचिन्त्यमूर्तये तुभ्यं नमस्ते सकलेश्वर ।
इत्यादिभिस्तदा देवं वाग्भिरीशानमव्ययम् ॥ १७ ॥
तुष्टुवुर्देवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः ।
'सकलेश्वर ! आपका स्वरूप अचिन्त्य है, आपको नमस्कार है ।' इस प्रकारके वचनोंद्वारा देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों, सिद्धों और चारणोंने अविनाशी ईश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया ॥ १७ १/२ ॥
शृण्वन्नेवं जगन्नाथः स्तुतिवाक्यानि तानि च ॥ १८ ॥
ययौ सार्धं सुरगणैर्मुनिभिर्वेदपारगैः ।
यत्र पूर्वं स्वयं विष्णुस्तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ १९ ॥
लोकवृद्धिकरः श्रीमांल्लोकानां हितकाम्यया ।
जगदीश्वर श्रीकृष्ण उन स्तुतिवचनोंको सुनते हुए वेदपारंगत मुनियों और देवताओंके साथ उस स्थानपर गये,