विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 989, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५६४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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ऊचुः प्राञ्जलयो विष्णुं सुराः शक्रपुरोगमाः ॥४५'॥
महात्मा वामनकी यह बात सुनकर इन्द्र आदि समस्त देवता प्रसन्नचित्त हो उन कश्यपनन्दन भगवान् विष्णुसे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले—॥ ४४-४५ ॥
ब्रह्मणो वरदानेन हृतं नो निखिलं जगत् ।
तपसा महता चैव विक्रमेण दमेन च ॥४६॥
बलिना दैत्यमुख्येन सर्वज्ञेन महात्मना।
अवध्यः किल सोऽस्माकं सर्वेषां देवसत्तम ॥४७॥
भवान् प्रभवते तस्य नान्यः कश्चन सुव्रत ।
तत् प्रपद्यामहे सर्वे भवन्तं शरणार्थिनः ।
शरण्यं वरदं देवं सर्वदेवभयापहम् ॥४८॥
'देवप्रवर ! सर्वज्ञ महात्मा दैत्यराज बलिने महान् तप, अद्भुत विक्रम, इन्द्रिय-संयम तथा ब्रह्माजीके दिये हुए वरदानके प्रभावसे हमारा सारा जगत् हमसे छीन लिया है। कहा जाता है कि वे हम सब लोगोंके लिये अवध्य हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले प्रभो ! केवल आप ही उन्हें जीतने-में समर्थ हैं, दूसरा कोई नहीं; इसलिये हम सब लोग शरणार्थी होकर आप सर्वदेव-भयहारी शरणागतवत्सल वर-दायक देवताकी शरणमें आये हैं॥४६–४८॥
ऋषीणां च हितार्थाय लोकानां च सुरेश्वर ।
प्रियार्थे च तथादित्याः कश्यपस्य तथैव च ॥४९॥
कव्यं पितॄणामुचितं सुराणां हव्यमुत्तमम् ।
प्रवर्तेत महाबाहो यथापूर्वं सुरोत्तम ॥५०॥
आनृण्यार्थे सुरेशस्य वासवस्य महात्मनः ।
प्रत्यानय महेन्द्रस्य त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥५१॥
'महाबाहु सुरश्रेष्ठ सुरेश्वर ! आप ऋषियों और लोकों-के हितके लिये, माता अदिति और पिता कश्यपका प्रिय करनेके लिये, पितरोंके निमित्त उचित कव्य तथा देवताओंके लिये उत्तम हव्य जिस प्रकार पूर्ववत् प्राप्त हो सके, उसके लिये तथा अपने ज्येष्ठ भ्राता देवेश्वर महात्मा इन्द्रके ऋणसे उऋण होनेके लिये यह त्रिलोकीका अविनाशी राज्य बलिसे छीनकर आप पुनः महेन्द्रको लौटा दीजिये ४९–५१
ऋतुना वाजिमेधेन यजते स हि दानवः ।
यत् प्रत्यानयने युक्तं लोकानां तद् विचिन्त्य ॥५२॥
'इस समय दानवराज बलि अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, उनसे त्रिलोकीका राज्य लौटा लानेका जो उचित उपाय हो, उसका विचार कीजिये' ॥ ५२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तदा देवैर्विष्णुर्वामनरूपधृक् ।
प्रहर्षयन्नुवाचाथ सर्वान् देवानिदं वचः ॥५३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवताओंके ऐसा कहनेपर वामनरूपधारी भगवान् विष्णुने समस्त देवताओंका हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह बात कही ॥ ५३ ॥
विष्णुरुवाच
तस्य यज्ञसकाशं मां महर्षिर्वेदपारगः।
बृहस्पतिर्महातेजा नयत्वङ्गिरसः सुतः ॥५४॥
श्रीविष्णु बोले—देवताओ ! वेदोंके पारंगत विद्वान् अङ्गिराकुमार महातेजस्वी महर्षि बृहस्पति मुझे बलिके यज्ञके समीप ले चलें ॥ ५४ ॥
तस्याहं समुपाप्तो यज्ञवाटं सुरोत्तमाः ।
विचरिष्ये यथायुक्तं त्रैलोक्यहरणाय वै ॥५५॥
सुरश्रेष्ठगण ! उसके यज्ञमण्डपमें पहुँचकर मैं त्रिलोकीके राज्यका अपहरण करनेके लिये यथोचित उपायका विचार करूँगा ॥ ५५ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो बृहस्पतिर्धीमाननयद् वामनं प्रभुम् ।
यज्ञवाटं महातेजा दानवेन्द्रस्य धीमतः ॥५६॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! तब महातेजस्वी बुद्धिमान् बृहस्पतिने भगवान् वामनको उत्तम बुद्धिवाले दानवराज बलिकी यज्ञशालातक पहुँचा दिया ॥ ५६ ॥
मौञ्जी यज्ञोपवीती च छत्री दण्डी ध्वजी तथा ।
वामनो धूम्ररक्ताक्षो भगवान् बालरूपधृक् ॥५७॥
बालरूपधारी भगवान् वामनने मूंजकी मेखला, यज्ञोप-वीत, छत्र, दण्ड और ध्वज धारण कर रक्खे थे। उनके नेत्र धूम्र तथा रक्तवर्णके थे ॥ ५७ ॥
तं गत्वा यज्ञवाटं च ब्रह्मर्षिगणसंकुलम् ।
आत्मना चैव भगवान् वर्णयामास तं क्रतुम् ॥५८॥
ब्रह्मर्षियोंसे भरे हुए उस यज्ञमण्डपमें पहुँचकर भगवान्-ने स्वयं ही उस यज्ञका वर्णन किया ॥ ५८ ॥
लोकेश्वरेश्वरः श्रीमान् सुरैर्ब्रह्मपुरोगमैः।
अध्यास्यमानो भगवानवृद्धोऽप्यथ वृद्धवत् ॥५९॥
लोकेश्वरोंके भी ईश्वर श्रीमान् भगवान् वामन यद्यपि अवृद्ध (बालक) थे, तो भी ब्रह्मा आदि समस्त देवता वृद्धकी भाँति उनकी सेवामे उपस्थित थे ॥ ५९ ॥
दानवाधिपतेस्तस्य बलेर्वैरोचनस्य च ।
यज्ञवाटमचिन्त्यात्मा जगाम सुरसत्तमः ॥६०॥
जिनका स्वरूप अचिन्त्य है, वे सुरश्रेष्ठ भगवान् वामन दानवराज विरोचनकुमार बलिके यज्ञमण्डपमें गये ॥ ६० ॥
पालितोऽपि हि दैतेयैः सांग्रामिकपरिच्छदैः।
द्वारे दानवसम्बाधे सहसैव विवेश ह ॥६१॥
यद्यपि दैत्यराज बलि युद्धोपयोगी वेषभूषा धारण करने-वाले सेवकोंसे सुरक्षित थे (अतः उनके पास पहुँचना कठिन था), तथापि दानवोंसे भरे हुए उस मण्डपके द्वारके भीतर वे सहसा प्रविष्ट हो गये ॥ ६१ ॥