विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 988, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] सप्ततितमोऽध्यायः ९६३
तार्क्ष्यारिष्टनेमिश्च गरुडश्च महाबलः ॥ २८ ॥
अरुणश्चारुणिंश्चैव वैनतेया ह्युपस्थिताः ।
ताक्ष्यं, अरिष्टनेमि, महाबली गरुड़, अरुण और आरुणि—ये विनताके पुत्र भी वहाँ उपस्थित थे ॥ २८॥
पितामहश्च भगवान् स्वयमागम्य लोककृत् ।
प्राह चैवं गुरुः श्रीमान् सह सर्वैर्महात्मभिः ॥ २९ ॥
इन सब महात्माओंके साथ लोकस्रष्टा जगद्गुरु श्रीमान् भगवान् पितामह स्वयं आकर इस प्रकार बोले ॥ २९ ॥
ब्रह्मोवाच
यस्मात् प्रसूयते लोकः प्रविष्णुः सनातनः ।
तस्माल्लोकेश्वरः श्रीमान् विष्णुरेव भवत्वयम् ॥ ३० ॥
ब्रह्माजीने कहा—इनसे ही इस सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति होती है, इसलिये ये प्रभावशाली सनातन पुरुष श्रीमान् विष्णु ही लोकेश्वर हों (इन्हींको लोकेश्वरके पद-पर प्रतिष्ठित किया जाय) ॥ ३० ॥
एवमुक्त्वा तु भगवान् सार्धं देवर्षिभिः प्रभुः ।
नमस्कृत्या सुरेशाय जगाम त्रिदिवं पुनः ॥ ३१ ॥
ऐसा कहकर देवर्षियोंसहित भगवान् ब्रह्मा उन देवेश्वर-को नमस्कार करके पुनः अपने धामको चले गये ॥ ३१ ॥
स तु जातः सुरेशानः कश्यपस्यात्मजः प्रभुः ।
नवदुर्दिनमेघाभो रक्ताक्षो वामनाकृतिः ॥ ३२ ॥
वहाँ प्रकट हुए कश्यपकुमार देवेश्वर भगवान् विष्णुका स्वरूप बौना था। वे वर्षाकालके नूतन मेघकी भाँति श्याम कान्तिसे सुशोभित हो रहे थे। उनके नेत्र कुछ-कुछ लाल थे ॥ ३२ ॥
श्रीवत्सेनेोरसि श्रीमान् रोमजातेन राजता ।
उत्फुल्लोचनाः सर्वाः पश्यन्त्यप्सरसस्तदा ॥ ३३ ॥
उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्स नामवाली रोमराजि सुशोभित थी, जिससे वे भगवान् बड़े शोभासम्पन्न दिखायी देते थे। उस समय सारी अप्सराएँ प्रफुल्ल नेत्रोंसे उनकी छवि निहार रही थीं ॥ ३३ ॥
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद् युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद् भासा तस्य महात्मनः ॥ ३४ ॥
यदि आकाशमें एक सहस्र सूर्योंकी प्रभा एक साथ ही उदित हो जाती तो वही उन महात्मा श्रीहरिकी प्रभाके समान हो सकती थी ॥ ३४ ॥
सुरर्षिप्रतिमः श्रीमान् भूर्भुवर्भूतभावनः ।
शुचिरोमा महास्कन्धः सर्वतेजोमयः प्रभुः ॥ ३५ ॥
वे देवर्षियोंके तुल्य तेजस्वी श्रीमान् भगवान् वामन भूर्लोक और भुवर्लोक आदिके समस्त प्राणियोंके उत्पादक और संरक्षक थे। उनकी रोमावली पवित्र और कंधे बड़े-बड़े थे। वे प्रभु सम्पूर्ण तेजके पुञ्ज थे ॥ ३५ ॥
या गतिः पुण्यकीर्तीनामगतिः पापकर्मणाम् ।
योगसिद्धा महात्मानो यं विदुर्यौगमुत्तमम् ॥ ३६ ॥
यस्याष्टगुणमैश्वर्यं यमाहुर्देवसत्तमम् ।
यं प्राप्य शाश्वतं विप्रा नियता मोक्षकाङ्क्षिणः ॥ ३७ ॥
जन्मनो मरणाच्चैव मुच्यन्ते भवभीरवः ।
यदेतत्तप इत्याहुः सर्वाश्रमनिवासिनः ॥ ३८ ॥
सेवन्ते यं यताहारा दुष्करं व्रतमास्थिताः ।
योऽनन्त इति नागेषु सेव्यते सर्वभोगिभिः ॥ ३९ ॥
सहस्रमूर्धा रक्ताक्षः शेषादिभिरनुत्तमैः ।
यो यज्ञ इति विप्रेन्द्रैरिज्यते स्वर्गलिप्सुभिः ॥ ४० ॥
नानास्थानगतः श्रीमानेकः कविरनुत्तमः ।
यं देवा यान्ति वेत्तारं यज्ञभागप्रदायिनम् ॥ ४१ ॥
वृषार्चिश्चन्द्रसूर्याक्षं देवमाकाशविग्रहम् ।
स प्राह त्रिदशान् सर्वान् वाचा वै परया विभुः ॥ ४२ ॥
जो पुण्यकीर्ति पुरुषोंकी गति हैं, पापकर्मियोंकी जिनके पास पहुँच नहीं होती, योगसिद्ध महात्मा पुरुष जिन्हें उत्तम योगके रूपमें जानते हैं, जिनमें अणिमा आदि अष्टगुण ऐश्वर्य सदा विराजमान हैं, जिन्हें देवशिरोमणि कहा गया है, जिन सनातन देवको पाकर नियमपरायण, मोक्षाभिलाषी तथा भवबन्धनसे भयभीत रहनेवाले ब्राह्मण जन्म-मरणके चक्रसे छूट जाते हैं, जिन्हें सभी आश्रमोंके निवासी तप कहते हैं, आहारका संयम करके दुष्कर व्रतका आश्रय लेनेवाले साधक जिनकी उपासना करते हैं, शेष आदि सर्वोत्तम एवं समस्त सर्पगण नागोंमें अनन्त नामसे जिनकी आराधना करते हैं, जिनके सहस्रों मस्तक और लाल-लाल नेत्र हैं, स्वर्गकी अभिलाषा रखनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञ-पुरुषरूपसे जिनका यजन करते हैं, जो श्रीसम्पन्न, अद्वितीय तथा सर्वोत्तम ज्ञानी हैं और अकेले ही नाना स्थानोंमें व्याप्त हैं, जिन्हें ज्ञानी, यज्ञभागप्रदाता, धर्ममय तेजसे युक्त, चन्द्रमा और सूर्यरूपी नेत्रोंसे सुशोभित तथा अनन्त आकाश-मय शरीरसे सम्पन्न मानकर देवता उनकी शरणमें जाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापी परमात्माने अपनी उत्तम वाणीद्वारा समस्त देवताओंसे कहा—॥ ३६–४२ ॥
जानन्नपि महातेजा गतो योगेन बालताम् ।
किं करोमि सुरश्रेष्ठाः कं वरं च ददामि वः ॥ ४३ ॥
यत्काङ्क्षितं वै सर्वेषां तद्वै ब्रूत मुदा युताः ।
योगशक्तिसे बालभावको प्राप्त हुए उन महातेजस्वी श्रीहरिने जानते हुए भी पूछा—‘सुरश्रेष्ठगण ! बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ ? तुम्हें क्या वर दूँ। तुम सब लोगोंकी जो इच्छा हो, उसे प्रसन्नतापूर्वक बताओ’ ॥ ४३½ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वामनस्य महात्मनः ॥ ४४ ॥
सर्वे ते हृष्टमनसो देवाः कश्यपनन्दनम् ।