विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 987, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९६२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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पर्जन्य, हिरण्योमा, वेदशिरा, सप्तनेत्र, विश्व, अतिविश्व, च्यवन, सुधामा, विरजा, अतिनामा और सहिष्णु—इन सबने वहाँ आकर भगवान्को नमस्कार किया ॥ ६-७१/२ ॥
उद्द्योतमाना वपुषा सर्वाभरणभूषिताः ॥ ८ ॥
उपनृत्यन्ति देवेशं विष्णुमप्सरसां वराः।
अपने शरीरसे प्रकाशित होनेवाली समस्त आभूषणोंसे विभूषित श्रेष्ठ अप्सराएँ देवेश्वर भगवान् विष्णुके समीप आकर नृत्य करने लगीं ॥ ८१/२ ॥
ततो गन्धर्वतूर्येषु प्रणदत्सु विहायसि ॥ ९ ॥
बहुभिः सह गन्धर्वैः प्रागायत च तुम्बुरुः।
तदनन्तर आकाशमें गन्धर्वोंके बाजे बजने लगे। उस समय बहुसंख्यक गन्धर्वोंके साथ तुम्बुरुने गीत गाया ॥ ९१/२ ॥
महाश्रुतिश्चित्रशिरा ऊर्णायुरनघस्तथा ॥ १० ॥
गोमायुः सूर्यवर्चाश्च सोमवर्चाश्च सप्तमः।
युगपस्तृणपः कार्णिर्नन्दिश्च त्रिशिरास्तथा ॥ ११ ॥
त्रयोदशः शालिशिराः पर्जन्यश्च चतुर्दशः।
कलिः पञ्चदशश्चात्र तत्रैव तु महीपते ॥ १२ ॥
पृथ्वीनाथ ! इनके सिवा महाश्रुति, चित्रशिरा, ऊर्णायु, अनघ, गोमायु, सूर्यवर्चा, सातवें सोमवर्चा, युगप, तृणप, कार्णि, नन्दि, त्रिशिरा, तेरहवें शालिशिरा, चौदहवें पर्जन्य और पंद्रहवें कलि—ये सब वहीं गीत गाने लगे ॥ १०-१२ ॥
दश पञ्च त्विमे प्रोक्ता नारदश्चैव षोडशः।
हाहा हूहूश्च गन्धर्वौ हंसश्चैव महाद्युतिः ॥ १३ ॥
ये पंद्रह गन्धर्व बताये गये हैं। इनके साथ सोलहवें नारद थे तथा हाहा, हूहू नामक दो गन्धर्व और महातेजस्वी हंस भी थे ॥ १३ ॥
सर्वे ते देवगन्धर्वा उपगायन्ति केशवम्।
तथैवाप्सरसो हृष्टाः सर्वालंकारभूषिताः ॥ १४ ॥
वपुष्मन्तः सुजघनाः सर्वाङ्गशुभदर्शनाः।
ननृतुश्च महाभागा जगुश्चायतलोचनाः ॥ १५ ॥
सुमध्याश्चारुमध्याश्च प्रियमुख्यो वराननाः।
वे समस्त देवगन्धर्व भगवान् केशवके समीप गान करने लगे। उसी प्रकार हर्षमें भरी हुई महाभागा अप्सराएँ सब प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित हो वहाँ नृत्य और गान करने लगीं। उनके शरीर सुन्दर थे। जघनप्रदेश मनोहर जान पड़ते थे। वे सब-की-सब सर्वाङ्गसुन्दरी दिखायी देती थीं। उनके नेत्र बड़े-बड़े थे। शरीरका मध्यभाग सुन्दर एवं मनोहर था। उन सुमुखी अप्सराओंके मुख सबको प्रिय लगते थे ॥ १४-१५१/२ ॥
अनूक्ताथ तथा जामी मिश्रकेशी त्वलम्बुषा ॥ १६ ॥
मरीचिः शुचिकाचैव विद्युत्पूर्णा तिलोत्तमा।
अद्रिका लक्षणा चैव रम्भा तद्वन्मनोरमा ॥ १७ ॥
असिता च सुबाहुश्च सुप्रिया सुभगा तथा।
उर्वशी चित्रलेखा च सुग्रीवा च सुलोचना ॥ १८ ॥
पुण्डरीका सुगन्धा च सुरथा च प्रमाथिनी।
नन्दा शारद्वती चैव तथान्यास्तत्र संघशः ॥ १९ ॥
मेनका सहजन्या च पर्णिका पुञ्जिकस्थला।
एताश्चाप्सरसोऽन्याश्च प्रनृत्यन्ति सहस्रशः ॥ २० ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—अनूक्ता, जामी, मिश्रकेशी, अलम्बुषा, मरीचि, शुचिका, विद्युत्पूर्णा, तिलोत्तमा, अद्रिका, लक्षणा, रम्भा, मनोरमा, असिता, सुबाहु, सुप्रिया, सुभगा, उर्वशी, चित्रलेखा, सुग्रीवा, सुलोचना, पुण्डरीका, सुगन्धा, सुरथा, प्रमाथिनी, नन्दा, शारद्वती, मेनका, सहजन्या, पर्णिका, पुञ्जिकस्थला—ये तथा दूसरी झुंड-की-झुंड अप्सराएँ सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ आकर नृत्य करने लगीं ॥ १६—२० ॥
धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोऽशो भगस्तथा।
इन्द्रो विवस्वान् पूषा च त्वष्टा च सविता तथा ॥ २१ ॥
कथितो विष्णुरित्येवं काश्यपेयो गणस्तथा।
इत्येते द्वादशादित्या ज्वलन्तः सूर्यवर्चसः ॥ २२ ॥
चक्रुस्तस्य सुरेशस्य नमस्कारं महात्मनः।
धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, त्वष्टा, सविता तथा विष्णु—यह कश्यप-पुत्रोंका समुदाय है। ये सूर्यतुल्य तेजस्वी और अग्निके समान प्रकाशमान बारह आदित्य कहे गये हैं। इन सबने आकर उन देवेश्वर महात्मा वामनको नमस्कार किया ॥ २१-२२१/२ ॥
मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महाबलः ॥ २३ ॥
अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी चापराजितः।
दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च विशाम्पते ॥ २४ ॥
स्थाणुर्भर्गश्च भगवान् रुद्रास्तत्रावतस्थिरे।
प्रजानाथ ! मृगव्याध, सर्प, महाबली निर्ऋति, अजैकपात्, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, अपराजित, दहन, ईश्वर, कपाली तथा भगवान् स्थाणु या भर्ग—ये ग्यारह रुद्र भी वहाँ उपस्थित थे ॥ २३-२४१/२ ॥
अश्विनौ वसवश्चाष्टौ मरुतश्च महाबलाः ॥ २५ ॥
विश्वेदेवाश्च साध्याश्च तस्य प्राञ्जलयः स्थिताः।
दोनों अश्विनीकुमार, आठ वसु, महाबली मरुद्गण, विश्वेदेव तथा साध्य देवता उन भगवान्के सामने हाथ जोड़कर खड़े थे ॥ २५१/२ ॥
शेषानुजा महाभागा वासुकिप्रमुखास्तथा ॥ २६ ॥
कच्छपश्वापहर्ता च तक्षकश्च महाबलः।
अधृष्टास्तेजसा युक्ता महाक्रोधा महाबलाः ॥ २७ ॥
एते नागा महात्मानस्तस्मै प्राञ्जलयः स्थिताः।
शेषके छोटे भाई महाभाग वासुकि आदि, कच्छप, अपहर्ता और महाबली तक्षक—ये महाकाय नाग किसीसे पराजित होनेवाले नहीं थे। ये तेजस्वी, महाक्रोधी और महाबलवान् थे। ये सब-के-सब वहाँ भगवान्के लिये हाथ जोड़े हुए खड़े थे ॥ २६-२७१/२ ॥