भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 986, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 986

भविष्यपर्व ] सप्ततितमोऽध्यायः [ ९६१


देवेश्वरको नमस्कार करके पूर्वदिशामें स्थित कश्यपजीके दिव्य एवं विशाल आश्रमकी ओर चल दिये ॥ १६-१७॥

गत्वा ते आश्रमं तत्र ब्रह्मर्षिगणसेवितम्।
चेरुः स्वाध्यायनियता अदित्या गर्भमीप्सवः ॥ १८ ॥

ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित उस आश्रममें पहुँचकर वे देवता वहाँ नियमपूर्वक स्वाध्यायमें तत्पर रहकर अदितिके गर्भकी प्रतीक्षा करते हुए विचरने लगे ॥ १८ ॥

अदितिर्देवमाता च गर्भं दध्रेऽतितेजसम्।
भूतात्मानं महात्मानं दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥ १९ ॥

देवमाता अदितिने अत्यन्त तेजस्वी गर्भ धारण किया, जिसमें समस्त प्राणियोंके आत्मा परमात्मा श्रीहरिका निवास था। एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक वे उस गर्भको धारण किये रहीं ॥ १९ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रसूता गर्भमुत्तमम्।
सुराणां शरणं देवमसुराणां विनाशनम् ॥ २० ॥

सहस्र वर्ष पूर्ण होनेपर देवी अदितिने देवताओंके शरणदाता और असुरोंके विनाशक नारायणदेवको अपने उत्तम गर्भ (शिशु) के रूपमें जन्म दिया ॥ २० ॥

गर्भस्थेन तु देवेन परित्राताः सुरास्तदा।
आददानेन तेजांसि त्रैलोक्यस्य महात्मना ॥ २१ ॥

गर्भमें रहते समय ही तीनों लोकोंके तेजको छीन लेनेवाले महात्मा नारायणदेवने तत्काल सब देवताओंकी रक्षा आरम्भ कर दी ॥ २१ ॥

तस्मिञ्जाते तु देवेशे त्रैलोक्यस्य सुखावहे।
भयदे दैत्यसंधानां सुराणां नन्दिवर्धने ॥ २२ ॥

त्रिभुवनको सुख देनेवाले, दैत्यसमूहोंको भयभीत करनेवाले और देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाले देवेश्वर श्रीहरिके अदितिके गर्भसे प्रकट होते ही सर्वत्र आनन्द छा गया ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥


सप्ततितमोऽध्यायः

ऋषियों और विविध देवताओंका वामनजीको नमस्कार करना, गन्धर्वों तथा अप्सराओंका नाचना-गाना, भगवान्‌के वैशिष्ट्यका वर्णन, भगवान्‌का देवताओंसे उनका मनोरथ पूछकर बृहस्पतिजीके साथ बलिके यज्ञमें जाना, वहाँ अपनी वाक्पटुतासे सत्रको चकित कर देना और राजा बलिका उनसे परिचय तथा आगमनका प्रयोजन पूछना

वैशम्पायन उवाच
प्रजानां पतयः सप्त सप्त चैव महर्षयः।
तस्य देवस्य जातस्य नमस्कारं प्रचक्रिरे ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वहाँ प्रकट हुए भगवान् विष्णुको मरीचि आदि सात प्रजापतियों तथा सात महर्षियोंने नमस्कार किया ॥ १ ॥

भरद्वाजः कश्यपो गौतमश्च
विश्वामित्रो जमदग्निर्वसिष्ठः।
यश्चोदितो भास्करे सम्प्रणष्टे
सोऽप्यत्रात्रिर्भगवान्याजगाम ॥ २ ॥

भरद्वाज, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ तथा सूर्यदेवके नष्ट (अपने स्थानसे भ्रष्ट) होनेपर जो उदित हुए थे, वे भगवान् अत्रि भी श्रीहरिको प्रणाम करनेके लिये वहाँ पधारे थे ॥ २ ॥

मरीचिरङ्गिराश्चैव पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।
दक्षप्रजापतिश्चैव नमस्कारं प्रचक्रिरे ॥ ३ ॥

मरीचि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और दक्ष प्रजापति—इन प्रजापतियोंने भी वहाँ आकर भगवान्‌को प्रणाम किया ॥ ३ ॥

और्वो वसिष्ठपुत्रश्च स्तम्बः काश्यप एव च।
कपीवानकपीवांश्च दत्तो निश्च्यवनस्तथा ॥ ४ ॥
वसिष्ठपुत्राः सप्तासन्वासिष्ठा इति विश्रुताः।
हिरण्यगर्भस्य सुताः पूर्वजाताः सुतेजसः ॥ ५ ॥

और्व, वसिष्ठपुत्र शक्ति, स्तम्भ, काश्यप, कपीवान्, अकपीवान्, दत्तात्रेय, निश्च्यवन तथा वासिष्ठ नामसे विख्यात वसिष्ठके वे सात पुत्र, जो पहले हिरण्यगर्भके परमतेजस्वी पुत्रोंके रूपमें उत्पन्न हुए थे (भगवान्‌को नमस्कार करनेके लिये वहाँ पधारे थे) ॥ ४-५ ॥

गार्ग्यः पृथुस्तथैवान्यो जन्यो वामन एव च।
देववाहुर्युधुश्च पर्जन्यश्चैव सोमजः ॥ ६ ॥
हिरण्यरोमा वेदशिराः सप्तनेत्रस्तथैव च।
विश्वोऽतिविश्वश्च्यवनः सुधामा विरजास्तथा ॥ ७ ॥
अतिनामा सहिष्णुश्च नमस्कारमकुर्वत।

गार्ग्य, पृथु, जन्य, वामन, देवबाहु, युधुम्न, सोमवंशी

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित) · पृष्ठ 986, कुल 1169 में से · BharatKosha