भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 985
९६०श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

था, दर्शन नहीं हो रहा था। करने, न करने और अन्यथा करनेमें भी समर्थ वे श्रीमान् भगवान् नारायण देव इस प्रकार कहने लगे ॥ १–३ ॥

विष्णुरुवाच

प्रीतोऽस्मि वः सुरश्रेष्ठाः सर्वे मत्तो विनिश्चयम्।
वरं वृणुत भद्रं वो वरदोऽस्मि सुरोत्तमाः ॥ ४ ॥

भगवान् विष्णु बोले—सुरश्रेष्ठगण ! तुम्हारा भला हो ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ; तुम सब लोग मुझसे सुनिश्चित वर माँगो। श्रेष्ठ देवताओ! मैं तुम्हें वर देनेके लिये उद्यत हूँ ॥ ४ ॥

कश्यप उवाच

यदैव भगवान् प्रीतः सर्वेषाममरोत्तमः।
तदैव कृतकृत्याः स्म त्वं हि नः परमा गतिः ॥ ५ ॥

कश्यपने कहा—प्रभो ! आप देवताओंमें उत्तम हैं; आप जभी हम सबपर प्रसन्न हुए तभी हम कृतकृत्य हो गये, क्योंकि आप ही हमारी परम गति हैं ॥ ५ ॥

यदि प्रसन्नो भगवान् दातव्यो वा वरो यदि।
वासवस्यानुजो भ्राता ज्ञातीनां नन्दिवर्धनः।
अदित्यां वामनः श्रीमान् भगवानस्तु वै सुतः ॥ ६ ॥

यदि भगवान् हमपर प्रसन्न हैं अथवा यदि हमें वर देना उचित समझते हैं तो अदितिके गर्भसे पुत्ररूपमें उत्पन्न हो श्रीमान् भगवान् वामनके नामसे विख्यात हों और इन्द्रके छोटे भाई होकर बन्धु-बान्धवोंका आनन्दवर्धन करें ॥ ६॥

वैशम्पायन उवाच

अदितिर्देवमाता च एतमेवार्थमुत्तमम्।
पुत्रार्थे वरदं प्राह भगवन्तं वरार्थिनी ॥ ७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वरकी इच्छा रखनेवाली देवमाता अदिति भी वरदायक भगवान्‌से पुत्रके लिये यही उत्तम मनोरथ प्रकट करती हुई बोली ॥ ७ ॥

अदितिरुवाच

याचे त्वां पुत्रकामा वै भवान् पुत्रो भवत्विति।
निःश्रेयसाय सर्वेषां देवानां हि महात्मनाम् ॥ ८ ॥

अदितिने कहा—भगवन् ! मेरे मनमें पुत्रकी कामना है। मैं आपसे यही प्रार्थना करती हूँ कि आप समस्त महात्मा देवताओंके कल्याणके लिये मेरे पुत्र हो जायें ॥ ८ ॥

देवा ऊचुः

भ्राता भर्ता च दाता च शरणं च भवस्व नः।
अदित्याः पुत्रतां याते त्वयि देवाः सवासवाः।
देवशब्दं वहिष्यन्ति कश्यपस्यात्मजो भव ॥ ९ ॥

देवता बोले—भगवन् ! आप हमारे भ्राता, भर्ता (भरण-पोषण करनेवाले), दाता और आश्रय हों। आप जब अदितिके पुत्र होंगे, तभी इन्द्रसहित समस्त देवता देवशब्द (देवतापदवी) का भार वहन कर सकेंगे, अतः आप कश्यपके पुत्र हो जाइये ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्तानब्रवीद् विष्णुर्देवान् कश्यपमेव च।
एवं भवतु भद्रं वो यथेष्टं काममाप्नुत ॥ १० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब भगवान् विष्णुने देवताओं तथा कश्यपजीसे कहा—'ऐसा ही होगा, तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त करो ॥ १० ॥

सर्वेषामेव युष्माकं ये भविष्यन्ति शत्रवः।
मुहूर्तमपि ते सर्वे न स्थास्यन्ति ममाग्रतः ॥ ११ ॥

'तुम सब लोगोंके जो शत्रु होंगे, वे सब-के-सब दो घड़ी भी मेरे सामने नहीं ठहर सकेंगे ॥ ११ ॥

हत्वासुरगणान् सर्वान् ये चान्ये देवशत्रवः।
करिष्ये देवताः सर्वा यज्ञभागाग्रभोजिनः ॥ १२ ॥

'समस्त असुरों तथा अन्यान्य देव-द्रोहियोंका वध करके मैं समस्त देवताओंको यज्ञ-भागका अग्रभोजी बना दूँगा ॥

हव्यांदांश्च सुरान् सर्वान् कव्यादांश्च पितॄनपि।
करिष्ये विबुधश्रेष्ठाः पारमेष्ठ्येन कर्मणा ॥ १३ ॥

'श्रेष्ठ देवताओ ! मैं अपने परमेश्वरोचित कर्मके द्वारा सब देवताओंको हविष्यभोक्ता और पितरोंको भी कव्यभोजी (श्राद्धभोक्ता) बना दूँगा ॥ १३ ॥

यथागतेन मार्गेण निवर्तध्वं सुरोत्तमाः।
देवमातुस्तथादित्याः कश्यपस्यामितात्मनः।
यथामनीषितं कर्ता गच्छध्वं स्वं स्वमालयम् ॥ १४ ॥

'सुरश्रेष्ठगण ! तुम जिस मार्गसे आये हो, उसीसे लौट जाओ ! मैं देवमाता अदिति तथा महात्मा कश्यपजीकी इच्छाके अनुसार कार्य करूँगा ! तुम सब लोग अपने-अपने स्थानको जाओ' ॥ १४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्ते तु वचने विष्णुना प्रभविष्णुना।
देवाः प्रहृष्टमनसः पूजयन्ति स्म सर्वशः ॥ १५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! प्रभावशाली विष्णुके ऐसी बात कहनेपर देवताओंका मन हर्षसे खिल उठा। वे सब प्रकारसे भगवान्‌की पूजा—भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ १५ ॥

विश्वेदेवा महात्मानः कश्यपोऽदितिरेव च।
साध्या मरुद्गणाश्चैव शक्रश्चैव महाबलः ॥ १६ ॥
नमस्कृत्य सुरेशाय तस्मै देवाय रंहसे।
प्रयाताः प्राग्दिशं दिव्यं विपुलं कश्यपाश्रमम् ॥ १७ ॥

महात्मा विश्वेदेवगण, कश्यप, अदिति, साध्य, मरुद्गण तथा महाबली इन्द्र—ये सब उन वेगशाली दिव्यस्वरूप