विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 984, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | एकोनसप्ततितमोऽध्यायः | ९५९ |
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स्रुक् का संग्रह किया, वह आपका ही स्वरूप है। स्रुग्भाण्ड (स्रुक् आदि यज्ञीयसामग्री) भी आप ही हैं। आप ही गण (ऋत्विजोंका समुदाय) हैं। आपका ही यज्ञोंद्वारा यजन किया गया है। आप ही इज्य (यज्ञोंद्वारा पूजनीय) हैं। ईड्य (स्तवनीय!) हैं। आप ही त्वष्टा (विश्वकर्मा) हैं। आप ही प्रज्वलित अग्नि हैं। आप ही जङ्गम प्राणियोंकी गति हैं तथा आप ही मोक्ष हैं, योग हैं, गुह्य हैं, सिद्ध हैं, धन्य हैं, धाता हैं, परम (उत्कृष्ट) हैं, यज्ञ हैं, सोम हैं, यूप हैं, दक्षिणा हैं, दीक्षा हैं और सब कुछ हैं ॥ ५ ॥
स्थविष्ठ स्थविर विश्व तुराषाड् हिरण्यगर्भ हिरण्यनाभ हिरण्यनारायण नारायणान्तर नृणामयन आदित्यवर्ण आदित्यतेजः महापुरुष सुरोत्तम आदिदेव पद्मनाभ पद्मशय पद्माक्ष पद्मगर्भ हिरण्याग्रकेश शुक्ल विश्वदेव विश्वतोमुख विश्वाक्ष विश्वसम्भव विश्वभुक्त्वमेव ॥ ६ ॥
आप अत्यन्त स्थूल और वृद्ध हैं, जाग्रत्-अवस्थाके अभिमानी विश्वसंज्ञक पुरुष हैं, इन्द्र हैं, हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) हैं। आपकी नाभि में हिरण्य है—इसी लिये आप हिरण्यनारायण कहलाते हैं और आप अन्तर्यामी नारायण हैं, नरों (मनुष्यों) के अयन (आश्रय) हैं। आपका वर्ण आदित्यके समान कान्तिमान् है। आप सूर्यके समान तेजस्वी हैं, आप ही महापुरुष, सुरश्रेष्ठ, आदिदेव, पद्मनाभ (नाभिसे कमल उत्पन्न करनेवाले), कमलपर शयन करनेवाले और कमललोचन हैं। पद्मको गर्भसे प्रकट करनेके कारण पद्मगर्भ कहलाते हैं। आपके सुन्दर केश सुनहरे हैं। आपकी अङ्गकान्ति भास्वरशुक्ल है। आप सम्पूर्ण देवस्वरूप हैं। आपके सब ओर मुख और सब ओर नेत्र हैं। आप ही इस विश्वके उत्पादक तथा जगत्के भोक्ता (रक्षक और संहारक) हैं ॥ ६ ॥
भूरिविक्रमं चक्रक्रम त्रिभुवनं सुविक्रम खविक्रम खर्विक्रम बभ्रुः सुविभुः प्रभाकरः शम्भुः स्वयम्भूश्च भूतादिर्भूतात्मन् महाभूत विश्वभुक् त्वमेव विश्वगोप्तासि विश्वम्भर पवित्रमसि हविर्विशारद हविःकर्मा अमृतेन्धन सुरासुरगुरो महादेव नरदेव ऊर्ध्वकर्मन् पूतात्मन् अमृतेश दिवःस्पृग् विश्वस्य पते घृताच्यसि अनन्तकर्मन् द्रुहिणवंश स्ववंश विश्वपास्त्वं त्वमेव विश्वं बिभर्षि वरार्थिनो नस्त्रायस्वेति ॥ ७ ॥
आपका पराक्रम बहुत है। आप चक्रका संचालन करनेवाले हैं। तीनों लोक आपके ही स्वरूप हैं। आपका विक्रम उत्तम है। विक्रम आपका स्वरूप है। आप स्वर्लोकको लाँघ जानेवाले हैं। आप बभ्रु (अग्नि एवं विष्णुरूप), सुविभु (व्यापक), प्रभाकर (सूर्यरूप), शम्भु (कल्याणमय शिव), स्वयम्भू (ब्रह्मा), भूतादि (महत्तत्त्व अथवा सम्पूर्ण भूतोंके आदि कारण), भूतात्मा (समस्त प्राणियोंके आत्मा), महाभूत (परमात्मा अथवा पञ्च महाभूतस्वरूप), विश्वभोक्ता और विश्वपालक हैं। विश्वम्भर ! आप पवित्र हैं। सात हविर्यज्ञ-संस्थाओंके विशेषज्ञ हैं। हविष्यके होममें तत्पर रहनेवाले हैं। अमृत (घी) रूपी ईंधनसे प्रज्वलित होनेवाले अग्नि हैं। सुरासुरगुरो ! महादेव ! नरदेव ! आपके कर्म ऊर्ध्वगति प्रदान करनेवाले हैं। पूतात्मन् ! आप अमृतपदके स्वामी हैं। द्युलोकका स्पर्श करनेवाले हैं। विश्वपते ! आप घृताची (घीकी आहुति डालनेवाली स्रुवा) हैं। आपके कर्म अनन्त हैं। ब्रह्मा आपके वंशज हैं। आप स्ववंश (स्वयम्भू) हैं। आप ही विश्वके पालक हैं तथा आप ही विश्वका धारण-पोषण करते हैं। हम वरकी अभिलाषा रखने वाले सेवकोंकी आप रक्षा करें ॥ ७ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे महापुरुषस्तवे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें महापुरुषकी स्तुतिविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
कश्यप, अदिति और देवताओंको भगवान् विष्णुका वरदान देना और अदितिके गर्भसे प्रकट होना
वैशम्पायन उवाच
नारायणस्तु भगवान्छ्रुत्वैतत् परमं स्तवम् ।
ब्रह्मज्ञेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम् ॥ १ ॥
स्निग्धगम्भीरनिर्घोषजीमूतस्वननिःस्वनम् ।
मनसा प्रीतियुक्तेन विबुधानां महात्मनाम् ॥ २ ॥
उवाच वचनं सम्यग् हृष्टपुष्टपदाक्षरम् ।
आकाशाच्छुश्रुवे शब्दो दर्शनं नोपलभ्यते ।
श्रीमान् प्रीतमना देवः प्रोवाच प्रभुरीश्वरः ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! ब्रह्मवेत्ता विप्रवर कश्यपद्वारा किये गये इस परमस्तवको सुनकर भगवान् नारायणके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे उन महात्मा देवताओंसे मेघगर्जनाके समान स्निग्ध-गम्भीर घोष करते हुए हृष्ट-पुष्ट पद और अक्षरवाली उत्तम वाणीमें बोले; उस समय आकाशसे केवल उनका शब्दमात्र सुनायी देता