विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 983, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९५८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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...भुज सहस्रभव सहस्रशस्त्वामाहुर्वेदाः ॥ १ ॥
सहस्रलोचन, सहस्रभुज तथा सहस्रों रूपोंमें प्रकट होनेवाले हैं, वेद आपका सहस्रों प्रकारसे वर्णन करते हैं ॥ १ ॥
कश्यपने कहा— देवदेवेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप एक सींग धारण करनेवाले मत्स्य एवं वराहरूप हैं। धर्ममयी किरणोंसे प्रकाशित होते हैं। धर्मके सागर हैं। जलका वर्षण और शोषण करनेवाले सूर्य हैं। देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। देवताओंके स्रष्टा हैं। आपका किसी अन्यसे निर्माण नहीं हुआ है—आप नित्यसिद्ध हैं। कल्याणमय कपिलस्वरूप हैं। युद्धके लिये की हुई तैयारी मात्रसे ही आप दैत्यसेनाको तितर-बितर कर डालते हैं। आप ध्रुव, धर्म, धर्मराज एवं वैकुण्ठधामके अधिपति हैं। गार्हपत्यादि त्रिविध अग्निके आवर्तक, आदि, मध्य और अन्तसे रहित, धनंजय (अग्नि), पवित्र कीर्तिवाले, अग्निह (कार्तिकेयस्वरूप), वृष्णिज (श्रीकृष्ण), अजन्मा, अजय (अपराजित), अमृतेशय (जलमें शयन करनेवाले) और सनातन पुरुष हैं। आप ही विधाता, त्रिकाम (तीनों लोकोंकी कामनाके विषय अथवा तीनों वेदोंकी श्रुतियोंके लिये कमनीय), त्रिधाम (त्रिलोकी-के आश्रय), त्रिककुद् (धर्म, ज्ञान और वैराग्यरूप तीन कंधोंवाले), ककुद्मी (मोटे कंधेवाले), दुन्दुभे (विजय-घोष करनेवाले वाद्यरूप), महानाभ (बड़ी नाभिवाले), लोकनाभ (अपने नाभिकमलसे सम्पूर्ण लोकको प्रकट करने-वाले), पद्मनाभ (अपनी नाभिसे कमलको प्रकट करनेवाले), विरिञ्चि (ब्रह्मस्वरूप), वरिष्ठ (सर्वश्रेष्ठ), बहुरूपधारी, विरूप (विविध रूप धारण करनेवाले), विश्वरूप, अक्षय, अक्षर (अविनाशी), सत्याक्षर (सत्य एवं अविनाशी अथवा सत्य अक्षरवाले वेदरूप), हंसाक्षर (अजपा मन्त्ररूप), हव्यभोक्ता (अग्नि), खण्डपरशु (शिव), शुक्र (बल-वीर्यरूप), मुञ्जकेश (मूँजके समान केशवाले), हंस और महाहंस हैं। महान् अक्षर प्रणव, इन्द्रियोंके प्रेरक, सूक्ष्म, परमसूक्ष्म, इन्द्र, विश्वरूप, देवताओंके अग्रज, नीलवर्ण, तमोगुण और रजोगुणसे रहित, तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुणके आश्रय, सम्पूर्ण लोकोंमें प्रतिष्ठित, शिपिविष्ट (सूर्य-किरणोंमें स्थित रहनेवाले), उत्तम तपस्यावाले, श्रेष्ठ तपोरूप, अग्र (सबके आदि), अग्रज (सबसे प्रथम प्रकट), धर्मनाभ (धर्मस्वरूप नाभिवाले), गभस्तिनाभ (किरणमयी नाभिवाले), धर्मनेमि (धर्मचक्रके प्रवर्तक), सत्यधाम (वैकुण्ठस्वरूप), सत्याक्षर (वेदरूप), गभस्तिनेमि (रश्मिमण्डलसे प्रकाशित), पापरहित तथा चन्द्र (समष्टि मन) रूपी रथपर आरूढ परमेश्वर ! आप ही समुद्रवासा (समुद्ररूपी वस्त्र धारण करनेवाले) हैं। आप ही अजैकपात् (ग्यारह रुद्रोंमेंसे एक अथवा पूर्वभाद्रपदानक्षत्र), सहस्रों मस्तकवाले, सहस्रसंख्यक, महान् मस्तक धारण करनेवाले, सहस्रनेत्र, सहस्रचरण, अधोमुख, महामुख, महापुरुष, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रमुख,
विश्वेदेव विश्वसम्भव सर्वेषामेव देवानां
सौभग आदौ गतिः विश्वं त्वामाप्यायनः
विश्वं त्वामाहुः पुष्पहासः परमवरदस्त्वमेव
वौषट् ओंकार वषट्कार त्वामेकमाहुरग्र्यं मखभागप्राशिनम् ॥ २ ॥
आप ही विश्वेदेवस्वरूप, विश्वको उत्पन्न करनेवाले, सम्पूर्ण देवताओंके सौभाग्यस्वरूप एवं धर्मरूप हैं। आप ही सम्पूर्ण विश्वको पुष्ट एवं तृप्त करनेवाले हैं। विद्वान् पुरुष आपको ही विश्वरूप बताते हैं। आपका हास पुष्पोंके विकास-की भाँति सुशोभित होता है। आप ही सर्वोत्तम वरदायक देवता हैं। आप ही वौषट्, ओङ्कार और वषट्कार हैं। एक-मात्र आपको ही सर्वश्रेष्ठ यज्ञभागका भोक्ता बताया गया है ॥
शतधार सहस्रधार भूर्दं भुवर्दे स्वर्दे भूर्भुवः-
स्वर्दे त्वमेव भूतं भुवनं त्वं स्वधा त्वमेव ब्रह्मसख
ब्रह्ममय ब्रह्मादिस्त्वमेव ॥ ३ ॥
आप ही शतधार और सहस्रधार (सैकड़ों, हजारों धाराओंमें अमृतकी वर्षा करनेवाले) सोम हैं। आप ही भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोकको देनेवाले हैं। आप उक्त तीनों लोकोंका एक साथ ही दान करनेके कारण भूर्भुवःस्वर्दे (त्रिलोकप्रद) कहे गये हैं। आप ही भूत एवं भुवन हैं। आप ही स्वधा हैं। आप ही ब्रह्मसख (ब्रह्माजीके सखा) और ब्रह्ममय हैं तथा ब्रह्माजीके आदि कारण भी आप ही हैं ॥
द्यौरसि पृथिव्यसि पूषासि मातरिश्वासि घर्मोऽसि
मघवासि होता पोता नेता हन्ता मन्ता होम्यहोता
परात्परस्त्वं होम्यस्त्वमेव ॥ ४ ॥
आप ही द्युलोक हैं, पृथ्वी हैं, पूषा नामक आदित्य हैं, मातरिश्वा (वायु) हैं, धर्म हैं, इन्द्र हैं, होता (हवनकर्ता), पोता (एक ऋत्विज्), नेता (नायक अथवा अगुवा), हन्ता (दुष्टोंका वध करनेवाले), मन्ता (सम्मान देनेवाले), हवनीय पदार्थका होम करनेवाले, परात्पर परमात्मा तथा हवनीय पदार्थरूप हैं ॥ ४ ॥
आपोऽसि विश्ववाग् धात्रा परमेण धास्रः त्वमेव
दिग्ध्व्यः स्रुक् स्रुग्भाण्डस्त्वं गण इष्टोऽसि इज्योऽसि
ईड्योऽसि त्वष्टा त्वमसि समिद्धस्त्वमेव गतिर्गति-
मतामसि मोक्षोऽसि योगोऽसि गुह्योऽसि सिद्धोऽसि
धन्योऽसि धातासि परमोऽसि यशोऽसि सोमोऽसि
यूपोऽसि दक्षिणासि दीक्षासि विश्वमसि ॥ ५ ॥
आप ही जल हैं। सम्पूर्ण विश्वकी वाणी हैं। विधाताने उत्तम यज्ञके निमित्त अग्निकी तृप्तिके लिये दिशाओंसे जिस