विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
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| भविष्यपर्व ] | अष्टषष्टितमोऽध्यायः | ९५७ |
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| उस समय कश्यप, अदिति और तुम सब लोग उनसे वर ग्रहण करना। कश्यप और अदिति उन योगात्मा श्रीहरिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् निस्संदेह यही बात कहे कि 'आप ही मेरे पुत्र होकर प्रकट हों' ॥११—१६३॥<br><br>उक्तश्च परया भक्त्या तथास्त्विति स वक्ष्यति ॥ १७ ॥<br>देवा ब्रुवन्तु तं सर्वे भ्राता नस्त्वं भवेति ह।<br>तथास्त्विति च संश्रीमान् वक्ष्यते सर्वलोककृत् ॥ १८ ॥<br>परम भक्तिभावसे ऐसी बात कहनेपर वे भगवान् 'तथास्तु-ऐसा ही होगा' यह कहेंगे, सब देवता भी उनसे यही कहें कि आप हमारे भाई हो जायँ। तब वे सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा श्रीमान् भगवान् 'तथास्तु' कहकर तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर लेंगे ॥ १७-१८ ॥<br><br>तस्मादेवं गृहीत्वा तु वरं त्रिदशसत्तमाः।<br>कृतकृत्याः पुनः सर्वे गच्छध्वं स्वं स्वमालयम् ॥ १९ ॥<br>श्रेष्ठ देवताओ ! इस प्रकार उनसे वर लेकर कृतकृत्य हो पुनः तुम सब लोग अपने-अपने स्थानको चले जाना ॥ १९ ॥<br><br>तथास्त्विति सुराः सर्वे कश्यपोऽदितिरेव च।<br>वन्दित्वा ब्रह्मचरणौ गताः सौम्यां दिशं प्रति ॥ २० ॥<br>तब सब देवता, कश्यप और अदितिने 'ऐसा ही होगा' यह कहकर ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम किया और सब-के-सब उत्तर दिशाकी ओर चल लिये ॥ २० ॥<br><br>तेऽचिरेणैव सम्प्राप्ताः क्षीरोदस्योत्तरं तटम्।<br>यथोद्दिष्टं भगवता ब्रह्मणा ब्रह्मवादिना ॥ २१ ॥<br>ब्रह्मवादी भगवान् ब्रह्माने जैसा बताया था, उसके अनुसार वे शीघ्र ही क्षीरसागरके उत्तर तटपर चले गये ॥ | तेऽतीत्य सागरान् सर्वान् पर्वतांश्च बहून् क्षणात्।<br>नद्यश्च विविधा दिव्याः पृथिव्यां सुरसत्तमाः ॥ २२ ॥<br>पश्यन्ति च सुघोरां वै सर्वसत्त्वविवर्जिताम्।<br>अभास्कराममर्यादां तमसा संवृतां दिशम् ॥ २३ ॥<br>वे श्रेष्ठतम देवता क्षणभरमे समस्त सागरों, बहुसंख्यक पर्वतों तथा नाना प्रकारकी दिव्य नदियोंको लाँघकर जब भूतलपर स्थित हुए, तब उन्हें अत्यन्त भयंकर, समस्त प्राणियों-से रहित, सूर्यके प्रकाशसे शून्य, सीमाहीन एवं अन्धकारसे आच्छन्न दिशा दृष्टिगोचर हुई ॥ २२-२३ ॥<br><br>अमृतं स्थानमासाद्य कश्यपेन सुराः सह।<br>दीक्षिताः कामदं दिव्यं व्रतं वर्षसहस्रकम् ॥ २४ ॥<br>प्रसादार्थं सुरेशाय तस्मै योगाय धीमते।<br>नारायणाय देवाय सहस्राक्षाय धीमते ॥ २५ ॥<br>कश्यपके साथ अमृतस्थानमें पहुँचकर समस्त देवताओंग्ने उन योगस्वरूप बुद्धिमान् देवेश्वर सहस्रलोचनधारी नारायण-देवकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे एक सहस्र वर्षोंके लिये दिव्य कामद-व्रतकी दीक्षा ली ॥ २४-२५ ॥<br><br>ब्रह्मचर्येण मौनेन स्थानवीरासनेन च।<br>दमेन च सुराः सर्वे तपो दुश्चरमास्थिताः ॥ २६ ॥<br>वे सब देवता ब्रह्मचर्य-पालन, मौनधारण, वीरासनग्रहण तथा मन और इन्द्रियोंके संयमद्वारा दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ २६ ॥<br><br>कश्यपस्तत्र भगवान् प्रसादार्थं महात्मनः।<br>उदीरयति वेदोक्तं यमाहुः परमं स्तवम् ॥ २७ ॥<br>वहाँ उन परमात्माकी प्रसन्नताके लिये भगवान् कश्यप एक वेदोक्त स्तोत्रका पाठ करने लगे, जिसे 'परमस्तव' कहते हैं ॥ |
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
अष्टषष्टितमोऽध्यायः
कश्यपद्वारा परमपुरुष परमात्माका स्तवन
कश्यप उवाच
| नमोऽस्तु देवदेवेश एकशृङ्ग वराह वृषाकपि वृषसिन्धो वृषाकपे सुरवृषभ सुरनिर्मित अनि-र्मित भद्रकपिल विष्वक्सेन ध्रुव धर्म धर्मराज वैकुण्ठ त्रेतावर्त अनादिमध्यनिधन धनंजय शुचिश्रवः अग्निहृज वृष्णिज अज अजयामृते-शय सनातन विधातस्त्रिकाम त्रिधाम त्रिककृत् ककुद्मिन् दुन्दुभे महानाभ लोकनाभ पद्मनाभ विरिञ्चे वरिष्ठ बहुरूप विरूप विश्वरूपाक्षया-क्षर सत्याक्षर हंसाक्षर हव्यभुक् खण्डपरशो | शुक मुञ्जकेश हंस महाहंस महदक्षर हृषीकेश सूक्ष्म परसूक्ष्म तुराषाड् विश्वमूर्ते सुराग्रज नील निस्तमो विरजस्तमोरजःसत्त्वधाम सर्व-लोकप्रतिष्ठ शिपिविष्ट सुतपस्तपोऽग्र अग्र अग्रज धर्मनाभ गभस्तिनाभ धर्मनेमे सत्य-धाम सत्याक्षर गभस्तिनेमे विपाप्मन् चन्द्ररथ त्वमेव समुद्रावासाः अजैकपात् सहस्रशीर्ष सहस्रसम्मित महाशीर्ष सहस्रदृक् सहस्रपात् अधोमुख महामुख महापुरुष पुरुषोत्तम सहस्र-बाहो सहस्रमूर्ते सहस्रास्य सहस्राक्ष सहस्र- |