विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 981, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९५६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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सप्तषष्टितमोऽध्यायः
ब्रह्माजीकी आज्ञासे कश्यप और अदितिसहित देवताओंका क्षीरसागरके उत्तर तटपर जाकर तपस्यामें संलग्न होना
ब्रह्मोवाच
यदर्थमिह सम्प्राप्ता भवन्तः सर्व एव हि।
विजानाम्यहमव्यग्र एतत् सर्वं महाबलाः ॥ १ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महाबली देवताओ ! तुम सब लोग जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हो, यह सब मैं व्यग्रतारहित होकर जानता हूँ ॥ १ ॥
भविष्यति च वः सोऽर्थः काङ्क्षितो यः सुरोत्तमाः।
बलेर्दानवमुख्यस्य यो विजेता भविष्यति ॥ २ ॥
सुरश्रेष्ठगण ! तुमलोग जिसकी इच्छा रखते हो, तुम्हारा वह मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा। दानवराज बलिपर विजय पानेवाले जो परम पुरुष हैं, वे शीघ्र ही प्रकट होंगे ॥ २ ॥
न खल्वासुरसंघानामेको जेता स विश्वकृत्।
त्रैलोक्यस्यापि जेताऽसौ देवानापि चोत्तमः ॥ ३ ॥
वे विश्वस्रष्टा परमात्मा केवल असुरसमुदायोंको ही नहीं जीतेंगे, त्रिलोकीके राज्यको भी जीत लेंगे। वे देवताओंमें भी सबसे उत्तम हैं ॥ ३ ॥
धाता चैव हि लोकानां विश्वयोनिः सनातनः।
पूर्वं देवं सदा प्राहुर्हेमगर्भनिदर्शनम् ॥ ४ ॥
वे ही लोकोंके धाता (धारण-पोषण करनेवाले), सम्पूर्ण विश्वकी योनि एवं सनातन पुरुष हैं। विद्वान् पुरुष उन्हींको सदा आदि देवता कहते हैं। मैं हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) उन्हींका निदर्शन (प्रतिबिम्ब अथवा पुत्र) हूँ ॥ ४ ॥
आत्मा देवेन विभुना कृतोऽजेयो महात्मनः।
बलेरसुरमुख्यस्य विश्वस्य जगतस्तथा ॥ ५ ॥
प्रभवः स हि सर्वेषामस्माकमपि पूर्वजः।
अचिन्त्यः स हि विश्वात्मा योगयुक्तः परंतपः ॥ ६ ॥
उन सर्वव्यापी परमात्मदेवने ही असुरशिरोमणि महात्मा बलिके स्वरूपको अजेय बनाया है। वे ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके कारण तथा हम सब देवताओंके भी पूर्वज हैं। शत्रुओंको संताप देनेवाले वे योगयुक्त विश्वात्मा अचिन्त्य (मन और बुद्धिके अविषय) हैं ॥ ५-६ ॥
तं देवापि महात्मानं न विदुः कोऽप्यसाविति।
वेद्यात्मानं च विश्वं च स देवः पुरुषोत्तमः ॥ ७ ॥
देवता भी उन परमात्माके विषयमें यह नहीं जानते कि वे कौन हैं ? किंतु वे पुरुषोत्तमदेव अपनेको तथा सम्पूर्ण विश्वको भी जानते हैं ॥ ७ ॥
तस्यैव तु प्रसादेन प्रवक्ष्येऽहं परां गतिम्।
यत्र योगं समास्थाय तपश्चरति दुष्करम् ॥ ८ ॥
उन्हींकी कृपा-प्रसादसे मैं उनकी परा गति (उत्कृष्ट आश्रय) का पता बता रहा हूँ, जहाँ योगका आश्रय लेकर वे दुष्कर तपस्या करते हैं ॥ ८ ॥
क्षीरोदस्योत्तरे कूले उदीच्यां दिशि देवताः।
अमृतं नाम परमं स्थानमाहुर्मनीषिणः ॥ ९ ॥
देवताओ ! मनीषी पुरुष कहते हैं कि उत्तर दिशामें क्षीरसागरके उत्तर तटपर 'अमृत' नामक उत्कृष्ट स्थान (परम पद) है ॥ ९ ॥
भवन्तस्तत्र वै गत्वा तपसा संशितव्रताः।
अमृतं स्थानमासाद्य तपश्चरंत दुष्करम् ॥ १० ॥
तुमलोग वहीं जाकर तपस्यापूर्वक कठोर व्रतका पालन करो। उस 'अमृत' स्थानमें पहुँचकर दुष्कर तपस्यामें लग जाओ ॥ १० ॥
तत्र श्रोष्यथ विस्पष्टां स्निग्धगम्भीरनिःस्वनाम्।
उष्णेगे तोयपूर्णस्य तोयदस्य समस्वनाम् ॥ ११ ॥
युक्ताक्षरपदस्निग्धां रम्यामभयदां शिवाम्।
वाणीं परमसंस्कारां वरदां ब्रह्मवादिनीम् ॥ १२ ॥
दिव्यां सरस्वतीं सत्यां सर्वकल्मषनाशिनीम्।
सर्वदेवाधिदेवस्य भाषितां भावितात्मनः ॥ १३ ॥
तस्य व्रतसमाप्तौ तु यावद् व्रतविसर्जनम्।
अमोघस्य तु देवस्य विश्वेदेवा महात्मनः ॥ १४ ॥
स्वागतं वः सुरश्रेष्ठा मत्संकाशे व्यवस्थिताः।
कस्य किं वा वरं देवा ददामि वरदः स्थितः ॥ १५ ॥
तं कश्यपोऽदितिश्चैव वरं गृह्णीत वै ततः।
प्रणम्य शिरसा पादौ तस्मै योगात्मने तदा ॥ १६ ॥
भवानेव च नः पुत्रो भवत्विति न संशयः।
सर्वदेवगण ! वहाँ व्रतकी समाप्ति होनेपर उस व्रतके विसर्जनसे पूर्व तुम्हें वर्षाकालके सजल जलधरकी भाँति स्निग्ध एवं गम्भीर स्वरमें उन अमोघ परमात्माकी सुस्पष्ट वाणी सुनायी देगी, जो उपयुक्त अक्षरों और पदोंसे युक्त, स्नेहपूर्ण, रमणीय, अभयदायिनी, मङ्गलकारिणी, उत्तम संस्कारसे सम्पन्न, वरदायक तथा ब्रह्मवादिनी होगी। उन शुद्ध अन्तःकरणवाले सर्वदेवाधिदेव भगवान्की कही हुई वह दिव्य सत्य वाणी सम्पूर्ण कल्मषोंका नाश करनेवाली होगी। वे कहेंगे—'मेरे पास खड़े हुए सुरश्रेष्ठगण ! तुम्हारा स्वागत है ! मैं वर देनेके लिये खड़ा हूँ, बोलो किसको कौन-सा वर दूँ ?'