भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

हरिवंशपर्व ] चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ८३


पञ्चमः पाञ्चिकस्तत्र सप्तजातिषु भारत ।
षष्ठस्तु कण्डरीकोऽभूद् ब्रह्मदत्तस्तु सप्तमः ॥ २७ ॥
भारत ! जन्मोंमें पाँचवाँ होकर उत्पन्न होनेवाला पाञ्चिक (कवि) पाञ्चाल हुआ, छठा कण्डरीक हुआ और सातवाँ ब्रह्मदत्त हुआ ॥ २७ ॥

शेषा विहङ्गमा ये वै काम्पिल्ये सहचारिणः ।
ते जाताः श्रोत्रियकुले सुदरिद्रे सहोदराः ॥ २८ ॥
जो शेष सहचारी पक्षी थे, वे काम्पिल्य नगरमें अत्यन्त दरिद्र श्रोत्रियकुलमें सगे भाई बनकर उत्पन्न हुए ॥ २८ ॥

धृतिमान् सुमना विद्वांस्तत्त्वदर्शी च नामतः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नाश्चत्वारश्छिद्रदर्शिनः ॥ २९ ॥
वे चारों धृतिमान्, सुमना, विद्वान् और तत्त्वदर्शीके नामसे प्रसिद्ध थे और वेदोंके अध्ययन करनेमें लगे रहते थे। साथ ही योगसाधनके लिये गृह-त्यागका अवसर ढूँढ़ते थे अथवा अपने सहचारियोंके भोगासक्ति रूप दूषणपर भी दृष्टि रखते थे ॥ २९ ॥

तेषां संवित्स्थोत्पन्ना पूर्वजातिकृता तदा ।
ये योगनिरताः सिद्धाः प्रस्थिताः सर्व एव हि ॥ ३० ॥
इनकी पूर्व जन्मोंमें जैसी वैराग्यपूर्ण बुद्धि थी, वैसी ही इस जन्ममें प्रकट हुई। अतः वे सब सिद्धपुरुष योगपरायण हो घरसे चलनेके लिये उद्यत हुए ॥ ३० ॥

आमन्त्र्य पितरं तात पिता तानब्रवीत् तदा ।
अधर्म एष युष्माकं यन्मां त्यक्त्वा गमिष्यथ ॥ ३१ ॥
तात ! जब उन्होंने अपने पितासे पूछकर जानेका विचार किया, तब पिताने उनसे यह बात कही—'तुमलोग यदि मुझको छोड़कर वनमें जाओगे तो यह तुम्हारे लिये अधर्म ही होगा ॥

दारिद्र्यमपनाकृत्य पुत्रार्थोश्चैव पुष्कलान् ।
शुश्रूषामप्रयुज्यैव कथं वै गन्तुमर्हथ ॥ ३२ ॥
तुमलोग मेरी दरिद्रता दूर न करके तथा पुत्रद्वारा सिद्ध होनेवाले प्रचुर प्रयोजनोंकी भी सिद्धि एवं मेरी सेवा भी न करके कैसे चले जाना चाहते हो? क्या यही उचित है ? ॥ ३२॥

ते तमूचुर्द्विजाः सर्वे पितरं पुनरेव च ।
करिष्यामो विधानं ते येन त्वं वर्तयिष्यसि ॥ ३३ ॥
तब उन सब द्विजोंने अपने पितासे कहा—'हमलोग ऐसा उपाय करेंगे जिससे आप जीवन-निर्वाह कर सकेंगे (तथा हम-जैसे पुत्रोंको पाकर आपको अपने उद्धारके लिये भी चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है) ॥ ३३ ॥

इमं श्लोकं महार्थं त्वं राजानं सहमन्त्रिणम् ।
श्रावयेथाः समागम्य ब्रह्मदत्तमकल्मषम् ॥ ३४ ॥
'आप निष्पाप राजा ब्रह्मदत्तसे मिलकर यह महत्त्वपूर्ण ('सप्तव्याधा दशार्णेषु' इत्यादि) श्लोक उनको और उनके मन्त्रियोंको सुनाइयेगा ॥ ३४ ॥

प्रीतात्मा दास्यति स ते ग्रामान् भोगांश्च पुष्कलान् ।
यथेप्सितांश्च सर्वार्थान् गच्छ तात यथेप्सितम् ॥ ३५ ॥
'तात ! इससे प्रसन्न होकर वे आपको बहुत-से ग्राम, प्रचुर भोग और आपकी इच्छानुसार सब पदार्थ देंगे। आपकी जब इच्छा हो तब (ब्रह्मदत्तके पास) चले जायें' ॥

एतावदुक्त्वा ते सर्वे पूजयित्वा च तं गुरुम् ।
योगधर्ममनुप्राप्य परां निर्वृतिमाययुः ॥ ३६ ॥
इतनी बातें कहकर उन सबोंने अपने पिताकी पूजा की और योगधर्मका साधन कर वे परमानन्दमय मोक्षको प्राप्त हो गये ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥


चतुर्विंशतितमोऽध्यायः

विभ्राजका ब्रह्मदत्तका पुत्र बनकर उत्पन्न होना, रानी संनतिका ब्रह्मदत्तसे रूठना, एक ब्राह्मणके कहे हुए श्लोकोंसे ब्रह्मदत्त, पाञ्चाल्य और कण्डरीकको अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होना तथा ब्रह्मदत्त आदिका तप करके मुक्त हो जाना

मार्कण्डेय उवाच
ब्रह्मदत्तस्य तनयः स विभ्राजस्त्वजायत ।
योगात्मा तपसा युक्तो विष्वक्सेन इति श्रुतः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजीने कहा—**जिसके मनमें योग-साधन-विषयक संकल्प हुआ था, वह तपस्वी राजा विभ्राज ब्रह्मदत्तका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ और (उस जन्ममें) वह विष्वक्सेन नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १ ॥

कदाचिद् ब्रह्मदत्तस्तु भार्यया सहितो वने ।
विजहार प्रहृष्टात्मा यथा शच्या शचीपतिः ॥ २ ॥
एक समयकी बात है, राजा ब्रह्मदत्त प्रसन्नचित्तसे अपनी