विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 105, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तस्य संकल्प आसीच्च तेषामेकतरस्य वै।
पुत्रत्वं प्राप्य योगेन युज्येयमिति भारत ॥ १२ ॥
भारत ! उनका यह संकल्प था कि मैं इन (योगी हंसोंमेंसे) किसी एकका पुत्र बनकर उत्पन्न होऊँ तो मैं भी योगधर्मका पालन कर सकूँगा ॥ १२ ॥
कृत्वाभिसन्धिं तपसा महता स समन्वितः।
महातपाः स विभ्राजो विरराजांशुमानिव ॥ १३ ॥
इस प्रकार विचार करके वे महातपस्वी विभ्राज बड़ा भारी तप करके सूर्यके समान सुशोभित होने लगे ॥ १३ ॥
ततो विभ्राजितं तेन वैभ्राजं नाम तद्वनम्।
सरस्तच्च कुरुश्रेष्ठ वैभ्राजमिति संज्ञितम् ॥ १४ ॥
कुरुश्रेष्ठ ! उन्होंने (अपने तपसे) उस वनको विभ्राजित (प्रकाशित) कर दिया। इसलिये वह सरोवर और वह वन भी वैभ्राज सरोवर और वैभ्राज वनके नामसे प्रसिद्ध हो गये ॥ १४ ॥
तत्र ते शकुना राजंश्चत्वारो योगधर्मिणः।
योगभ्रष्टास्त्रयश्चैव देहन्यासकृतोऽभवन् ॥ १५ ॥
राजन् ! (इसी समय) उस सरोवरपर उन योगधर्मका पालन करनेवाले चार हंसोंने तथा योगभ्रष्ट तीन हंसोंने भी अपने शरीरको त्याग दिया ॥ १५ ॥
काम्पिल्ये नगरे ते तु ब्रह्मदत्तपुरोगमाः।
जाताः सप्त महात्मानः सर्वे विगतकल्मषाः ॥ १६ ॥
वे सातों निष्पाप महात्मा काम्पिल्य नगरमें ब्रह्मदत्त आदि (नामोंसे) उत्पन्न हुए ॥ १६ ॥
ज्ञानध्यानतपःपूजावेदवेदाङ्गपारगाः ।
स्मृतिमन्तोऽत्र चत्वारस्त्रयस्तु परिमोहिताः ॥ १७ ॥
ये सब ज्ञान, ध्यान, तप और पूजामें लगे रहते थे और वेद-वेदाङ्गके पारगामी विद्वान् थे। इनमें चारको तो अपने पूर्व-जन्मोंका स्मरण था और तीन शापसे मोहित होनेके कारण अपने पूर्वजन्मकी स्मृतिसे वञ्चित थे ॥ १७ ॥
स्वतन्त्रस्त्वणुहाज्जज्ञे ब्रह्मदत्तो महायशाः।
यथा ह्यासीत्पक्षिभावे संकल्पः पूर्वचिन्तितः !
ज्ञानध्यानतपःपूतो वेदवेदाङ्गपारगः ॥ १८ ॥
स्वतन्त्रने अपने पक्षी-शरीरमें जैसा संकल्प किया था, उसीके अनुसार वह अणुहके महायशस्वी पुत्र ब्रह्मदत्तके रूपमें उत्पन्न हुआ। वह ज्ञान, ध्यान और तप करके पवित्र हो गया था तथा वेद और वेदाङ्गका पारगामी विद्वान् था ॥ १८ ॥
छिद्रदर्शी सुनेत्रश्च तथा वाभ्रव्यवत्स्ययोः।
जातौ श्रोत्रियदायादौ वेदवेदाङ्गपारगौ ॥ १९ ॥
वाभ्रव्य और वत्स—(ये दोनों वहाँ राजा अणुहके मन्त्री तथा श्रोत्रिय ब्राह्मण थे।) छिद्रदर्शन और सुनेत्र नामक हंस उन्हीं श्रोत्रिय राजमन्त्रियोंके कुलमें वेद-वेदाङ्गके पारगामी श्रोत्रिय पुत्र बनकर उत्पन्न हुए ॥ १९ ॥
सहायौ ब्रह्मदत्तस्य पूर्वजातिसहोपितौ।
पाञ्चालः पञ्चिकश्चैव कण्डरीकस्तथापरः ॥ २० ॥
ये दोनों पहले जन्ममें ब्रह्मदत्तके साथ रहे थे और उनकी सहायता करनेके लिये उत्पन्न हुए थे। (इनमें जो पूर्ववर्ती छः जन्मोंमें अपने सात भाइयोंमेंसे) पाँचवाँ (होकर उत्पन्न हुआ था, वह कवि सातवें जन्ममें) पाञ्चाल नामक श्रोत्रिय हुआ और छठा (खद्युम) कण्डरीक नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ २० ॥
पाञ्चालो बह्वृचस्त्वासीदाचार्यत्वं चकार ह।
द्विवेदः कण्डरीकस्तु छन्दोगोऽध्वर्यु रेव च ॥ २१ ॥
इनमें पाञ्चाल बह्वृच अर्थात् ऋग्वेदी था। वह आचार्य (पुरोहित) का काम करने लगा और कण्डरीक छन्दोंका गान करनेवाला सामवेदी तथा अध्वर्यु (यजुर्वेदी) हुआ, इस प्रकार वह दो वेदोंका ज्ञाता था ॥ २१ ॥
सर्वसत्त्वरुतज्ञस्तु राजाऽऽसीदणुहात्मजः ।
पाञ्चालकण्डरीकाभ्यां तस्य सख्यमभूत् तदा ॥ २२ ॥
अणुहका पुत्र राजा ब्रह्मदत्त सब प्राणियोंकी बोलीको समझ लेता था। उसकी पाञ्चाल और कण्डरीकसे मित्रता हो गयी ॥ २२ ॥
ते ग्राम्यधर्माभिरताः कामस्य वशवर्तिनः।
पूर्वजातिकृतेनासन् धर्मकामार्थकोविदाः ॥ २३ ॥
ये तीनों ग्राम्यधर्म (संसारी पुरुषोंके धर्म) में मग्न रहते थे और काम (इच्छा) के वशमें होकर चलते थे। इन्होंने पूर्वजन्ममें जो सत्कर्म किया था, उसके फलसे ये धर्म, अर्थ और कामके तत्त्वज्ञ हुए ॥ २३ ॥
अणुहस्तु नृपश्रेष्ठो ब्रह्मदत्तमकल्मषम्।
राज्येऽभिषिच्य योगात्मा परां गतिमवाप्तवान् ॥ २४ ॥
राजाओंमें श्रेष्ठ अणुह निष्पाप ब्रह्मदत्तका राज्यपर अभिषेक करके स्वयं योग-साधन कर परम गतिको प्राप्त हो गये ॥ २४ ॥
ब्रह्मदत्तस्य भार्या तु देवलस्यात्मजाभवत्।
असितस्य हि दुर्धर्षा संनतिर्नाम नामतः ॥ २५ ॥
असित देवलकी पुत्री, जिसका नाम संनति था तथा जिसका तिरस्कार करना किसीके लिये भी बहुत कठिन था, राजा ब्रह्मदत्तकी धर्मपत्नी हुई ॥ २५ ॥
तामेकभावसम्पन्नां लेभे कन्यामनुत्तमाम्।
संनतिं संनतिमर्ती देवलाद् योगधर्मिणीम् ॥ २६ ॥
उस एक-भाव (ब्रह्मभाव) से सम्पन्न, नम्रताकी मूर्ति, योग-धर्मका पालन करनेवाली संनति नामकी श्रेष्ठ कन्याको ब्रह्मदत्तने देवल ऋषिसे पत्नीके रूपमें प्राप्त किया था ॥ २६ ॥