विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] त्रयोविंशतितमोऽध्यायः [ ८१
इमं च वाक्यसंदर्भश्लोकमेकमुदाहृतम्।
पुरुषान्तरितं श्रुत्वा ततो योगमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥
उस मनुष्य-जन्ममें जब कोई पुरुष तुम्हें यह आगे बताया जानेवाला वाक्य संदर्भरूप ( 'सप्तव्याधा दशार्णेषु' आदि)* श्लोक सुनावेगा, तब तुम्हें यह मोक्ष देनेवाला ज्ञानमय योग-धर्म फिर प्राप्त हो जायगा ॥ ११ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥
त्रयोविंशतितमोऽध्यायः
हंसोंका काम्पिल्यनगरमें ब्रह्मदत्त आदिके रूपमें उत्पन्न होना और चार हंसोंका अपने पितासे आज्ञा लेकर मुक्त हो जाना
मार्कण्डेय उवाच
ते योगधर्मनिरताः सप्त मानसचारिणः।
पद्मगर्भोऽरविन्दाक्षः क्षीरगर्भः सुलोचनः ॥ १ ॥
उरुविन्दुः सुविन्दुश्च हैमगर्भस्तु सप्तमः।
वाय्वम्बुभक्षाः सततं शरीराण्युपशोषयन् ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा— तदनन्तर, योगधर्ममें निरत रहनेवाले उन सात मानसचारी हंसोंने, जो पद्मगर्भ, अरविन्दाक्ष, क्षीरगर्भ, सुलोचन, उरुविन्दु, सुविन्दु और हैमगर्भ नाम धारण करते थे, केवल जल और वायुका ही भक्षण करके अपने शरीरको सुखाना आरम्भ कर दिया ॥ १-२ ॥
राजा विभ्राजमानस्तु वपुषा तद् वनं तदा।
चचारान्तःपुरवृतो नन्दनं मघवानिव ॥ ३ ॥
इधर वह राजा अपने शरीरसे प्रकाश फैलाता हुआ अपनी स्त्रियोंको साथ ले उस वनमें इस प्रकार घूमने लगा, जैसे नन्दनवनमें इन्द्र घूमते हों ॥ ३ ॥
स तानपश्यत्खचरान् योगधर्मात्मकान् नृप।
निर्वेदाच्च तमेवार्थमनुध्यायन् पुरं ययौ ॥ ४ ॥
राजन् ! उस राजाने उन पक्षियोंको (एकाग्रता आदि बाह्य लक्षणोंसे) योगधर्ममें परायण देखा। इससे वह (पक्षी भी योगसाधन करते हैं। हाय ! मैं मनुष्य होकर भी योग-साधन न कर सका। इस प्रकार) कुछ निर्विण्ण होकर, उसी बातको सोचता हुआ अपने नगरको चला गया ॥ ४ ॥
अणुहो नाम तस्याऽऽसीत्पुत्रः परमधार्मिकः।
अणुधर्मरतिर्नित्यमणुं सोऽप्यगमत्पदम् ॥ ५ ॥
उसके अणुह† नामक परम धार्मिक पुत्र था ! वह अणुह धर्मके सूक्ष्म तत्त्वके चिन्तनमें अनुरक्त था। इसलिये उसे अणुपद (ब्रह्मके सूक्ष्म स्वरूपका बोध) प्राप्त हुआ था ॥ ५ ॥
प्रादात्कन्यां शुकस्तस्मै कृत्वीं पूजितलक्षणाम्।
सत्यशीलगुणोपेतां योगधर्मरतां सदा ॥ ६ ॥
उसको शुकने श्रेष्ठ लक्षणोंवाली सत्यशील एवं अन्यान्य गुणोंसे सम्पन्न और सदा योगधर्मका पालन करनेवाली अपनी कन्या कृत्त्वी अर्पित की थी ॥ ६ ॥
सा ह्युद्दिष्टा पुरा भीष्म पितृकन्या मनीषिणी।
सनत्कुमारेण तदा संनिधौ मम शोभना ॥ ७ ॥
भीष्म ! जैसा कि सनत्कुमारजीने पहले मुझे बताया था, वह सुन्दरी कन्या कृत्त्वी पितरोंकी ही बुद्धिमती कन्या (पीवरी) थी ॥ ७ ॥
सत्यधर्मभृतां श्रेष्ठा दुर्विज्ञेया कृतात्मभिः।
योगा च योगपत्नी च योगमाता तथैव च ॥ ८ ॥
वह सत्यधर्मका पालन करनेवाली नारियोंमें श्रेष्ठ थी। पुण्यात्मा पुरुष भी उसके स्वरूपको बड़ी कठिनतासे समझ सकते थे। वह स्वयं तो योगिनी थी ही, योगीकी ही पत्नी और योगीकी ही माता भी थी ॥ ८ ॥
यथा ते कथितं पूर्वं पितृकल्पेषु वै मया।
विभ्राजस्त्वणुहं राज्ये स्थापयित्वा नरेश्वरः ॥ ९ ॥
आमन्त्र्य पौरान् प्रीतात्मा ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च।
प्रायात् सरस्तत्प्रभृतं यत्र ते सहचारिणः ॥ १० ॥
मैंने पहले पितृ-कल्पके समय ये सब बातें तुम्हें बतायी थीं। राजा विभ्राज अणुहको राज्यसिंहासनपर बैठाकर प्रसन्नचित्त हो पुरवासियोंसे विदा ले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर जहाँ वे सहचारी हंस रहते थे, उस सरोवरपर तप करनेके लिये चले गये ॥ ९-१० ॥
स वै तत्र निराहारो वायुभक्षो महातपाः।
त्यक्त्वा कामांस्तपस्तेपे सरसस्तस्य पार्श्वतः ॥ ११ ॥
वे उस सरोवरके तटपर सब कामनाओंको त्याग निराहार रह वायुको ही पीकर तपस्या करने लगे ॥ ११ ॥
* 'सप्तव्याधा दशार्णेषु' आदि वाक्य चौबीसवें अध्यायका बीसवाँ और इक्कीसवाँ श्लोक है।
† अणुह शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—(अणून्-सूक्ष्मान् धर्मान् इन्ति प्राप्नोतीति अणुहः-सूक्ष्म तत्त्वोंको समझनेकी शक्तिवाला)