भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 103
८०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

विभ्राजमानो वपुषा प्रभावेन समन्वितः।
श्रीमानन्तःपुरवृतो वनं तत्रप्रविवेश ह ॥ ४२ ॥

इस प्रकार वे सब पक्षी वहाँ साथ-साथ विचर रहे थे, इतनेहीमें नीपोंका स्वामी पौरववंशी श्रीमान् विभ्राज अपने शरीरकी कान्तिसे प्रकाशित होता और अपना प्रभाव दिखाता हुआ अपने अन्तःपुरको लेकर उस वनमें आया ॥ ४१-४२ ॥

स्वतन्त्रश्च विहङ्गोऽसौ स्पृहयामास तं नृपम् ।
दृष्ट्वाऽऽयान्तं श्रियोपेतं भवेयमहमीदृशः ॥ ४३ ॥

यद्यस्ति सुकृतं किञ्चित्तपो वा नियमोऽपि वा ।
खिन्नोऽस्मि ह्युपवासेन तपसा निष्फलेन च ॥ ४४ ॥

तब स्वतन्त्र नामवाले हंसने वहाँ आये हुए उस लक्ष्मीवान् राजाको देखकर उसके समान बननेकी कामना की । ( वह विचारने लगा कि ) यदि मेरे पास कुछ भी पुण्य, तप या नियम हो, तो मैं इस राजाके समान हो जाऊँ । अब मैं इस उपवास और निष्फल तपसे खिन्न हो रहा हूँ ॥ ४३-४४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥


द्वाविंशोऽध्यायः

पितृकल्प, शुचिवाक् पक्षीका स्वतन्त्र आदि तीन पक्षियोंको शाप देना, सुमना पक्षीका अनुग्रहपूर्वक उन्हें शापसे मुक्त करना

मार्कण्डेय उवाच

ततस्तं चक्रवाकौ द्वावूचतुः सहचारिणौ ।
आवां ते सचिवौ स्यावस्तव प्रियहितैषिणौ ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी बोले---उस समय उस स्वतन्त्र पक्षीके साथमें रहनेवाले दो चक्रवाकोंने उससे कहा,—हम आपका प्रिय एवं हित चाहनेवाले आपके मन्त्री बनेंगे ॥ १ ॥

तथेत्युक्त्वा च तस्यासीत् तदा योगात्मिका मतिः ।
एवं ते समयं चक्रुः शुचिवाक् तमुवाच ह ॥ २ ॥

तब स्वतन्त्रने कहा, 'बहुत अच्छा' । यों कहकर वह पुनः अपने योगधर्मका विचार करने लगा । जब इस प्रकार उन तीनोंने प्रतिज्ञा कर ली, तब शुचिवाकने उस (स्वतन्त्र) से कहा ॥ २ ॥

यस्मात् कामप्रधानस्त्वं योगधर्ममपास्य वै ।
एवं वरं प्रार्थयसे तस्माद् वाक्यं निबोध मे ॥ ३ ॥

तू योगधर्मको छोड़कर कामप्रधान धर्मकी कामनासे ऐसा वर माँग रहा है, इसलिये तू मेरा यह शाप सुन ले ॥ ३ ॥

राजा त्वं भविता तात काम्पिल्ये नात्र संशयः ।
भविष्यतः सखायौ च द्वाविमौ सचिवौ तव ॥ ४ ॥

तात ! तू काम्पिल्य नगरका राजा बनकर उत्पन्न होगा, इसमें संदेह नहीं । तेरे ये दोनों मित्र भी तेरे मन्त्री बनकर उत्पन्न होंगे ॥ ४ ॥

शप्त्वा चानभिभाष्यांस्तांश्चत्वारश्चकुरण्डजाः ।
तांस्त्रीनभीप्सतो राज्यं व्यभिचारप्रदर्शितान् ॥ ५ ॥

(इस प्रकार) शेष चार पक्षियोंने राज्यकी इच्छा करके योगधर्मसे भ्रष्ट होनेवाले उन तीन पक्षियोंको शाप देकर उनसे बोलना भी छोड़ दिया ॥ ५ ॥

शस्ताः खगास्त्रयस्ते तु योगभ्रष्टा विचेतसः ।
तानयाचन्त चतुरस्त्रयस्ते सहचारिणः ॥ ६ ॥

इस प्रकार योगभ्रष्ट होनेके कारण शापसे ग्रस्त हुए वे तीनों पक्षी डरके मारे अचेत हो गये। उन तीनों साथियोंने चारों पक्षियोंसे ( शापका अनुग्रह करनेकी ) प्रार्थना की ॥ ६ ॥

तेषां प्रसादं ते चक्रुरथैतान् सुमनाऽब्रवीत् ।
सर्वेषामेव वचनात्प्रसादानुगतं वचः ॥ ७ ॥

तब उन्होंने उनके ऊपर कृपाकी और सबकी सम्मतिसे सुमनाने अनुग्रहपूर्वक यह बात कही—॥ ७ ॥

अन्तवान् भविता शापो युष्माकं नात्र संशयः ।
इतश्च्युताश्च मानुष्यं प्राप्य योगमवाप्स्यथ ॥ ८ ॥

'इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे इस शापका शीघ्र ही अन्त होगा। यहाँ योगसे भ्रष्ट होकर तुम मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होगे और अन्तमें फिर तुम्हें योगज्ञान प्राप्त होगा ॥ ८ ॥

सर्वसत्त्वरुतज्ञश्च स्वतन्त्रोऽयं भविष्यति ।
पितृप्रसादो ह्यस्माभिरस्य प्रातः कृतेन वै ॥ ९ ॥
गां प्रोक्षयित्वा धर्मेण पितृभ्य उपकल्प्यताम् ।
अस्माकं ज्ञानसंयोगः सर्वेषां योगसाधनः ॥ १० ॥

'यह स्वतन्त्र नामक हंस सब जीवोंकी बोली समझनेवाला होगा । पूर्वजन्ममें इसीके कथनानुसार कार्य करनेसे हमें पितरोंकी कृपा प्राप्त हुई । इसने कहा था कि 'गौका प्रोक्षण करके इसे पितरोंको अर्पित किया जाय ।' इसीके पालनसे हम सबको योगसाधक ज्ञानकी प्राप्ति हुई है ॥ ९-१० ॥

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