भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 102

हरिवंशपर्व ] एकविंशोऽध्यायः [ ७९

उन मृगोंके नाम उन्मुख, नित्यवित्त्रस्त, स्तब्धकर्ण, विलोचन, पण्डित, घसमर और नादी थे ॥ २५ ॥
तमेवार्थमनुध्यायन्तो जातिस्मरणसम्भवम् ।
आसन् वनचराः शान्ता निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः॥ २६ ॥

( उस जन्ममें भी ) पूर्व जन्मकी स्मृति होनेसे याद आये हुए उन्हीं कर्मों और उनके फलोंका स्मरण करते हुए वे मृग धैर्यपूर्वक कष्ट सहन करते, शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंकी परवा नहीं करते और परिग्रह ( हिरनियोंके संग ) से दूर रहकर वनमें घूमते रहते थे ॥ २६ ॥
ते सर्वे शुभकर्माणः सधर्माणो वनेचराः ।
योगधर्ममनुप्राप्ता विहरन्ति स्म तत्र ह ॥ २७ ॥

वे सब समानरूपसे धर्मका पालन करते और शुभकर्मोंमें तत्पर रहते थे एवं योगधर्मका आश्रय लेकर ( आत्मविचार करते हुए ) वनमें इधर-उधर घूमते रहते थे ॥ २७ ॥
जहुः प्रांणान्मरुं साध्यं लघ्वाहारास्तपस्विनः ।
तेषां मरुं साधयतां पदस्थानानि भारत ।
तथैवाद्यापि दृश्यन्ते गिरौ कालञ्जरे नृप ॥ २८ ॥

भारत ! उन मृगोंने हल्का आहार तथा मरु ( निर्जल रहने ) की साधना करके तपस्यामे तत्पर हो वहाँ अपने प्राण त्याग दिये । राजन् ! जल न पीनेकी साधना करनेवाले उन मृगोंके पैरोंके चिह्न कालञ्जर पर्वतपर अब भी पूर्ववत् दिखायी देते हैं ॥ २८ ॥
कर्मणा तेन ते तात शुभेनाशुभवर्जिताः ।
शुभाच्छुभतरां योनिं चक्रवाकत्वमागताः ॥ २९ ॥

तात ! इस शुभ कर्मके कारण वे अशुभ योनिसे छूटकर अतिशुभ चक्रवाककी योनिमें उत्पन्न हुए ॥ २९ ॥
शुभे देशे शरद्वीपे सप्तैवासञ्जलौकसः ।
त्यक्त्वा सहचरीधर्मं मुनयो ब्रह्मचारिणः ॥ ३० ॥

वे सातों कल्याणमय शरद्वीप ( जलद्वीप ) में जलचर पक्षी बनकर उत्पन्न हुए । वहाँ भी वे सहचरीधर्म अर्थात् सहवासका त्यागकर ब्रह्मचारी मुनि बनकर रहने लगे ॥ ३० ॥
निःस्पृहो निर्ममः क्षान्तो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।
निर्वृत्तिर्निभृतश्चैव शकुना नामतः स्मृताः ॥ ३१ ॥

( इस चक्रवाक-जन्ममें ) उनके नाम निःस्पृह, निर्मम, क्षान्त, निर्द्वन्द्व, निष्परिग्रह, निर्वृत्ति और निभृत थे ॥ ३१ ॥
ते तत्र पक्षिणः सर्वे शकुना धर्मचारिणः ।
निराहारा जहुः प्राणांस्तपोयुक्ताः सरित्तटे ॥ ३२ ॥

उन सब धर्माचारी पक्षियोंने नदीके किनारेपर निराहार रहकर तप करते-करते अपने प्राणोंको त्याग दिया ॥ ३२ ॥
अथ ते सोदरा जाता हंसा मानसचारिणः ।
जातिस्मराः सुसंयुक्ताः सप्तैव ब्रह्मचारिणः ॥ ३३ ॥

तदनन्तर वे सातो सहोदर भाई मानसरोवरपर विचरने-वाले हंसके रूपमें उत्पन्न हुए । इस जन्ममें भी उनको अपने ( पूर्व ) जन्मोंका स्मरण बना रहता था । अतः वे सातों ही सदा साथ रहकर पूर्णरूपसे ब्रह्मचर्यका पालन करते थे ॥ ३३ ॥
विप्रयोनौ यतो मोहान्मिथ्योपचरितो गुरुः ।
तिर्यग्योनौ ततो जाताः संसारे परिवभ्रमुः ॥ ३४ ॥

उन्होंने ब्राह्मणयोनिमें मोहवश अपने गुरुसे मिथ्या-भाषण किया था, इसलिये वे तिर्यग्योनिमे उत्पन्न होकर संसारमे भटक रहे थे ॥ ३४ ॥
यतश्च पितृवाक्यार्थः कृतः स्वार्थे व्यवस्थितैः ।
ततो ज्ञानंच जातिं च ते हि प्रापुर्गुणोत्तराम् ॥ ३५ ॥

स्वार्थमें तत्पर रहनेपर भी उन्होंने पितरोंके श्राद्धनिमित्त संकल्प बोलकर कार्य किया था, इसलिये उन्हें उत्तरोत्तर उत्कृष्ट गुणसे युक्त ज्ञान और जन्म मिलता गया ॥ ३५ ॥
सुमनाः शुचिवाक्छुद्धः पञ्चमश्छिद्रदर्शनः ।
सुनेत्रश्च स्वतन्त्रश्च शकुना नामतः स्मृताः ॥ ३६ ॥

( इस जन्ममे ) उन हंसोंके नाम थे—सुमना, शुचिवाक्, शुद्ध, पञ्चम, छिद्रदर्शन, सुनेत्र और स्वतन्त्र ॥ ३६ ॥
पञ्चमः पाञ्चिकस्तत्र सप्तजातिष्वजायत ।
षष्ठस्तु कण्डरीकोऽभूद् ब्रह्मदत्तस्तु सप्तमः ॥ ३७ ॥

उन ( वाग्दुष्ट आदि कौशिक-पुत्रों ) में जो पाँचवाँ ( कवि ) था, वह भावी सातवें जन्ममे पाञ्चिक ( नामक राजमन्त्री ) हुआ । छठा ( खसम भावी मनुष्य-जन्ममे ) कण्डरीक हुआ और सातवाँ ( पितृवर्ती भावी सातवें जन्ममे ) ब्रह्मदत्त हुआ ॥ ३७ ॥
तेषां तु तपसा तेन सप्तजातिकृतेन वै ।
योगस्य चापि निर्वृत्त्या प्रतिभानाच्च शोभनात् ॥ ३८ ॥
पूर्वजातिषु यद् ब्रह्म श्रुतं गुरुकुलेषु वै ।
तथैवावस्थिता बुद्धिः संसारेष्वपि वर्तताम् ॥ ३९ ॥

उन्होंने सातों जन्मोंमें जो तप किया, उससे, योग-सिद्धिसे, पूर्वजन्मके कर्मोंकी स्मृति होनेसे तथा पूर्वजन्ममें गुरुकुलमें रहकर जो वेदाध्ययन किया गया था, उसके प्रभावसे संसारमें भ्रमण करनेपर भी उनकी बुद्धि वैसी ही बनी रही, बदली नहीं ॥३८-३९॥
ते ब्रह्मचारिणः सर्वे विहङ्गा ब्रह्मवादिनः ।
योगधर्ममनुध्यायन्तो विहरन्ति स्म तत्र ह ॥ ४० ॥

वे सभी आकाशचारी हंस ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मवादी होकर योगधर्मका पालन करते हुए विचरते रहे ॥ ४० ॥
तेषां तत्र विहङ्गानां चरतां सहचारिणाम् ।
नीपानामेश्वरो राजा विभ्राजः पौरवान्वयः ॥ ४१ ॥