भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 101
७८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उस समय कवि और खसने उनसे ऐसा न करनेकी प्रार्थना की; परंतु वे ब्राह्मण इनके द्वारा किसी प्रकार भी रोके न जा सके ॥ ९ ॥

पितृवर्ती तु यस्तेषां नित्यं श्राद्धाहिको द्विजः।
स सर्वानब्रवीद् भ्रातृन् कोपाद्धर्मे समाहितः ॥ १० ॥

तब उनमें जो प्रतिदिन श्राद्ध करनेवाला धर्मात्मा पितृवर्ती नामक द्विज था, वह उन सब भाइयोंसे बिगड़कर बोला ॥ १० ॥

यद्यवश्यं प्रहन्तव्या पितॄनुद्दिश्य साध्विमाम्।
प्रकुर्वीमहि गां सम्यक् सर्व एव समाहिताः ॥ ११ ॥

'यदि इसे अवश्य ही मारना है तो हमें चित्तको सावधान-कर इसे पितरोंके निमित्त ही मारना चाहिये ॥ ११ ॥

एवमेषापि गौर्धर्मं प्राप्स्यते नात्र संशयः।
पितॄनभ्यर्च्य धर्मेण नाधर्मोऽस्मान् भविष्यति ॥ १२ ॥

'ऐसा करनेसे इस गौको भी निस्संदेह धर्मकी प्राप्ति होगी और धर्मपूर्वक पितरोंका पूजन कर देनेसे हमें भी अधर्म न लगेगा' ॥ १२ ॥

तथेत्युक्त्वा च ते सर्वे प्रोक्षयित्वा च गां ततः।
पितृभ्यः कल्पयित्वैनामुपायुञ्जत भारत ॥ १३ ॥

भारत ! तब उन सबने 'तथास्तु' कहकर गौका प्रोक्षण किया और उसको पितरोंके निमित्त अर्पित करके उसका मनमाना उपयोग किया ॥ १३ ॥

उपयुज्य च गां सर्वे गुरोस्तस्य न्यवेदयन्।
शार्दूलेन हता धेनुर्वत्सोऽयं गृह्यतामिति ॥ १४ ॥

गौको उपयोगमें लाकर उन सबोंने गुरुजीसे निवेदन किया कि 'गायको तो सिंहने मार डाला, यह उसका बछड़ा है, इसे आप ग्रहण कीजिये' ॥ १४ ॥

आर्जवात् स तु तं वत्सं प्रतिजग्राह वै द्विजः।
मिथ्योपचर्य ते तं तु गुरुमन्यायतो द्विजाः।
कालेन समयुज्यन्त सर्व एवायुषः क्षये ॥ १५ ॥

सरलस्वभाव होनेके कारण उन ब्राह्मणने भी उस बछड़ेको ग्रहण कर लिया । इस प्रकार वे ब्राह्मण अन्यायद्वारा अपने गुरुको धोखा देकर आयु समाप्त होनेपर मृत्युको प्राप्त हुए ॥ १५ ॥

ते वै क्रूरतया हिंस्रा अनार्यत्वाद् गुरौ तथा।
उग्रा हिंसाविहाराश्च सत्ताजायन्त सोदराः ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् अपनी क्रूरता और गुरुसे अनार्यताका व्यवहार करनेके कारण वे सात भाई उग्र स्वभाववाले, हिंसाविहारी व्याध बनकर उत्पन्न हुए ॥ १६ ॥

लुब्धकस्यात्मजास्तात बलवन्तो मनस्विनः।
पितॄनभ्यर्च्य धर्मेण प्रोक्षयित्वा च गां तदा ॥ १७ ॥
स्मृतिः प्रत्यवमर्शश्च तेषां जात्यन्तरेऽभवत्।
जाता व्याधा दशार्णेषु सप्त धर्मविचक्षणाः ॥ १८ ॥

तात ! उस समय वे एक बहेलियेके बलवान् एवं मनस्वी पुत्र हुए । उन्होंने धर्मतः पितरोंका पूजनकर गौका प्रोक्षण किया था; इसलिये दूसरा जन्म पानेपर भी उनको अपने पूर्वजन्म और पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंका स्मरण बना रहा। वे सातों दशार्ण देशमें धर्मकुशल व्याध बनकर उत्पन्न हुए थे ॥ १७-१८ ॥

स्वकर्मनिरताः सर्वे लोभानृतविवर्जिताः।
तावन्मात्रं प्रकुर्वन्ति यावता प्राणधारणम् ॥ १९ ॥

वे सब लोभ और असत्यसे दूर रहते हुए अपने कर्ममें तत्पर रहते थे और उतना ही भोजन करते थे, जिससे प्राण टिके रहें ॥ १९ ॥

शेषं ध्यानपराः कालमनुध्यायन्ति कर्म तत् ।
नामधेयानि चाप्येषामिमान्यासन्नराधिप ॥ २० ॥

राजन् ! उनके पास जो समय बचता था, उसमें ध्यानमग्न हो वे अपने (पूर्वजन्मके) कर्मका चिन्तन करते रहते थे। इस जन्ममें उनके नाम इस प्रकार थे— ॥ २० ॥

निर्वैरो निर्वृतिः शान्तो निर्मन्युः कृतिरेव च।
वैधसो मातृवर्ती च व्याधाः परमधार्मिकाः ॥ २१ ॥

निर्वैर, निर्वृति, शान्त, निर्मन्यु, कृति, वैधस और मातृवर्ती। ये सभी व्याध परम धार्मिक थे ॥ २१ ॥

तैरवसुषितैस्तात हिंसाधर्मरतैः सदा।
माता च पूजिता वृद्धा पिता च परितोषितः ॥ २२ ॥

तात ! इस प्रकार वे दशार्णदेशमें रहकर हिंसा में भी धर्मका पालन करते रहते थे। वे अपनी वृद्धा माताका सत्कार करते थे और पिताको भी संतुष्ट रखते थे ॥ २२ ॥

यदा माता पिता चैव संयुक्तौ कालधर्मणा।
तदा धनूंषि ते त्यक्त्वा वने प्राणानवासृजन् ॥ २३ ॥

जब उनके माता-पिता मर गये, तब उन्होंने अपने-अपने धनुषका परित्याग कर वनमें (अनशन आदिके द्वारा) अपने प्राण त्याग दिये ॥ २३ ॥

शुभेन कर्मणा तेन जाता जातिस्मरा मृगाः।
त्रासानुत्पाद्य संविग्ना रम्ये कालञ्जरे गिरौ ॥ २४ ॥

(माता-पिताकी सेवारूप) शुभ कर्मके कारण वे पूर्व-जन्मका स्मरण रखनेवाले मृग बनकर उत्पन्न हुए। (पहले हिंसाके द्वारा दूसरोंको) त्रास देनेके कारण वे रमणीय कालञ्जर पर्वतपर सदा उद्विग्न रहते थे ॥ २४ ॥

उन्मुखो नित्यवित्रस्तः स्तब्धकर्णो विलोचनः।
पण्डितो घस्मरो नादी नामतस्तेऽभवन् मृगाः ॥ २५ ॥