भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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हरिवंशपर्व ] एकविंशोऽध्यायः ७७


(के शेष भाग) को मैं तुमसे कहूँगा ॥ १४०-१४१ ॥

श्राद्धस्य फलमुद्दिश्य नियतं सुकृतस्य च ।
तन्निबोध महाराज सप्तजातिषु भारत ॥ १४२॥
सगालवस्य चरितं कण्डरीकस्य चैव हि ।
ब्रह्मदत्ततृतीयानां योगिनां ब्रह्मचारिणाम् ॥ १४३॥

महाराज ! भरतनन्दन ! भलीभाँति किये गये श्राद्धके नियत पुण्यफलको लक्ष्यमें रखकर कहे गये, गालव, कण्डरीक और तीसरे ब्रह्मदत्त—इन ब्रह्मचारी योगियोंके सातों जन्मोंके चरित्रको तुम सावधान होकर सुनो ॥ १४२-१४३॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पूजनीयोपाख्याने चटकाख्यानं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पूजनीयोपाख्यानमें चटक (चिड़िये) की कथा नामक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥


एकविंशोऽध्यायः

पितृकल्प—मार्कण्डेयजीद्वारा श्राद्धकी महिमाका वर्णन, श्राद्धके फलसे कौशिक-पुत्रोंको उत्तम जन्मकी प्राप्ति

मार्कण्डेय उवाच
श्राद्धे प्रतिष्ठितो लोकः श्राद्धे योगः प्रवर्तते ।
हन्त ते वर्तयिष्यामि श्राद्धस्य फलमुत्तमम् ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी बोले— यह सारा संसार श्राद्धमें ही प्रतिष्ठित है और श्राद्धसे ही योग सम्पन्न होता है। अतः मैं तुमसे श्राद्धके उत्तम फलका वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥

ब्रह्मदत्तेन यत् प्राप्तं सप्तजातिषु भारत ।
तत एव हि धर्मस्य बुद्धिर्निर्वर्तते शनैः ॥ २ ॥

भारत ! ब्रह्मदत्तने (भारद्वाज, कौशिक, व्याध, मृग, चक्रवाक, हंस और श्रोत्रिय—इन) सात जन्मोंमें जो (श्राद्ध) धर्मका फल पाया था, उसको सुननेसे शनैः-शनैः धर्म-बुद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ २ ॥

पीडयाप्यथ धर्मस्य कृते श्राद्धे परानघ ।
यत् प्राप्तं ब्राह्मणैः पूर्वं तन्निबोध महामते ॥ ३ ॥

निष्पाप महामते ! प्राचीन कालमें कुछ ब्राह्मणोंने (हिंसारूपी अधर्मके द्वारा) धर्मको पीड़ित करनेपर भी श्राद्ध करके जो फल पाया था, उसे तुम सुनो ॥ ३ ॥

ततोऽहं तानधर्मिष्ठान् कुरुक्षेत्रे पितृव्रतान् ।
सनत्कुमारनिर्दिष्टानपश्यं सप्त वै द्विजान् ॥ ४ ॥
दिव्येन चक्षुषा तेन यानुवाच पुरा विभुः ।

विभु सनत्कुमारजीने जिनका वर्णन किया था, मैने अपने दिव्य नेत्रसे सनत्कुमारजीके बताये हुए उन सात ब्राह्मणोंको अधर्ममे परायण होनेपर भी कुरुक्षेत्रमें श्राद्ध करते देखा ॥ ४½ ॥

वाग्दुष्टः क्रोधनो हिंस्रः पिशुनः कविरेव च ।
खसृमः पितृवर्ती च नामभिः कर्मभिस्तथा ॥ ५ ॥

उनके नाम इस प्रकार थे—वाग्दुष्ट, क्रोधन, हिंस्र, पिशुन, कवि, खसृम (ख अर्थात् आकाशमें सरण करने—विचरनेके स्वभाववाला परलोकार्थी) और पितृवर्ती। जैसे उनके नाम थे, वैसे ही उनके कर्म थे ॥ ५ ॥

कौशिकस्य सुतास्तात शिष्या गार्ग्यस्य भारत ।
पितुर्युपरते सर्वे व्रतवन्तस्तदाभवन् ॥ ६ ॥

तात ! भारत ! वे कौशिक (विश्वामित्र) के पुत्र थे और जब इनके पिता विश्वामित्र* शाप देकर उदासीन हो गये, तब वे सभी गार्ग्यके शिष्य बनकर (ब्रह्मचर्य) व्रतका पालन करनेके लिये उनके यहाँ रहने लगे ॥ ६ ॥

विनियोगाद् गुरोस्तस्य गां दोग्ध्रीं समकालयन् ।
समानवत्सां कपिलां सर्वे न्यायागतां तदा ॥ ७ ॥
तेषां पथि क्षुधार्तानां बाल्यान्मोहाच्च भारत ।
क्रूरा बुद्धिः सम्भवत् तां गां वै हिंसितुं तदा ॥ ८ ॥

भारत ! एक समय वे सब गुरुके आज्ञा देनेपर उनकी दुधार कपिला गौ और उसके कपिल वर्णके बछड़ेको वनमे चरानेके लिये ले गये। वह गौ गुरु गार्ग्यको न्यायतः प्राप्त हुई थी। मार्गमें क्षुधासे पीड़ित होनेके कारण उन्होंने मोह और मूर्खताके कारण गौको मारनेका क्रूर विचार किया ॥ ७-८ ॥

तान् कविः खसृमश्चैव याचेते नेति वै तदा ।
न चाशक्नुवन्त ते ताभ्यां तदा वारयितुं द्विजाः ॥ ९ ॥


* विश्वामित्रने अपने पचास पुत्रोंको शाप देते हुए कहा था—तुम्हारे वंशका अन्त हो जाय, तुम अपनी प्रजाका भक्षण करो अर्थात् अब तुम्हारे पुत्र आदि ब्राह्मण नहीं कहलायेंगे। इस प्रकार तुम अपनी प्रजा (के ब्राह्मणत्व) का भक्षण करोगे। उन पचास पुत्रोंमेंसे ये वाग्दुष्ट आदि भी हैं। सुना जाता है कि अन्ध्र, पुण्ड्र आदि भी इनकी ही संतानें हैं। (नीलकण्ठी)