भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 99

७६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

अपि मार्दवभावेन गात्रं संलीय बुद्धिमान् ।
अरिं नाशयते नित्यं यथा वल्लीर्महाद्रुमम् ॥१२६॥
जैसे लता अपने शरीरको बचाये रखकर कोमलतासे महावृक्षका आलिङ्गन करके उसे सुखा देती है, उसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुष भी अपने शरीरकी सदा रक्षा करते हुए नम्रता-पूर्वक शत्रु का नाश कर देते हैं ॥ १२६ ॥

मृदुराद्र्रः कृशो भूत्वा शनैः संलीयते रिपुः ।
वल्मीक इव वृक्षस्य पश्चान्मूलानि कृन्तति ॥१२७॥
जैसे दीमक कृश होनेपर भी आर्द्र (स्निग्ध) हो वृक्षमें लगकर शनैः-शनैः उसकी जड़को काट डालता है, इसी प्रकार शत्रु दुर्बल होनेपर भी स्निग्ध बनकर (स्नेह दिखाकर) शरीरमें घुस आता (और अवसर पानेपर) जड़से उखाड़ फेंकता है ॥ १२७ ॥

अद्रोहसमयं कृत्वा मुनीनामग्रतो हरिः।
जघान नमुचिं पश्चादपां फेनेन पार्थिव ॥१२८॥
राजन् ! इन्द्रने मुनियोंके सामने द्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा करके भी पीछे जलके फेनसे नमुचिको मार डाला था ॥ १२८ ॥

सुप्तं मत्तं प्रमत्तं वा घातयन्ति रिपुं नराः ।
विषेण वह्निना वापि शस्त्रेणाप्यथ मायया ॥१२९॥
मनुष्य सोये हुए, मतवाले तथा उन्मत्त शत्रुको विष, अग्नि, शस्त्र अथवा छल-कपटसे भी मार डालते हैं ॥ १२९ ॥

न च शेषं प्रकुर्वन्ति पुनर्बैरभयान्नराः ।
घातयन्ति समूलं हि श्रुत्वेमामुपमां नृप ॥१३०॥
राजन् ! मनुष्य बार-बारके वैर होनेके भयसे शत्रुको शेष नहीं रखते, वे तो इस निम्नाङ्कित उपमाको सुनकर शत्रुको जड़से ही नष्ट कर डालते हैं ॥ १३० ॥

शत्रुशेषमृणाच्छेषं शेषमग्नेश्च भूमिप ।
पुनर्वर्धेत सम्भूय तस्माच्छेषं न शेषयेत् ॥१३१॥
भूपाल ! यदि शत्रुको, ऋणको अथवा अग्निको (थोड़ा-सा भी) बाकी रहने दिया जाय तो ये फिर इकट्ठा होकर बढ़ने लगते हैं, अतः इनके शेषको भी शेष न रहने दे ॥ १३१ ॥

हसते जल्पते वैरी एकपात्रे भुनक्ति च ।
एकासनं चारोहति स्मरते तच्च किल्बिषम् ॥१३२॥
शत्रु यद्यपि एक साथ हँसता है, बोलता है, एक ही पात्रमें साथ-साथ भोजन भी करता है और एक ही आसनपर साथ-साथ बैठता है, तथापि पूर्व वैरका स्मरण तो करता ही रहता है ॥ १३२ ॥

कृत्वा सम्बन्धकं चापि विश्वसेच्छत्रुणा न हि ।
पुलोमानं जघानाजौ जामाता सन्शतक्रतुः ॥१३३॥
शत्रुसे सम्बन्ध करके भी उसके ऊपर विश्वास न करे; क्योंकि इन्द्रने जामाता (दामाद) होकर भी पुलोमाको युद्धमें मार डाला था ॥ १३३ ॥

निधाय मनसा वैरं प्रियं वक्तीह यो नरः।
उपसर्पेन्न तं प्राज्ञः कुरङ्ग इव लुब्धकम् ॥१३४॥
जो मनुष्य मनमें वैरको छिपाये हुए प्रिय बातें करता है, बुद्धिमान् पुरुष (उसपर विश्वास करके) उसके पास न जाय; ठीक उसी तरह, जैसे मृग बहेलियेके निकट नहीं जाता ॥ १३४ ॥

न चासन्ने निवस्तव्यं सवैरे वर्धिते रिपौ।
पातयेत् तं समूलं हि नदीरय इव द्रुमम् ॥१३५॥
यदि वैर रखनेवाला शत्रु बढ़ रहा हो तो उसके पास निवास नहीं करना चाहिये; क्योंकि जैसे बढ़ती हुई नदीका वेग वृक्षको गिरा देता है, इसी प्रकार वह उसको जड़से उखाड़ डालता है ॥ १३५ ॥

अमित्रादुन्नतिं प्राप्य नोन्नतोऽस्मीति विश्वसेत्।
तस्मात् प्राप्योन्नतिं नश्येत् प्रावार इव कीटकः ॥१३६॥
शत्रुसे उन्नति पानेपर 'मैं भी उन्नत हो गया हूँ' ऐसा विश्वास न करे। उससे उन्नति पानेपर भी मनुष्य प्रावार-कीट (पाँखवाले चींटे) की तरह नष्ट हो जाता है ॥ १३६ ॥

इत्येता ह्युशनोगीता गाथा धार्या विपश्चिता ।
कुर्वता चात्मरक्षां वै नरेण पृथिवीपते ॥१३७॥
पृथिवीनाथ ! विद्वान् पुरुष आत्मरक्षा करता हुआ शुक्राचार्यकी गायी हुई इन गाथाओंको अपने मनमें स्मरण रखे॥

मया सकिल्बिषं तुभ्यं प्रयुक्तमतिदारुणम् ।
पुत्रमन्धं प्रकुर्वन्त्या तस्मान्नो विश्वसे त्वयि ॥१३८॥
मैंने आपके पुत्रको अंधा बनाकर अति दारुण अपराध किया है, अतः अब मैं आपका विश्वास नहीं करूँगी ॥ १३८ ॥

एवमुक्त्वा प्रदुद्राव तदाऽऽकाशं पतत्रिणी ।
इत्येतत् ते मयाख्यातं पुराभूतमिदं नृप ॥१३९॥
ब्रह्मदत्तस्य राजेन्द्र यद् वृत्तं पूजनीयया ।
राजन् ! इस प्रकार कहकर वह चिड़िया आकाशमें उड़ गयी। राजेन्द्र ! प्राचीन कालमें ब्रह्मदत्तका पूजनीयाके साथ जो संवाद हुआ था, वह मैंने तुमसे कह दिया ॥ १३९½ ॥

श्राद्धं च पृच्छसे यन्मां युधिष्ठिर महामते ॥१४०॥
अतस्ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् ।
गीतं सनत्कुमारेण मार्कण्डेयाय पृच्छते ॥१४१॥
महामति युधिष्ठिर ! अब तुम जिस श्राद्ध-विषयको मुझसे पूछ रहे थे, उसे सुनाता हूँ। मार्कण्डेयजीके पूछनेपर सनत्कुमारजीने जो कुछ कहा था, उसी प्राचीन इतिहास

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