भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 98

हरिवंशपर्व ] विंशोऽध्यायः [ ७५


जाते हुए और चिरकालसे अपने घरमें रहनेवालेकी रक्षा सदा करनी चाहिये ॥ ११०-१११ ॥

अपालयन्नरो याति कुम्भीपाकमसंशयम्।
कथमस्य हविर्देवा गृह्णन्ति पितरः स्वधाम् ॥११२॥

'यदि मनुष्य इनकी रक्षा नहीं करता है तो वह निस्सन्देह कुम्भीपाक नरकमें पड़ता है। देवता ऐसे पुरुषकी हविको और पितर स्वधाको भला कैसे ग्रहण कर सकते हैं' ॥

एवमुक्त्वा महाराज दशधर्मगता सती।
शोकार्ता तस्य बालस्य चक्षुषी निर्बिभेद सा ॥११३॥
कराभ्यां राजपुत्रस्य ततस्तच्चक्षुरस्फुटत्।
कृत्वा चान्धं नृपसुतमुत्पपात ततोऽम्बरम् ॥११४॥

महाराज ! राजासे यों कहकर शोकसे आतुर होनेके कारण दशधर्म* को प्राप्त हुई उस पूजनीयाने अपने दोनों पञ्जोंसे उस राजकुमारके दोनों नेत्रोंको विदीर्ण कर दिया, जिससे उसकी आँखें फूट गयीं। इस प्रकार राजकुमारको अन्धा कर देनेके पश्चात् पूजनीया आकाशमें उड़ गयी ॥ ११३-११४ ॥

अथ राजा सुतं दृष्ट्वा पूजनीयामुवाच ह।
विशोका भव कल्याणि कृतं ते भीरु शोभनम् ॥११५॥

तब राजाने पुत्रकी ओर देखकर पूजनीयासे कहा—'कल्याणि ! अब तू शोकरहित हो जा। भीरु ! तूने बहुत अच्छा किया ॥ ११५ ॥

गतशोका निवर्तस्व अजर्यं सख्यमस्तु ते।
पुरेव वस भद्रं ते निवर्तस्व रमस्व च ॥११६॥

'अब तू शोकरहित होकर लौट आ। तेरी मैत्री सुदृढ़ बनी रहे। तेरा कल्याण हो, तू लौट आ और आनन्दपूर्वक पहलेकी भाँति यहीं रह ॥ ११६ ॥

पुत्रपीडोद्भवश्चापि न कोपः परमस्त्वयि।
ममास्ति सखि भद्रं ते कर्तव्यं च कृतं त्वया ॥११७॥

'सखि ! तेरा कल्याण हो। पुत्रको पीड़ा देनेपर भी मैं तेरे ऊपर कुपित नहीं हुआ हूँ। तूने वही किया, जो करना चाहिये था' ॥ ११७ ॥

पूजनीयोवाच

आत्मौपम्येन जानामि पुत्रस्नेहं तवाप्यहम्।
न चाहं वस्तुमिच्छामि तव पुत्रमचक्षुषम्।
कृत्वा वै राजशार्दूल त्वद् गृहे कृतकिल्बिषा ॥११८॥

नृपश्रेष्ठ ! मैं अपने ही समान तुम्हारे पुत्र-प्रेमको भी जानती हूँ, अतः तुम्हारे पुत्रको नेत्रहीन करनेके कारण अपराधिनी होकर तुम्हारे घरमें रहना नहीं चाहती ॥ ११८ ॥


* मनुष्यको व्याकुल और विवेकहीन बना देनेवाली जो क्रोध आदिकी दश दशायें हैं, उनको दशधर्म कहते हैं। देखिये पृ० ४९ की टिप्पणी।


गाथाश्चाप्युशनोगीता इमाः शृणु मयेरिताः।
कुमित्रं च कुदेशं च कुराजानं कुसौहृदम्।
कुपुत्रं च कुभार्यां च दूरतः परिवर्जयेत् ॥११९॥

आप मुझसे शुक्राचार्यकी गायी हुई इन गाथाओंको सुनें, 'खोटे मित्र, खोटे देश, खोटे राजा, खोटे सुहृद्-बन्धु, खोटे पुत्र तथा खोटी भार्याको दूरसे ही त्याग देना चाहिये' ॥ ११९॥

कुमित्रे सौहृदं नास्ति कुभार्यायां कुतो रतिः।
कुतः पिण्डः कुपुत्रे वै नास्ति सत्यं कुराजनि ॥१२०॥

खोटे मित्रमें प्रेम नहीं होता, कुभार्यासे सुख नहीं मिल सकता, कुपुत्रसे पिण्ड मिलना कठिन है और कुराजासे सत्य (न्याय) की आशा नहीं की जा सकती है ॥ १२० ॥

कुसौहृदे क विश्वासः कुदेशे न तु जीव्यते।
कुराजनि भयं नित्यं कुपुत्रे सर्वतोऽसुखम् ॥१२१॥

कुमित्रपर भला विश्वास कैसे हो सकता है और कुदेशमें जीना भी सम्भव नहीं है। खोटे राजासे सर्वदा भय बना रहता है और कुपुत्रसे तो सब प्रकारसे दुःख ही मिलता है ॥ १२१ ॥

अपकारिणि विश्रम्भं यः करोति नराधमः।
अनाथो दुर्बलो यद्वन्न चिरं स तु जीवति ॥१२२॥

जो अधम मनुष्य अपराधीपर विश्वास करता है, वह अनाथ और दुर्बल मनुष्यकी भाँति चिरकालतक जीवित नहीं रह सकता ॥ १२२ ॥

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद् भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥१२३॥

अविश्वासीका विश्वास न करे और विश्वासीपर भी अधिक विश्वास न करे; क्योंकि ऐसे लोगोंपर विश्वास करनेसे जो भय उत्पन्न होता है, वह जड़को भी काट डालता है ॥ १२३ ॥

राजसेविषु विश्वासं गर्भसंकरितेषु च।
यः करोति नरो मूढो न चिरं स तु जीवति ॥१२४॥

जो मनुष्य राजसेवकों तथा संकर जातियोंपर विश्वास करता है, वह मूढ चिरकालतक जीवित नहीं रह सकता ॥ १२४ ॥

अप्युन्नतिं प्राप्य नरः प्रावारः कीटको यथा।
स विनश्यत्यसंदेहमाहैवमुशना नृप ॥१२५॥

राजन् ! जैसे पंख निकलनेपर ऊपरको उड़ा हुआ चींटा मौतके मुखमें चला जाता है, उसी प्रकार ऐसे पुरुषोंपर विश्वास रखनेवाला पुरुष भी मारा जाता है, इसमें कुछ संदेह नहीं है—ऐसा शुक्राचार्यका कथन है ॥ १२५ ॥