भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 97
७४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

स बालो ब्रह्मदत्तस्य पूजनीयासुतश्च ह।
ते फले भक्षयित्वा च पृथकौ प्रीतमानसौ ॥ ९४ ॥
अभूतां नित्यमेवेह खादन्तौ तौ च ते फले।
ब्रह्मदत्तका बालक और पूजनीयाका बच्चा—ये दोनों उन फलोंको खाकर बड़े प्रसन्न होते थे। इस प्रकार वे दोनों नित्य ऐसे फलोंको खाया करते थे ॥ ९४॥

तस्यां गतायामथ च पूजन्यां वै सदाहनि ॥ ९५ ॥
शिशुना चटकेनाथ धात्री तं तु शिशुं नृप।
तेन प्रक्रीडयामास ब्रह्मदत्तात्मजं सदा ॥ ९६ ॥
नीडात् तमाकृष्य तदा पूजनीयाकृतात् ततः।
राजन् ! प्रतिदिन उस पूजनीके चले जानेपर राजकुमारकी धाय उस चिड़ियाके बनाये हुए घोंसलेसे उसके बच्चेको खींचकर उसके द्वारा ब्रह्मदत्तके शिशु पुत्रको खेलाया करती थी ॥ ९५-९६॥

क्रीडता राजपुत्रेण कदाचिच्चटकः स तु ॥ ९७ ॥
निगृहीतः कन्धरायां शिशुना दृढमुष्टिना।
दुर्भेद्यमुष्टिना राजन्रसूनू सद्यस्त्वजीजहत् ॥ ९८ ॥
एक समय उस शिशु राजकुमारने खेलते-खेलते अपनी सुदृढ़ मुट्ठीमें उस बच्चेका गला पकड़ लिया। राजन् ! राजकुमारकी मुट्ठी बड़ी कठिनतासे खुल सकती थी। (अतएव दबाव पड़नेके कारण) उस चिड़ियाके बच्चेने तत्काल ही अपने प्राण त्याग दिये ॥ ९७-९८ ॥

तं तु पञ्चत्वमापन्नं व्यात्तास्यं बालघातितम्।
कथंचिन्मोचितं दृष्ट्वा नृपतिर्दुःखितोऽभवत् ॥ ९९ ॥
राजा ब्रह्मदत्तने उसको किसी प्रकार अपने पुत्रके हाथसे छुड़ाया; परंतु उसे मरा, मुख फैलाकर पड़ा हुआ तथा अपने बालकके द्वारा मारा गया देखकर वे दुखी हो गये ॥ ९९ ॥

धात्रीं तस्य जगर्हे तां तदाश्रुपरमो नृपः।
तस्थौ शोकान्वितो राजञ्छोचंस्तं चटकं तदा ॥१००॥
राजन् ! तब ब्रह्मदत्तने शोकाकुल हो नेत्रोंमें आँसू भरकर उस धायकी निन्दा की। फिर वे खड़े-खड़े उस बच्चेके लिये शोक करने लगे ॥ १०० ॥

पूजनीयापि तत्काले गृहीत्वा तु फलद्वयम्।
ब्रह्मदत्तस्य भवनमाजगाम वनेचरी ॥१०१॥
उसी समय वनमें विचरण करनेवाली पूजनीया भी दो फलोंको लेकर ब्रह्मदत्तके भवनमें आ पहुँची ॥ १०१ ॥

अथापश्यत् तमागम्य गृहे तस्मिन् नराधिप।
पञ्चभूतपरित्यक्तं शावं तं स्वतनुद्भवम् ॥१०२॥
राजन् ! उस भवनमें आकर उसने अपने शरीरसे उत्पन्न हुए बच्चेको पञ्चभूतोंसे रहित मुर्देके रूपमें देखा ॥ १०२ ॥

सुमोह दृष्ट्वा तं पुत्रं पुनः संज्ञामथालभत्।
लब्धसंज्ञा च सा राजन् विललाप तपस्विनी ॥१०३॥
राजन् ! पुत्रकी ऐसी दशा देखकर वह मूर्च्छित हो गयी। कुछ देर बाद उसे फिर चेतना आयी, तब वह तपस्विनी विलाप करने लगी ॥ १०३ ॥

पूजनीयोवाच
न तु त्वमागतां पुत्र वाशन्तीं परिसर्पसि।
कुर्वंश्चाटुसहस्त्राणि अव्यक्तकलया गिरा ॥१०४॥
पूजनीया बोली-पुत्र ! मैं आकर कूँ-कूँ शब्द कर रही हूँ, तब भी तू अस्फुट (तोतली) होनेसे मनोहर लगनेवाली वाणीमें हजारों बातें करता हुआ मेरे सामने क्यों नहीं आता ? ॥ १०४ ॥

व्यादितास्यः क्षुधार्तश्च पीतेनास्येन पुत्रक।
शोणेन तालुना पुत्र कथमद्य न सर्पसि ॥१०५॥
पुत्र ! क्षुधासे पीड़ित होकर अपने लाल-लाल तालु तथा पीली चोंचवाले मुखको खोलकर तू मेरे पास आज क्यों नहीं आता ? ॥ १०५ ॥

पक्षाभ्यां त्वां परिष्वज्य ननु वाशामिचाप्यहम्।
चीचीकूचीति वाशन्तं त्वामद्य न शृणोमि किम् ॥१०६॥
मैं तुझे अपने पंखोंसे लपेटकर रो रही हूँ, तब भी मैं तुझे चीं-चीं, कूँ-कूँ शब्द करता हुआ क्यों नहीं सुनती ? ॥

मनोरथो यस्तु मम पश्येयं पुत्रकं कदा।
व्यात्तास्यं वारि याचन्तं स्फुरत्पक्षं ममाग्रतः ॥१०७॥
स मे मनोरथो भग्नस्त्वयि पञ्चत्वमागते।
विलप्यैवं बहुविधं राजानमथ साब्रवीत् ॥१०८॥
मेरे मनमें जो यह अभिलाषा थी कि मैं अपने सामने अपने पुत्रको परोंको फटफटाकर चोंच फैलाकर जल माँगता हुआ कब देखूँगी, सो मेरा वह मनोरथ तेरे मरनेसे नष्ट हो गया—यों अनेक तरहसे विलाप करके वह राजासे बोली ॥ १०७-१०८ ॥

ननु मूर्धाभिषिक्तस्त्वं धर्मं वेत्सि सनातनम्।
अथ कस्मान्मम सुतं धात्र्या घातितवानसि ॥१०९॥
तव पुत्रेण चाकृष्य क्षत्रियाधम शंस मे।
'हे क्षत्रियाधम ! तू तो मूर्धाभिषिक्त (सम्राट्) राजा है और सनातनधर्मको जाननेवाला है, तो भी तूने मेरे बच्चेको धायसे और अपने पुत्रसे खिंचवाकर क्यों मरवा डाला ? इस बातका तू उत्तर दे ॥ १०९॥

न च नूनं श्रुता तेऽभूदियमाङ्गिरसी श्रुतिः ॥११०॥
शरणागतः क्षुधार्तश्च शत्रुभिश्वाभ्युपद्रुतः।
चिरोषितश्च स्वगृहे पातव्यः सर्वदा भवेत् ॥१११॥
'क्या तूने यह आङ्गिरसी श्रुति नहीं सुनी है कि 'शरणमें आये हुए, भूखसे व्याकुल, शत्रुओंद्वारा पीछा किये

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