भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

हरिवंशपर्व ] [ विंशोऽध्यायः ] ७३


युधिष्ठिर उवाच

किमर्थं ब्रह्मदत्तस्य पूजनीया शकुन्तिका।
अन्धं चकार गाङ्गेय ज्येष्ठं पुत्रं पुरा विभो ॥ ७७ ॥

युधिष्ठिरने पूछा—समर्थ गङ्गानन्दन ! पहले पूजनीया चिड़ियाने ब्रह्मदत्तके ज्येष्ठ पुत्रको अंधा क्यों कर दिया था ? ॥ ७७ ॥

चिरोषिता गृहे चापि किमर्थं चैव यस्य सा ।
चकार विप्रियमिदं तस्य राज्ञो महात्मनः ॥ ७८ ॥

वह जिसके महलमें बहुत समयसे रहती थी, उसी महात्मा राजाका उसने ऐसा अनिष्ट क्यों किया? ॥ ७८ ॥

पूजनीया चकारासौ किं सख्यं तेन चैव ह।
एतन्मे संशयं छिन्धि सर्वमुक्तवा यथातथम् ॥ ७९ ॥

उस पूजनीयाने उनके साथ मित्रता क्यों की थी ? आप इन सब बातोंको यथार्थ रीतिसे बताकर मेरे सारे संदेहोंको दूर कर दें ॥ ७९ ॥

भीष्म उवाच

शृणु सर्वं महाराज यथावृत्तमभूत् पुरा।
ब्रह्मदत्तस्य भवने तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ८० ॥

भीष्मजीने कहा—महाराज युधिष्ठिर ! प्राचीनकालमें ब्रह्मदत्तके महलमें जो घटना घटी थी, उसे तुम पूर्णरूपसे सुनो ॥ ८० ॥

काविच्छकुन्तिका राजन् ब्रह्मदत्तस्य वै सखी ।
शितिपक्षा शोणशिराः शितिपृष्ठा शितोदरी ॥ ८१ ॥

राजन् ! एक चिड़िया थी, जिसका राजा ब्रह्मदत्तसे स्नेह हो जानेके कारण वह उनकी सहचरी बन गयी थी। उसके दोनों पंख, पीठ और उदरका भाग तो काला था; परंतु मस्तकका रंग लाल था ॥ ८१ ॥

सखी सा ब्रह्मदत्तस्य सुदृढं बद्धसौहृदा ।
तस्याः कुलायमभवद् गेहे तस्य नरोत्तम ॥ ८२ ॥

नरोत्तम ! राजा ब्रह्मदत्तकी वह सहचरी उनके सुदृढ़ स्नेहपाशमें बँध गयी थी; अतः उन्हींके महलमें उसका घोंसला था ॥ ८२ ॥

सा सदाहनि निर्गत्य तस्य राज्ञो गृहोत्तमात् ।
चचाराम्भोधितीरेषु पल्वलेषु सरस्सु च ॥ ८३ ॥

वह दिनमें निरन्तर उस राजाके उत्तम महलसे निकलकर समुद्रके किनारे तथा तालाबों और तलैयाँपर विचरती थी ॥ ८३ ॥

नदीपर्वतकुञ्जेषु वनेषूपवनेषु च।
प्रफुल्लेषु तडागेषु कह्लारेषु सुगन्धिषु ॥ ८४ ॥
कुमुदोत्पलकिञ्जल्कसुरभीकृतवायुषु ।
हंससारसघुष्टेषु कारण्डवरुतेषु च ॥ ८५ ॥
चरित्वा तेषु सा राजन् निशि काम्पिल्यमागमत् ।

राजन् ! वह नदी, पर्वत, कुञ्ज, वन और उपवनोंमें तथा जिनमें सुगन्धित कमल खिले हुए थे, जहाँकी वायु कुमुद, उत्पल और किञ्जल्ककी सुगन्धसे वासित थी एवं जो हंस, सारस और कारण्डवके कलरवोंसे गुंजायमान थे—ऐसे तड़ागोंपर घूम-घामकर वह रात्रिके समय काम्पिल्यनगरमें लौट आती थी ॥ ८४-८५ १/२ ॥

नृपतेर्भवनं प्राप्य ब्रह्मदत्तस्य धीमतः ॥ ८६ ॥
राज्ञा तेन सदा राजन् कथायोगं चकार सा ।

राजन् ! वह बुद्धिमान् राजा ब्रह्मदत्तके महलमें पहुँचकर उस राजासे प्रतिदिन बातें किया करती थी ॥ ८६ १/२ ॥

आश्चर्याणि च दृष्टानि यानि वृत्तानि कानिचित् ॥ ८७ ॥
चरित्वा विविधान् देशान् कथयामास सा निशि ।

वह बहुत-से देशोंमें घूमकर जो कुछ आश्चर्यजनक घटनाएँ देखती थी, रात्रिके समय उन्हें (राजासे) कहा करती थी ॥ ८७ १/२ ॥

कदाचित् तस्य नृपतेर्ब्रह्मदत्तस्य कौरव ॥ ८८ ॥
पुत्रोऽभूद् राजशार्दूल सर्वसेनेति विश्रुतः।
पूजनीयाथ सा तस्मिन् प्रसूताण्डमथापि च ॥ ८९ ॥

कुरुवंशी राजशार्दूल ! एक समय राजा ब्रह्मदत्तके पुत्र हुआ, जिसका नाम सर्वसेन रखा गया । उसी समय उस पूजनीयाने भी वहाँ एक अंडा दिया ॥ ८८-८९ ॥

तस्मिन् नीडे पुरा ह्येकं तत्किल प्रास्फुटत् तदा ।
स्फुटितो मांसपिण्डस्तु बाहुपादास्र्यसंयुतः ॥ ९० ॥
बभूवक्त्रश्चक्षुर्हीनो बभूव पृथिवीपते ।
चक्षुष्मानप्यभूत् पश्चाद्दीप्तपक्षोत्थितश्च ह ॥ ९१ ॥

पृथिवीपते ! एक दिन उस घोंसलेमें उसका वह एक अण्डा फूटा और उसमेंसे एक मांस-पिण्ड निकला, जो हाथ-पैर और मुखसे युक्त था । उसका मुँह भूरे रंगका था; परंतु नेत्र नहीं प्रकट हुए थे। कुछ समय बाद उसके नेत्र खुल गये और उसमें छोटे-छोटे पंख भी निकल आये ॥ ९०-९१ ॥

अथ सा पूजनीया वै राजपुत्रस्वपुत्रयोः ।
तुल्यस्नेहात् प्रीतिमती दिवसे दिवसेऽभवत् ॥ ९२ ॥

तदनन्तर वह पूजनीया अपने बच्चे और राजकुमारपर समान स्नेह होनेके कारण प्रतिदिन एक-सी प्रीति रखने लगी ॥ ९२ ॥

आजहार सदा सायं चञ्च्वामृतफलद्वयम् ।
अमृतास्वादसदृशं सर्वसेनतनूजयोः ॥ ९३ ॥

वह सदा सायंकालमें अमृतके समान स्वादिष्ट रससे भरे हुए दो फल सर्वसेन और अपने बच्चेके लिये अपनी चोंचमें लाया करती थी ॥ ९३ ॥