विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] चतुर्विंशतितमोऽध्यायः [ ८५
'यही अवसर है' यह समझकर वे ब्राह्मण राजाको और उनके दोनों मन्त्रियोंको उसी समय श्लोक सुनाने लगे ॥१९॥
सप्त व्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ ।
चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे ॥ २० ॥
तेऽभिजाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
प्रस्थिता दीर्घमध्वानं यूयं किमवसीदथ ॥ २१ ॥
'जो दशार्ण देशमें व्याध, कालञ्जर पर्वतपर मृग, शरद्वीपमें चक्रवाक तथा मानस-सरोवरमें हंस हुए थे, उनमेंसे हम चार तो कुरुक्षेत्रमें वेद-पारगामी कुलीन ब्राह्मण होकर दीर्घमार्गपर चले आये हैं, (अर्थात् योगसाधना करके मुक्त हो गये। अब शेष बचे हुए) तुम (तीन व्यक्ति योगमार्गसे भ्रष्ट होकर) क्यों कष्ट पा रहे हो ?' ॥ २०-२१ ॥
तच्छ्रुत्वा मोहमगमद् ब्रह्मदत्तो नराधिपः ।
सचिवश्चास्य पाञ्चाल्यः कण्डरीकश्च भारत ॥ २२ ॥
भारत ! राजा ब्रह्मदत्त वह श्लोक सुनकर मूर्च्छित हो गये और उनके मन्त्री पाञ्चाल तथा कण्डरीककी भी वही दशा हुई ॥ २२ ॥
स्रस्तरश्मिप्रतोदौ तौ पतितव्यजनावुभौ ।
दृष्ट्वा बभूवुरस्वस्थाः पौराश्च सुहृदस्तथा ॥ २३ ॥
कण्डरीकके हाथमेंसे चाबुक और बागडोर छूट गयीं तथा पाञ्चालके हाथमेंसे भी चँवर और पंखा छूटकर नीचे गिर पड़े। नगरनिवासी और मित्रवर्ग राजा तथा दोनों मन्त्रियोंकी इस दशाको देखकर खिन्न हो गये ॥ २३ ॥
मुहूर्तमिव राजा स सह ताभ्यां रथे स्थितः ।
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां प्रत्यागच्छदरिंदमः ॥ २४ ॥
दोनों मन्त्रियोंसहित शत्रुदमन राजा ब्रह्मदत्त रथमें दो घड़ीतक मूर्च्छित पड़े रहे । तत्पश्चात् उन्हें होश आया और ये अपने नगरमें लौट आये ॥ २४ ॥
ततस्ते तत्सरः स्मृत्वा योगं तमुपलभ्य च ।
ब्राह्मणं विपुलैरर्थैर्भोगैश्च समयोजयन् ॥ २५ ॥
तदनन्तर उन तीनोंको उस सरोवरका ध्यान आ गया और अपने पूर्व-जन्मके योगका भी स्मरण होने लगा। तब उन्होंने उस ब्राह्मणको बहुत-सा धन और भोग-पदार्थ दिये ॥ २५ ॥
अभिषिच्य स्वराज्ये तु विष्वक्सेनमरिंदमम् ।
जगाम ब्रह्मदत्तोऽथ सदारो वनमेव ह ॥ २६ ॥
फिर ब्रह्मदत्तने अपने राज्यपर शत्रुदमन विष्वक्सेनका अभिषेक किया और अपनी स्त्रीको साथमें लेकर वनको चल दिये ॥ २६ ॥
अथैनं संततिर्धीरा देवलस्य सुता तदा ।
उवाचं परमप्रीता योगाद् वनगतं नृपम् ॥ २७ ॥
तदनन्तर योग-साधन करनेके लिये वनमें आये हुए राजा ब्रह्मदत्तसे देवलकी पुत्री धीरस्वभावा संततिने परम प्रसन्न होकर कहा— ॥ २७ ॥
जानन्त्या ते महाराज पिपीलिकरुतज्ञताम् ।
चोदितः क्रोधमुद्दिश्य सक्तः कामेषु वै मया ॥ २८ ॥
महाराज ! मैं यह बात जानती थी कि आप चींटीकी बोलीको समझ सकते हैं, तब भी मैंने आपको संसारके भोगोंमें आसक्त देख यह क्रोधका नाटक रचकर आपको योगकी ओर प्रेरित किया है ॥ २८ ॥
इतो वयं गमिष्यामो गतिमिष्टामनुत्तमाम् ।
तव चान्तर्हितो योगस्ततः संस्मारितो मया ॥ २९ ॥
अब हम परम उत्तम अभीष्ट गतिको प्राप्त करेंगे, इसी उद्देश्यसे मैंने आपको भूले हुए योगका स्मरण दिलाया है ॥ २९ ॥
स राजा परमप्रीतः पत्न्याः श्रुत्वा वचस्तदा ।
प्राप्य योगं बलादेव गतिं प्राप सुदुर्लभाम् ॥ ३० ॥
तब अपनी पत्नीकी यह बात सुनकर राजा बड़े प्रसन्न हुए और योग-साधना करके उन्होंने उसके बलसे ही परम दुर्लभ गति पायी ॥ ३० ॥
कण्डरीकोऽपि धर्मात्मा सांख्ययोगमनुत्तमम् ।
प्राप्य योगगतिः सिद्धो विशुद्धस्तेन कर्मणा ॥ ३१ ॥
धर्मात्मा कण्डरीक भी परमश्रेष्ठ सांख्ययोगका ज्ञान पाकर योगका आश्रय ले उसके साधनसे शुद्ध एवं सिद्ध (मुक्त) हो गये ॥ ३१ ॥
क्रमं प्रणीय पाञ्चाल्यः शिक्षां चोत्पाद्य केवलाम् ।
योगाचार्यगतिं प्राप यशश्चाग्र्यं महातपाः ॥ ३२ ॥
महातपस्वी पाञ्चालने भी वैदिकोंमें प्रसिद्ध क्रमपाठकी विधि एवं विशुद्ध 'शिक्षा' (नामक वेदाङ्ग अथवा योगविषयक शिक्षा) की रचना करके योगाचार्यकी गति (मोक्ष) तथा उत्तम यश प्राप्त किया ॥ ३२ ॥
एवमेतत् पुरावृत्तं मम प्रत्यक्षर्माच्युत ।
तद् धारयस्व गाङ्गेय श्रेयसा योक्ष्यसे ततः ॥ ३३ ॥
(मार्कण्डेयजी कहते हैं—) अच्युत भीष्म ! प्राचीन कालमें घटित हुआ यह श्राद्ध-माहात्म्य-सूचक वृत्तान्त मैंने प्रत्यक्ष देखा है। तुम भी इसे धारण करो तो तुम्हारा कल्याण होगा ॥ ३३ ॥
ये चान्ये धारयिष्यन्ति तेषां चरितमुत्तमम् ।
तिर्यग्योनिषु ते जातु न गमिष्यन्ति कर्हिचित् ॥ ३४ ॥