भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 109
८६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

जो दूसरे सज्जन भी इन वाग् दुष्ट आदिके उत्तम चरित्रको सुनेंगे, वे भी कभी तिर्यग्-योनिमें उत्पन्न न होंगे ॥ ३४ ॥

श्रुत्वा चेदमुपाख्यानं महार्थं महतां गतिम्।
योगधर्मो हृदि सदा परिवर्तति भारत ॥ ३५ ॥

भारत ! महात्माओंकी सद्गति देनेवाले इस महत्त्वमय उपाख्यानको सुननेसे हृदयमें योग-धर्म पूर्णरूपसे प्रकाशित होने लगता है ॥ ३५ ॥

स तेनैवानुबन्धेन कदाचिल्लभते शमम्।
ततो योगगतिं याति शुद्धां तां भुवि दुर्लभाम् ॥ ३६ ॥

हृदयमें उस योगधर्मको धारण करनेसे ही मनुष्य कभी शान्ति-लाभ करता है; फिर उसे पृथ्वीमें दुर्लभ योगियोंकी शुद्ध-गति प्राप्त होती है ॥ ३६ ॥


वैशम्पायन उवाच

एवमेतत् पुरा गीतं मार्कण्डेयेन धीमता।
श्राद्धस्य फलमुद्दिश्य सोमस्याप्यायनाय वै ॥ ३७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—प्राचीन कालमें बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीने श्राद्धके फलको लक्ष्यमें रखकर सोम (चन्द्रमा) का आप्यायन (पोषण) करनेके लिये यह ऐसी कथा कही थी ॥ ३७ ॥

सोमो हि भगवान् देवो लोकस्याप्यायनं परम्।
वृष्णिवंशप्रसङ्गेन तस्य वंशं निबोध मे ॥ ३८ ॥

भगवान् सोम ही लोकोंको परम तृप्ति देनेवाले हैं। अब वृष्णिवंशके प्रसङ्गमें तुम चन्द्रवंशका वर्णन सुनो—॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पसमाप्तिर्नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पका उपसंहारनामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥२४॥


पञ्चविंशतितमोऽध्यायः

चन्द्रमाकी उत्पत्ति और राजसूय यज्ञ, देवासुरसंग्राम तथा बुधकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

पिता सोमस्य वै राजन् जज्ञेऽत्रिर्भगवानृषिः।
ब्रह्मणो मानसात् पूर्वं प्रजासर्गं विधित्सतः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! प्राचीन कालमें ब्रह्माजीने प्रजाकी सृष्टि करनेका विचार किया। उस समय उनके मानसिक संकल्पसे सोम (चन्द्रमा) के पिता भगवान् अत्रि ऋषि उत्पन्न हुए ॥ १ ॥

तत्रात्रिः सर्वभूतानां तस्थौ स्वतनयैर्युतः।
कर्मणा मनसा वाचा शुभान्येव चचार सः ॥ २ ॥

अत्रि ऋषि भी प्रजाकी सृष्टिमें ही संलग्न हुए। वे तथा उनके पुत्र मन, वाणी और कर्मसे सब प्राणियोंका कल्याण करनेवाले कार्य ही करते थे ॥ २ ॥

अहिंस्रः सर्वभूतेषु धर्मात्मा संशितव्रतः।
काष्ठकुड्यशिलाभूत ऊर्ध्वबाहुर्महाद्युतिः ॥ ३ ॥
अनुत्तरं नाम तपो येन तप्तं महत् पुरा।
त्रीणि वर्षसहस्राणि दिव्यानीति हि नः श्रुतम् ॥ ४ ॥

हमने सुना है कि प्राचीन कालमें प्रशंसनीय व्रतका पालन करनेवाले, महातेजस्वी, धर्मात्मा अत्रि ऋषिने तीन हजार दिव्य वर्षोंतक अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर काष्ठ, दीवार और पत्थरके समान निश्चल रहकर किसी प्राणीको तनिक भी कष्ट पहुँचाये बिना ही अनुत्तर* नामक महान् तप किया था ॥ ३-४ ॥


* १. जिससे उत्कृष्ट दूसरा कोई तप नहीं है, उसे 'अनुत्तर' कहते हैं।


तत्रोध्वंरेतसस्तस्य स्थितस्यानिनिमिपस्य ह।
सोमत्वं तनुरापेदे महासत्त्वस्य भारत ॥ ५ ॥

भारत ! अत्रि ऋषि महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न थे। वे एक-टक देखते हुए ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) रहकर सोमकी भावनासे खड़े-खड़े तपस्या करते थे, अतः उनका शरीर सोमरूपमें परिणत हो गया ॥ ५ ॥

ऊर्ध्वमाचक्रमे तस्य सोमत्वं भावितात्मनः।
नेत्राभ्यां वारि सुस्राव दशधा द्योतयद् दिशः ॥ ६ ॥

शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनिके नेत्रोंसे वह सोमरूप तेज, जलरूपमें बह निकला और दसों दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ आकाशमें चढ़ने लगा ॥ ६ ॥

तं गर्भं विधिना दृष्ट्वा दश देव्यो दधुस्तदा।
समेत्य धारयामासुर्न च ताः समशक्नुवन् ॥ ७ ॥

तब प्रसन्नतामें भरी हुई दस दिशारूपी देवियोंने सम्मिलित हो उस तेजको अपने गर्भमें विधिपूर्वक धारण किया, परंतु वे उस तेजको धारण करनेमें समर्थ न हो सकीं ॥ ७ ॥

स ताभ्यः सहसैवाथ दिग्भ्यो गर्भः प्रभान्वितः।
पपात भासयँल्लोकाञ्छीतांशुः सर्वभावनः ॥ ८ ॥

तब (औषध आदिके द्वारा) सब लोकोंको पुष्ट करनेवाला शीतल किरणोंसे सुशोभित वह प्रकाशमान गर्भ लोकोंको