विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सदस्यस्तत्र भगवान् हरिनारायणः स्वयम्।
सनत्कुमारप्रमुखैराद्यैर्ब्रह्मर्षिभिर्वृतः ॥ २५॥
उस यज्ञमें सनत्कुमार आदि प्राचीन ब्रह्मर्षियोंने स्वयं भगवान् नारायण हरिको ही सदस्य बनाया था॥ २५॥
दक्षिणामददात् सोमस्त्रील्लोकानिति नः श्रुतम्।
तेभ्यो ब्रह्मर्षिमुख्येभ्यः सदस्येभ्यश्च भारत ॥ २६॥
भारत ! हमने सुना है कि उन ब्रह्मर्षियोंमें श्रेष्ठ सदस्योंको सोमने तीनों लोक दक्षिणामें दे दिये थे॥ २६॥
तं सिनिञ्च कुहूश्चैव द्युतिः पुष्टिः प्रभा वसुः।
कीर्तिर्धृतिश्च लक्ष्मीश्च नव देव्यः सिषेविरे॥ २७॥
उस समय सिनोवाली, कुहू, द्युति, पुष्टि, प्रभा, वसु, कीर्ति, धृति और लक्ष्मी (शोभा)—ये नौ देवियाँ नित्यप्रति चन्द्रमाकी सेवामे लगी रहती थीं॥ २७॥
प्राप्यावभृथमव्यग्रः सर्वदेवर्षिपूजितः।
विरराजाधिराजेन्द्रो दशधा भासयन् दिशः॥ २८॥
इस प्रकार सभी ऋषि और देवताओंसे सत्कार पाकर द्विजराज चन्द्रमाने अवभृथ स्नान किया, फिर वे दसों दिशाओंको प्रकाशित करने लगे॥ २८॥
तस्य तत् प्राप्य दुष्प्राप्यमैश्वर्यं मुनिसत्कृतम्।
विवभ्राम मतिस्तात विनयादनयाऽऽहता॥ २९॥
तात ! मुनियोंद्वारा सम्मानित उस दुर्लभ ऐश्वर्यको पाकर चन्द्रमाकी बुद्धि विनयसे भ्रष्ट हो गयी और उसे अनीतिने घेर दबाया॥ २९॥
बृहस्पतेः स वै भार्यां तारां नाम यशस्विनीम्।
जहार तरसा सर्वानवमत्याङ्गिरःसुतान्॥ ३०॥
तब उन्होंने अङ्गिराके सब पुत्रोंका तिरस्कार करके बृहस्पतिकी यशस्विनी भार्या ताराका बलपूर्वक अपहरण कर लिया॥ ३०॥
स याच्यमानो देवैश्च तथा देवर्षिभिः सह।
नैव व्यसर्जयत् तारां तस्मा आङ्गिरसे तदा।
स संरब्धस्ततस्तस्मिन् देवाचार्यो बृहस्पतिः॥ ३१॥
देवताओं तथा देवर्षियोंके याचना करनेपर भी उन्होंने बृहस्पतिकी स्त्री उनको नहीं लौटायी। तब तो देवताओंके आचार्य बृहस्पतिजी उनके ऊपर अत्यन्त कुपित हो उठे॥
उशना तस्य जग्राह पाष्णििमाङ्गिरसस्तदा।
स हि शिष्यो महातेजाः पितुः पूर्वो बृहस्पतेः॥ ३२॥
उस समय शुक्राचार्यने चन्द्रमाका पक्ष लिया और रुद्रने बृहस्पतिका; क्योंकि महातेजस्वी रुद्र बृहस्पतिके पिता अङ्गिराके शिष्य थे॥ ३२॥
तेन स्नेहेन भगवान् रुद्रस्तस्य बृहस्पतेः।
पाष्णिग्राहोऽभवद् देवः प्रगृह्याजगवं धनुः॥ ३३॥
उसी गुरुभाईके स्नेहसे भगवान् शिव अपना आजगव नामक धनुष लेकर बृहस्पतिजीके पाष्णिग्राह (सहायक) बने थे॥ ३३॥
तेन ब्रह्मशिरो नाम परमास्त्रं महात्मना।
उद्दिश्य दैत्यानुत्सृष्टं येनैषां नाशितं यशः॥ ३४॥
महात्मा रुद्रने दैत्योंको लक्ष्य करके ब्रह्मशिर नामक श्रेष्ठ अस्त्र छोड़ा, जिसने उन (दैत्यों) के सारे यशपर ही पानी फेर दिया॥ ३४॥
तत्र तद् युद्धमभवत् प्रख्यातं तारकामयम्।
देवानां दानवानां च लोकक्षयकरं महत्॥ ३५॥
वहाँ ताराके लिये देवताओं और दानवोंमें बड़ा भारी युद्ध हुआ, जो तारकामय महासंग्रामके नामसे प्रसिद्ध है। इसमें संसारका बड़ा भारी संहार हुआ॥ ३५॥
तत्र शिष्टास्तु ये देवास्तुषिताश्चैव भारत।
ब्रह्माणं शरणं जग्मुरादिदेवं सनातनम्॥ ३६॥
भारत ! इस युद्धमें मरनेसे बचे हुए देवता और तुषितगण आदिदेव सनातन ब्रह्माजीकी शरणमें गये॥ ३६॥
ततो निवार्योशनसं रुद्रं ज्येष्ठं च शङ्करम्।
ददावङ्गिरसे तारां स्वयमेव पितामहः॥ ३७॥
तब ब्रह्माजीने शुक्राचार्य तथा रुद्रोंमें ज्येष्ठ शङ्करको भी समझा-बुझाकर युद्ध करनेसे रोका; फिर उन्होंने स्वयं ही ताराको लाकर बृहस्पतिजीको दिया॥ ३७॥
तामन्तःप्रसवां दृष्ट्वा तारां प्राह बृहस्पतिः।
मदीयायां न ते योनौ गर्भो धार्यः कथंचन॥ ३८॥
उस समय ताराको गर्भवती देख बृहस्पतिजीने कहा—'तुझे मेरे क्षेत्रमें किसी तरह पराया गर्भ नहीं धारण करना चाहिये'॥ ३८॥
अयोनावुत्सृजन् तं सा कुमारं दस्युहन्तमम्।
इषीकास्तम्बमासाद्य ज्वलन्तमिव पावकम्॥ ३९॥
तब ताराने अयोग्य स्थान—सींकोंके झुरमुटमें जाकर प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी उस भारी दस्युहन्ता कुमारको उत्पन्न किया॥ ३९॥
जातमात्रः स भगवान् देवानामक्षिपद् वपुः।
ततः संशयमापन्ना इमामकथयन् सुराः॥ ४०॥
उस ऐश्वर्यवान् कुमारने उत्पन्न होते ही अपने शरीरकी कान्तिसे देवताओंका तेज फीका कर दिया। तब तो देवता संदेहमें पड़कर तारासे कहने लगे—॥ ४०॥
सत्यं ब्रूहि सुतः कस्य सोमस्याथ बृहस्पतेः।
पृच्छ्यमाना यदा देवैर्नाह सा साध्वसाधु वा॥ ४१॥
तदा तां शप्तुमारब्धः कुमारो दस्युहन्तमः।
तं निवार्य ततो ब्रह्मा तारां पप्रच्छ संशयम्॥ ४२॥