विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] षड्विंशोऽध्यायः [ ८९
'अरी ! सच बता, यह पुत्र चन्द्रमाका है अथवा बृहस्पतिका ?' परंतु देवताओंके पूछनेपर भी जब उसने भला-बुरा कुछ उत्तर न दिया, तब वह दस्युहन्ता कुमार उसे शाप देनेके लिये तैयार हो गया । उस समय ब्रह्माजीने उसे रोककर तारासे इस संदेहको पूछा—॥४१-४२॥
यदन्न तथ्यं तद् ब्रूहि तारे कस्य सुतस्त्वयम् ।
सा प्राञ्जलिरुवाचेदं ब्रह्माणं वरदं प्रभुम् ॥ ४३ ॥
'तारे ! यह किसका पुत्र है—इस बातको तू ठीक-ठीक बता।' तब उसने दोनों हाथ जोड़कर वर देनेवाले प्रभु ब्रह्माजीसे कहा—॥ ४३ ॥
सोमस्येति महात्मानं कुमारं दस्युहन्तमम् ।
ततस्तं मूर्ख्युपाघ्राय सोमो धाता प्रजापतिः ॥ ४४ ॥
बुध इत्यकरोन्नाम तस्य पुत्रस्य धीमतः ।
प्रतिकूलं च गगने समभ्युत्तिष्ठते बुधः ॥ ४५ ॥
'प्रभो ! यह सोमका ही पुत्र है।' तब उस गर्भको धारण करानेवाले प्रजापति चन्द्रमाने उस महामना दस्युहन्ता कुमारका मस्तक सूँघकर उस बुद्धिमान् पुत्रका नाम 'बुध' रखा । यह बुध जब आकाशमें उदय होता है, तब प्रतिकूल चेष्टा (उत्पात) किया करता है ॥ ४४-४५ ॥
उत्पादयामास ततः पुत्रं वै राजपुत्रिका ।
तस्यापत्यं महाराजो बभूवैलः पुरूरवाः ॥ ४६ ॥
तदनन्तर वैराज मनुकी पुत्री इलाने बुधसे एक पुत्र उत्पन्न किया । उनके वे पुत्र महाराज पुरूरवा हुए ॥ ४६ ॥
उर्वश्यां जज्ञिरे यस्य पुत्राः सप्त महात्मनः ।
प्रसह्य धर्षितस्तत्र सोमो वै राजयक्ष्मणा ॥ ४७ ॥
महात्मा पुरूरवाके उर्वशीके गर्भसे सात पुत्र उत्पन्न हुए । इधर सोमको हठात् राजयक्ष्माने धर दबाया ॥ ४७ ॥
ततो यक्ष्माभिभूतस्तु सोमः प्रक्षीणमण्डलः ।
जगाम शरणार्थाय पितरं सोऽत्रिमेव तु ॥ ४८ ॥
यक्ष्मासे ग्रस्त होनेपर चन्द्रमाका मण्डल क्षीण होने लगा, तब वे अपने पिता अत्रिकी शरणमें पहुँचे ॥४८॥
तस्य तत्तापशमनं चकारात्रिर्महातपाः ।
स राजयक्ष्मणा मुक्तः श्रिया जज्वल सर्वतः ॥ ४९ ॥
महातपस्वी अत्रिने उनके तापको दूर कर दिया । वे (चन्द्रमा) राजयक्ष्मा रोगसे मुक्त होकर सब ओरसे प्रकाशित हो उठे ॥ ४९ ॥
एवं सोमस्य वै जन्म कीर्तितं कीर्तिवर्धनम् ।
वंशमस्य महाराज कीर्त्यमानं च मे शृणु ॥ ५० ॥
महाराज ! इस प्रकार मैंने तुमसे चन्द्रमाके जन्मका वर्णन किया, जो कीर्तिको बढ़ानेवाला है । अब मेरे द्वारा चन्द्रमाके वंशका वर्णन सुनो ॥ ५० ॥
धन्यमारोग्यमायुष्यं पुण्यं संकल्पसाधनम् ।
सोमस्य जन्म श्रुत्वैव पापेभ्यो विप्रमुच्यते ॥ ५१ ॥
मनुष्य चन्द्रमाके जन्मको सुनते ही सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । यह चन्द्रमाके जन्मकी कथा धन, आयु, आरोग्य और पुण्य देनेवाली है । इसे सुननेसे मनुष्यके सारे संकल्प—मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं ॥ ५१ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि सोमोत्पत्तिकथने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥
षड्विंशोऽध्यायः
महाराज पुरूरवाके चरित्र और वंशका वर्णन, राजा पुरूरवाका त्रेताग्निकी रचना करना और गन्धर्वोंके लोकमें जाना
वैशम्पायन उवाच
बुधस्य तु महाराज विद्वान् पुत्रः पुरूरवाः ।
तेजस्वी दानशीलश्च यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ १ ॥
ब्रह्मवादी पराक्रान्तः शत्रुभिर्युधि दुर्जयः ।
आहर्ता चाग्निहोत्रस्य यज्ञानां च महीपतिः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज ! बुधके विद्वान् पुत्र पुरूरवा हुए, जो तेजस्वी, दानशील, यज्ञकर्ता, बहुत-सी दक्षिणा देनेवाले, ब्रह्मवादी, युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले और शत्रुओंसे दुर्जय थे । वे राजा अग्निहोत्र और यज्ञोंके अनुष्ठान करनेवाले थे ॥ १-२ ॥
सत्यवादी पुण्यमतिः काम्यः संवृतमैथुनः ।
अतीव त्रिषु लोकेषु यशसाप्रतिमस्तदा ॥ ३ ॥
राजा पुरूरवा सत्यभाषी और पवित्र विचारवाले थे । उनका रूप बड़ा सुन्दर था और वे गुप्त रूपसे सहवास करनेवाले थे । वे अपने समयमें तीनों लोकोंमें अनुपम यशस्वी थे ॥ ३ ॥
तं ब्रह्मवादिनं क्षान्तं धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ।
उर्वशी वरयामास हित्वा मानं यशस्विनी ॥ ४ ॥