विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९० | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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उन ब्रह्मवादी, क्षमापरायण, धर्मज्ञ तथा सत्यभाषी राजा-को यशस्विनी उर्वशी अप्सराने गर्वका परित्याग करके पतिरूपमें वरण कर लिया था ॥ ४ ॥
तया सहावसद् राजा वर्षाणि दश पञ्च च ।
पञ्च षट् सप्त चाष्टौ च दश चाष्टौ च भारत ॥ ५ ॥
वने चैत्ररथे रम्ये तथा मन्दाकिनीतटे ।
अलकायां विशालायां नन्दने च वनोत्तमे ॥ ६ ॥
उत्तरांश्च कुरून् प्राप्य मनोरथफलद्रुमान् ।
गन्धमादनपादेषु मेरुपृष्ठे तथोत्तरे ॥ ७ ॥
भारत ! राजा पुरूरवा उस अप्सराके साथ दस वर्षतक रमणीय चैत्ररथ वनमें, पाँच वर्षतक मन्दाकिनीके तटपर बसी हुई अलकापुरीमें, पाँच वर्षतक बदरीनारायणके वनोंमें, छः वर्षतक उत्तम उपवन नन्दनवनमें, सात वर्षतक मनोरथरूप फलको देनेवाले वृक्षोंसे परिपूर्ण उत्तरकुरुदेशमें, आठ वर्षतक गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर, दस वर्षतक मेरुपर्वतपर तथा आठ वर्षतक उत्तरांचलपर विहार करते रहे ॥ ५-७ ॥
एतेषु वनमुख्येषु सुरैराचरितेषु च ।
उर्वश्या सहितो राजा रेमे परमया मुदा ॥ ८ ॥
राजा पुरूरवा उर्वशीको साथमें लेकर देवताओंसे सेवित इन मुख्य-मुख्य वनोंमें बड़े आनन्दके साथ विहार किया करते थे ॥ ८ ॥
देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिरभिष्टुते ।
राज्यं च कारयामास प्रयागे पृथिवीपतिः ॥ ९ ॥
पृथिवीपति पुरूरवा (उर्वशीके साथ) महर्षियोंसे प्रशंसित परम पवित्र देश प्रयागमें राज्य करते थे ॥ ९ ॥
तस्य पुत्रा बभूवुस्ते सप्त देवसुतोपमाः ।
दिवि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः ॥ १० ॥
विश्वायुश्चैव धर्मात्मा श्रुतायुश्च तथापरः ।
दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः ॥ ११ ॥
राजाके द्वारा उर्वशीके गर्भसे स्वर्गमें देव-पुत्रोंके तुल्य आयु, बुद्धिमान् अमावसु, धर्मात्मा विश्वायु, श्रुतायु, दृढायु, वनायु और शतायु नामक सात पुत्र उत्पन्न हुए, जो सभी महान् आत्मबलसे सम्पन्न थे ॥ १०-११ ॥
जनमेजय उवाच
गान्धर्वी चोर्वशी देवी राजानं मानुषं कथम् ।
देवानुत्सृज्य सम्प्राप्ता तन्मे ब्रूहि बहुश्रुत ॥ १२ ॥
जनमेजयने पूछा—बहुश्रुत वैशम्पायनजी ! उर्वशीदेवी तो अप्सरा थी, फिर देवताओंका परित्याग कर वह मनुष्य राजाके पास क्योंकर आयी ? यह मुझे बताइये ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मशापाभिभूता सा मानुषं समपद्यत ।
ऐलं तु सा वरारोहा समयात् समुपस्थिता ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! ब्रह्मशापके कारण उर्वशीको मनुष्यलोकमें आना पड़ा था। वह सुन्दर अङ्गोंवाली उर्वशी कुछ शर्तोंके साथ इला-नन्दन पुरूरवाके पास रही थी ॥ १३ ॥
आत्मनः शापमोक्षार्थं समयं सा चकार ह ।
अनग्नदर्शनं चैव सकामायां च मैथुनम् ॥ १४ ॥
द्वौ मेषौ शयनाभ्याशे सदा बद्धौ च तिष्ठतः ।
घृतमात्रो तथाऽऽहारः कालमेकं तु पार्थिव ॥ १५ ॥
भूपाल ! उसने अपने शापसे छूटनेके लिये यह शर्त करा ली थी कि 'मैं आपको नंगा न देखूँ, मेरे सकाम होनेपर ही आप सहवास करें, मेरे पलंगके पास सदा दो मेंढ़ बँधे रहेंगे और मैं दिनमें एक बार थोड़ा-सा घृतमात्र भोजन करूँगी ॥१४-१५॥
यद्येष समयो राजन् यावत्कालं च ते दृढः ।
तावत्कालं तु वत्स्यामि त्वत्तः समय एष नः ॥ १६ ॥
'राजन् ! जबतक इन प्रतिज्ञाओंका आप दृढ़ताके साथ पालन करते रहेंगे, तबतक मैं आपके पास रहूँगी—यह मैं आपसे प्रतिज्ञा करती हूँ' ॥ १६ ॥
तस्यास्तं समयं सर्वं स राजा समपालयत् ।
एवं सा वसते तत्र पुरूरवसि भामिनी ॥ १७ ॥
राजा उसकी सब शर्तोंका पालन करने लगे। इस प्रकार वह श्रेष्ठ अप्सरा पुरूरवाके यहाँ रहने लगी ॥ १७ ॥
वर्षाण्येकोनषष्टिस्तु तत्सक्ता शापमोहिता ।
उर्वश्यां मानुषस्थायां गन्धर्वाश्चिन्तयान्विताः ॥ १८ ॥
शापके कारण उर्वशीको जब राजामें आसक्त होकर रहते हुए उनसठ वर्ष बीत गये, तब गन्धर्वोंको मनुष्योंके बीच बसनेवाली उर्वशीकी चिन्ता हुई ॥ १८ ॥
गन्धर्वा ऊचुः
चिन्तयध्वं महाभागा यथा सा तु वराङ्गना ।
समागच्छेत् पुनर्देवानुर्वशी स्वर्गभूषणम् ॥ १९ ॥
गन्धर्वोंने कहा—महाभागो ! वराङ्गना उर्वशी देवताओंमें फिर किस प्रकार आवे ? इसका उपाय सोचो; क्योंकि वह स्वर्गका भूषण है ॥ १९ ॥
ततो विश्वावसुर्नाम तत्राह वदतां वरः ।
मया तु समयस्ताभ्यां क्रियमाणः श्रुतः पुरा ॥ २० ॥
तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ विश्वावसु नामक गन्धर्वने कहा—'उन दोनोंने पहले जो प्रतिज्ञाएँ की थीं, उन्हें मैंने सुना है ॥
व्युत्क्रान्तसमयं सा वै राजानं त्यक्ष्यते यथा ।
तदहं वेद्म्यशेषेण यथा भेत्स्यत्यसौ नृपः ॥ २१ ॥
'राजाके प्रतिज्ञा भङ्ग करनेपर वह उसे छोड़ देगी। उस राजाकी प्रतिज्ञा जिस प्रकार टूटेगी, मैं उसे भी भलीभाँति जानता हूँ ॥ २१ ॥