विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
हरिवंशपर्व ] षड्विंशोऽध्यायः [ ८९
'अरी ! सच बता, यह पुत्र चन्द्रमाका है अथवा बृहस्पतिका ?' परंतु देवताओंके पूछनेपर भी जब उसने भला-बुरा कुछ उत्तर न दिया, तब वह दस्युहन्ता कुमार उसे शाप देनेके लिये तैयार हो गया । उस समय ब्रह्माजीने उसे रोककर तारासे इस संदेहको पूछा—॥४१-४२॥
यदन्न तथ्यं तद् ब्रूहि तारे कस्य सुतस्त्वयम् ।
सा प्राञ्जलिरुवाचेदं ब्रह्माणं वरदं प्रभुम् ॥ ४३ ॥
'तारे ! यह किसका पुत्र है—इस बातको तू ठीक-ठीक बता।' तब उसने दोनों हाथ जोड़कर वर देनेवाले प्रभु ब्रह्माजीसे कहा—॥ ४३ ॥
सोमस्येति महात्मानं कुमारं दस्युहन्तमम् ।
ततस्तं मूर्ख्युपाघ्राय सोमो धाता प्रजापतिः ॥ ४४ ॥
बुध इत्यकरोन्नाम तस्य पुत्रस्य धीमतः ।
प्रतिकूलं च गगने समभ्युत्तिष्ठते बुधः ॥ ४५ ॥
'प्रभो ! यह सोमका ही पुत्र है।' तब उस गर्भको धारण करानेवाले प्रजापति चन्द्रमाने उस महामना दस्युहन्ता कुमारका मस्तक सूँघकर उस बुद्धिमान् पुत्रका नाम 'बुध' रखा । यह बुध जब आकाशमें उदय होता है, तब प्रतिकूल चेष्टा (उत्पात) किया करता है ॥ ४४-४५ ॥
उत्पादयामास ततः पुत्रं वै राजपुत्रिका ।
तस्यापत्यं महाराजो बभूवैलः पुरूरवाः ॥ ४६ ॥
तदनन्तर वैराज मनुकी पुत्री इलाने बुधसे एक पुत्र उत्पन्न किया । उनके वे पुत्र महाराज पुरूरवा हुए ॥ ४६ ॥
उर्वश्यां जज्ञिरे यस्य पुत्राः सप्त महात्मनः ।
प्रसह्य धर्षितस्तत्र सोमो वै राजयक्ष्मणा ॥ ४७ ॥
महात्मा पुरूरवाके उर्वशीके गर्भसे सात पुत्र उत्पन्न हुए । इधर सोमको हठात् राजयक्ष्माने धर दबाया ॥ ४७ ॥
ततो यक्ष्माभिभूतस्तु सोमः प्रक्षीणमण्डलः ।
जगाम शरणार्थाय पितरं सोऽत्रिमेव तु ॥ ४८ ॥
यक्ष्मासे ग्रस्त होनेपर चन्द्रमाका मण्डल क्षीण होने लगा, तब वे अपने पिता अत्रिकी शरणमें पहुँचे ॥४८॥
तस्य तत्तापशमनं चकारात्रिर्महातपाः ।
स राजयक्ष्मणा मुक्तः श्रिया जज्वल सर्वतः ॥ ४९ ॥
महातपस्वी अत्रिने उनके तापको दूर कर दिया । वे (चन्द्रमा) राजयक्ष्मा रोगसे मुक्त होकर सब ओरसे प्रकाशित हो उठे ॥ ४९ ॥
एवं सोमस्य वै जन्म कीर्तितं कीर्तिवर्धनम् ।
वंशमस्य महाराज कीर्त्यमानं च मे शृणु ॥ ५० ॥
महाराज ! इस प्रकार मैंने तुमसे चन्द्रमाके जन्मका वर्णन किया, जो कीर्तिको बढ़ानेवाला है । अब मेरे द्वारा चन्द्रमाके वंशका वर्णन सुनो ॥ ५० ॥
धन्यमारोग्यमायुष्यं पुण्यं संकल्पसाधनम् ।
सोमस्य जन्म श्रुत्वैव पापेभ्यो विप्रमुच्यते ॥ ५१ ॥
मनुष्य चन्द्रमाके जन्मको सुनते ही सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । यह चन्द्रमाके जन्मकी कथा धन, आयु, आरोग्य और पुण्य देनेवाली है । इसे सुननेसे मनुष्यके सारे संकल्प—मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं ॥ ५१ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि सोमोत्पत्तिकथने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥
षड्विंशोऽध्यायः
महाराज पुरूरवाके चरित्र और वंशका वर्णन, राजा पुरूरवाका त्रेताग्निकी रचना करना और गन्धर्वोंके लोकमें जाना
वैशम्पायन उवाच
बुधस्य तु महाराज विद्वान् पुत्रः पुरूरवाः ।
तेजस्वी दानशीलश्च यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ १ ॥
ब्रह्मवादी पराक्रान्तः शत्रुभिर्युधि दुर्जयः ।
आहर्ता चाग्निहोत्रस्य यज्ञानां च महीपतिः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज ! बुधके विद्वान् पुत्र पुरूरवा हुए, जो तेजस्वी, दानशील, यज्ञकर्ता, बहुत-सी दक्षिणा देनेवाले, ब्रह्मवादी, युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले और शत्रुओंसे दुर्जय थे । वे राजा अग्निहोत्र और यज्ञोंके अनुष्ठान करनेवाले थे ॥ १-२ ॥
सत्यवादी पुण्यमतिः काम्यः संवृतमैथुनः ।
अतीव त्रिषु लोकेषु यशसाप्रतिमस्तदा ॥ ३ ॥
राजा पुरूरवा सत्यभाषी और पवित्र विचारवाले थे । उनका रूप बड़ा सुन्दर था और वे गुप्त रूपसे सहवास करनेवाले थे । वे अपने समयमें तीनों लोकोंमें अनुपम यशस्वी थे ॥ ३ ॥
तं ब्रह्मवादिनं क्षान्तं धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ।
उर्वशी वरयामास हित्वा मानं यशस्विनी ॥ ४ ॥
| ९० | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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उन ब्रह्मवादी, क्षमापरायण, धर्मज्ञ तथा सत्यभाषी राजा-को यशस्विनी उर्वशी अप्सराने गर्वका परित्याग करके पतिरूपमें वरण कर लिया था ॥ ४ ॥
तया सहावसद् राजा वर्षाणि दश पञ्च च ।
पञ्च षट् सप्त चाष्टौ च दश चाष्टौ च भारत ॥ ५ ॥
वने चैत्ररथे रम्ये तथा मन्दाकिनीतटे ।
अलकायां विशालायां नन्दने च वनोत्तमे ॥ ६ ॥
उत्तरांश्च कुरून् प्राप्य मनोरथफलद्रुमान् ।
गन्धमादनपादेषु मेरुपृष्ठे तथोत्तरे ॥ ७ ॥
भारत ! राजा पुरूरवा उस अप्सराके साथ दस वर्षतक रमणीय चैत्ररथ वनमें, पाँच वर्षतक मन्दाकिनीके तटपर बसी हुई अलकापुरीमें, पाँच वर्षतक बदरीनारायणके वनोंमें, छः वर्षतक उत्तम उपवन नन्दनवनमें, सात वर्षतक मनोरथरूप फलको देनेवाले वृक्षोंसे परिपूर्ण उत्तरकुरुदेशमें, आठ वर्षतक गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर, दस वर्षतक मेरुपर्वतपर तथा आठ वर्षतक उत्तरांचलपर विहार करते रहे ॥ ५-७ ॥
एतेषु वनमुख्येषु सुरैराचरितेषु च ।
उर्वश्या सहितो राजा रेमे परमया मुदा ॥ ८ ॥
राजा पुरूरवा उर्वशीको साथमें लेकर देवताओंसे सेवित इन मुख्य-मुख्य वनोंमें बड़े आनन्दके साथ विहार किया करते थे ॥ ८ ॥
देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिरभिष्टुते ।
राज्यं च कारयामास प्रयागे पृथिवीपतिः ॥ ९ ॥
पृथिवीपति पुरूरवा (उर्वशीके साथ) महर्षियोंसे प्रशंसित परम पवित्र देश प्रयागमें राज्य करते थे ॥ ९ ॥
तस्य पुत्रा बभूवुस्ते सप्त देवसुतोपमाः ।
दिवि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः ॥ १० ॥
विश्वायुश्चैव धर्मात्मा श्रुतायुश्च तथापरः ।
दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः ॥ ११ ॥
राजाके द्वारा उर्वशीके गर्भसे स्वर्गमें देव-पुत्रोंके तुल्य आयु, बुद्धिमान् अमावसु, धर्मात्मा विश्वायु, श्रुतायु, दृढायु, वनायु और शतायु नामक सात पुत्र उत्पन्न हुए, जो सभी महान् आत्मबलसे सम्पन्न थे ॥ १०-११ ॥
जनमेजय उवाच
गान्धर्वी चोर्वशी देवी राजानं मानुषं कथम् ।
देवानुत्सृज्य सम्प्राप्ता तन्मे ब्रूहि बहुश्रुत ॥ १२ ॥
जनमेजयने पूछा—बहुश्रुत वैशम्पायनजी ! उर्वशीदेवी तो अप्सरा थी, फिर देवताओंका परित्याग कर वह मनुष्य राजाके पास क्योंकर आयी ? यह मुझे बताइये ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मशापाभिभूता सा मानुषं समपद्यत ।
ऐलं तु सा वरारोहा समयात् समुपस्थिता ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! ब्रह्मशापके कारण उर्वशीको मनुष्यलोकमें आना पड़ा था। वह सुन्दर अङ्गोंवाली उर्वशी कुछ शर्तोंके साथ इला-नन्दन पुरूरवाके पास रही थी ॥ १३ ॥
आत्मनः शापमोक्षार्थं समयं सा चकार ह ।
अनग्नदर्शनं चैव सकामायां च मैथुनम् ॥ १४ ॥
द्वौ मेषौ शयनाभ्याशे सदा बद्धौ च तिष्ठतः ।
घृतमात्रो तथाऽऽहारः कालमेकं तु पार्थिव ॥ १५ ॥
भूपाल ! उसने अपने शापसे छूटनेके लिये यह शर्त करा ली थी कि 'मैं आपको नंगा न देखूँ, मेरे सकाम होनेपर ही आप सहवास करें, मेरे पलंगके पास सदा दो मेंढ़ बँधे रहेंगे और मैं दिनमें एक बार थोड़ा-सा घृतमात्र भोजन करूँगी ॥१४-१५॥
यद्येष समयो राजन् यावत्कालं च ते दृढः ।
तावत्कालं तु वत्स्यामि त्वत्तः समय एष नः ॥ १६ ॥
'राजन् ! जबतक इन प्रतिज्ञाओंका आप दृढ़ताके साथ पालन करते रहेंगे, तबतक मैं आपके पास रहूँगी—यह मैं आपसे प्रतिज्ञा करती हूँ' ॥ १६ ॥
तस्यास्तं समयं सर्वं स राजा समपालयत् ।
एवं सा वसते तत्र पुरूरवसि भामिनी ॥ १७ ॥
राजा उसकी सब शर्तोंका पालन करने लगे। इस प्रकार वह श्रेष्ठ अप्सरा पुरूरवाके यहाँ रहने लगी ॥ १७ ॥
वर्षाण्येकोनषष्टिस्तु तत्सक्ता शापमोहिता ।
उर्वश्यां मानुषस्थायां गन्धर्वाश्चिन्तयान्विताः ॥ १८ ॥
शापके कारण उर्वशीको जब राजामें आसक्त होकर रहते हुए उनसठ वर्ष बीत गये, तब गन्धर्वोंको मनुष्योंके बीच बसनेवाली उर्वशीकी चिन्ता हुई ॥ १८ ॥
गन्धर्वा ऊचुः
चिन्तयध्वं महाभागा यथा सा तु वराङ्गना ।
समागच्छेत् पुनर्देवानुर्वशी स्वर्गभूषणम् ॥ १९ ॥
गन्धर्वोंने कहा—महाभागो ! वराङ्गना उर्वशी देवताओंमें फिर किस प्रकार आवे ? इसका उपाय सोचो; क्योंकि वह स्वर्गका भूषण है ॥ १९ ॥
ततो विश्वावसुर्नाम तत्राह वदतां वरः ।
मया तु समयस्ताभ्यां क्रियमाणः श्रुतः पुरा ॥ २० ॥
तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ विश्वावसु नामक गन्धर्वने कहा—'उन दोनोंने पहले जो प्रतिज्ञाएँ की थीं, उन्हें मैंने सुना है ॥
व्युत्क्रान्तसमयं सा वै राजानं त्यक्ष्यते यथा ।
तदहं वेद्म्यशेषेण यथा भेत्स्यत्यसौ नृपः ॥ २१ ॥
'राजाके प्रतिज्ञा भङ्ग करनेपर वह उसे छोड़ देगी। उस राजाकी प्रतिज्ञा जिस प्रकार टूटेगी, मैं उसे भी भलीभाँति जानता हूँ ॥ २१ ॥
हरिवंशपर्व ] षड्विंशोऽध्यायः ९१
ससहायो गमिष्यामि युष्माकं कार्यसिद्धये ।
एवमुक्त्वा गतस्तत्र प्रतिष्ठानं महायशाः ॥ २२ ॥
'तुम्हारे कामको सिद्ध करनेके लिये अपने सहायकोंको साथ लेकर मैं वहाँ जाऊँगा।' यों कहकर वह महायशस्वी गन्धर्व प्रतिष्ठानपुर (झूँसी-प्रयाग) में गये ॥ २२ ॥
निशायामथ चागम्य मेषमेकं जहार सः।
मातृवद् वर्तते सा तु मेषयोश्चारुहासिनी ॥ २३ ॥
वहाँ आकर उन्होंने रातमें एक भेड़ चुरा ली। मनोहर हासवाली वह उर्वशी उन भेड़ोंपर माताके समान स्नेह करती थी ॥ २३ ॥
गन्धर्वागमनं श्रुत्वा शापान्तं च यशस्विनी।
राजानमब्रवीत् तत्र पुत्रो मेऽह्रियतेति सा ॥ २४ ॥
यशस्विनी उर्वशीने गन्धर्वोंके आगमनको सुनकर विचारा कि अब मेरे शापके अन्त होनेका समय आ गया, तब उसने राजासे कहा—'राजन् ! मेरे एक बच्चेको चोर चुरा ले गये' ॥
एवमुक्तो विनिश्चित्य नग्नो नैवोदतिष्ठत।
नग्नं मां द्रक्ष्यते देवी समयो वितथो भवेत् ॥ २५ ॥
यह कहनेपर भी वह यह विचारकर नंगा नहीं उठा कि यदि यह देवी मुझे नंगा देख लेगी तो मेरी प्रतिज्ञा झूठी हो जायगी ॥ २५ ॥
ततो भूयस्तु गन्धर्वा द्वितीयं मेषमाददुः।
द्वितीये तु हृते मेषे ऐलं देव्यब्रवीदिदम् ॥ २६ ॥
इतनेहीमें गन्धर्व पुनः दूसरे भेंड़को भी उठा ले गये। दूसरे भेंड़के चुराये जानेपर देवी उर्वशीने पुरूरवासे यह कहा—॥ २६ ॥
पुत्रो मेऽपहृतो राजन्ननाथाया इव प्रभो।
एवमुक्तस्तथोत्थाय नग्नो राजा प्रधावितः ॥ २७ ॥
मेषयोः पदमन्विच्छन् गन्धर्वैर्विद्युदप्यथ।
उत्पादिता सुमहती ययौ तद्भवनं महत् ॥ २८ ॥
प्रकाशितं वै सहसा ततो नग्नमवैक्षत।
नग्नं दृष्ट्वा तिरोभूता साऽप्सरा कामरूपिणी ॥ २९ ॥
'सामर्थ्यशाली राजन् ! अनाथ स्त्रीके समान मेरे पुत्रोंको छीन लिया गया।' यो उर्वशीके कहनेपर राजा नंगे ही उठकर भेड़ोंके पैरके चिह्नका अनुसरण करते हुए दौड़े। इसी समय गन्धर्वोंने बड़ी भारी बिजली चमकायी। उस समय वह विशाल भवन एक साथ प्रकाशित हो गया। तब तो उर्वशीने राजाको नंगा देख लिया। वह कामरूपिणी अप्सरा राजाको नंगा देखते ही अन्तर्धान हो गयी ॥ २७-२९ ॥
उत्सृष्टावुरणौ दृष्ट्वा राजा गृहागतो गृहे।
अपश्यन्नुर्वशीं तत्र विललाप सुदुःखितः ॥ ३० ॥
उधर राजा भी (गन्धर्वोंके) छोड़े हुए भेड़ोंको देख उन्हें साथ लेकर घरमें घुसे, पर वहाँ उन्हें उर्वशी नहीं दिखायी दी। तब वे परम दुःखित हो विलाप करने लगे ॥ ३० ॥
चचार पृथिवीं सर्वां मार्गमाण इतस्ततः।
अथापश्यत् स तां राजा कुरुक्षेत्रे महाबलः ॥ ३१ ॥
प्लक्षतीर्थे पुष्करिण्यां हैमवत्यां समाप्लुताम्।
क्रीडन्तीमप्सरोभिश्च पञ्चभिः सह शोभनाम् ॥ ३२ ॥
फिर वे उर्वशीको खोजते हुए पृथ्वीपर सर्वत्र घूमने लगे। कुछ समयके अनन्तर उन महाबली नरेशने उस शोभामयी अप्सराको कुरुक्षेत्रके प्लक्षतीर्थकी हैमवती नामवाली पुष्करिणीमें स्नानकर अपनी पाँच सखियोंके साथ क्रीड़ा करते देखा ॥ ३१-३२ ॥
तां क्रीडन्तीं ततो दृष्ट्वा विललाप सुदुःखितः।
सा चापि तत्र तं दृष्ट्वा राजानमविदूरतः ॥ ३३ ॥
उर्वशी ताः सखीः प्राह स एष पुरुषोत्तमः।
यस्मिन्नहमवात्सं वै दर्शयामास तं नृपम् ॥ ३४ ॥
क्रीड़ा करती हुई उर्वशीको देखकर राजा दुःखित होकर विलाप करने लगे। इधर उर्वशीने भी उस राजाको समीप ही देखकर अपनी सखियोंसे राजाको दिखाया और कहा—'ये वे ही पुरुषोत्तम हैं, जिनके पास मैं रही थी' ॥ ३३-३४ ॥
समाविग्नास्तु ताः सर्वाः पुनरेव नराधिपः।
जाये ह तिष्ठ मनसा घोरे वचसि तिष्ठ ह ॥ ३५ ॥
एवमादीनि सूक्तानि परस्परमभाषत।
उर्वशी चाब्रवीदैलं सगर्भाहं त्वया प्रभो ॥ ३६ ॥
उस समय वे सभी अप्सराएँ (उर्वशीके पुनर्गमनकी आशङ्कासे) घबरा गयीं। इधर राजा उससे फिर कहने लगे—'प्रिये ! तू थोड़ा ठहर, ओ कठोर हृदयवाली ! ठहर जा और अपने वचनोंपर दृढ़ रह !' इस प्रकार वैदिक सूक्तोंको वे दोनों एक दूसरेके प्रति उत्तर-प्रत्युत्तरके रूपमें कहने लगे। उस समय उर्वशीने इला-पुत्र पुरूरवासे कहा—'प्रभो ! मैं आपके द्वारा गर्भवती हूँ ॥ ३५-३६ ॥
संवत्सरात् कुमारास्ते भविष्यन्ति न संशयः।
निशामेकां च नृपते निवत्स्यसि मया सह ॥ ३७ ॥
'राजन् ! निस्सन्देह एक-एक वर्षपर मेरे गर्भसे आपके कुमार उत्पन्न होंगे तथा प्रतिवर्ष एक रात्रि आप मेरे साथ रह सकेंगे' ॥ ३७ ॥
हृष्टो जगाम राजाथ स्वपुरं तु महायशाः।
गते संवत्सरे भूय उर्वशी पुनरागमत् ॥ ३८ ॥
तब वे महायशस्वी राजा प्रसन्न हो गये और अपने
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नगरमें आ गये। वर्ष समाप्त होनेपर उर्वशी उनके पास फिर आयी ॥ ३८ ॥
उषितश्च तया सार्द्धमेकरात्रं महायशाः ।
उर्वश्याथाब्रवीद्दैलं गन्धर्वा वरदास्तव ॥ ३९ ॥
महायशस्वी पुरूरवा उसके साथ एक रात्रि रहे। तदनन्तर उर्वशीने पुरूरवासे कहा—'गन्धर्व आपको वर देना चाहते हैं ॥ ३९ ॥
तान् वृणीष्व महाराज ब्रूहि चैनांस्त्वमेव हि ।
वृणीष्व समतां राजन् गन्धर्वाणां महात्मनाम् ॥ ४० ॥
'महाराज ! अब आप वर माँग लीजिये। आप इनसे इन महात्मा गन्धर्वोंकी समता माँग लीजिये' ॥ ४० ॥
तथेत्युक्त्वा वरं वव्रे गन्धर्वांश्च तथास्त्विति ।
पूरयित्वाग्निना स्थालीं गन्धर्वाश्च तमब्रुवन् ॥ ४१ ॥
तब पुरूरवाने 'बहुत अच्छा' कहकर गन्धर्वोंसे वर माँग लिया। तब गन्धर्वोंने 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा,' कहकर एक थालीमें अग्नि भरकर पुरूरवासे कहा—॥ ४१ ॥
अनेनेष्ट्वा च लोकान्नः प्राप्स्यसि त्वं नराधिप ।
तानादाय कुमारांस्तु नगरायोपचक्रमे ॥ ४२ ॥
'राजन् ! इस अग्निसे यज्ञ करके तुम हमारे लोकोंमें आ जाओगे।' तब वे राजा (अग्नि और) अपने पुत्रोंको लेकर नगरकी ओर चले ॥ ४२ ॥
निक्षिप्याग्निमरण्ये तु सपुत्रस्तु गृहं ययौ ।
स त्रेताग्निं तु नापश्यदश्वत्थं तत्र दृष्टवान् ॥ ४३ ॥
(मार्गमें) उन्होंने वनमें अग्निको रख दिया और अपने पुत्रोंको लेकर घरमें प्रवेश किया। फिर वनमें जानेपर वहाँ उन्होंने अग्निको नहीं देखा; किंतु उसकी जगह एक पीपलके वृक्षको खड़ा देखा ॥ ४३ ॥
शमीजातं तु तं दृष्ट्वा अश्वत्थं विस्मितस्तदा ।
गन्धर्वेभ्यस्तदाशंसदग्निनाशं ततस्तु सः ॥ ४४ ॥
तब वे राजा (अग्निको अपने गर्भमें छिपानेवाले) शमी (जंड) के वृक्षमेंसे उत्पन्न हुए पीपलको देखकर विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने गन्धर्वोंसे अग्निके न दीखनेका वृत्तान्त कहा ॥ ४४ ॥
श्रुत्वा तमर्थमखिलमरणीं तु समादिशन् ।
अश्वत्थादरणीं कृत्वा मथित्वाग्निं यथाविधि ॥ ४५ ॥
मथित्वाग्निं त्रिधा कृत्वा अयजत् स नराधिपः ।
इष्ट्वा यज्ञैर्बहुविधैर्गन्तस्तेषां सलोकताम् ॥ ४६ ॥
गन्धर्वोंने सब बातको सुनकर कहा, 'तुम पीपलकी अरणी बना लो' तब उन्होंने पीपलकी अरणी बनाकर शास्त्रीय विधिके अनुसार उन अरणियोंको मथकर अग्निको उत्पन्न किया। फिर उस अग्निके तीन विभाग किये। तदनन्तर उस अग्निसे उन्होंने यजन किया था। वे उस त्रेताग्निसे अनेक प्रकारके यज्ञ कर गन्धर्वोंकी समानता पाकर गन्धर्वोंके लोकमें पहुँच गये ॥ ४५-४६ ॥
गन्धर्वेभ्यो वरं लब्ध्वा त्रेताग्निं समकारयत् ।
एकोऽग्निः पूर्वमेवासीदैलेस्त्रेतामकारयत् ॥ ४७ ॥
राजा पुरूरवाने गन्धर्वोंसे वर पाकर त्रेताग्निकी रचना की थी। पहले अग्नि एक ही था, पुरूरवाने उसको तीन बनाया था ॥ ४७ ॥
एवंप्रभावो राजासीदैलस्तु नरसत्तम ।
देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिरभिष्टुते ॥ ४८ ॥
राज्यं स कारयामास प्रयागे पृथिवीपतिः ।
उत्तरे जाह्नवीतीरे प्रतिष्ठाने महायशाः ॥ ४९ ॥
नरश्रेष्ठ ! राजा पुरूरवा ऐसे प्रतापी थे। उन महायशस्वी पृथ्वीपतिने गङ्गाके उत्तर तटपर बसे हुए महर्षियोंसे प्रशंसित परम पवित्र प्रतिष्ठान (झूँसी—प्रयाग) में राज्य किया था ॥ ४८-४९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि ऐलोत्पत्तिर्नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पुरूरवाकी उत्पत्तिविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
सप्तविंशोऽध्यायः
पुरूरवाके द्वितीय पुत्र अमावसुके वंशका वर्णन, विश्वामित्र और परशुरामकी उत्पत्ति
वैशम्पायन उवाच
ऐलपुत्रा बभूवुस्ते सर्वे देवसुतोपमाः ।
दिवि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः ॥ १ ॥
विश्वायुश्चैव धर्मात्मा श्रुतायुश्च तथापरः ।
दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुरूरवाके सभी पुत्र देवकुमारोंके तुल्य थे। वे सब महात्मा उर्वशीके गर्भसे स्वर्गमें उत्पन्न हुए थे। (उनके नाम इस प्रकार हैं—) आयु, बुद्धिमान् अमावसु, धर्मात्मा विश्वायु, श्रुतायु, दृढायु, वनायु और शतायु ॥ १-२ ॥
अमावसोश्च दायादो भीमो राजाथ नग्नजित् ।
श्रीमान् भीमस्य दायादो राजासीत् काञ्चनप्रभः ।
हरिवंशपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ९३
विद्वांस्तु काञ्चनस्यापि सुहोत्रोऽभून्महाबलः ॥ ३ ॥
अमावसुके राजा भीम और नग्नजित् नामक पुत्र हुए थे। भीमके पुत्र श्रीमान् राजा काञ्चनप्रभ हुए। काञ्चनके महाबली पुत्र सुहोत्र हुए, जो बड़े विद्वान् थे ॥ ३ ॥
सौहोत्रिरभवज्जह्नुः केशिन्या गर्भसम्भवः ।
आजहे यो महत्सत्रं सर्वमेधमहामखम् ॥ ४ ॥
सुहोत्रके केशिनीके गर्भसे जह्नु नामक पुत्र हुए। उन्होंने सर्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया था (जिसमे बहुत बड़ा 'अन्नसत्र' होता है) ॥ ४ ॥
पतिलोभेन यं गङ्गा पतित्वेऽभिससार ह ।
नेच्छतः प्लावयामास तस्य गङ्गा च तत्सदः ।
स तया प्लावितं दृष्ट्वा यज्ञवाटं समन्ततः ॥ ५ ॥
सौहोत्रिरब्रवीद् गङ्गां क्रुद्धो भरतसत्तम ॥ ६ ॥
गङ्गाजी उनको पति बनानेके लोभसे उनके समीप गयी थीं; परंतु जब उन्होंने इस बातकी इच्छा न की, तब गङ्गाजीने उनकी सभाको जलसे भर दिया था। भरतसत्तम ! सुहोत्र-पुत्र जह्नुने अपने यज्ञवाटको गङ्गाजीके द्वारा डूबता हुआ देख क्रोधमे भरकर गङ्गाजीसे कहा—॥ ५-६ ॥
एष ते विफलं यत्नं पिवन्नम्भः करोम्यहम् ।
अस्य गङ्गेऽवलेपस्य सद्यः फलमवाप्नुहि ॥ ७ ॥
'गङ्गे ! मैं तेरे इस जलको पीकर तेरे यत्नको व्यर्थ किये देता हूँ। तू अपने अभिमानका फल शीघ्र ही पा ले' ॥ ७ ॥
राजर्षिणा ततः पीतां गङ्गां दृष्ट्वा महर्षयः ।
उपनिन्युर्महाभागां दुहितृत्वेन जाह्नवीम् ॥ ८ ॥
तदनन्तर उन राजर्षिने गङ्गाजीको पी लिया। यह देखकर महर्षियोंने महाभागा गङ्गाजीको उनकी पुत्री मानकर (उनका नाम) जाह्नवी रख दिया ॥ ८ ॥
युवनाश्वस्य पुत्रीं तु कावेरीं जह्नुरावहत् ।
युवनाश्वस्य शापेन गङ्गार्धेन विनिर्ममे ।
कावेरीं सरितां श्रेष्ठां जह्नोर्भार्यामनिन्दिताम् ॥ ९ ॥
जह्नुने युवनाश्वकी पुत्री कावेरीसे विवाह किया था, जिसे युवनाश्वके शापसे गङ्गाने अपने ही आधे भागद्वारा प्रकट किया था; इस प्रकार सरिताओंमें श्रेष्ठ साध्वी कावेरी जह्नुकी भार्या हुई ॥ ९ ॥
जह्नुस्तु दयितं पुत्रं सुनहं नाम धार्मिकम् ।
कावेर्यां जनयामास अजकस्तस्य चात्मजः ॥ १० ॥
जह्नुने कावेरीके गर्भसे सुनह नामक धार्मिक पुत्रको उत्पन्न किया। सुनहके पुत्र अजक हुए ॥ १० ॥
अजकस्य तु दायादो बलाकाश्वो महीपतिः ।
बभूव मृगयाशीलः कुशस्तस्यात्मजोऽभवत् ॥ ११ ॥
अजकके पुत्र राजा बलाकाश्व हुए। उनको मृगयाका व्यसन था। उनके पुत्र कुश हुए ॥ ११ ॥
कुशपुत्रा बभूवुर्हि चत्वारो देववर्चसः ।
कुशिकः कुशनाभश्च कुशाम्बो मूर्तिमांस्तथा ॥ १२ ॥
कुशके देवताओके समान कान्तिमान् कुशिक, कुशनाभ, कुशाम्ब और मूर्तिमान् नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १२ ॥
पह्लवैः सह संवृद्धिं राजा वनचरैस्तदा ।
कुशिकस्तु तपस्तेपे पुत्रमिन्द्रसमप्रभम् ।
लभेषमिति तं शक्रास्त्रासादभ्येत्य जज्ञिवान् ॥ १३ ॥
राजा कुशिक वनवासी पह्लवोंके साथ पलकर बड़े हुए थे। उन्होंने इन्द्रके समान प्रभाववाले पुत्रको पानेकी इच्छासे तप करना आरम्भ कर दिया। तब इन्द्र उनके भयसे स्वयं ही उनके यहाँ पुत्र बनकर उत्पन्न हो गये ॥ १३ ॥
पूर्णे वर्षसहस्रे वै तं तु शक्रो ह्यपश्यत ।
अत्युग्रतपसं दृष्ट्वा सहस्राक्षः पुरंदरः ॥ १४ ॥
समर्थः पुत्रजनने स्वमेवांशमवासयत् ।
पुत्रत्वे कल्पयामास स देवेन्द्रः सुरोत्तमः ॥ १५ ॥
राजा कुशिकको जब (तप करते) एक हजार वर्ष पूरे हो गये, तब इन्द्रका ध्यान कुशिककी ओर गया, हजार नेत्रों-वाले पुरन्दर इन्द्रने राजाको अति उग्र तप करके पुत्र उत्पन्न करनेमे समर्थ देख उन (के वीर्य) मे अपने अंशको स्थापित कर दिया। इस प्रकार देवेन्द्र सुरोत्तम कुशिकके पुत्र बने थे ॥ १४-१५ ॥
स गाधिरभवद् राजा मघवान् कौशिकः स्वयम् ।
पौरुकुत्स्यभवद् भार्या गाधिस्तस्यामजायत ॥ १६ ॥
इस प्रकार इन्द्र स्वयं (कुशिकके पुत्र) कौशिक गाधि बनकर उत्पन्न हुए थे। राजा कुशिककी पत्नी पुरुकुत्सकी पुत्री थी, उसके गर्भसे ही गाधि उत्पन्न हुए थे ॥ १६ ॥
गाधेः कन्या महाभागा नाम्ना सत्यवती शुभा ।
तां गाधिर्भृगुपुत्राय ऋचीकाय ददौ प्रभुः ॥ १७ ॥
गाधिकी महाभाग्यवती शुभ कन्याका नाम सत्यवती था, राजा गाधिने सत्यवतीका विवाह भृगुपुत्र ऋचीकके साथ कर दिया था ॥ १७ ॥
तस्याः प्रीतोऽभवद् भर्ता भार्गवो भृगुनन्दनः ।
पुत्रार्थे कारयामास चरुं गाधेस्तथैव च ॥ १८ ॥
सत्यवतीके स्वामी भृगुवंशी ऋचीकने अपनी पत्नीके ऊपर प्रसन्न होकर उसके और गाधिके लिये पुत्र देनेवाला चरु बनाया ॥ १८ ॥
उवाचाहूय तां भर्ता ऋचीको भार्गवस्तदा ।
उपयोज्यश्चरुर्ह्ययं त्वया मात्रा त्वयं तव ॥ १९ ॥
तदनन्तर सत्यवतीके स्वामी भृगुवंशी ऋचीकने सत्यवतीको
| ९४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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बुलाकर कहा—‘तू इस चरुका उपयोग करना और इस (दूसरे) चरुका उपयोग करनेके लिये अपनी मातासे कहना ॥ १९॥
तस्यां जनिष्यते पुत्रो दीप्तिमान् क्षत्रियर्षभः।
अजेयः क्षत्रियैर्लोके क्षत्रियर्षभसूदनः ॥ २० ॥
‘तुम्हारी माताके जो पुत्र होगा, वह क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ, दीप्तिमान्, संसारमें क्षत्रियोंसे अजेय और बड़े-बड़े क्षत्रियोंको दबानेवाला होगा ॥ २० ॥
तवापि पुत्रं कल्याणि धृतिमन्तं तपोनिधिम्।
शमात्मकं द्विजश्रेष्ठं चरुरेव विधास्यति ॥ २१ ॥
‘कल्याणि ! यह चरु तुम्हें भी धैर्यधारी तपोनिधि शान्तस्वरूप द्विजश्रेष्ठ पुत्र देगा’ ॥ २१ ॥
एवमुक्त्वा तु तां भार्यामृचीको भृगुनन्दनः।
तपस्यभिरतो नित्यमरण्यं प्रविवेश ह ॥ २२ ॥
सदा तपस्यामें ही तत्पर रहनेवाले भृगुनन्दन ऋचीक अपनी पत्नीसे इस प्रकार कहकर (तप करनेके लिये) वनमें चले गये ॥ २२ ॥
गाधिः सदारस्तु तदा ऋचीकावासमभ्यगात्।
तीर्थयात्राप्रसङ्गेन सुतां द्रष्टुं जनेश्वरः॥ २३ ॥
उसी समय राजा गाधि अपनी भार्याके साथ तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे अपनी पुत्रीको देखनेके लिये ऋचीक ऋषिके आश्रमपर आये ॥ २३ ॥
चरुद्वयं गृहीत्वा तदृषेः सत्यवती तदा।
चरुमादाय यत्नेन सा तु मात्रे न्यवेदयत् ॥२४ ॥
तब सत्यवतीने ऋषिके दिये हुए दोनों चरुओंको ग्रहण करके उन्हें यत्नपूर्वक अपनी माताके सामने लाकर रख दिये ॥ २४॥
माता व्यत्यस्य दैवेन दुहित्रे स्वं चरुं ददौ।
तस्याश्चरुमथाज्ञानादात्मसंस्थं चकार ह ॥ २५ ॥
तब दैववश माताने चरु बदलकर पुत्रीको अपना चरु दे दिया और उसने अज्ञानवश पुत्रीके चरुको स्वयं खा लिया ॥ २५ ॥
अथ सत्यवती गर्भं क्षत्रियान्तकरं तदा।
धारयामास दीप्तेन वपुषा घोरदर्शनम् ॥ २६ ॥
तदनन्तर सत्यवतीने क्षत्रियोंका संहार करनेवाले गर्भको धारण कर लिया, जो अपने शरीरकी कान्तिके कारण घोर (क्रूर) दीखने लगा॥ २६ ॥
तामृचीकस्ततो दृष्ट्वा योगेनाभ्यनुसृत्य च।
तामब्रवीद् द्विजश्रेष्ठः स्वां भार्यां वरवर्णिनीम् ॥ २७ ॥
उसको देखकर ऋषिने ध्यानके द्वारा सारी बातोंको जान लिया। फिर द्विजश्रेष्ठ ऋचीक ऋषि अपनी श्रेष्ठ अङ्गोंवाली भार्यासे कहने लगे—॥ २७ ॥
मात्रासि वञ्चिता भद्रे चरुव्यत्यासहेतुना।
जनिष्यति हि पुत्रस्ते क्रूरकर्मातिदारुणः ॥ २८ ॥
भ्राता जनिष्यते चापि ब्रह्मभूतस्तपोधनः।
विश्वं हि ब्रह्म तपसा मया तस्मिन् समर्पितम् ॥ २९ ॥
‘भद्रे ! माताने तुझे ठग लिया है, चरुमें उलट-फेर होनेसे तेरा पुत्र अत्यन्त दारुण क्रूर कार्य करनेवाला होगा और तेरा भाई तपस्याका धनी एवं ब्रह्मस्वरूप होगा, मैंने तपके द्वारा उस (चरु) में सारा वेद भर दिया था’ ॥ २८-२९ ॥
एवमुक्ता महाभागा भर्त्रा सत्यवती तदा।
प्रसादयामास पतिं पुत्रो मे नेदृशो भवेत्।
ब्राह्मणापसदस्तत्र इत्युक्तो मुनिरब्रवीत् ॥ ३० ॥
पतिके इस प्रकार कहनेपर महाभाग्यवती सत्यवती स्वामीको प्रसन्न करके बोली—‘मेरा पुत्र ऐसा ब्राह्मणाधम न हो।’ तब मुनिने उससे कहा—॥ ३० ॥
नैष संकल्पितः कामो मया भद्रे तथास्त्विति।
उग्रकर्मा भवेत् पुत्रः पितुर्मातृश्च कारणात्।
पुनः सत्यवती वाक्यमेवमुक्ताब्रवीदिदम् ॥ ३१ ॥
‘भद्रे ! पिता अथवा माताके कारण ही पुत्र क्रूर कर्म करनेवाला हो जाता है, मैंने तो उग्र कर्म करनेवाले पुत्रकी कामना नहीं की थी (परंतु तेरी ही असावधानीसे चरुका उलट-फेर हो गया है अतएव ऐसा ही पुत्र होगा)।’ इस प्रकार कहनेपर सत्यवतीने फिर कहा—॥ ३१ ॥
इच्छँल्लोकानपि मुने सृजेथाः किं पुनः सुतम्।
शमात्मकंऋजुं त्वं मे पुत्रं दातुमर्हसि ॥ ३२ ॥
‘मुने ! आप चाहें तो तीनों लोकोंका निर्माण कर सकते हैं, फिर पुत्रकी तो बात ही क्या ? आप तो मुझे शमपरायण सरल पुत्र ही प्रदान करें’ ॥ ३२ ॥
काममेवंविधः पौत्रो मम स्यात्तव च प्रभो।
यद्यन्यथा न शक्यं वै कर्तुमेतद् द्विजोत्तम ॥ ३३ ॥
‘प्रभो ! द्विजश्रेष्ठ ! यदि इस बातको पलटा न जा सके तो भले ही आपका और मेरा पौत्र ऐसा हो जाय’ ॥ ३३ ॥
ततः प्रसादमकरोत्स तस्यास्तपसो बलात्।
भद्रे नास्ति विशेषो मे पौत्रे च वरवर्णिनि।
त्वया यथोक्तं वचनं तथा भद्रं भविष्यति ॥ ३४ ॥
तब उन्होंने अपने तपोबलसे उसके ऊपर अनुग्रह किया और कहा—‘भद्रे ! वरवर्णिनि ! मैं (पुत्रमें और) पौत्रमे कुछ भेद नहीं समझता, अतः तूने जो कहा है, वह वैसा ही होगा’ ॥ ३४ ॥
ततः सत्यवती पुत्रं जनयामास भार्गवम्।
तपस्यभिरतं दान्तं जमदग्निं शमात्मकम् ॥ ३५ ॥
हरिवंशपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः [ ९५
तदनन्तर सत्यवतीने भृगुवंशी जमदग्निको जन्म दिया, जो तपस्यापरायण, जितेन्द्रिय तथा शम (मनोनिग्रह) से सम्पन्न थे ॥ ३५ ॥
भृगोश्चरुविपर्यासे रौद्रवैष्णवयोः पुरा ।
यजनाद् वैष्णवेऽर्थांशे जमदग्निरजायत ॥ ३६ ॥
भृगुवंशी ऋचीक मुनिने पूर्वकालमे जो देवताओंकी आराधना की थी, उसीके प्रभावसे रुद्र और विष्णुके अंशभूत उन दोनों चरुओंमे उलट-फेर हो जानेपर भी वैष्णव चरुके अंशसे शान्तस्वभाव जमदग्नि मुनिका जन्म हुआ ॥ ३६ ॥
सा हि सत्यवती पुण्या सत्यधर्मपरायणा ।
कौशिकीति समाख्याता प्रवृत्तेयं महानदी ॥ ३७ ॥
सत्यवती सत्य-धर्ममें तत्पर रहनेवाली पुण्यात्मा स्त्री थी। यही कौशिकी नामसे विख्यात महानदी हुई ॥ ३७ ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रेणुर्नाम नराधिपः ।
तस्य कन्या महाभागा कामली नाम रेणुका ॥ ३८ ॥
इक्ष्वाकुवंशमें रेणु नामवाले एक नरेश थे। उनकी कन्या महाभागा रेणुका थी, जिसका दूसरा नाम कामली भी था ॥
रेणुकायां तु कामल्यां तपोविद्यासमन्वितः ।
आर्चीको जनयामास जामदग्न्यं सुदारुणम् ॥ ३९ ॥
सर्वविद्यानुगं श्रेष्ठं धनुर्वेदस्य पारगम् ।
रामं क्षत्रियहन्तारं प्रदीप्तमिव पावकम् ॥ ४० ॥
उस रेणुका या कामलीके गर्भसे तपस्वी एवं विद्वान् ऋचीकपुत्र जमदग्निने अत्यन्त कठोर स्वभाववाले परशुरामजीको प्रकट किया, जो समस्त विद्याओंमें पारङ्गत, धनुर्वेदमें प्रवीण, क्षत्रियकुलका संहार करनेवाले तथा प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी थे ॥ ३९-४० ॥
और्वस्यैवमृचीकस्य सत्यवत्यां महायशाः ।
जमदग्निस्तपोवीर्याज्जज्ञे ब्रह्मविदां वरः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार और्व नामसे प्रसिद्ध ऋचीक मुनिके तपोबलसे उनकी पत्नी सत्यवतीके गर्भसे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महायशस्वी जमदग्निका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ४१ ॥
मध्यमश्च शुनःशेपः शुनःपुच्छः कनिष्ठकः ।
विश्वामित्रं तु दायादं गाधिः कौशिकनन्दनः ॥ ४२ ॥
जनयामास पुत्रं तु तपोविद्याशमात्मकम् ।
प्राप्य ब्रह्मर्षिसमतां योऽयं सप्तर्षितां गतः ॥ ४३ ॥
ऋचीकके मझले पुत्र शुनःशेप और छोटे पुत्र शुनःपुच्छ थे। इधर कौशिकनन्दन महाराज गाधिने विश्वामित्रको पुत्ररूपमें प्रकट किया, जो तपस्वी, विद्वान् और शान्त थे। वे ब्रह्मर्षिकी समता पाकर सप्तर्षियोंमें प्रतिष्ठित हुए हैं ॥ ४२-४३ ॥
विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा नाम्ना विश्वरथः स्मृतः ।
जज्ञे भृगुप्रसादेन कौशिकाद् वंशवर्धनः ॥ ४४ ॥
धर्मात्मा विश्वामित्रका दूसरा नाम विश्वरथ था। वे कुशिकवंशी राजा गाधिके यहाँ भृगुवंशी ऋचीक मुनिकी कृपासे उत्पन्न हुए थे और अपने वंशका विस्तार करनेवाले थे ॥
विश्वामित्रस्य च सुता देवरातादयः स्मृताः ।
प्रख्यातास्त्रिषु लोकेषु तेषां नामानि मे शृणु ॥ ४५ ॥
विश्वामित्रके देवरात आदि बहुत-से पुत्र कहे गये हैं, जो तीनों लोकोंमें विख्यात थे। उनके नाम मुझसे सुनो ॥
देवश्रवाः कतिश्चैव यस्सात्यायनाः स्मृताः ।
शालाहत्यां हिरण्याक्षो रेणोजज्ञेऽथ रेणुमान् ॥ ४६ ॥
सांकृतिर्गालवश्चैव मुद्गलश्चेति विश्रुताः ।
मधुच्छन्दो जयश्चैव देवलश्च तथाष्टकः ॥ ४७ ॥
कच्छपो हरितश्चैव विश्वामित्रस्य वै सुताः ।
तेषां ख्यातानि गोत्राणि कौशिकानां महात्मनाम् ॥ ४८ ॥
देवश्रवा, कात्यायन गोत्रके प्रवर्तक कति और हिरण्याक्ष— ये तीनों शालावतीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। उनकी दूसरी स्त्रीका नाम रेणु था, जिससे रेणुमान्, सांकृति, गालव, मुद्गल, मधुच्छन्द, जय तथा देवल उत्पन्न हुए थे। अष्टक ( दृषद्वती या माधवीका पुत्र था ), कच्छप और हरित भी विश्वामित्रके ही पुत्र थे। इन कौशिकवंशी महात्माओंके प्रसिद्ध गोत्र इस प्रकार हैं ॥ ४६-४८ ॥
पाणिनो बभ्रवश्चैव ध्यानजप्यास्तथैव च ।
पार्थिवा देवराताश्च शालङ्कायनबाष्कलाः ॥ ४९ ॥
लोहिता यामदूताश्च तथा कारीषवः स्मृताः ।
सौश्रुताः कौशिका राजंस्तथान्ये सैन्धवायनाः ॥ ५० ॥
देवला रेणवश्चैव याज्ञवल्क्याघमर्षणाः ।
औदुम्बरा ह्यभिष्णातास्तारकायनचुञ्चुलाः ॥ ५१ ॥
शालाहत्या हिरण्याक्षाः सांकृत्या गालवास्तथा ।
वादरायणिनश्चान्ये विश्वामित्रस्य धीमतः ॥ ५२ ॥
राजन् ! पाणिन, बभ्रु, ध्यानजप्य, पार्थिव, देवरात, शालङ्कायन, बाष्कल, लोहित, यामदूत, कारीषु, सौश्रुत, कौशिक, सैन्धवायन, देवल, रेणु, याज्ञवल्क्य, अघमर्षण, औदुम्बर, अभिष्ण्णात, तारकायन, चुञ्चुल, शालावत्य, हिरण्याक्ष, सांकृत्य, गालव तथा बादरायणि—ये तथा और भी बहुत-से बुद्धिमान् विश्वामित्रके पुत्र थे ॥ ४९-५२ ॥
ऋष्यन्तरविवाहाश्च कौशिका बहवः स्मृताः ।
पौरवस्य महाराज ब्रह्मर्षेः कौशिकस्य च ।
सम्बन्धोऽप्यस्य वंशेऽस्मिन्ब्रह्मक्षत्रस्य विश्रुतः ॥ ५३ ॥
कौशिकगोत्री ब्राह्मणोंकी संख्या बहुत है। वे अन्य ऋषियोंके कुलमें विवाह-सम्बन्ध स्थापित करनेके योग्य हैं। महाराज ! राजर्षि पौरव तथा ब्रह्मर्षि कौशिकके कुलमें सम्बन्ध हुआ है। इस प्रकार इस वंशमें ब्राह्मणों तथा क्षत्रियोंका परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध विख्यात है ॥ ५३ ॥
९६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
विश्वामित्रात्मजानां तु शुनःशेपोऽग्रजः स्मृतः ।
भार्गवः कौशिकत्वं हि प्राप्तः स मुनिसत्तमः ॥ ५४ ॥
विश्वामित्रके पुत्रोंमें शुनःशेप सबसे बड़े माने गये हैं। मुनिश्रेष्ठ शुनःशेपका जन्म यद्यपि भृगुकुलमें हुआ था तथापि वे कौशिकगोत्री हो गये ॥ ५४ ॥
विश्वामित्रस्य पुत्रस्तु शुनःशेपोऽभवत् किल ।
हरिदश्वस्य यज्ञे तु पशुत्वे विनियोजितः ॥ ५५ ॥
देवैर्दत्तः शुनःशेपो विश्वामित्राय वै पुनः ।
देवैर्दत्तः स वै यस्माद् देवरातस्ततोऽभवत् ॥ ५६ ॥
कहते हैं, राजा हरिदश्व (हरिश्चन्द्र) के यज्ञमें शुनःशेप पशु बनाकर लाये गये थे। उसी समय वे विश्वामित्रके पुत्र हुए। देवताओंने विश्वामित्रके हाथमें पुनः शुनःशेपको दे दिया था। देवताओंद्वारा प्रदत्त होनेके कारण वे ('देवैः रातः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार) देवरात नामसे विख्यात हुए ॥
देवरातादयः सप्त विश्वामित्रस्य वै सुताः ।
दृषद्वतीसुतश्चापि विश्वामित्रात् तथाष्टकः ॥ ५७ ॥
विश्वामित्रके देवरात आदि सात प्रमुख पुत्र थे। उन्हींसे अष्टकका भी जन्म हुआ था, जो दृषद्वतीका पुत्र था ॥
अष्टकस्य सुतो लौहिः प्रोक्तो जह्नुगणो मया ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वंशमायोर्महात्मनः ॥ ५८ ॥
अष्टकका पुत्र लौहि बताया गया है। इस प्रकार मैंने जह्नुकुलका वर्णन किया। इसके बाद महात्मा आयुके वंशका वर्णन करूँगा ॥ ५८ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वण्यमावसुवंशकीर्तनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें अमावसुके वंशका वर्णनविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥
अष्टाविंशोऽध्यायः
राजा रजि और उनके पुत्रोंका चरित्र, इन्द्रका अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर पुनः उसपर प्रतिष्ठित होना
वैशम्पायन उवाच
आयोः पुत्रास्तथा पञ्च सर्वे वीरा महारथाः ।
स्वर्भानुतनुयायां च प्रभायां जज्ञिरे नृप ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! स्वर्भानुकुमारी प्रभा आयुकी पत्नी थी। उसके गर्भसे आयुके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब वीर और महारथी थे ॥ १ ॥
नहुषः प्रथमं जज्ञे वृद्धशर्मा ततः परम् ।
रम्भो रजिरनेनाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ॥ २ ॥
उनमें सबसे पहले नहुषका जन्म हुआ। तत्पश्चात् वृद्धशर्मा उत्पन्न हुए। तदनन्तर क्रमशः रम्भ, रजि और अनेना प्रकट हुए। ये तीनों लोकोंमें विख्यात थे ॥ २ ॥
रजिः पुत्रशतानीह जनयामास पञ्च वै ।
राजेयमिति विख्यातं क्षत्रमिन्द्रभयावहम् ॥ ३ ॥
रजिने पाँच सौ पुत्रोंको जन्म दिया। वे सभी क्षत्रिय राजेय नामसे विख्यात हुए। उनसे इन्द्र भी डरते थे ॥ ३ ॥
यत्र देवासुरे युद्धे समुत्पन्ने सुदारुणे ।
देवाश्चैवासुराश्चैव पितामहमथाब्रुवन् ॥ ४ ॥
आवयोर्भगवन् युद्धे को विजेता भविष्यति ।
ब्रूहि नः सर्वभूतेश श्रोतुमिच्छामि ते वचः ॥ ५ ॥
पूर्वकालमें देवताओं तथा असुरोंमें अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ होनेपर उन दोनों पक्षोंके लोगोंने पितामह, ब्रह्माजीसे पूछा—'भगवन् ! सर्वभूतेश्वर ! बताइये, हम दोनोंके युद्धमें कौन विजयी होगा ? हम इस विषयमें आपकी यथार्थ बात सुनना चाहते हैं' ॥ ४-५ ॥
ब्रह्मोवाच
येषामर्थाय संग्रामे राजिरात्तायुधः प्रभुः ।
योत्स्यते ते जयिष्यन्ति त्रींल्लोकान्नात्र संशयः ॥ ६ ॥
ब्रह्माजीने कहा—शक्तिशाली राजा रजि हाथमें हथियार लेकर जिनके लिये संग्रामभूमिमें खड़े हो युद्ध करेंगे, वे तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर लेंगे। इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥
यतो रजिर्धृतिस्तत्र श्रीश्च तत्र यतो धृतिः ।
यतो धृतिश्च श्रीश्चैव धर्मस्तत्र जयस्तथा ॥ ७ ॥
जिस पक्षमें रजि हैं, उधर ही धृति है जहाँ धृति है वहीं लक्ष्मी है तथा जहाँ धृति और लक्ष्मी हैं वहीं धर्म एवं विजय है ॥ ७ ॥
ते देवदानवाः प्रीता देवेनोक्ता रजेर्जये ।
अभ्ययुर्जयमिच्छन्तो वृण्वाना भरतर्षभ ॥ ८ ॥
भरतकुलभूषण जनमेजय ! रोजिक विजयके विषयमें ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर देवता और दानव प्रसन्न हो अपनी-अपनी विजय चाहते हुए रजिका वरण करनेके लिये उनके पास गये ॥ ८ ॥
स हि स्वर्भानुदौहित्रः प्रभायां समपद्यत ।
राजा परमतेजस्वी सोमवंशप्रवर्धनः ॥ ९ ॥
वे राहुके दौहित्र थे। राहुकी पुत्री प्रभाके गर्भसे उनका जन्म हुआ था। सोमवंशकी वृद्धि करनेवाले वे राजा रजि बड़े तेजस्वी थे ॥ ९ ॥
हरिवंशपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ९७
ते हृष्टमनसः सर्वे रजिं देवाश्च दानवाः।
ऊचुरस्मज्जयाय त्वं गृहाण वरकार्मुकम् ॥ १० ॥
समस्त देवता और दानव दोनों प्रसन्नचित्त हो रजिंके पास जाकर बोले—'राजन् ! आप हमारी विजयके लिये अपना श्रेष्ठ धनुष धारण कीजिये' ॥ १० ॥
अथोवाच रजिस्तत्र तयोर्वै देवदैत्ययोः।
स्वार्थज्ञः स्वार्थमुद्दिश्य यशः स्वं च प्रकाशयन् ॥ ११ ॥
तब स्वार्थको समझनेवाले रजिने वहाँ स्वार्थको सामने रखकर अपने यशको प्रकाशमे लाते हुए देवता और दानव दोनों पक्षके लोगोंसे कहा ॥ ११ ॥
रजिरुवाच
यदि दैत्यगणान् सर्वाञ्जित्वा शक्रपुरोगमाः।
इन्द्रो भवामि धर्मेण ततो योत्स्यामि संयुगे ॥ १२ ॥
रजि बोले—इन्द्रादि देवताओ ! यदि मैं समस्त दैत्योंको जीतकर धर्मतः इन्द्र हो सकूँ तो तुम्हारी ओरसे रणभूमिमें युद्ध करूँगा ॥ १२ ॥
देवाः प्रथमतॊ भूयः प्रत्युचुर्हृष्टमानसाः।
एवं यथेष्टं नृपते कामः सम्पद्यतां तव ॥ १३ ॥
यह सुनकर देवताओँने फिर प्रसन्नचित्त हो पहले ही उत्तर दिया—'नरेश्वर ! ऐसा ही होगा। तुम्हारी अभीष्ट कामना पूर्ण हो' ॥ १३ ॥
श्रुत्वा सुरगणानां तु वाक्यं राजा रजिस्तदा।
पप्रच्छासुरमुख्यांस्तु यथा देवानपृच्छत ॥ १४ ॥
देवताओँकी यह बात सुनकर उस समय राजा रजिने मुख्य-मुख्य असुरोंसे भी वैसी ही बात पूछी जैसी देवताओँसे पूछी थी ॥ १४ ॥
दानवा दर्पपूर्णास्तु स्वार्थमेवानुगम्य ह।
प्रत्युचुस्ते नृपवरं साभिमानमिदं वचः ॥ १५ ॥
तब अहंकारी दानवों ने स्वार्थको ही सामने रखकर अनुसरण करते हुए उन नृपश्रेष्ठको अभिमानपूर्वक यों उत्तर दिया— ॥ १५ ॥
अस्माकमिन्द्रः प्रह्लादो यस्यार्थे विजयामहे।
अस्मिंस्तु समये रजिंस्तिष्ठेथा राजसत्तम ॥ १६ ॥
'राजशिरोमणे ! हमारे इन्द्र तो प्रह्लाद ही हैं, जिनके लिये हम विजय प्राप्त करना चाहते हैं। राजन् ! आपको इसी शर्तपर हमारे पक्षमें खड़ा होना चाहिये' ॥ १६ ॥
स तथेति ब्रुवन्नेव दैवतैरप्यभिचोदितः।
भविष्यसीन्द्रो जित्वैवं दैवैरुक्तस्तु पार्थिवः।
जघान दानवान् सर्वान् ये वध्या वज्रपाणिनः ॥ १७ ॥
वे 'बहुत अच्छा' कहकर असुरोंकी बात मानना ही चाहते थे कि देवताओँने फिर उन्हें अपने पक्षमें आनेके लिये प्रेरणा देते हुए कहा—'राजन् ! तुम इस प्रकार विजय पाकर हमारे इन्द्र हो जाओगे।' देवताओँके ऐसा कहनेपर राजा रजिने उन समस्त दानवोंका संहार कर डाला, जो वज्रपाणि इन्द्रके द्वारा मारे जाने योग्य थे ॥ १७ ॥
स विप्रणष्टां देवानां परमश्रीः श्रियं वशी।
निहत्य दानवान् सर्वानाजहार रजिः प्रभुः ॥ १८ ॥
मनको वशमे रखनेवाले परमकान्तिमान् एवं शक्तिशाली राजा रजिने समस्त दानवोंका संहार करके देवताओँकी खोयी हुई सम्पत्तिको फिर वापस ला दिया ॥ १८ ॥
ततो रजिं महावीर्यं देवैः सह शतक्रतुः।
रजेः पुत्रोऽहमित्युक्त्वा पुनरेवाब्रवीद् वचः ॥ १९ ॥
तब देवताओंसहित इन्द्रने अपनेको रजिका पुत्र बताकर उन महापराक्रमी रजिसे पुनः इस प्रकार कहा— ॥ १९ ॥
इन्द्रोऽसि तात देवानां सर्वेषां नात्र संशयः।
यस्याहमिन्द्रः पुत्रस्ते ख्यातिं यास्यामि कर्मभिः ॥ २० ॥
'तात ! आप हम सब देवताओँके इन्द्र हैं, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि मैं इन्द्र आजसे आपके इन वीरोचित कर्मोंद्वारा अनुगृहीत हो आपका पुत्र कहलाऊँगा। आपके पुत्र-रूपमें ही मेरी ख्याति होगी' ॥ २० ॥
स तु शक्रवचः श्रुत्वा वञ्चितस्तेन मायया।
तथेत्येवाब्रवीद् राजा प्रीयमाणः शतक्रतुम् ॥ २१ ॥
इन्द्रकी यह बात सुनकर उनकी मायासे वञ्चित हो महाराज रजिने 'तथास्तु' कह दिया। वे इन्द्रपर बहुत प्रसन्न थे ॥ २१ ॥
तस्मिंस्तु देवसदृशे दिवं प्राप्ते महीपतौ।
दायाद्यमिन्द्रादाजह्रुराचारात् तनया रजेः ॥ २२ ॥
उन देवोपम भूपाल रजिंके ब्रह्मलोकवासी हो जानेपर उनके पुत्रोंने लोकव्यवहारके अनुसार इन्द्रसे अपना दायभाग माँगा और बलपूर्वक ले लिया ॥ २२ ॥
पञ्चपुत्रशतान्यस्य तद्वै स्थानं शतक्रतोः।
समाक्रमन्त बहुधा स्वर्गलोकं त्रिविष्टपम् ॥ २३ ॥
रजिका पाँच सौ पुत्र थे। उन्होंने इन्द्रके त्रिविष्टप नामसे प्रसिद्ध स्वर्गलोकपर बारंबार आक्रमण करके उसे ले लिया ॥ २३ ॥
ततो बहुतिथे काले समतीते महाबलः।
हृतराज्योऽब्रवीच्छक्रो हृतभागो बृहस्पतिम् ॥ २४ ॥
तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर राज्य और यज्ञभाग-से वञ्चित हो अत्यन्त दुर्बल हुए इन्द्रने एक दिन एकान्तमें बृहस्पतिजीसे कहा ॥ २४ ॥
| ९८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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इन्द्र उवाच
बदरीफलमात्रं वै पुरोडाशं विधत्स्व मे।
ब्रह्मर्षे येन तिष्ठेयं तेजसाऽऽप्यायितः सदा ॥ २५ ॥
इन्द्र बोले—ब्रह्मर्षे ! आप एक बेरके बराबर भी पुरोडाशखण्डकी व्यवस्था मेरे लिये कर दें, जिससे मैं भी सदा तेजसे परिपुष्ट होता रहूँ ॥ २५ ॥
ब्रह्मन् कृशोऽहं विमना हृतराज्यो हृताशनः ।
हतौजा दुर्बलो मूढो रजिपुत्रैः कृतः प्रभो ॥ २६ ॥
ब्रह्मन् ! प्रभो ! रजिके पुत्रोंने मेरा राज्य और भोजन छीनकर मुझे अत्यन्त कृश, खिन्नचित्त, हतोत्साह, दुर्बल एवं मूढ़ बना दिया है ॥ २६ ॥
बृहस्पतिरुवाच
यद्येवं चोदितः शक्र त्वयास्यां पूर्वमेव हि ।
नाभविष्यत्त्वत्प्रियार्थमकर्तव्यं ममानघ ॥ २७ ॥
बृहस्पतिजीने कहा—निष्पाप इन्द्र ! यदि ऐसी बात है तो तुम्हें मुझसे पहले ही यह कहना चाहिये था। तुम्हारा प्रिय करनेके लिये ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो मैं न कर सकूँ ॥ २७ ॥
प्रयतिष्यामि देवेन्द्र त्वत्प्रियार्थे न संशयः ।
यथा भागं च राज्यं च नचिरात्प्रतिलप्स्यसे ॥ २८ ॥
देवेन्द्र ! मैं तुम्हारे प्रिय मनोरथकी सिद्धिके लिये निःसंदेह ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे तुम अपना राज्य और यज्ञभाग शीघ्र प्राप्त कर लोगे ॥ २८ ॥
तथा तात करिष्यामि मा भूत् ते विक्लवं मनः ।
ततः कर्म चकारास्य तेजसो वर्धनं तदा ॥ २९ ॥
तात ! तुम जैसा चाहते हो वैसा ही करूँगा। तुम्हारा मन व्याकुल न हो। ऐसा कहकर बृहस्पतिजीने उस समय इन्द्रके तेजको बढ़ानेवाले कर्मका अनुष्ठान किया ॥ २९ ॥
तेषां च बुद्धिसम्मोहमकरोद् द्विजसत्तमः ।
नास्तिकादार्थशास्त्रं हि धर्मविद्वेषणं परम् ॥ ३० ॥
द्विजश्रेष्ठ बृहस्पतिने रजिके पुत्रोंकी बुद्धिमें मोह उत्पन्न करनेके लिये ऐसे शास्त्रका निर्माण किया, जो नास्तिकवादसे परिपूर्ण तथा धर्मके प्रति अत्यन्त द्वेष उत्पन्न करनेवाला था ॥ ३० ॥
परमं तर्कशास्त्राणामसतां तन्मनोऽनुगम् ।
न हि धर्मप्रधानानां रोचते तत्कथान्तरे ॥ ३१ ॥
केवल तर्कके आधारपर अपने सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंमें वह उत्कृष्ट माना गया है। बृहस्पतिका वह नास्तिक दर्शन दुष्ट पुरुषोंके ही मनको अधिक भाता है। धर्मप्रधान पुरुषोंको बातचीतके प्रसंगमें भी उसकी चर्चा नहीं सुहाती है ॥ ३१ ॥
ते तद् वृहस्पतिकृतं शास्त्रं श्रुत्वाल्पचेतसः ।
पूर्वोक्तधर्मशास्त्राणामभवन् द्वेषिणः सदा ॥ ३२ ॥
बृहस्पतिके उस शास्त्रको सुनकर वे मन्दबुद्धि रजिपुत्र पहलेके धर्मशास्त्रोंसे सदा द्वेष रखने लगे ॥ ३२ ॥
प्रवक्तुर्न्यायरहितं तन्मतं बहु मेनिरे ।
तेनाधर्मेण ते पापाः सर्व एव क्षयं गताः ॥ ३३ ॥
वक्ताका वह न्यायरहित मत उन्हें बहुत उत्तम जान पड़ने लगा। उसी अधर्मसे वे सब पापी नष्ट हो गये ॥ ३३ ॥
त्रैलोक्यराज्यं शक्रस्तु प्राप्य दुष्प्रापमेव च ।
बृहस्पतिप्रसादाद्धि परां निर्वृतिरभ्ययात् ॥ ३४ ॥
इस तरह बृहस्पतिकी कृपासे त्रिलोकीका वह दुर्लभ राज्य पाकर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३४ ॥
ते यदा तु सुसम्भूढा रागोन्मत्ता विधर्मिणः ।
ब्रह्मद्विषश्च संवृत्ता हतवीर्यपराक्रमाः ॥ ३५ ॥
ततो लेभे सुरैश्वर्यमिन्द्रः स्थानं तथोत्तमम् ।
हत्वा रजिसुतान् सर्वान् कामक्रोधपरायणान् ॥ ३६ ॥
वे रजिके पुत्र जब नास्तिकवादका आश्रय ले विवेकशून्य, रागोन्मत्त, धर्मके विपरीत चलनेवाले, ब्रह्मद्रोही, शक्तिहीन और पराक्रमशून्य हो गये, तब काम-क्रोधमें तत्पर रहनेवाले उन समस्त रजिपुत्रोंको मारकर इन्द्रने देवताओंका ऐश्वर्य और उत्तम स्थान प्राप्त कर लिया ॥ ३५-३६ ॥
य इदं च्यावनं स्थानात् प्रतिष्ठां च शतक्रतोः ।
शृणुयाद् धारयेद्वापि न स दौरात्म्यमाप्नुयात् ॥ ३७ ॥
जो इन्द्रके अपने स्थानसे भ्रष्ट होने और पुनः उसपर प्रतिष्ठित होनेके इस प्रसङ्गको सुनता और अपने हृदयमें धारण करता है, उसके मनमें कभी दुर्भावना नहीं आती ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आयोर्वंशकीर्तनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आयुके वंशका वर्णनविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
हरिवंशपर्व ] एकोनत्रिंशोऽध्यायः ९९
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
अनेनाके वंशका वर्णन, धन्वन्तरिका काशिराज धन्वके यहाँ पुत्ररूपमें अवतार, दिवोदासके राज्यकालमें भगवान् शिवकी आज्ञासे गणेश्वर निकुम्भके द्वारा वाराणसीको जनशून्य बनानेका प्रयत्न, वहाँ शिव और पार्वतीका निवास, दिवोदासका वाराणसीपर अधिकार और अलर्ककी प्रशंसा
वैशम्पायन उवाच
रम्भोऽनपत्यस्त्वासीद् वंशं वक्ष्याम्यनेनसः ।
अनेनसः सुतो राजा प्रतिक्षत्रो महायशाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! आयुपुत्र रम्भके कोई संतान नहीं हुई। अब मैं अनेनाके वंशका वर्णन करूँगा। अनेनाके पुत्र महायशस्वी राजा प्रतिक्षत्र हुए ॥ १ ॥
प्रतिक्षत्रसुतश्चापि सञ्जयो नाम विश्रुतः।
सञ्जयस्य जयः पुत्रो विजयस्तस्य चात्मजः ॥ २ ॥
प्रतिक्षत्रके पुत्र सञ्जय नामसे विख्यात हुए। सञ्जयके पुत्र जय और जयके पुत्र विजय हुए ॥ २ ॥
विजयस्य कृतिः पुत्रस्तस्य हर्यश्वतः सुतः।
हर्यश्वतसुतो राजा सहदेवः प्रतापवान् ॥ ३ ॥
विजयके पुत्र कृति, कृतिके हर्यश्व और हर्यश्वके पुत्र प्रतापी राजा सहदेव हुए ॥ ३ ॥
सहदेवस्य धर्मात्मा नदीन इति विश्रुतः।
नदीनस्य जयत्सेनो जयत्सेनस्य संकृतिः ॥ ४ ॥
सहदेवका धर्मात्मा पुत्र नदीन नामसे विख्यात हुआ। नदीनका पुत्र जयत्सेन और जयत्सेनका संकृति था ॥ ४ ॥
संकृतेरपि धर्मात्मा क्षत्रधर्मा महायशाः।
अनेनसः समाख्याताः क्षत्रवृद्धस्य मे श्रृणु ॥ ५ ॥
संकृतिके पुत्र महायशस्वी धर्मात्मा क्षत्रधर्मा हुए। यहाँ-तक अनेनाके पुत्रोंका वर्णन हुआ। अब मुझसे क्षत्रवृद्धकी संततिका वर्णन सुनो ॥ ५ ॥
क्षत्रवृद्धात्मजस्तत्र सुनहोत्रो महायशाः ।
सुनहोत्रस्य दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः ॥ ६ ॥
काशः शलश्च द्वावेतौ तथा गृत्समदः प्रभुः।
पुत्रो गृत्समदस्यापि शुनको यस्य शौनकाः ॥ ७ ॥
क्षत्रवृद्धके पुत्र महायशस्वी सुनहोत्र हुए। सुनहोत्रके परम धार्मिक तीन पुत्र थे—काश, शल और प्रभावशाली गृत्समद। गृत्समदके पुत्र शौनक हुए, जिससे शौनक-वंशका विस्तार हुआ ॥ ६-७ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव वैश्याः शूद्रास्तथैव च।
शालात्मजश्चार्ष्टिषेणस्तनयस्तस्य काशकः ॥ ८ ॥
शौनक-वंशमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णोंके लोग हुए। शलके पुत्रका नाम आर्ष्टिषेण था। उनके पुत्र काशक हुए ॥ ८ ॥
काशस्य काशयो राजन् पुत्रो दीर्घतपास्तथा।
धन्वस्तु दीर्घतपसो विद्वान् धन्वन्तरिस्ततः ॥ ९ ॥
राजन्! काशके वंशज (पुत्र) काशि कहलाये। इनमें दीर्घतपा सबसे प्रथम पुत्र थे। दीर्घतपाके धन्व और धन्व-से विद्वान् धन्वन्तरिका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ९ ॥
तपसोऽन्ते सुमहतो जातो वृद्धस्य धीमतः।
पुनर्धन्वन्तरिर्देवो मानुषेष्विह जज्ञिवान् ॥ १० ॥
अपनी महान् तपस्या पूरी करके अन्तमें धन्वन्तरि देवने बुद्धिमान् एवं वृद्ध राजा धन्वके यहाँ इस मनुष्यरूपमें पुनः जन्म ग्रहण किया ॥ १० ॥
जनमेजय उवाच
कथं धन्वन्तरिर्देवो मानुषेष्विह जज्ञिवान्।
एतद् वेदितुमिच्छामि तन्मे ब्रूहि यथातथम् ॥ ११ ॥
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन् ! धन्वन्तरि देव इस मनुष्य-लोकमें किस प्रकार उत्पन्न हुए? यह मैं जानना चाहता हूँ। अतः यह प्रसङ्ग मुझे ठीक-ठीक बताइये ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
धन्वन्तरेः सम्भवोऽयं श्रूयतां भरतर्षभ ।
जातः स हि समुद्रात्तु मथ्यमाने पुरामृते ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ ! धन्वन्तरिके जन्मका यह प्रसङ्ग सुनो। वे पूर्वकालमें अमृतमन्थनके समय समुद्रसे प्रकट हुए थे ॥ १२ ॥
उत्पन्नः कलशात् पूर्वं सर्वतश्च श्रिया वृतः।
अभ्यसन् सिद्धिकार्यं हि विष्णुं दृष्ट्वा हि तस्थिवान् ॥ १३॥
पहले जब वे समुद्रसे प्रकट हुए, उस समय भगवान् विष्णुके नामोंका जप और आरोग्य-साधक कार्यका चिन्तन करते हुए सब ओरसे दिव्य कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे। वे अपने सामने भगवान् विष्णुको देखकर खड़े हो गये ॥
अब्जस्त्वमिति होवाच तस्मादब्जस्तु स स्मृतः।
अब्जः प्रोवाच विष्णुं वै तव पुत्रोऽस्मि वै प्रभो ॥ १४ ॥
विधत्स्व भागं स्थानं च मम लोके सुरेश्वर।
एवमुक्तः स दृष्ट्वा वै तथ्यं प्रोवाच तं प्रभुः ॥ १५ ॥
| १०० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
भगवान् विष्णुने उनसे कहा—'तुम अप् अर्थात् जलसे प्रकट हुए हो, इसलिये अब्ज हो।' उनके ऐसा कहनेसे वे अब्ज कहलाने लगे । उस समय अब्जने भगवान् विष्णुसे कहा—'प्रभो ! मैं आपका पुत्र हूँ। सुरेश्वर ! मेरे लिये यज्ञभागकी व्यवस्था कीजिये और लोकमें मेरे लिये कोई स्थान दीजिये।' उनके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुने उनकी ओर देखकर यह यथार्थ बात कही—॥ १४-१५ ॥
कृतो यज्ञविभागो हि यज्ञियैर्हि सुरैः पुरा।
देवेषु विनियुक्तं हि विद्धि होत्रं महर्षिभिः॥ १६॥
'पूर्वकालमें यज्ञसम्बन्धी देवताओंने यज्ञका विभाग कर लिया है। महर्षियोंने हवनीय पदार्थोंका देवताओंके लिये ही विनियोग किया है। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥
न शक्यमुपहोमा यै तुभ्यं कर्तुं कदाचन।
अर्वाग्भूतोऽसि देवानां पुत्र त्वं तु नहीश्वरः ॥ १७ ॥
'बेटा ! तुम्हें छोटे-मोटे उपहोम कभी नहीं अर्पित किये जा सकते (क्योंकि वे तुम्हारे योग्य नहीं हैं)। तुम देवताओंसे पीछे उत्पन्न हुए हो। अतः तुम्हारे लिये वेद-विरुद्ध यज्ञभागकी कल्पना नहीं की जा सकती और वैदिक यज्ञभाग पानेके तुम अधिकारी नहीं हो ॥ १७ ॥
द्वितीयायां तु सम्भूतौ लोके ख्यातिं गमिष्यसि।
अणिमादिश्च ते सिद्धिर्गर्भस्थस्य भविष्यति ॥ १८॥
'दूसरे जन्ममें तुम संसारमें विख्यात होओगे। वहाँ गर्भावस्थामें ही तुम्हें अणिमा आदि सिद्धि प्राप्त हो जायगी ॥ १८॥
तेनैव त्वं शरीरेण देवत्वं प्राप्स्यसे प्रभो।
चरुमन्त्रैर्यतैर्जप्यैर्यक्ष्यन्ति त्वां द्विजातयः ॥ १९॥
'प्रभो ! तुम उसी शरीरसे देवत्व प्राप्त कर लोगे और ब्राह्मणलोग चरु, मन्त्र, व्रत एवं जपनीय मन्त्रोंद्वारा तुम्हारा यजन करेंगे ॥ १९ ॥
अष्टधा त्वं पुनश्चैवमायुर्वेदं विधास्यसि।
अवश्यभावी ह्यर्थोऽयं प्राग्दृष्टस्त्वब्जयोनिना ॥ २०॥
'फिर तुम उस जन्ममें आयुर्वेदको आठ भागोंमें विभक्त करके उसे आठ अङ्गोंसे युक्त * बना दोगे, यह बात अवश्य होनेवाली है। कमलयोनि ब्रह्माजीने इसे पहलेसे ही देख लिया है ॥ २० ॥
तृतीयं द्वापरं प्राप्य भविता त्वं न संशयः।
इमं तस्मै वरं दत्त्वा विष्णुरन्तर्दधे पुनः ॥ २१ ॥
'दूसरा द्वापर आनेपर तुम संसारमें प्रकट होओगे, इसमें संशय नहीं है।' धन्वन्तरिको यह वर देकर भगवान् विष्णु फिर अन्तर्धान हो गये ॥ २१ ॥
द्वितीये द्वापरं प्राप्ते सौनहोत्रिः स काशिराट्।
पुत्रकामस्तपस्तेपे धन्वो दीर्घं तपस्तदा ॥ २२॥
जब दूसरा द्वापर आया, तब सुनहोत्रके पुत्र काशिराज धन्व पुत्रकी कामनासे दीर्घकालीन तपस्या करने लगे ॥ २२ ॥
प्रपद्ये देवतां तां तु या मे पुत्रं प्रदास्यति।
अब्जं देवं घृतार्थाय तदाऽऽराधितवान् नृपः ॥ २३ ॥
उन्होंने मन-ही-मन सोचा कि 'मैं उस देवताकी शरण लूँ, जो मुझे पुत्र प्रदान करेगा।' ऐसा विचारकर राजाने पुत्रके लिये अब्जदेव (भगवान् धन्वन्तरि) की आराधना की ॥ २३ ॥
ततस्तुष्टः स भगवानब्जः प्रोवाच तं नृपम्।
यदिच्छसि वरं ब्रूहि तत् ते दास्यामि सुव्रत ॥ २४ ॥
उस आराधनासे संतुष्ट होकर भगवान् अब्ज राजा धन्वसे बोले—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश ! तुम जो वर प्राप्त करना चाहते हो, उसे बताओ। वह मैं तुम्हें दूँगा' ॥
नृप उवाच
भगवन् यदि तुष्टस्त्वं पुत्रो मे ख्यातिमान् भव।
तथेति समुक्त्वाय तत्रैवान्तरधीयत ॥ २५ ॥
राजा बोले—भगवन् ! यदि आप मुझसे संतुष्ट हैं तो मेरे पुत्र हो जायें और इसी रूपमें आपकी ख्याति हो । तब 'तथास्तु' कहकर भगवान् धन्वन्तरि वहीं अन्तर्धान हो गये ॥
तस्य गेहे समुत्पन्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा।
काशिराजो महाराज सर्व्ररोगप्रणाशनः ॥ २६ ॥
महाराज ! तदनन्तर धन्वन्तरिदेव धन्वके घरमें अवतीर्ण हुए । काशिराज धन्वन्तरि समस्त रोगोंका नाश करनेमें समर्थ थे ॥ २६ ॥
*-वैद्यकमें आयुर्वेदके आठ अङ्ग इस प्रकार बताये गये हैं—
कायबालग्रहोर्ध्वाङ्गशल्यदंष्ट्राजरावृषान् ।
अष्टावङ्गानि तस्याहुश्चिकित्सा येषु संश्रिता ॥
१-कायचिकित्सा, २-बालचिकित्सा, ३-ग्रहचिकित्सा, ४-ऊर्ध्वाङ्गचिकित्सा, ५-शल्यचिकित्सा, ६-दंष्ट्राचिकित्सा, ७-जराचिकित्सा और ८-वृषचिकित्सा—ये आठ प्रकारकी चिकित्साएँ हैं । पूर्वोक्त काय, बाल आदि जो आठ अङ्ग हैं, उनपर ही चिकित्सा अवलम्बित होती है। शारीरिक रोगोंके निदान और उपचारको कायचिकित्सा कहते हैं। बालकोंके रोगोंका विचार और उन्हें दूर करनेके उपाय आदि बालचिकित्साके अन्तर्गत हैं। भूत, प्रेत, पिशाच आदिके आवेशसे होनेवाली पीड़ाको समझना और विभिन्न प्रकारके उपचारोंद्वारा उसे दूर करना ग्रहचिकित्सा है। सिर, नेत्र आदि ऊपरके अङ्गोंकी बीमारीको दूर करनेकी चेष्टा एवं विधि ऊर्ध्वाङ्गचिकित्सा कहलाती है। अस्त्र-शस्त्रोंके आघात आदिसे होनेवाले घावको चीर-फाड़कर ठीक करनेकी जो क्रिया है, उसे शल्य-चिकित्सा कहते हैं। सर्पदंशन आदि जङ्गम तथा अफीम आदि स्थावर विषको दूर करनेका उपचार दंष्ट्राचिकित्सा है। रसायन आदिके द्वारा बुढ़ापाको रोकना या उसे दूर करना जराचिकित्सा है। वाजीकरण तन्त्रको ही वृषचिकित्सा कहते हैं।
हरिवंशपर्व ] [ एकोनत्रिंशोऽध्यायः १०१
आयुर्वेदं भरद्वाजात् प्राप्येह भिषजां क्रियाम् । तमष्टधा पुनर्व्यस्य शिष्येभ्यः प्रत्यपादयत् ॥ २७ ॥ उन्होंने मुनिवर भरद्वाजसे आयुर्वेद तथा चिकित्साकर्मका ज्ञान प्राप्त करके उसे आठ भागोंमें विभक्त किया और उन सबकी विस्तृत विवेचना की । फिर बहुतसे शिष्योंको उस अष्टाङ्गयुक्त आयुर्वेदकी शिक्षा दी ॥ २७ ॥
धन्वन्तरेस्तु तनयः केतुमानिति विश्रुतः । अथ केतुमतः पुत्रो वीरो भीमरथः स्मृतः ॥ २८ ॥ धन्वन्तरिके पुत्र केतुमान् नामसे विख्यात हुए । केतुमान्के वीर पुत्रका नाम भीमरथ था ॥ २८ ॥
सुतो भीमरथस्यापि दिवोदासः प्रजेश्वरः । दिवोदासस्तु धर्मात्मा वाराणस्यधिपोऽभवत् ॥ २९ ॥ भीमरथके पुत्र धर्मात्मा राजा दिवोदास हुए, जो वाराणसीपुरीके स्वामी थे ॥ २९ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु पुरीं वाराणसीं नृप । शून्यां निवासयामास क्षेमको नाम राक्षसः ॥ ३० ॥ नरेश्वर ! राजा दिवोदासके राज्यकालमें ही शापवश वाराणसीपुरी जनशून्य हो गयी थी, जिसे पीछे भगवान् रुद्रके अनुचर क्षेमक नामक राक्षसने बसाया था ॥ ३० ॥
शप्ता हि सा मतिमता निकुम्भेन महात्मना । शून्या वर्षसहस्रं वै भविष्री नात्र संशयः ॥ ३१ ॥ भगवान् रुद्रके पार्षद बुद्धिमान् महात्मा निकुम्भने यह शाप दे दिया था कि 'वाराणसीपुरी एक हजार वर्षांतक जनशून्य बनी रहेगी । इसमें संशय नहीं है' ॥ ३१ ॥
तस्यां तु शप्तमात्रायां दिवोदासः प्रजेश्वरः । विषयान्ते पुरीं रम्यां गोमत्यां संन्यवेशयत् ॥ ३२ ॥ उस पुरीके शापग्रस्त हो जानेपर राजा दिवोदासने अपने राज्यकी सीमापर गोमती नदीके किनारे एक रमणीय नगरी बसायी ॥ ३२ ॥
भद्रश्रेण्यस्य पूर्वं तु पुरी वाराणसीत्यभूत् । भद्रश्रेण्यस्य पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम् ॥ ३३ ॥ हत्वा निवेशयामास दिवोदासो नरर्षभः । भद्रश्रेण्यस्य तद् राज्यं हृतं तेन बलीयसा ॥ ३४ ॥ पहले वाराणसीपुरी (यदुवंशी महिष्मान्के पुत्र) भद्रश्रेण्यके अधिकारमें थी । भद्रश्रेण्यके सौ पुत्र थे, जो श्रेष्ठ धनुर्धर माने जाते थे नरश्रेष्ठ दिवोदासने उन सबको मारकर वहाँ अपना राज्य स्थापित किया । उन महाबली नरेशने भद्रश्रेण्यके उस राज्यका बलपूर्वक अपहरण कर लिया ॥ ३३-३४ ॥
जनमेजय उवाच वाराणसीं निकुम्भस्तु किमर्थं शप्तवान् प्रभुः । निकुम्भकश्च धर्मात्मा सिद्धिक्षेत्रं शशाप यः ॥ ३५ ॥ जनमेजयने पूछा—मुने ! वाराणसी तो सिद्धिक्षेत्र (मोक्षधाम) है और प्रभावशाली निकुम्भ बड़े धर्मात्मा हैं। फिर उन्होंने उस पुरीको शाप किस लिये दिया ? ॥ ३५ ॥
वैशम्पायन उवाच दिवोदासस्तु राजर्षिर्नगरीं प्राप्य पार्थिवः । वसति स्म महातेजाः स्फीतायां तु नराधिपः ॥ ३६ ॥ वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! महातेजस्वी, नरेश्वर राजर्षि दिवोदास वाराणसी नगरीको पाकर वहाँके राजा हो गये । वे उस समृद्धिशालिनी नगरीमें सदा ही निवास करते थे ॥ ३६ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु कृतदारो महेश्वरः । देव्याः स प्रियकामस्तु न्यवसच्छ्वशुरान्तिके ॥ ३७ ॥ इन्हीं दिनों भगवान् शङ्कर विवाह करके देवी पार्वतीका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने श्वशुरके पास ही निवास करते थे ॥ ३७ ॥
देवाज्ञया पार्षदा ये त्वधिरूपास्तपोधनाः । पूर्वोक्तैरुपदेशैश्च तोषयन्ति स्म पार्वतीम् ॥ ३८ ॥ उस समय महादेवजीकी आज्ञासे उनके सुयोग्य पार्षद, जो तपस्याके धनी थे, उनके पहले दिये हुए उपदेशके अनुसार पार्वतीदेवीको संतुष्ट करते रहते थे ॥ ३८ ॥
हृष्यते चै महादेवी मेना नैव प्रहृष्यति । जुगुप्सत्यसकृत् तां वै देवीं देवं तथैव सा ॥ ३९ ॥ इससे महादेवी पार्वती तो प्रसन्न रहती थीं, परंतु उनकी माता मेनाको संतोष नहीं होता था । वे महादेवी पार्वती तथा भगवान् शङ्करकी बारंबार निन्दा ही करती थीं ॥ ३९ ॥
सपार्षदस्त्वनाचारस्तव भर्ता महेश्वरः । दरिद्रः सर्वदैवासौ शीलं तस्य न वर्तते ॥ ४० ॥ उन्होंने एक दिन कहा—'उमे ! तेरे पति महादेव और उनके पार्षद सभी अनाचारी हैं । साथ ही वे भोलेनाथ सदाके दरिद्र हैं । शील तो उनमें नाममात्रको भी नहीं है' ॥ ४० ॥
मात्रा तथोक्ता वरदा स्त्रीस्वभावान्न चुक्रुधे । स्मितं कृत्वा च वरदा भवपार्श्वमथागमत् ॥ ४१ ॥ वरदायिनी उमा माताके ऐसा कहनेपर स्त्रीस्वभाववश कुपित हो उठीं और किंचित् मुसकराकर महादेवजीके पास आयीं ॥ ४१ ॥
विवर्णवदना देवी महादेवमभाषत । नेह वत्स्याम्यहं देव नय मां स्वं निकेतनम् ॥ ४२ ॥
१७२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
उस समय उनका मुख मलिन हो रहा था। निकट आकर देवीने महादेवजीसे कहा—'देव ! अब मैं यहाँ (नैहरमें) नहीं रहूँगी। आप मुझे अपने घर ले चलें' ॥ ४२ ॥
तथा कर्तुं महादेवः सर्वलोकानवैक्षत । वासार्थं रोचयामास पृथिव्यां कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥ वाराणसीं महातेजाः सिद्धिक्षेत्रं महेश्वरः ।
कुरूनन्दन ! पार्वतीजीके कथनानुसार कार्य करनेके लिये महादेवजीने सम्पूर्ण लोकोंपर दृष्टिपात किया। उन महातेजस्वी महेश्वरने पृथ्वीपर अपने रहनेके लिये सिद्धिक्षेत्र वाराणसीपुरीको पसंद किया ॥ ४३½ ॥
दिवोदासेन तां ज्ञात्वा निविष्टां नगरीं भवः ॥ ४४ ॥ पार्श्वे तिष्ठन्तमाहूय निकुम्भमिदमब्रवीत् ।
परंतु उस नगरीमें राजा दिवोदास निवास करते हैं, यह जानकर महादेवजीने अपने पास खड़े हुए निकुम्भसे इस प्रकार कहा—॥ ४४½ ॥
गणेश्वर पुरीं गत्वा शून्यां वाराणसीं कुरु ॥ ४५ ॥ मृदुनैवाभ्युपायेन ह्यतिवीर्यः स पार्थिवः ।
'गणेश्वर ! तुम जाकर वाराणसीपुरीको मनुष्योंसे सूनी कर दो; परंतु इसके लिये कोमल उपायसे ही काम लेना, क्योंकि वे राजा दिवोदास बड़े बलवान् हैं' ॥ ४५½ ॥
ततो गत्वा निकुम्भस्तु पुरीं वाराणसीं तदा ॥ ४६ ॥ स्वप्ने निदर्शयामास कण्डुकं नाम नापितम् । श्रेयस्तेऽहं करिष्यामि स्थानं मे रोचयानघ ॥ ४७ ॥ मद्रूपां प्रतिमां कृत्वा नगरान्ते तथैव च । ततः स्वप्ने यथोद्दिष्टं सर्वं कारितवान् नृप ॥ ४८ ॥
तब निकुम्भने वाराणसीपुरीमें जाकर कण्डुक नाईको स्वप्नमें दर्शन दिया और कहा—'अनघ ! तू नगरकी सीमापर मेरी प्रतिमा बनाकर मेरे लिये निवासस्थानकी व्यवस्था कर। ऐसा करनेसे मैं तेरा कल्याण करूँगा।' नरेश्वर ! तब उस नाईने स्वप्नमें जैसा कहा गया था उसके अनुसार सब कुछ किया और कराया ॥ ४६–४८ ॥
पुरीद्वारे तु विज्ञाप्य राजानं च यथाविधि । पूजां तु महतीं तस्य नित्यमेव प्रयोजयत् ॥ ४९ ॥
राजाको सूचना देकर उसने नगरके द्वारपर विधिपूर्वक निकुम्भ-प्रतिमाकी स्थापना की । फिर वह प्रतिदिन बड़े समारोहके साथ उस प्रतिमाकी पूजा करने लगा ॥ ४९ ॥
गन्धैश्च धूपमाल्यैश्च प्रोक्षणीयैस्तथैव च । अन्नपानप्रयोगैश्च अत्यद्भुतमिवाभवत् ॥ ५० ॥
गन्ध, पुष्प, माला, धूप, प्रोक्षणीय जल तथा अन्न-पान आदि अर्पण करके वह नाई निकुम्भकी पूजा करता था। यह वहाँ अत्यन्त अद्भुत-सी बात हुई ॥ ५० ॥
एवं सम्पूज्यते तत्र नित्यमेव गणेश्वरः । ततो वरसहस्रं तु नागराणां प्रयच्छति । पुत्रान् हिरण्यमायुश्च सर्वान् कामांस्तथैव च ॥ ५१ ॥
इस प्रकार वहाँ नित्य ही निकुम्भनामक गणेशकी पूजा होती और वे नागरिकोंको सहस्रों वर प्रदान करते थे । पुत्र, सुवर्ण, आयु तथा सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुएँ सबको देते थे ॥ ५१ ॥
राज्ञस्तु महिषी श्रेष्ठा सुयशा नाम विश्रुता । पुत्रार्थमागता देवी साध्वी राज्ञा प्रचोदिता ॥ ५२ ॥
राजा दिवोदासकी श्रेष्ठ महारानी सुयशा नामसे विख्यात थीं। राजाकी आज्ञा लेकर वे साध्वी महारानी पुत्रकी कामनासे वहाँ आयीं ॥ ५२ ॥
पूजां तु विपुलां कृत्वा देवी पुत्रमयाचत । पुनः पुनरथागत्य बहुशः पुत्रकारणात् ॥ ५३ ॥
वहाँ जाकर बड़े विस्तारके साथ पूजा करके देवी सुयशाने निकुम्भसे पुत्रके लिये याचना की । उन्होंने बारंबार आकर पूजन किया और अनेक बार पुत्रके लिये प्रार्थना की ॥ ५३ ॥
न प्रयच्छति पुत्रं हि निकुम्भः कारणेन हि । राजा तु यदि नः क्रुध्येत् कार्यसिद्धिस्ततो भवेत् ॥ ५४ ॥
परंतु निकुम्भ कारणवश उन्हें पुत्र नहीं देते थे। उन्होंने सोचा—'यदि राजा किसी तरह हमपर कुपित हो जाय तो हमारा काम बन जाय' ॥ ५४ ॥
अथ दीर्घेण कालेन क्रोधो राजानमाविशत् । भूत एष महान् द्वारि नागराणां प्रयच्छति ॥ ५५ ॥ प्रीतो वरान् वै शतशो मम किं न प्रयच्छति । मामकैः पूज्यते नित्यं नगर्यो मे सदैव हि ॥ ५६ ॥ विज्ञापितो मयात्यर्थं देव्या मे पुत्रकारणात् । न ददाति च पुत्रं मे कृतघ्नः केन हेतुना ॥ ५७ ॥ ततो नार्हति सत्कारं मत्सकाशाद् विशेषतः । तस्मात्तु नाशयिष्यामि स्थानमस्य दुरात्मनः ॥ ५८ ॥
तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् राजाके मनमें क्रोध हुआ। वे सोचने लगे—'मेरे नगरके द्वारपर बैठा हुआ यह महान् भूत प्रसन्न होकर नागरिकोंको सैकड़ों प्रकारके वर देता है, परंतु मुझे क्यों नहीं देता ? सदा मेरी ही नगरीमें, मेरे ही लोग इसकी नित्य पूजा करते हैं। मैंने भी देवीको पुत्र प्रदान करनेके लिये बार-बार निवेदन किया; परंतु यह कृतघ्न न जाने किस कारणसे मुझे पुत्र नहीं दे रहा है। अतः अब यह विशेषतः मुझसे सत्कार पानेके योग्य नहीं रहा। इसलिये इस दुरात्माके स्थानका मैं नाश कर दूँगा' ॥ ५५–५८ ॥
एवं स तु विनिश्चित्य दुरात्मा राजकिल्बिषी । स्थानं गणपतेस्तस्य नाशयामास दुर्मतिः ॥ ५९ ॥
हरिवंशपर्व ] एकोनत्रिंशोऽध्यायः १०३
ऐसा निश्चय करके दुरात्मा, दुर्बुद्धि एवं पापी राजाने गणपति निकुम्भके उस स्थानको नष्ट करा दिया ॥ ५९ ॥
भग्नमायतनं दृष्ट्वा राजानमशपत् प्रभुः ।
यस्मादनपराधस्य त्वया स्थानं विनाशितम् ।
पुर्यकस्मादियं शून्या तव नूनं भविष्यति ॥ ६० ॥
अपने वासस्थानको भग्न हुआ देख भगवान् निकुम्भने राजाको शाप देते हुए कहा—'राजन् ! तुमने बिना किसी अपराधके मेरे स्थानको नष्ट कराया है, इसलिये निश्चय ही तुम्हारी यह नगरी अकस्मात् जनशून्य हो जायगी' ॥ ६० ॥
ततस्तेन तु शापेन शून्या वाराणसी तदा ।
शप्त्वा पुरीं निकुम्भस्तु महादेवमथागमत् ॥ ६१ ॥
तदनन्तर उस शापसे उस समय वाराणसीपुरी सूनी हो गयी । उस पुरीको शाप देकर निकुम्भ महादेवजीके पास चले गये ॥ ६१ ॥
अकस्मात् तु पुरी सा तु विद्रुता सर्वतोदिशम् ।
तस्यां पुर्यां ततो देवो निर्ममे पदमात्मनः ॥ ६२ ॥
वाराणसीमे रहनेवाले सब लोग अकस्मात् सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये । तब महादेवजीने उस पुरीमें अपना निवासस्थान बनाया ॥ ६२ ॥
रमते तत्र वै देवो रममाणो गिरेः सुताम् ।
न रतिं तत्र वै देवी लभते गृहविस्मयात् ।
वत्स्याम्य न पुर्यां तु देवी देवमथाब्रवीत् ॥ ६३ ॥
फिर वे भगवान् शिव गिरिराजनन्दिनी उमाका मनोरञ्जन करते हुए वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे । परंतु देवी पार्वतीका मन वहाँ नहीं लगता था, क्योंकि वहाँ कोई निश्चित गृह न होनेसे वे विस्मयमें पड़ी रहती थीं । (अथवा पिताके घरके लिये उत्कण्ठित होनेके कारण देवीको वहाँ प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती थी ।) उन्होंने महादेवजीसे कहा—'भगवन् ! मैं इस पुरीमे नहीं रहूँगी (आप मेरे घरको चलिये) ' ॥ ६३ ॥
देव उवाच
नाहं वेश्मनि वत्स्यामि अविमुक्तं हि मे गृहम् ।
नाहं तत्र गमिष्यामि गच्छ देवि गृहं प्रति ॥ ६४ ॥
महादेवजी बोले—देवि ! मैं और किसी घरमें नहीं रहूँगा । यह अविमुक्त क्षेत्र ही मेरा घर है । अतः मैं वहाँ नहीं चलूँगा । तुम जाना चाहो तो अपने उस घरको जाओ ॥ ६४ ॥
हसन्नुवाच भगवांस्त्र्यम्बकस्त्रिपुरान्तकः ।
तस्मात् तदविमुक्तं हि प्रोक्तं देवेन वै स्वयम् ॥ ६५ ॥
एवं वाराणसी शप्ता अविमुक्तं च कीर्तितम् ॥ ६६ ॥
त्रिपुरोंका विनाश करनेवाले त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवने हँसते हुए पूर्वोक्त बात कही थी । महादेवजीने स्वयं ही उस क्षेत्रको अविमुक्त कहा था, इसलिये वह अविमुक्त नामसे प्रसिद्ध हो गया । इस तरह वाराणसीपुरीको शाप प्राप्त हुआ और उसे अविमुक्त क्षेत्र कहा गया ॥ ६५-६६ ॥
यस्मिन् वसति वै देवः सर्वदेवनमस्कृतः ।
युगेषु त्रिषु धर्मात्मा सह देव्या महेश्वरः ॥ ६७ ॥
सर्वदेववन्दित धर्मात्मा देव महेश्वर सत्ययुग आदि तीन युगोंमे देवी पार्वतीके साथ उस अविमुक्त क्षेत्रमे प्रत्यक्ष निवास करते हैं ॥ ६७ ॥
अन्तर्धानं कलौ याति तत्पुरं हि महात्मनः ।
अन्तर्हिते पुरे तस्मिन् पुरी सा वसते पुनः ।
एवं वाराणसी शप्ता निवेशं पुनरागता ॥ ६८ ॥
कलियुग आनेपर महात्मा महादेवजीका वह नगर अदृश्य हो जाता है । उसके अदृश्य हो जानेपर वाराणसीपुरी फिरसे बसती है । इस प्रकार वाराणसी नगरी शापग्रस्त होकर उजड़ी और पुनः बसी थी ॥ ६८ ॥
भद्रश्रेण्यस्य पुत्रो वै दुर्दम नाम विश्रुतः ।
दिवोदासेन बालेति घृणया स विवर्जितः ॥ ६९ ॥
भद्रश्रेण्यका एक पुत्र दुर्दम नामसे विख्यात था । दिवोदासने उसे बालक समझकर दयावश जीवित छोड़ दिया था ॥ ६९ ॥
हैहयस्य तु दायाद्यं कृतवान् वै महीपतिः ।
आजह्रे पितृदायाद्यं दिवोदासहतं बलात् ॥ ७० ॥
उस राजाने हैहयका पुत्र होना स्वीकार किया और उन्हींकी सहायतासे उसने दिवोदासद्वारा बलपूर्वक अपहृत हुई अपनी पैतृक सम्पत्तिको फिर वापस लौटाया ॥ ७० ॥
भद्रश्रेण्यस्य पुत्रेण दुर्दमैन महात्मना ।
वैरस्यान्तं महाराज क्षत्रियेण विधित्सता ॥ ७१ ॥
महाराज ! भद्रश्रेण्यका महामनस्वी पुत्र दुर्दम एक वीर क्षत्रिय था । उसने बैरका बदला लेनेके लिये ही वैसा किया था ॥ ७१ ॥
दिवोदासाद् दृषद्वत्यां वीरो जज्ञे प्रतर्दनः ।
तेन पुत्रेण बालेन प्रहृतं तस्य वै पुनः ॥ ७२ ॥
दिवोदास के द्वारा उनकी पत्नी दृषद्वतीके गर्भसे वीर प्रतर्दनका जन्म हुआ । उस राजकुमारने बालक होनेपर भी दुर्दमसे पुनः राज्य छीन लिया ॥ ७२ ॥
प्रतर्दनस्य पुत्रौ द्वौ वत्सभर्गौ बभूवतुः ।
वत्सपुत्रो ह्यलर्कस्तु संनतिस्तस्य चात्मजः ॥ ७३ ॥
प्रतर्दनके दो पुत्र थे—वत्स और भार्ग । वत्सके पुत्र अलर्क और अलर्कके संनति हुए ॥ ७३ ॥
| १०४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
अलर्कः काशिराजस्तु ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः ।
अलर्कं प्रति राजर्षि श्लोको गीतः पुरातनैः ॥ ७४ ॥
काशिराज अलर्क बड़े ब्राह्मणभक्त और सत्यप्रतिज्ञ थे। राजर्षि अलर्कके विषयमें प्राचीन पुरुषोंने निम्नाङ्कित श्लोकका गान किया है ॥ ७४ ॥
षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिं वर्षशतानि च ।
युवा रूपेण सम्पन्न आसीत् काशिकुलोद्वहः ॥ ७५ ॥
'काशिवंशावतंस अलर्क छाछठ हजार छह सौ वर्षोंतक युवावस्था तथा सुन्दर रूप-वैभवसे सम्पन्न रहे' ॥ ७५ ॥
लोपामुद्राप्रसादेन परमायुरवाप सः।
तस्यासीत् सुमहद्राज्यं रूपयौवनशालिनः ॥ ७६ ॥
उन्होंने लोपामुद्राकी कृपासे उत्तम आयु प्राप्त की थी। रूप और युवावस्थासे सुशोभित होनेवाले अलर्कका राज्य बहुत विशाल था ॥ ७६ ॥
शापस्यान्ते महाबाहुर्हत्वा क्षेमकराक्षसम् ।
रम्यां निवेशयामास पुरीं वाराणसीं पुनः ॥ ७७ ॥
महाबाहु अलर्कने निकुम्भके शापका अन्त होनेपर क्षेमक नामक राक्षसको मारकर पुनः रमणीय वाराणसीपुरी बसायी थी ॥ ७७ ॥
संनतेरपि दायादः सुनीथो नाम धार्मिकः ।
सुनीथस्य तु दायादः क्षेम्यो नाम महायशाः ॥ ७८ ॥
संनतिके पुत्र धर्मात्मा सुनीथ हुए और सुनीथका महायशस्वी पुत्र क्षेम्य नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ७८ ॥
क्षेम्यस्य केतुमान् पुत्रः सुकेतुस्तस्य चात्मजः ।
सुकेतोस्तनयश्चापि धर्मकेतुरिति स्मृतः ॥ ७९ ॥
क्षेम्यके पुत्र केतुमान्, केतुमान्के पुत्र सुकेतु और सुकेतु-के भी पुत्र धर्मकेतु हुए ॥ ७९ ॥
धर्मकेतोस्तु दायादः सत्यकेतुर्महारथः ।
सत्यकेतुसुतश्चापि विभुर्नाम प्रजेश्वरः ॥ ८० ॥
धर्मकेतुके पुत्र महारथी सत्यकेतु हुए और सत्यकेतुके पुत्र प्रजापालक विभु हुए ॥ ८० ॥
आनर्तस्तु विभोः पुत्रः सुकुमारस्तु तत्सुतः ।
सुकुमारस्य पुत्रस्तु धृष्टकेतुः सुधार्मिकः ।
धृष्टकेतोस्तु दायादो वेणुहोत्रः प्रजेश्वरः ॥ ८१ ॥
विभुके पुत्रका नाम आनर्त था। आनर्तका पुत्र सुकुमार हुआ। सुकुमारके पुत्र परम धर्मात्मा धृष्टकेतु हुए और धृष्टकेतुके पुत्र राजा वेणुहोत्र थे ॥ ८१ ॥
वेणुहोत्रसुतश्चापि भर्गो नाम प्रजेश्वरः ।
वत्सस्य वत्सभूमिंस्तु भृगुभूमिस्तु भार्गवात् ॥ ८२ ॥
वेणुहोत्रका पुत्र राजा भर्गके नामसे विख्यात हुआ । प्रतर्दनके जो वत्स और भार्ग नामक दो पुत्र बतलाये गये हैं, उनमेंसे वत्सके वत्सभूमि तथा भार्गके भृगुभूमि नामक पुत्र हुए॥
एते त्वङ्गिरसः पुत्रा जाता वंशेऽथ भार्गवे ।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्तयोः पुत्राः सहस्रशः ।
इत्येते काशयः प्रोक्ता नहुषस्य निबोध मे ॥ ८३ ॥
ये अङ्गिरागोत्री गालवके वंशज हैं, जो भार्गववंशमें उत्पन्न हुए । इनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों वर्णोंके लोग हैं। वत्सभूमि और भृगुभूमिके सहस्रों पुत्र कहे गये हैं। इस प्रकार ये राजा काशिके कुलमें उत्पन्न हुए क्षत्रिय बताये गये हैं। अब तुम मुझसे नहुषकी सन्तानोंका वर्णन सुनो ॥८३॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥
त्रिंशोऽध्यायः
नहुष एवं ययातिके वंशका वर्णन तथा ययातिका चरित्र
वैशम्पायन उवाच
उत्पन्नाः पितृकन्यायां विरजायां महौजसः ।
नहुषस्य तु दायादाः षडिन्द्रोपमतेजसः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! नहुषके उनकी पत्नी पितृकन्या विरजाके गर्भसे छः महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो इन्द्रके समान तेजस्वी थे ॥ १ ॥
यतिर्ययातिः संयातिरायातिः पाञ्चिको भवः ।
सुयातिः षष्ठस्तेषां वै ययातिः पार्थिवोऽभवत् ।
यतिर्ज्येष्ठस्तु तेषां वै ययातिस्तु ततः परम् ॥ २ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—यति, ययाति, संयाति, आयाति, पाँचवाँ भव और छठाँ सुयाति । इनमेंसे ययाति ही राजा हुए । इन छः भाइयोंमें सबसे बड़े थे यति और उनके बाद ययाति उत्पन्न हुए थे ॥ २ ॥
ककुत्स्थकन्यां गां नाम लेभे परमधार्मिकः ।
यतिस्तु मोक्षमास्थाय ब्रह्मभूतोऽभवन्मुनिः ॥ ३ ॥
परम धर्मात्मा यतिने ककुत्स्थकी कन्या गौको पत्नीरूपमें प्राप्त किया था। वे मोक्षधर्मका आश्रय ले ब्रह्मस्वरूप मुनि हो गये ॥ ३ ॥
हरिवंशपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः १०५
तेषां ययातिः पञ्चानां विजित्य वसुधामिमाम् ।
देवयानीमुशनसः सुतां भार्यामवाप सः ।
शर्मिष्ठामासुरीं चैव तनयां वृषपर्वणः ॥ ४ ॥
शेष पाँच भाइयोंमें ययातिने इस पृथ्वीको जीतकर शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा असुरराज वृषपर्वाकी कन्या शर्मिष्ठाको भी पत्नीके रूपमें प्राप्त किया ॥ ४ ॥
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।
द्रुह्यं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ५ ॥
देवयानीने यदु और तुर्वसुको जन्म दिया तथा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु तथा पूरु—ये तीन पुत्र उत्पन्न किये ॥ ५ ॥
तस्मै शक्रो ददौ प्रीतो रथं परमभास्वरम् ।
असङ्गं काञ्चनं दिव्यं दिव्यैः परमवाजिभिः ॥ ६ ॥
युक्तं मनोजवैः शुभ्रैर्येन भार्यामुवाह सः ।
ययातिपर प्रसन्न होकर इन्द्रने उन्हें एक अत्यन्त प्रकाशमान रथ प्रदान किया, जिसमें मनके समान वेगशाली, दिव्य, उत्तम एवं श्वेतवर्णके अश्व जुते हुए थे । वह दिव्य रथ सोनेका बना हुआ था । उसकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी । उसी रथके द्वारा वे अपनी भार्याको ब्याहकर लाये थे ॥ ६१/२ ॥
स तेन रथमुख्येन षडरात्रेणाजयन्महीम् ।
ययातिर्युधि दुर्धर्षस्तथा देवान् सदानवान् ॥ ७ ॥
उस श्रेष्ठ रथके द्वारा दुर्धर्ष राजा ययातिने छः रातोंमें ही सम्पूर्ण पृथ्वी तथा देवताओं और दानवोंको भी जीत लिया था ॥ ७ ॥
स रथः पौरवाणां तु सर्वेषामभवत् तदा ।
यावसु वसुनाम्नो वै कौरवाज्जनमेजय ॥ ८ ॥
जनमेजय ! कुरुवंशी राजा वसुतक सभी पौरव नरेशोंके पास वह रथ परम्परया प्राप्त होकर विद्यमान था ॥ ८ ॥
कुरोः पुत्रस्य राजेन्द्र राज्ञः पारीक्षितस्य ह ।
जगाम स रथो नाशं शापाद् गार्ग्यस्य धीमतः ॥ ९ ॥
राजेन्द्र ! कुरुवंशी परीक्षित्-कुमार इन्द्रोत जनमेजयको बुद्धिमान् गार्ग्यका शाप प्राप्त होनेके कारण वह रथ उनके यहाँसे अदृश्य हो गया ॥ ९ ॥
गार्ग्यस्य हि सुतं बालं स राजा जनमेजयः ।
वाक्छूरं हिंसयामास ब्रह्महत्यामवाप सः ॥ १० ॥
बात यह थी कि गार्ग्यके एक बालक पुत्र था, जो बड़ा ही वाचाल था । उसे इन्द्रोत नामवाले राजा जनमेजयने मार डाला । इससे उन्हें ब्रह्महत्या प्राप्त हुई ॥ १० ॥
स लोहगन्धी राजर्षिः परिधावन्नितस्ततः ।
पौरजानपदैस्त्यक्तो न लेभे शर्म कर्हिचित् ॥ ११ ॥
पुरवासियों तथा जनपदके लोगोंने उन्हें त्याग दिया । उनके शरीरसे लोहेकी-सी गन्ध आती थी ( अथवा वे पतितके समान जान पड़ते थे ) । राजर्षि इन्द्रोत इधर-उधर भागते-फिरते थे, किंतु कहीं भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥
ततः स दुःखसंतप्तो नालभत् संविदं क्वचित् ।
इन्द्रोतः शौनकं राजा शरणं प्रत्यपद्यत ॥ १२ ॥
जब कहीं भी स्वस्थ होनेका उपाय नहीं सूझा, तब दुःखसे संतप्त हुए राजा इन्द्रोत शौनक मुनिकी शरणमें गये ॥ १२ ॥
याजयामास चेन्द्रोतं शौनको जनमेजयम् ।
अश्वमेधेन राजानं पावनार्थं द्विजोत्तमः ॥ १३ ॥
द्विजश्रेष्ठ शौनक राजा इन्द्रोत जनमेजयको शुद्ध करनेके लिये उनसे अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करवाया ॥ १३ ॥
स लोहगन्धो व्यनशत् तस्यावभृथमेत्य ह ।
स च दिव्यो रथो राजन् वसोश्चेदिपतेस्तदा ।
दत्तः शक्रेण तुष्टेन लेभे तस्माद् बृहद्रथः ॥ १४ ॥
उस यज्ञके अन्तमें अवभृथ स्नान कर लेनेपर इन्द्रोतका पाप दूर हो गया और उनके शरीरसे जो लोहेकी-सी गन्ध आती थी, वह मिट गयी । राजन् ! तत्पश्चात् इन्द्रने संतुष्ट होकर वह दिव्य रथ चेदिराज उपरिचर वसुको दे दिया । फिर वसुसे वह रथ मगधराज बृहद्रथको मिला ॥ १४ ॥
बृहद्रथात् क्रमेणैव गतो बार्हद्रथं नृपम् ।
ततो हत्वा जरासंधं भीमस्तं रथमुत्तमम् ॥ १५ ॥
प्रददौ वासुदेवाय प्रीत्या कौरवनन्दनः ।
बृहद्रथसे क्रमशः वह रथ उनके पुत्र राजा जरासंधको प्राप्त हुआ । तत्पश्चात् कौरवकुलको आनन्दित करनेवाले भीमसेनने जरासंधको मारकर वह उत्तम रथ प्रसन्नतापूर्वक भगवान् श्रीकृष्णको दे दिया ॥ १५१/२ ॥
सप्तद्वीपां ययातिस्तु जित्वा पृथ्वीं ससागराम् ॥ १६ ॥
व्यभजत् पञ्चधा राजन् पुत्राणां नाहुषस्तदा ।
राजन् ! नहुषनन्दन राजा ययातिने समुद्र और सातों द्वीपोंसहित सारी पृथ्वीको जीतकर उसके पाँच भाग किये और उन्हें अपने पाँचों पुत्रोंमें बाँट दिया ॥ १६१/२ ॥
दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं मतिमान् नृपः ॥ १७ ॥
प्रतीच्यामुत्तरस्यां च द्रुह्यं चानुं च नाहुषः ।
दिशि पूर्वोत्तरस्यां वै यदुं ज्येष्ठं न्ययोजयत् ॥ १८ ॥
उन बुद्धिमान् नरेशने दक्षिण-पूर्व दिशामें तुर्वसुको, पश्चिममें द्रुह्युको और उत्तर दिशामें अनुको अभिषिक्त करके पूर्वोत्तर दिशाके ( ईशान कोण ) राज्यपर ज्येष्ठ पुत्र यदुको नियुक्त कर दिया ॥ १७-१८ ॥
मध्ये पूरुं च राजानमभ्यषिञ्चत नाहुषः ।
तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना ॥ १९ ॥
| १०६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
यथाप्रदेशमद्यापि धर्मेण प्रतिपाल्यते।
प्रजास्तेषां पुरस्तात् तु वक्ष्यामि नृपसत्तम ॥ २० ॥
इसके बाद नहुषनन्दन ययातिने मध्यदेशके राज्य-सिंहासनपर पूरुका अभिषेक किया। नृपश्रेष्ठ! वे तथा उनके वंशज आज भी सातों द्वीपों और नगरोंसहित इस सारी पृथ्वीका अपने-अपने प्रदेशके अनुसार धर्मपूर्वक पालन करते हैं। अब आगे मैं उनकी संतानोंका वर्णन करूँगा ॥ १९-२० ॥
धनुर्न्यस्य पृषत्कांश्च पञ्चभिः पुरुषर्षभैः।
जरावानभवद् राजा भारमावेश्य बन्धुषु ॥ २१ ॥
पाँच पुरुषप्रवर पुत्रोंसे कृतकृत्य हो राजा ययातिने राज्यका भार अपने उन बन्धु-बान्धवोंपर रखकर धनुष और बाणोंका भी त्याग कर दिया। तत्पश्चात् उन्हें जरावस्थाने काबूमें कर लिया ॥ २१ ॥
निःक्षिप्तशस्त्रः पृथिवीं निरीक्ष्य पृथिवीपतिः।
प्रीतिमानभवद् राजा ययातिरपराजितः।
एवं विभज्य पृथिवीं ययातिर्यदुमब्रवीत् ॥ २२ ॥
किसीसे परास्त न होनेवाले पृथ्वीपति राजा ययाति अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करके पृथ्वीको सुव्यवस्थित देख बड़े प्रसन्न हुए। इस तरह भूमण्डलका विभाग करके ययातिने यदुसे कहा— ॥ २२ ॥
जरां मे प्रतिगृह्णीष्व पुत्र कृत्यान्तरेण वै।
तरुणस्तव रूपेण चरेयं पृथिवीमिमाम्।
जरां त्वयि समाधाय तं यदुः प्रत्युवाच ह ॥ २३ ॥
‘बेटा! एक दूसरा कार्य उपस्थित हुआ है, जिसके लिये मुझे तुम्हारी युवावस्था चाहिये। तुम मेरा बुढ़ापा ग्रहण करो और मैं तुममें अपनी वृद्धावस्था स्थापित करके तुम्हारे रूपसे तरुण होकर इस पृथ्वीपर विचरण करूँ।' तब यदुने उन्हें यों उत्तर दिया— ॥ २३ ॥
अनिर्दिष्टा मया भिक्षा ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुता।
अनपाकृत्य तां राजन् न ग्रहीष्यामि ते जराम् ॥ २४ ॥
'महाराज! मैंने एक ब्राह्मणको मुँहमाँगी भिक्षा देनेकी प्रतिज्ञा कर ली है, अभीतक उसने यह स्पष्टरूपसे बताया नहीं है कि 'मुझे अमुक वस्तु चाहिये।' मैं जबतक उसकी भिक्षा-का ऋण उतार न दूँ, तबतक आपका बुढ़ापा नहीं ले सकूँगा ॥
जरायां बहवो दोषाः पानभोजनकारिताः।
तस्माज्जरां न ते राजन् ग्रहीतुमहमुत्सहे ॥ २५ ॥
'राजन्! बुढ़ापेमें खान-पानसम्बन्धी बहुत-से दोष हैं, अतः मैं आपका बुढ़ापा नहीं ग्रहण करूँगा ॥ २५ ॥
सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप।
प्रतिग्रहीतुं धर्मज्ञ पुत्रमन्यं वृणीष्व वै ॥ २६ ॥
'नरेश्वर! आपके तो बहुत-से पुत्र हैं, जो मुझसे भी बढ़कर प्रिय हैं; अतः धर्मज्ञ महाराज! जरावस्था ग्रहण करने-के लिये किसी दूसरे पुत्रका वरण कीजिये' ॥ २६ ॥
स एवमुक्तो यदुना राजा कोपसमन्वितः।
उवाच वदतां श्रेष्ठो ययातिर्गर्हयन् सुतम् ॥ २७ ॥
यदुके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा ययाति कुपित हो उठे और अपने उस पुत्रकी निन्दा करते हुए बोले— ॥ २७ ॥
क आश्रयस्तवान्योऽस्ति को वा धर्मो विधीयते।
मामनादृत्य दुर्बुद्धे यदहं तव देशिकः ॥ २८ ॥
'दुर्बुद्धे! मेरा अनादर करके तेरा दूसरा कौन-सा आश्रय है? अथवा तू किस धर्मका पालन कर रहा है? मैं तो तेरा गुरु हूँ (फिर मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन कैसे कर रहा है?)' ॥
एवमुक्त्वा यदुं तात शशापैनं स मन्युमान्।
अराज्या ते प्रजा मूढ भवित्रीति नराधम ॥ २९ ॥
तात! अपने पुत्र यदुसे ऐसा कहकर कुपित हुए राजा ययातिने उन्हें शाप दिया—'मूढ! नराधम! तेरी संतान सदा राज्यसे वञ्चित रहेगी' ॥ २९ ॥
स तुर्वसुं च द्रुह्युं चाप्यनुं च भरतर्षभ।
एवमेवाब्रवीद् राजा प्रत्याख्यातश्च तैरपि ॥ ३० ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर राजा ययातिने क्रमशः तुर्वसु, द्रुह्य और अनुको भी बुलाकर उनसे ऐसी ही बात कही, परंतु उन्होंने भी उनकी बात माननेसे इन्कार कर दिया ॥ ३० ॥
शशाप तानतिक्रुद्धो ययातिरपराजितः।
यथा ते कथितं पूर्वं मया राजर्षिसत्तमः ॥ ३१ ॥
तब किसीसे भी पराजित न होनेवाले राजर्षिशिरोमणि ययातिने अत्यन्त कुपित हो उनको भी वैसा ही शाप दिया जैसा यदुके प्रसङ्गमें पहले तुम्हें बताया गया है ॥ ३१ ॥
एवं शप्त्वा सुतान् सर्वान्श्चतुरः पूरुपूर्वजान्।
तदेव वचनं राजा पूरुमप्याह भारत ॥ ३२ ॥
भारत! इस प्रकार पूरुसे पहले उत्पन्न हुए अपने चारों पुत्रोंको शाप देकर राजा ययातिने पूरुके सामने भी वही प्रस्ताव रक्खा ॥ ३२ ॥
तरुणस्तव रूपेण चरेयं पृथिवीमिमाम्।
जरां त्वयि समाधाय त्वं पूरो यदि मन्यसे ॥ ३३ ॥
'पूरु! यदि तुम स्वीकार करो तो मैं अपने बुढ़ापेका भार तुमपर रखकर तुम्हारे रूपसे तरुण होकर इस पृथ्वीपर विचरूँ' ॥ ३३ ॥
स जरां प्रतिजग्राह पितुः पूरुः प्रतापवान्।
ययातिरपि रूपेण पूरोः पर्यचरन्महीम् ॥ ३४ ॥
यह सुनकर प्रतापी पूरुने पिताका बुढ़ापा ले लिया और ययाति भी पूरुके रूपसे तरुण हो इस पृथ्वीपर विचरने लगे ॥
हरिवंशपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः १०७
स मार्गमाणः कामानामान्तं भरतसत्तम।
विश्वाच्या सहितो रेमे वने चैत्ररथे प्रभुः॥ ३५॥
भरतश्रेष्ठ ! प्रभावशाली ययाति कामनाओंका अन्त ढूँढ़ते हुए चैत्ररथ नामक वनमें गये और वहाँ विश्वाची नामक अप्सराके साथ रमण करने लगे ॥ ३५ ॥
यदावितृष्णः कामानां भोगेषु स नराधिपः।
तदा पुरोः सकाशाद्वै स्वां जरां प्रत्यपद्यत ॥ ३६॥
इतनेपर भी जब उन्हें कामोपभोगसे तृप्ति नहीं हुई, तब उन नरेशने घर आकर पूरुसे अपना बुढ़ापा ले लिया ॥ ३६॥
तत्र गाथा महाराज शृणु गीता ययातिना ।
याभिः प्रत्याहरेत् कामान् सर्वतोऽङ्गानि कूर्मवत्॥ ३७॥
महाराज ! वहाँ ययातिने जो गाथाएँ गायीं (उद्गार प्रकट किये), उन्हें सुनो । उनपर ध्यान देनेसे मनुष्य सब भोगोंकी ओरसे अपने मनको उसी प्रकार हटा सकता है जैसे कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है ॥ ३७ ॥
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ ३८॥
ययातिने कहा-'भोगोंकी इच्छा उन्हें भोगनेसे कभी शान्त नहीं होती; अपितु घीसे आगकी भाँति और भी बढ़ती ही जाती है ॥ ३८ ॥
यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।
नालमेकस्य तत् सर्वमिति पश्यन्न मुह्यति ॥ ३९ ॥
'इस पृथ्वीपर जितने भी धान, जौ, सुवर्ण, पशु तथा स्त्रियाँ हैं, ये सब एक पुरुषके लिये भी पर्याप्त नहीं हैं। ऐसा समझकर विद्वान् पुरुष मोहमें नहीं पड़ता ॥ ३९ ॥
यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् ।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ४० ॥
'जब जीव मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीके प्रति पापबुद्धि नहीं करता, तब वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ४० ॥
यदाऽन्येभ्यो न बिभ्येत् यदा चास्मान्न बिभ्यति ।
यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ४१ ॥
'जब वह दूसरे प्राणियोंसे नहीं डरता, जब उससे भी दूसरे प्राणी नहीं डरते तथा जब वह इच्छा-द्वेषसे परे हो जाता है, उस समय ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥४२।
'खोटी बुद्धिवाले पुरुषोंद्वारा जिसका त्याग होना कठिन है, जो मनुष्यके बूढ़े होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राण-नाशक रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग करनेवालेको ही सुख मिलता है ॥ ४२ ॥
जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।
जीविताशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति ॥ ४३ ॥
'बूढ़े होनेवाले मनुष्यके बाल पक जाते हैं, उसके दाँत भी टूटने लगते हैं, परंतु धन और जीवनकी आशा उस मनुष्यके जीर्ण होनेपर भी जीर्ण (शिथिल) नहीं होती ॥ ४३ ॥
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् ।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ ४४ ॥
'संसारमें जो कामजनित सुख है तथा जो दिव्य महान् सुख हैं, ये सब मिलकर तृष्णा-क्षयसे होनेवाले सुखके सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते' ॥ ४४ ॥
एवमुक्त्वा स राजर्षिः सदारः प्राविशद् वनम् ।
कालेन महता चापि सञ्चार विपुलं तपः ॥ ४५ ॥
ऐसा कहकर राजर्षि ययाति स्त्रीसहित वनमें चले गये । वहाँ बहुत समयतक उन्होंने भारी तपस्या की ॥ ४५ ॥
भृगुतुङ्गे तपस्तप्त्वा तपसोऽन्ते महातपाः ।
अनश्नन् देहमुत्सृज्य सदारः स्वर्गमाप्तवान् ॥ ४६ ॥
उन महातपस्वी नरेशने भृगुतुङ्ग नामक शिखरपर तपस्या करके स्त्रीसहित उपवासके द्वारा देहको त्याग दिया और स्वर्गलोक प्राप्त किया ॥ ४६ ॥
तस्य वंशे महाराज पञ्च राजर्षिसत्तमाः ।
यैर्व्याप्ता पृथिवी सर्वा सूर्यस्येव गभस्तिभिः ॥ ४७ ॥
महाराज ! उनके वंशमें यदु आदि पाँच राजर्षिशिरोमणि हुए, जिनके वंशजोंसे यह सारी पृथ्वी उसी प्रकार व्याप्त है, जैसे सूर्यकी किरणोंसे वह व्याप्त होती है ॥ ४७ ॥
यदोस्तु शृणु राजर्षेर्वंशं राजर्षिसत्कृतम् ।
यत्र नारायणो जज्ञे हरिर्वृष्णिकुलोद्वहः ॥ ४८ ॥
राजर्षि यदुका वंश समस्त राजर्षियोंद्वारा सम्मानित है। तुम उसका वर्णन सुनो । उसी वंशमें वृष्णिकुलभूषण श्रीकृष्णके रूपमें श्रीनारायण हरिका अवतार (प्रादुर्भाव) हुआ था ॥
धन्यः प्रजावानायुष्मान् कीर्तिमांश्च भवेन्नरः ।
ययातेश्चरितं पुण्यं पठञ्छृण्वन् नराधिप ॥ ४९ ॥
नरेश्वर ! जो मनुष्य ययातिके इस पुण्यमय चरित्रको पढ़ता और सुनता है, वह धनसम्पन्न, संतानवान्, दीर्घायु तथा यशस्वी होता है ॥ ४९ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि ययातिचरिते त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें ययातिको चरित्रविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥
१०८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे .
एकत्रिंशोऽध्यायः
पूरुकी वंशपरम्पराका वर्णन
जनमेजय उवाच
पूरोर्वंशमहं ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।
द्रुह्योरुर्गोर्यदोश्चैव तुर्वसोश्च पृथक् पृथक् ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा— ब्रह्मन् ! मैं पूरु, द्रुह्यु, अनु, यदु और तुर्वसुके वंशका पृथक्-पृथक् यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
वृष्णिवंशप्रसङ्गेन स्वं वंशं पूर्वमेव तु।
विस्तरेणानुपूर्व्या च तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ २ ॥
वृष्णिवंशके प्रसंगसे इन सबका वर्णन मुझे सुनना है; परंतु सबसे पहले मैं अपने ही वंश (पूरू-कुल) का क्रमशः विस्तारपूर्वक वर्णन सुनना चाहता हूँ। अतः आप पहले उसीका वर्णन करें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु पुरोर्महाराज वंशमुत्तमपौरुषम् ।
विस्तरेणानुपूर्व्या च यत्र जातोऽसि पार्थिव ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी बोले— महाराज ! उत्तम पराक्रमसे सम्पन्न पूरुवंशका, जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ है, मैं क्रमानुसार विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ। पृथ्वीनाथ ! तुम इसे सुनो ॥ ३ ॥
हन्त ते कीर्तयिष्यामि पूरोर्वंशमनुत्तमम् ।
द्रुह्योश्चानोर्यदोश्चैव तुर्वसोश्च नराधिप ॥ ४ ॥
नरेश्वर ! मैं बड़े हर्षके साथ तुमसे परम उत्तम पूरुवंशका वर्णन करूँगा। फिर द्रुह्यु, अनु, यदु तथा तुर्वसुके वंशका कीर्तन किया जायगा ॥ ४ ॥
पूरोः पुत्रो महावीर्यो राजाऽऽसीज्जनमेजयः।
प्रचिन्वांस्तु सुतस्तस्य यः प्राचीमजयद् दिशम् ॥ ५ ॥
पूरुके महापराक्रमी पुत्र राजा जनमेजय हुए। उनके पुत्रका नाम प्रचिन्वान् था; जिन्होंने पूर्वदिशाको जीता था ॥ ५ ॥
प्रचिन्वतः प्रवीरोऽभून्मनस्युस्तस्य चात्मजः।
राजा चाभयदो नाम मनस्योरभवत् सुतः ॥ ६ ॥
प्रचिन्वानके पुत्र प्रवीर और प्रवीरके मनस्यु हुए, मनस्युके पुत्र राजा अभयद थे ॥ ६ ॥
तथैवाभयदस्यासीत् सुधन्वा तु महीपतिः।
सुधन्वनो बहुगवः शम्यातिस्तस्य चात्मजः ॥ ७ ॥
अभयदके पुत्रका नाम सुधन्वा था, जो इस पृथ्वीका अधिपति हुआ। सुधन्वाके बहुगव और बहुगवके पुत्र शम्याति हुए ॥ ७ ॥
शम्यातेस्तु रहस्याती रौद्राश्वस्तस्य चात्मजः।
रौद्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि सूनवः ॥ ८ ॥
शम्यातिके रहस्याति और रहस्यातिके पुत्र रौद्राश्व हुए। रौद्राश्वके घृताची अप्सराके गर्भसे दस पुत्र हुए ॥ ८ ॥
ऋचेयुः प्रथमस्तेषां कृकणेयुस्तथैव च।
कक्षेयुः स्थण्डिलेयुश्च सन्नतेयुस्तथैव च ॥ ९ ॥
दशार्णेयुर्जलेयुश्च स्थलेयुश्च महायशाः।
धनेयुश्च वनेयुश्च पुत्रिकाश्च दश स्त्रियः ॥ १० ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—ऋचेयु अपने सभी भाइयोंमें ज्येष्ठ थे। उनके बाद कृकणेयु, कक्षेयु, स्थण्डिलेयु, सन्नतेयु, दशार्णेयु, जलेयु, महायशस्वी स्थलेयु, धनेयु और वनेयु थे। इनके सिवा रौद्राश्वके दस कन्याएँ भी थीं, जो पुत्रिका-धर्मके अनुसार ब्याही जानेवाली थीं ॥ ९-१० ॥
रुद्रा शूद्रा च भद्रा च मलदा मलहा तथा।
खलदा चैव राजेन्द्र नलदा सुरसापि च।
तथा गोचपला तु स्त्रीरत्नकूटा च ता दश ॥ ११ ॥
राजेन्द्र ! उन कन्याओंके नाम इस प्रकार हैं—रुद्रा, शूद्रा, भद्रा, मलदा, मलहा, खलदा, नलदा, सुरसा, गोचपला तथा स्त्रीरत्नकूटा—ये कुल मिलाकर दस थीं ॥ ११ ॥
ऋषिर्जातोऽथ्र्यिवंशे तु तासां भर्ता प्रभाकरः।
रुद्रायां जनयामास सुतं सोमं यशस्विनम् ॥ १२ ॥
अत्रिकुलमें उत्पन्न महर्षि प्रभाकर उन सबके पति हुए। उन्होंने रुद्राके गर्भसे यशस्वी सोमको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया ॥ १२ ॥
स्वर्भानुना हते सूर्ये पतमाने दिवो महीम्।
तमोऽभिभूते लोके च प्रभा येन प्रवर्तिता ॥ १३ ॥
राहुसे आहत होकर जब सूर्य आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे और समस्त संसारमें अन्धकार छा गया, उस समय प्रभाकरने ही अपनी प्रभा फैलायी ॥ १३ ॥
स्वस्ति तेऽस्त्विति चोक्तो वै पतमानो दिवाकरः।
वचनात् तस्य विप्रर्षेर्न पपात दिवो महीम् ॥ १४ ॥
महर्षिने गिरते हुए सूर्यको 'तुम्हारा कल्याण हो' यह कहकर आशीर्वाद दिया। उन ब्रह्मर्षिके इस वचनसे सूर्यदेव पृथ्वीपर नहीं गिरे ॥ १४ ॥
अत्रिश्रेष्ठानि गोत्राणि यश्चकार महातपाः।
यज्ञेष्वत्रेर्धनं चैव सुरैर्यस्य प्रवर्तितम् ॥ १५ ॥
महातपस्वी प्रभाकरने सब गोत्रोंमें अत्रिगोत्रकी ही श्रेष्ठता स्थापित की। अत्रिके यज्ञोंमें उन्हींके प्रभावसे देवताओंने धन प्रस्तुत किया था ॥ १५ ॥
स तासु जनयामास पुत्रिकासु सनामकान्।
दश पुत्रान् महात्मा स तपस्युग्रे रतान् सदा ॥ १६ ॥