भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 133
११०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

भूतलपर वंशकी वृद्धि करनेवाले पाँच पुत्र उत्पन्न किये ॥ ३३॥
अङ्गः प्रथमतोजज्ञे वङ्गः सुह्मस्तथैव च ।
पुण्ड्रः कलिङ्गश्च तथा बालेयं क्षत्रमुच्यते ॥ ३४ ॥
उनमें सबसे पहले अङ्गकी उत्पत्ति हुई । तत्पश्चात् क्रमशः वङ्ग, सुह्म, पुण्ड्र तथा कलिङ्ग उत्पन्न हुए । ये सब लोग बालेय क्षत्रिय कहलाते हैं ॥ ३४ ॥
बालेया ब्राह्मणाश्चैव तस्य वंशकरा भुवि ।
बलेस्तु तुष्टो ददौ वराः प्रीतेन भारत ॥ ३५ ॥
महायोगित्वमायुश्च कल्पस्य परिमाणतः ।
संग्रामे चाप्यजेयत्वं धर्मे चैव प्रधानता ॥ ३६ ॥
त्रैलोक्यदर्शनं चैव प्राधान्यं प्रसवे तथा ।
बले चाप्रतिमत्वं वै धर्मतत्त्वार्थदर्शनम् ॥ ३७ ॥
चतुरो नियतान् वर्णांस्त्वं च स्थापयिता भुवि ।
इत्युक्तो विभुना राजा बलिः शान्तिं परां ययौ ॥ ३८ ॥
बलिके कुलमें बालेय ब्राह्मण भी हुए, जो इस भूतलपर उनके वंशकी वृद्धि करनेवाले थे । भरतनन्दन ! ब्रह्माजीने बलिपर प्रसन्न होकर उन्हें निम्नांकित वर दिये थे—'तुम महायोगी होओगे, तुम्हारी आयु एक कल्पकी होगी, तुम युद्धमें अजेय होओगे, धर्ममें तुम्हारी प्रधानता होगी, तुम तीनों लोकोंकी देखभाल करोगे (अथवा तुम तीनों लोकोंकी सभी बातें प्रत्यक्षकी भाँति देखोगे) तुम्हारी संतति श्रेष्ठ समझी जायगी, बलमें तुम्हारी समानता करनेवाला कोई न होगा, तुम धर्मतत्त्वके ज्ञाता होओगे तथा भूतलपर चारों वर्णोंको नियन्त्रणमें रखकर उन्हें मर्यादाके भीतर स्थापित करोगे।' भगवान् ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर राजा बलिको बड़ी शान्ति मिली ॥ ३५–३८ ॥
तस्य ते तनयाः सर्वे क्षेत्रजा मुनिपुङ्गवात् ।
सम्भूता दीर्घतपसो सुदेष्णायां महौजसः ॥ ३९ ॥
उनके वे सभी पुत्र क्षेत्रज थे । मुनिवर दीर्घतपाद्वारा रानी सुदेष्णाके गर्भसे प्रकट हुए थे । उनका बल महान् था ॥
बलिस्तानभिषिच्यैह पञ्च पुत्रानकल्मषान् ।
कृतार्थः सोऽपियोगात्मा योगमास्थाय स प्रभुः ॥४०॥
अधृष्यः सर्वभूतानां कालापेक्षी चरन्नपि ।
कालेन महता राजन् स्वं च स्थानमुपागमत् ॥ ४१ ॥
राजा बलिने उन पाँचों निष्पाप पुत्रोंको विभिन्न राज्योंपर अभिषिक्त करके अपनेको कृतार्थ माना । उनका मन सदा योगमें लगा रहता था । वे योगका आश्रय ले समस्त प्राणियोंके लिये अजेय हो गये थे । कालकी प्रतीक्षा करते हुए सर्वत्र विचरते थे । राजन् ! दीर्घकालके पश्चात् उन्हें अपना स्थान (सुतललोक) उपलब्ध हुआ ॥ ४०-४१ ॥
तेषां जनपदाः पञ्च अङ्गा वङ्गाः सुह्लकाः ।
कलिङ्गाः पुण्ड्रकाश्चैव प्रजास्तद्वंशस्थ मे शृणु ॥ ४२ ॥
उनके पाँच पुत्रोंके अधिकारमें जो जनपद थे, उनके नाम इस प्रकार हैं—अङ्ग, वङ्ग, सुह्म, कलिङ्ग और पुण्ड्रक । अब तुम मुझसे अङ्गकी संतानोंका वर्णन सुनो ॥ ४२ ॥
अङ्गपुत्रो महानासीद् राजेन्द्रो दधिवाहनः ।
दधिवाहनपुत्रस्तु राजा दिविरथोऽभवत् ॥ ४३ ॥
अङ्गके पुत्र महान् राजाधिराज दधिवाहन थे और दधिवाहनके पुत्र राजा दिविरथ हुए ॥ ४३ ॥
पुत्रो दिविरथस्यासीच्छक्रतुल्यपराक्रमः ।
विद्वान् धर्मरथो नाम तस्य चित्ररथः सुतः ॥ ४४ ॥
दिविरथके पुत्र इन्द्रतुल्य पराक्रमी और विद्वान् थे । उनका नाम धर्मरथ था । धर्मरथके पुत्र चित्ररथ हुए ॥४४॥
तेन चित्ररथेनाथ तदा विष्णुपदे गिरौ ।
यजता सह शक्रेण सोमः पीतो महात्मना ॥ ४५ ॥
राजा चित्ररथ जब विष्णुपद पर्वतपर यज्ञ करते थे, उस समय उन महामना नरेशने इन्द्रके साथ बैठकर सोमपान किया था ॥ ४५ ॥
अथ चित्ररथस्यापि पुत्रो दशरथोऽभवत् ।
लोमपाद इति ख्यातो यस्य शान्ता सुताभवत् ॥ ४६ ॥
चित्ररथके पुत्र दशरथ हुए, जिनका दूसरा नाम लोमपाद था तथा शान्ता जिनकी पुत्री थी ॥ ४६ ॥
तस्य दाशरथिर्वीरश्चतुरङ्गो महायशाः ।
ऋष्यशृङ्गप्रसादेन जज्ञे कुलविवर्धनः ॥ ४७ ॥
उन लोमपाद या दशरथके पुत्र महायशस्वी वीर चतुरङ्ग हुए, जो ऋष्यशृङ्ग मुनिकी कृपासे उत्पन्न हुए थे । चतुरङ्ग अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले थे ॥ ४७ ॥
चतुरङ्गस्य पुत्रस्तु पृथुलाक्ष इति स्मृतः ।
पृथुलाक्षसुतो राजा चम्पो नाम महायशाः ॥ ४८ ॥
चतुरङ्गके पुत्र पृथुलाक्ष कहे गये हैं । पृथुलाक्षके पुत्र महायशस्वी राजा चम्प हुए ॥ ४८ ॥
चम्पस्य तु पुरी चम्पा या मालिन्यभवत् पुरा ।
पूर्णभद्रप्रसादेन हर्यङ्गोऽस्य सुतोऽभवत् ॥ ४९ ॥
चम्पकी राजधानी चम्पा थी, जो पहले मालिनीके नामसे प्रसिद्ध थी । चम्पके पुत्र हर्यङ्ग हुए, जो पूर्णभद्र नामक मुनिकी कृपासे उत्पन्न हुए थे ॥ ४९ ॥
ततो वैभाण्डकिस्तस्य वारणं शक्रवारणम् ।
अवतारयामास महीं मन्त्रैर्वाहनमुत्तमम् ॥ ५० ॥
विभाण्डकपुत्र ऋष्यशृङ्गने हर्यङ्गकी सवारीके लिये इन्द्रके उत्तम वाहन गजराज ऐरावतको मन्त्रोंद्वारा स्वर्गसे भूतलपर उतारा था ॥ ५० ॥