भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 134
हरिवंशपर्व ]द्वात्रिंशोऽध्यायः१११

हर्यङ्गस्य तु दायादो राजा भद्ररथः स्मृतः ।
पुत्रो भद्ररथस्यासीद् बृहत्कर्मा प्रजेश्वरः ॥ ५१ ॥
हर्यङ्गके पुत्र राजा भद्ररथ कहे गये हैं। भद्ररथके पुत्र राजा बृहत्कर्मा थे ॥ ५१ ॥

बृहद्धर्मः सुतस्तस्य तस्साज्जज्ञे बृहन्मनाः ।
बृहन्मनास्तु राजेन्द्र जनयामास वै सुतम् ॥ ५२ ॥
नाम्ना जयद्रथं नाम यस्माद् दृढरथो नृपः ।
आसीद् दृढरथस्यापि विश्वजिज्जनमेजय ॥ ५३ ॥
बृहत्कर्माके पुत्र बृहद्धर्म थे, उनसे बृहन्मनाका जन्म हुआ। राजेन्द्र ! बृहन्मनाने जयद्रथ नामक पुत्रको जन्म दिया, जिससे राजा दृढरथकी उत्पत्ति हुई। जनमेजय ! दृढरथके पुत्र विश्वजित् हुए ॥ ५२-५३ ॥

दायादस्तस्य कर्णस्तु विकर्णस्तस्य चात्मजः ।
तस्य पुत्रशतं त्वासीदङ्गानां कुलवर्धनम् ॥ ५४ ॥
विश्वजित्के पुत्र कर्ण तथा कर्णके पुत्र विकर्ण हुए। विकर्णके सौ पुत्र थे, जो अङ्गवंशकी वृद्धि करनेवाले थे ॥

बृहद्धर्मसुतो यस्तु राजा नाम्ना बृहन्मनाः ।
तस्य पत्नीद्वयं चासीच्चैद्यस्यैते सुते शुभे ।
यशोदेवी च सत्या च ताभ्यां वंशस्तु भिद्यते ॥ ५५ ॥
बृहद्धर्मका जो बृहन्मना नामसे प्रसिद्ध पुत्र था, उसकी दो पत्नियाँ थीं। ये दोनों ही चेदिराजकी सुन्दरी कन्याएँ थीं। एकका नाम यशोदेवी था और दूसरीका सत्या। उन दोनोंके द्वारा उस वंशमें भेद हो गया अर्थात् दोनोंकी पृथक-पृथक वंश-परम्परा चली ॥ ५५ ॥

जयद्रथस्तु राजेन्द्र यशोदेव्यां व्यजायत ।
ब्रह्मक्षत्रोत्तरः सत्यां विजयो नाम विश्रुतः ॥ ५६ ॥
राजेन्द्र ! बृहन्मनाका जो जयद्रथ नामक पुत्र था, वह यशोदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था तथा उनका दूसरा पुत्र, जो विजय नामसे विख्यात था, सत्याके पेटसे पैदा हुआ था। वह शान्ति आदि गुणोंमे ब्राह्मणोंसे और शौर्य आदि गुणोंमे क्षत्रियोंसे भी उत्कृष्ट था ॥ ५६ ॥

विजयस्य धृतिः पुत्रस्तस्य पुत्रो धृतव्रतः ।
धृतव्रतस्य पुत्रस्तु सत्यकर्मा महायशाः ॥ ५७ ॥
विजयका पुत्र धृति और धृतिका पुत्र धृतव्रत था। धृतव्रतके पुत्र महायशस्वी सत्यकर्मा हुए ॥ ५७ ॥

सत्यकर्मसुतश्चापि सूतस्त्वधिरथस्तु वै।
यः कर्णं प्रतिजग्राह ततः कर्णंस्तु सूतजः ॥ ५८ ॥
सत्यकर्माका पुत्र अधिरथ नामक सूत हुआ, जिसने कर्णको गोद लिया था। इसीलिये कर्णको सूतपुत्र कहा जाता है॥

एतत् ते कथितं सर्वं कर्णे प्रति महाबलम् ।
कर्णस्य वृषसेनस्तु वृषस्तस्यात्मजः स्मृतः ॥ ५९ ॥
राजन् ! यह सब मैने तुम्हे महाबली कर्णके विषयमें बताया है। कर्णका पुत्र वृषसेन हुआ और वृषसेनका पुत्र वृष कहा गया है ॥ ५९ ॥

एतेऽङ्गवंशजाः सर्वे राजानः कीर्तिता मया ।
सत्यव्रता महात्मानः प्रजावन्तो महारथाः ॥ ६० ॥
ये सब अङ्गवंशी राजा मेरे द्वारा बताये गये हैं, जो सत्यव्रती, महात्मा, पुत्रवान् तथा महारथी थे ॥ ६० ॥

ऋचेयोस्तु महाराज रौद्राश्वतनयस्य ह ।
शृणु वंशमनुप्रोक्तं यत्र जातोऽसि पार्थिव ॥ ६१ ॥
महाराज ! पृथ्वीनाथ ! अब मै रौद्राश्वकुमार ऋचेयुके वंशका वर्णन करूँगा, जिसमे तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम इसे सुनो ॥ ६१ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि कुशेयुवंशानुकीर्तनं नाम एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें कुशेयुवंशका वर्णनविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥


द्वात्रिंशोऽध्यायः

पूरुके वंशके अन्तर्गत ऋचेयुकी वंश-परम्परा—अजमीढवंश, पाञ्चाल एवं सोमकवंश, कौरव-वंश तथा तुर्वसु, द्रुह्यु और अनुकी संततिका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
अनाधृष्यस्तु राजर्षिर्भृचेयुश्चैकराट् स्मृतः ।
ऋचेयोर्ज्वलना नाम भार्या वै तक्षक आत्मजा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजर्षि ऋचेयु एकच्छत्र सम्राट् माने गये हैं। वे दूसरोंके लिये अजेय थे। ऋचेयुकी पत्नीका नाम ज्वलना था, जो तक्षक नागकी पुत्री थी ॥ १ ॥

तस्यां स देव्यां राजर्षिर्मतिनारो महीपतिः ।
मतिनारसुताश्चासंस्त्रयः परमधार्मिकाः ॥ २ ॥
तंसुराधः प्रतिरथः सुबाहुश्चैव धार्मिकः ।
गौरी कन्या च विख्याता मान्धातृजननी शुभा ॥ ३ ॥
महारानी ज्वलनाके गर्भसे पृथ्वीपति राजर्षि मतिनारका जन्म हुआ। मतिनारके तीन परम धर्मात्मा पुत्र हुए—प्रथम तंसु, दूसरे प्रतिरथ और तीसरे धर्मात्मा सुबाहु। मतिनारके