विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें११२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
एक कन्या भी हुई थी, जो गौरी नामसे विख्यात थी। शुभ-लक्षणा गौरी ही राजा मान्धाताकी जननी हुई ॥ २-३ ॥
सर्वे वेदविदस्तत्र ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः । सर्वे कृतास्त्रा बलिनः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ४ ॥
मतिनारके सभी पुत्र वेदवेत्ता, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, अस्त्रविद्याके विद्वान्, बलवान् तथा युद्धकुशल थे ॥ ४ ॥
पुत्रः प्रतिरथस्यासीत् कण्वः समभवन्नृपः । मेधातिथिः सुतस्तस्य यस्मात्काण्वायना द्विजाः॥ ५ ॥
मतिनारके दूसरे पुत्र प्रतिरथके बेटेका नाम कण्व था । कण्व राजा थे । कण्वके पुत्र मेधातिथि हुए, जिनसे काण्वायन ब्राह्मणोंकी परम्परा प्रचलित हुई ॥ ५ ॥
ईलिनी भूप यस्यासीत् कन्या वै जनमेजय । ब्रह्मवादिन्यधि स्त्रीं च तंसुस्तामभ्यगच्छत ॥ ६ ॥
राजा जनमेजय ! जिनकी कन्या ईलिनी नामसे प्रसिद्ध हुई थी, वे ईलिन नामक नरेश ब्रह्मवादी ब्राह्मणसमुदायमें उत्कृष्ट माने जाते थे । उनकी उस ईलिनी नामक कन्याको तंसुने पत्नीरूपमें प्राप्त किया ॥ ६ ॥
तंसोः सुरोधो राजर्षिर्धर्मनेत्रो महायशाः । ब्रह्मवादी पराक्रान्तस्तस्य भार्योपदानवी ॥ ७ ॥ उपदानवी सुताँल्लेभे चतुरस्त्वैलिकामजान् । दुष्यन्तमथ सुध्मन्तं प्रवीरमनघं तथा ॥ ८ ॥
तंसुके महायशस्वी राजर्षि सुरोध हुए, जो धर्मके प्रवर्तक होनेसे धर्मनेत्र कहलाते थे । वे ब्रह्मवादी और पराक्रमी थे । उनकी पत्नी उपदानवी थी । उपदानवीने चार पुत्र प्राप्त किये, जो दुष्यन्त, सुध्मन्त, प्रवीर और अनघके नामसे विख्यात थे । ये चारों ईलिनीकुमार सुरोध या धर्मनेत्रके पुत्र थे ॥ ७-८ ॥
दुष्यन्तस्य तु दायादो भरतो नाम वीर्यवान् । स सर्वदमनो नाम नागायुतबलो महान् ॥ ९ ॥
दुष्यन्तके पुत्रका नाम भरत था । वे बड़े पराक्रमी थे । सबका दमन करनेके कारण उनका दूसरा नाम सर्वदमन भी था । महान् वीर भरतमें दस हजार हाथियोंका बल था ॥
चक्रवर्ती सुतो जज्ञे दुष्यन्तस्य महात्मनः । शकुन्तलायां भरतो यस्य नाम्ना स्थ भारताः ॥ १० ॥
- महात्मा दुष्यन्तके वीर्य और शकुन्तलाके गर्भसे चक्रवर्ती भरत पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे, जिनके नामपर तुमलोग भारत कहलाते हो ॥ १० ॥
दुष्यन्तं प्रति राजानं वागुवाचाशरीरिणी । माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ॥ ११ ॥ भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् । रेतोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात् ॥ १२ ॥ त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ।
( कहते हैं—दुष्यन्तने तपोवनमें जाकर शकुन्तलाके साथ गान्धर्व-विवाह किया था और अपनी राजधानीको लौटकर उसके विषयमें कुछ बताया नहीं था । जब शकुन्तला भरतको लेकर दुष्यन्तके यहाँ गयी, तब वे उसे पहचाननेमें भूल करने लगे । उस समय ) आकाशवाणीने राजा दुष्यन्तको सम्बोधित करके कहा—'दुष्यन्त ! माता तो केवल चमड़ेकी धौंकनीके समान है, पुत्रपर अधिकार तो पिताका ही है । पुत्र जिसके द्वारा जन्म ग्रहण करता है, उसीका स्वरूप होता है । तुम इस पुत्रका पालन-पोषण करो, शकुन्तलाका अपमान मत करो । नरदेव ! अपने ही वीर्यसे उत्पन्न हुआ पुत्र अपने पिताको यमलोकसे ( निकालकर स्वर्गलोकको ) ले जाता है । 'इस पुत्रके आधान करनेवाले तुम्हीं हो'—शकुन्तलाने यह बात ठीक ही कही है' ॥ ११-१२½ ॥
भरतस्य विनष्टेषु तनयेषु महीपतेः ॥ १३ ॥ मातृणां तात कोपेन मया ते कथितं पुरा ।
राजा भरतके कई पुत्र होकर मर गये । तात ! माताओंके क्रोधसे ऐसा हुआ था । यह बात मैं तुम्हें पहले ( आदिपर्वमें ) बता चुका हूँ ॥ १३½ ॥
बृहस्पतेराङ्गिरसः पुत्रो राजन् महामुनिः । संक्रामितो भरद्वाजो मरुद्भिः क्रतुभिर्विभुः ॥ १४ ॥
राजन् ! भरतके यज्ञमें आये हुए देवताओंने भरतके लिये अङ्गिरा नन्दन बृहस्पतिजीके पुत्र महामुनि भरद्वाजको ही पुत्र बनाकर दे दिया ॥ १४ ॥
अत्रैवोदाहरन्तीमं भरद्वाजस्य धीमतः । धर्मसंक्रमणं चापि महद्भिर्भरताय वै ॥ १५ ॥ अयाजयद् भरद्वाजो मरुद्भिः क्रतुभिर्हि तम् । पूर्वे तु वितथे तस्य कृते वै पुत्रजन्मनि ॥ १६ ॥ ततोऽथ वितथो नाम भरद्वाजसुतोऽभवत् ।
इसी प्रसङ्गमें बुद्धिमान् भरद्वाजके धर्मसंक्रमणकी यह बात कही जाती है । मरुद्गणोंने भरतको पुत्ररूपमें जब भरद्वाजको ही अर्पित कर दिया, तब भरद्वाजने भरतसे देवताओंसहित यज्ञका अनुष्ठान करवाया । इसके पहले भरतके पुत्र-जन्मका सारा प्रयास वितथ ( व्यर्थ ) हो चुका था । भरद्वाजके प्रयत्नसे जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम वितथ हुआ ॥१५-१६½॥
ततोऽथ वितथे जाते भरतस्तु दिवं ययौ ॥ १७ ॥ वितथं चाभिषिच्याथ भरद्वाजो वनं ययौ ।
वितथका जन्म हो जानेपर भरत स्वर्गवासी हो गये । तत्पश्चात् वितथका राज्याभिषेक करके भरद्वाजजी भी वनमें चले गये ॥ १७½ ॥