भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 138

हरिवंशपर्व ] द्वाद्विंशोऽध्यायः [ १९५


र्त्विज्र वसुसे उनकी पत्नी गिरिकाने सात मनुष्योंको उत्पन्न किया ॥

महारथो मगधराड् विश्रुतो यो बृहद्रथः ।
प्रत्यग्रहः कुशश्चैव यमाहुर्मणिवाहनम् ॥ ५४ ॥
मारुतश्च यदुश्चैव मत्स्यः काली च सप्तमः ।

उनमें प्रथम संतान ये सुविख्यात महारथी राजा बृहद्रथ, जो मगध देशके अधिपति थे । दूसरे पुत्रका नाम प्रत्यग्रह था । तीसरे राजा कुश थे, जिन्हें मणिवाहन भी कहते हैं । चौथे मारुत, पाँचवें यदु और छठे श्रेष्ठतम पुरुष मत्स्य थे । सातवीं संतान कन्या थी, जो काली (या सत्यवती) कहलायी ॥

बृहद्रथस्य दायादः कुशाग्रो नाम विश्रुतः ॥ ५५ ॥
कुशाग्रस्यात्मजो विद्वान् वृषभो नाम वीर्यवान् ।

बृहद्रथका पुत्र कुशाग्र नामसे विख्यात हुआ । कुशाग्रके पुत्र वृषभ थे, जो विद्वान् और बलवान् थे ॥ ५५ १/२ ॥

वृषभस्य तु दायादः पुष्पवान्नाम धार्मिकः ॥ ५६ ॥
दायादस्तस्य विक्रान्तो राजा सत्यहितः स्मृतः ॥ ५७ ॥

वृषभका पुत्र धर्मात्मा पुण्यवान् था । उसके पुत्र पराक्रमी राजा सत्यहित हुए ॥ ५६-५७ ॥

तस्य पुत्रोऽथ धर्मात्मा नाम्ना ऊर्जस्तु जज्ञिवान् ।
ऊर्जस्य सम्भवः पुत्रो यस्य जज्ञे स वीर्यवान् ॥ ५८ ॥

सत्यहितके धर्मात्मा ऊर्ज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । ऊर्जके पुत्रका नाम सम्भव था (जिसे बृहद्रथ भी कहते हैं) । इसीसे पराक्रमी राजा जरासंधकी उत्पत्ति हुई थी ॥

शकले द्वे स वै जातो जरया संधितः स तु ।
जरया संधितो यस्माज्जरासंधस्ततः स्मृतः ॥ ५९ ॥

वह आधे-आधे शरीरके दो टुकड़ोंके रूपमें (दो माताओंके गर्भसे) उत्पन्न हुआ था । इन दोनों टुकड़ोंको जरा नामवाली राक्षसीने जोड़ दिया । जरासे संधित (जोड़ा गया) होनेसे उसका नाम जरासंध हुआ ॥ ५९ ॥

सर्वक्षत्रस्य जेतासौ जरासंधो महाबलः ।
जरासंधस्य पुत्रो वै सहदेवः प्रतापवान् ॥ ६० ॥

महाबली जरासंधने सम्पूर्ण क्षत्रिय-समुदायको जीत लिया था । उसका पुत्र प्रतापी सहदेव था ॥ ६० ॥

सहदेवात्मजः श्रीमानुदायुः स महायशाः ।
उदायुर्जनयामास पुत्रं परमधार्मिकम् ॥ ६१ ॥
श्रुतधर्मेति नामानं मगधान् योऽध्यसद् विभुः ।

सहदेवके कान्तिमान् पुत्र महायशस्वी उदायु हुए । उदायुने श्रुतधर्मा नामक परम धर्मात्मा पुत्रको जन्म दिया, जो वैभवसम्पन्न होकर मगध देशमें निवास करता था ॥

परीक्षितस्तु दायादो धार्मिको जनमेजयः ॥ ६२ ॥
जनमेजयस्य दायादास्त्रय एव महारथाः ।
श्रुतसेनोग्रसेनौ च भीमसेनश्च नामतः ॥ ६३ ॥
एते सर्वे महाभागा विक्रान्ता बलशालिनः ।
जनमेजयस्य पुत्रौ तु सुरथो मतिमांस्तथा ॥ ६४ ॥

कुरुके दूसरे पुत्र परीक्षित्के आत्मज धर्मात्मा जनमेजय हुए । जनमेजयके श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन—ये तीन महारथी पुत्र थे । ये सभी महाभाग राजकुमार पराक्रमी तथा बलशाली थे । जनमेजयके दो पुत्र हुए सुरथ और मतिमान् ॥

सुरथस्य तु विक्रान्तः पुत्रो जज्ञे विदूरथः ।
विदूरथस्य दायाद ऋक्ष एव महारथः ॥ ६५ ॥
द्वितीयः स बभौ राजा नाम्ना तेनैव संज्ञितः ।

सुरथके एक पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम था विदूरथ । विदूरथके महारथी पुत्रका नाम भी ऋक्ष ही था । ये दूसरे राजा थे, जो उसी (ऋक्ष) नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ६५ १/२ ॥

द्वावृक्षौ तद्य वंशेऽस्मिन् द्वावेव तु परीक्षितौ ॥ ६६ ॥
भीमसेनास्त्रयो राजन् द्वावेव जनमेजयौ ।

राजन् ! तुम्हारे इस वंशमें दो 'ऋक्ष' और दो ही 'परीक्षित्' नामके राजा हो गये हैं । तीन 'भीमसेन' और दो 'जनमेजय' हुए हैं ॥ ६६ १/२ ॥

ऋक्षस्य तु द्वितीयस्य भीमसेनोऽभवत् सुतः ॥ ६७ ॥
प्रतीपो भीमसेनस्य प्रतीपस्य तु शान्तनुः ।
देवापिर्बाल्हिकश्चैव त्रय एव महारथाः ॥ ६८ ॥

द्वितीय ऋक्षके पुत्र भीमसेन हुए । भीमसेनके प्रतीप और प्रतीपके पुत्र शान्तनु, देवापि तथा बाह्लिक थे । ये तीनों ही महारथी वीर थे ॥ ६७-६८ ॥

शान्तनोः प्रसयस्त्वेव यत्र जातोऽसि पार्थिव ।
बाह्लिकस्य तु राज्यं वै सप्तवाहं नरेश्वर ॥ ६९ ॥

पृथ्वीनाथ ! यह शान्तनुका कुल है, जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ है । नरेश्वर ! बाह्लिकका राज्य सप्तवाह (मन्त्री आदि सात अङ्गोंद्वारा संचालित होने योग्य) था ॥ ६९ ॥

बाह्लिकस्य सुतश्चैव सोमदत्तो महायशाः ।
जज्ञिरे सोमदत्तात्तु भूरिर्भूरिश्रवाः शलः ॥ ७० ॥

बाह्लिकके पुत्र महायशस्वी सोमदत्त हुए । सोमदत्तसे भूरि, भूरिश्रवा और शल—ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ७० ॥

उपाध्यायस्तु देवानां देवापिरभवन्मुनिः ।
च्यवनस्य कृतः पुत्र इष्टश्चासीन्महात्मनः ॥ ७१ ॥

देवापि देवताओंके उपाध्याय और मुनि हुए । महात्मा च्यवनने उन्हें अपना प्रिय पुत्र बना लिया था ॥ ७१ ॥

शान्तनुस्त्वभवद् राजा कौरवाणां धुरन्धरः ।
शान्तनोः सम्प्रवक्ष्यामि यत्र जातोऽसि पार्थिव ॥ ७२ ॥

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