विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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राजा शन्तनु कौरवकुलका भार वहन करनेवाले हुए। पृथ्वीनाथ ! अब मैं शन्तनुके वंशका वर्णन करता हूँ, जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ है ॥ ७२ ॥
गाङ्गं देवव्रतं नाम पुत्रं सोऽजनयत् प्रभुः।
स तु भीष्म इति ख्यातः पाण्डवानां पितामहः॥ ७३ ॥
प्रभावशाली शन्तनुने गङ्गाजीके गर्भसे देवव्रत नामक पुत्रको जन्म दिया। वे ही भीष्म नामसे विख्यात हुए, जो पाण्डवोंके पितामह थे ॥ ७३ ॥
काली विचित्रवीर्यं तु जनयामास भारत।
शन्तनोर्दयितं पुत्रं धर्मात्मानमकल्मषम् ॥ ७४ ॥
भारत ! उनकी दूसरी पत्नी काली (सत्यवती) ने शन्तनुके प्रिय पुत्र विचित्रवीर्यको उत्पन्न किया, जो पापशून्य तथा धर्मात्मा थे ॥ ७४ ॥
कृष्णद्वैपायनश्चैव क्षेत्रे वैचित्रवीर्यके।
धृतराष्ट्रं च पाण्डुं च विदुरं चाप्यजीजनत् ॥ ७५ ॥
विचित्रवीर्यके क्षेत्र (अर्थात् उनकी पत्नियोंके गर्भ) से श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरको उत्पन्न किया था ॥ ७५ ॥
धृतराष्ट्रश्च गान्धार्यां पुत्रानुत्पादयच्छतम्।
तेषां दुर्योधनः श्रेष्ठः सर्वेषामेव स प्रभुः ॥ ७६ ॥
धृतराष्ट्रने गान्धारीके गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न किये। उन सबमें दुर्योधन ही श्रेष्ठ और प्रभावशाली था ॥ ७६ ॥
पाण्डोर्धनंजयः पुत्रः सौभद्रस्तस्य चात्मजः।
अभिमन्योः परीक्षित् तु पिता तव जनेश्वर ॥ ७७ ॥
पाण्डुके पुत्र धनंजय (अर्जुन) हुए। धनंजयसे सुभद्राकुमार अभिमन्युका जन्म हुआ। जनेश्वर ! अभिमन्युके पुत्र तुम्हारे पिता परीक्षित् थे ॥ ७७ ॥
एष ते पौरवो वंशो यत्र जातोऽसि पार्थिव।
तुर्वसोस्तु प्रवक्ष्यामि द्रुह्योश्चानोर्यदोस्तथा ॥ ७८ ॥
जनमेजय ! यह तुमसे पौरववंशका वर्णन किया गया, जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ है। अब तुर्वसु, द्रुह्यु, यदु और अनुकी संततिका वर्णन करूँगा ॥ ७८ ॥
सुतस्तु तुर्वसोर्वह्निर्वह्नेर्गोभानुरात्मजः।
गोभानोस्तु सुतो राजा त्रैसानुरपराजितः ॥ ७९ ॥
तुर्वसुके पुत्र वह्नि और वह्निके गोभानु हुए। गोभानुके पुत्र राजा त्रैसानु थे, जो कभी परास्त नहीं होते थे ॥ ७९ ॥
करन्धमस्तु त्रैसानोर्मरुत्तस्तस्य चात्मजः।
अन्यस्तवावीक्षितो राजा मरुत्तः कथितस्तव ॥ ८०॥
त्रैसानुके करन्धम और करन्धमके पुत्र मरुत्त हुए। अविक्षित्के पुत्र राजा मरुत्त दूसरे हैं। उनका परिचय तुम्हें दिया जा चुका है* ॥ ८० ॥
अनपत्योऽभवद् राजा यज्वा विपुलदक्षिणः।
दुहिता सम्मता नाम तस्यासीत् पृथिवीपते ॥ ८१ ॥
ये करन्धम-पुत्र राजा मरुत्त पुत्रहीन थे। ये बड़े-बड़े यज्ञ करते और उनमें प्रचुर दक्षिणाएँ देते थे। पृथ्वीनाथ ! उनके एक पुत्री थी, जिसका नाम सम्मता था ॥ ८१ ॥
दक्षिणार्थं स वै दत्ता संवर्ताय महात्मने।
दुष्यन्तं पौरवं चापि लेभे पुत्रमकल्मषम् ॥ ८२ ॥
उन्होंने महात्मा संवर्तको अपनी वह कन्या ही दक्षिणारूपमें दे दी थी। (फिर संवर्तने दुष्यन्तके पिताको वह कन्या अर्पित कर दी। उनके संयोगसे) सम्मताने पुरुवंशी दुष्यन्तको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। दुष्यन्त निष्पाप राजा थे ॥ ८२ ॥
एवं ययातेः शापेन जरासंक्रमणे तदा।
पौरवं तुर्वसोर्वंशः प्रविवेश नृपोत्तम ॥ ८३ ॥
नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार पुत्रोंको अपना बुढ़ापा लेनेके लिये कहते समय ययातिने जो शाप दिया था, उसके अनुसार तुर्वसुका वंश समाप्त होकर पौरववंशमें विलीन हो गया ॥
दुष्यन्तस्य तु दायादः करुत्थामः प्रजेश्वरः।
करुत्थामात्तथाऽऽक्रीडश्चत्वारस्तस्य चात्मजाः॥८४॥
पाण्ड्यश्च केरलश्चैव कोलश्चोलश्च पार्थिवः।
तेषां जनपदाः स्फीताः पाण्ड्याश्चोलाः सकेरलाः ८५
दुष्यन्तके (शकुन्तलासे भिन्न दूसरी रानीके गर्भसे) राजा करुत्थाम हुए। करुत्थामसे आक्रीडका जन्म हुआ। उसके चार पुत्र थे—पाण्ड्य, केरल, कोल तथा राजा चोल। उनके समृद्धिशाली प्रदेश भी उन्हींके नामपर पाण्ड्य, चोल और केरल कहलाये ॥ ८४-८५ ॥
द्रुह्योश्च तनयो राजन् बभ्रुः सेतुश्च पार्थिवः।
अङ्गारसेतुस्तत्पुत्रो मरुतां पतिरुच्यते ॥ ८६ ॥
राजन् ! ययातिकुमार द्रुह्युके पुत्र राजा बभ्रु और सेतु हुए। सेतुके पुत्र अङ्गारसेतु हुए। इन्हें मरुत्पति भी कहा जाता है ॥ ८६ ॥
यौवनाश्वेन समरे कृच्छ्रेण निहतो बली।
युद्धं सुमहदस्यासीन्मासान्परि चतुर्दश ॥ ८७ ॥
युवनाश्वके पुत्र मान्धाताके साथ इनका चौदह महीनोंतक बड़ा भारी युद्ध हुआ। उस समराङ्गणमें बलवान् अङ्गारसेतु शत्रुद्वारा बड़ी कठिनाईसे मारे गये ॥ ८७ ॥
अङ्गारस्य तु दायादो गान्धारो नाम भारत।
ख्यायते तस्य नाम्ना वै गान्धारविषयो महान् ॥ ८८ ॥
* देखिये महाभारत, द्रोणपर्व (५५। ३७—४९) तथा आश्वमेधिकपर्व (अध्याय ६ से १० तक)।