भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 141
११८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

पहले तो उसने बहुत बड़ा वर यह माँगा था कि 'युद्धमें मेरी सहस्र भुजाएँ हो जायें' ॥ ११ ॥

अधर्मे वर्तमानस्य सद्भिस्तत्र निवारणम् ।
उग्रेण पृथिवीं जित्वा स्वधर्मेणानुरञ्जनम् ॥ १२ ॥

दूसरा वर यह था कि 'यदि कभी मैं अधर्म-कार्यमें प्रवृत्त होऊँ तो वहाँ साधु पुरुष आकर मुझे रोक दें।' तीसरे वरके रूपमें उसने यह प्रार्थना की कि 'मैं युद्धके द्वारा पृथ्वीको जीतकर स्वधर्म-पालनके द्वारा प्रजाको प्रसन्न रक्खूँ' ॥ १२ ॥

संग्रामान्त्सुबहून्कृत्वा हत्वा शत्रून्सहस्रशः ।
संग्रामे वर्तमानस्य वधं चाप्यधिकाद्रणे ॥ १३ ॥

चौथा वर इस प्रकार है—'मैं बहुत-से संग्राम करके सहस्रों शत्रुओंको मौतके घाट उतारकर संग्राममें ही रहते समय जो युद्धमें मुझसे अधिक शक्तिशाली हो, उसके द्वारा वधको प्राप्त होऊँ' ॥ १३ ॥

तस्य बाहुसहस्रं तु युध्यतः किल भारत ।
योगाद् योगेश्वरस्येव प्रादुर्भवति मायया ॥ १४ ॥

भरतनन्दन ! युद्ध करते समय किसी योगेश्वरकी भाँति योगबल और संकेतमात्रसे उसके एक सहस्र भुजाएँ प्रकट हो जाती थीं ॥ १४ ॥

तेनेयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना ।
ससमुद्रा सनगरा उग्रेण विधिना जिता ॥ १५ ॥

राजा अर्जुनने द्वीप, समुद्र, पत्तन और नगरोंसहित सारी पृथिवीको उग्रकर्म (युद्ध) के द्वारा जीता था ॥ १५ ॥

तेन सप्तसु द्वीपेषु सप्त यज्ञशतानि वै ।
प्राप्तानि विधिना राज्ञा श्रूयन्ते जनमेजय ॥ १६ ॥

जनमेजय ! उस राजाने सातों द्वीपोंमें विधिपूर्वक सात सौ यज्ञ किये थे, ऐसा सुना जाता है ॥ १६ ॥

सर्वे यज्ञा महाबाहोस्तस्यासन् भूरिदक्षिणाः ।
सर्वे काञ्चनयूपाश्च सर्वे काञ्चनवेदयः ॥ १७ ॥

महाबाहु अर्जुनके वे समस्त यज्ञ प्रचुर दक्षिणा देकर सम्पन्न किये गये थे। सबमें सोनेके यूप गड़े थे और सोनेकी ही वेदियाँ बनायी गयी थीं ॥ १७ ॥

सर्वैर्देवैर्महाराज विमानस्थैरलंकृताः ।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च निरयमेषोपशोभिताः ॥ १८ ॥

महाराज ! विमानोंपर बैठे हुए सम्पूर्ण देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ सदा ही उन यज्ञोंको अलंकृत एवं सुशोभित करती थीं ॥ १८ ॥

यस्य यज्ञे जगौ गाथां गन्धर्वो नारदस्तथा ।
वरीदासात्मजो विद्वान् महिम्ना तस्य विस्मितः ॥ १९ ॥

कार्तवीर्यके यज्ञमें उसकी महिमासे चकित होकर वरीदासके विद्वान् पुत्र नारद नामक गन्धर्वने इस गाथाका गान किया था ॥ १९ ॥

नारद उवाच

न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः ।
यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा विक्रमेण श्रुतेन च ॥ २० ॥

नारद बोले—अन्य राजालोग यज्ञ, दान, तपस्या, पराक्रम और शास्त्रज्ञानमें कार्तवीर्य अर्जुनकी स्थितिको नहीं पहुँच सकते ॥ २० ॥

स हि सप्तसु द्वीपेषु खड्गी चर्मी शरासनी ।
रथी द्वीपाननुचरन् योगी संदृश्यते नृभिः ॥ २१ ॥

वह योगी था। इसलिये मनुष्योंको सातों द्वीपोंमें ढाल-तलवार, धनुष-बाण और रथ लिये सदा सब ओर विचरता दिखायी देता था ॥ २१ ॥

अनष्टद्रव्यता चैव न शोको न च विभ्रमः ।
प्रभावेण महाराजः प्रजा धर्मेण रक्षतः ॥ २२ ॥

धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करनेवाले महाराज कार्तवीर्यके प्रभावसे किसीका धन नष्ट नहीं होता था। न तो किसीको शोक होता और न कोई भ्रममें ही पड़ता था ॥ २२ ॥

पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां वै नराधिपः ।
स सर्वरत्नभाक् सम्राट् चक्रवर्ती बभूव ह ॥ २३ ॥

वह पचासी हजार वर्षोंतक सब प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न चक्रवर्ती सम्राट् रहा ॥ २३ ॥

स एष यज्ञपालोऽभूत् क्षेत्रपालः स एव च ।
स एव दृष्ट्यां पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत् ॥ २४ ॥

योगी होनेके कारण राजा अर्जुन ही यज्ञों और खेतोंकी रक्षा करता था और वही वर्षाकालमें मेघ बन जाता था ॥ २४ ॥

स वै बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा ।
भाति रश्मिसहस्रेण शारदीव दिवाकरः ॥ २५ ॥

जैसे शरद्-ऋतुमें भगवान् भास्कर अपनी सहस्रों किरणोंसे शोभा पाते हैं, उसी प्रकार राजा कार्तवीर्य अर्जुन प्रत्यञ्चाकी रगड़से जिनकी त्वचा कठोर हो गयी थी, उन सहस्रों भुजाओंसे सुशोभित होता था ॥ २५ ॥

स हि नागान् मनुष्येषु माहिष्मत्यां महाद्युतिः ।
कर्कोटकसुताञ्जित्वा पुर्यां तस्यां न्यवेशयत् ॥ २६ ॥

महातेजस्वी अर्जुनने कर्कोटकनागके पुत्रोंको जीतकर उन्हें अपनी नगरी माहिष्मती पुरीमें मनुष्योंके बीच बसाया था ॥ २६ ॥

स वै वेगं समुद्रस्य प्रावृट्कालेऽम्बुजेक्षणः ।
क्रीडन्निव भुजोद्विग्नं प्रतिस्रोतश्चकार ह ॥ २७ ॥

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