भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 142

हरिवंशपर्व ] त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ११९

कमलनयन कार्तवीर्य वर्षाकालमें जल-क्रीडा करते समय समुद्रकी जलराशिके वेगोंको अपनी भुजाओंके आघातसे रोक-कर पीछेकी ओर लौटा देता था ॥ २७ ॥

लुण्ठिता क्रीडिता तेन फेनस्रग्दाममालिनी ।
चलदूर्भिसहस्रेण शङ्किताभ्येति नर्मदा ॥ २८ ॥
फेनरूपी पुष्पहारोंसे अलंकृत नर्मदाकी जलराशिमें जब वह लोटता और क्रीड़ा करता था, तब वह परपुरुषके उप-भोगमें आयी हुई नारीके समान शङ्कित-सी होकर अपनी सहस्रों चञ्चल लहरोंके साथ अपने पति समुद्रके निकट जाती थी ॥ २८ ॥

तस्य बाहुसहस्रेण क्षुभ्यमाणे महोदधौ ।
भयान्निलीना निश्चेष्टाः पातालस्था महासुराः ॥ २९ ॥
महासागरमे घुसकर जब वह अपनी सहस्रों भुजाएँ पटकता, उस समय समुद्र विक्षुब्ध हो उठता था और पातालनिवासी महादैत्य निश्चेष्ट होकर भयसे छिप जाते थे ॥ २९ ॥

चूर्णीकृतमहावीचिं चलन्मीनमहातिमिम् ।
मारुताविद्धफेनौघमावर्तक्षोभदुःसहम् ॥ ३० ॥
प्रावर्तयत् तदा राजा सहस्रेण च बाहुना ।
देवासुरसमाक्षिप्तः क्षीरोदमिव मन्दरः ॥ ३१ ॥
जब राजा अर्जुन अपनी सहस्र भुजाओंसे समुद्रको मथने लगता, उस समय उसकी उठती हुई उत्ताल तरंगें चूर-चूर हो जाती थीं । बड़े-बड़े तिमि और मीन आदि जल-जन्तु छट-पटाने लगते थे । भुजाओंके वेगसे उठी हुई वायुसे टकराकर उसकी फेनराशि छिन्न-भिन्न हो जाती थी और समुद्र बड़ी-बड़ी भँवरोंके कारण क्षुब्ध एवं दुःसह दिखायी देता था । देवताओं और असुरोंके द्वारा डाले हुए मन्दराचलने क्षीर-समुद्रकी जो दशा कर दी थी, वैसी ही दशा उसकी भुजाओं-से मथित हुए महासागरकी हो रही थी ॥ ३०-३१ ॥

मन्दरक्षोभचकिता अमृतोद्भवशङ्किताः ।
सहसोत्पतिता भीता भीमं दृष्ट्वा नृपोत्तमम् ॥ ३२ ॥
नता निश्चलमूर्धानो बभूवुस्ते महोरगाः ।
सायाह्ने कदलीखण्डाः कम्पितास्तस्य वायुना ॥ ३३ ॥
उस समय मन्दराचलके द्वारा समुद्रमन्थनकी आशङ्कासे चकित और अमृतकी उत्पत्तिसे भयभीत हुए बड़े-बड़े नाग सहसा उछलकर देखते और भयंकर नृपश्रेष्ठ कार्तवीर्यपर दृष्टि पड़ते ही मस्तक झुकाकर पत्थरके समान निश्चेष्ट हो जाते थे । जैसे संध्याके समय वायुके झोंकेसे कदलीखण्ड (केलोंके बगीचे) काँपने लगते हैं, उसी प्रकार उसके शरीरसे उठी हुई वायुके द्वारा वे नाग भी हिलने लगते थे ॥ ३२-३३ ॥

स वै बद्ध्वा धनुर्ज्याभिरुत्सिक्तं पञ्चभिः शरैः ।
लङ्केशं मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात् ।
निर्जित्यैव समानीय माहिष्मत्यां बबन्ध तम् ॥ ३४ ॥
राजा कार्तवीर्यने अभिमानसे भरे हुए लङ्कापति रावण-को अपने पाँच ही बाणोंद्वारा सेनासहित मूर्च्छित एवं पराजित करके धनुषकी प्रत्यञ्चासे बाँध लिया और माहिष्मतीपुरीमे लाकर बंदी बना लिया ॥ ३४ ॥

श्रुत्वा तु बद्धं पौलस्त्यं रावणं त्वर्जुनेन तु ।
ततो गत्वा पुलस्त्यस्तमर्जुनं ददृशे स्वयम् ।
सुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनानुयाचितः ॥ ३५ ॥
अर्जुनने मेरे वंशज रावणको कैद कर लिया है, यह सुनकर महर्षि पुलस्त्य स्वयं वहाँ गये और अर्जुनसे मिले । पुलस्त्यके प्रार्थना करनेपर उसने उनके पौत्र राक्षस रावणको मुक्त कर दिया ॥ ३५ ॥

यस्य बाहुसहस्रस्य बभूव ज्यातलस्वनः ।
युगान्ते त्वम्बुदस्येव स्फुटतो ह्यशनेरिव ॥ ३६ ॥
अर्जुनकी हजार भुजाओंमे धारण किये गये धनुषोंकी प्रत्यञ्चाका ऐसा घोर शब्द होता था, मानो प्रलयकालके मेघ गरजते हों, अथवा वज्र फट पड़ा हो ॥ ३६ ॥

अहो बत मृधे वीर्यं भार्गवस्य यदच्छिनत् ।
राज्ञो बाहुसहस्रं तु हैमं तालवनं यथा ॥ ३७ ॥
अहो ! भृगुवंशी परशुरामजीका पराक्रम धन्य है, जिससे उन्होंने युद्धमें सुवर्णमय तालवनके समान राजा कार्तवीर्यकी सहस्र भुजाओंको काट डाला था ॥ ३७ ॥

तृपितेन कदाचित् स भिक्षितश्चित्रभानुना ।
स भिक्षामददाद् वीरः सप्तद्वीपान् विभावसोः ॥ ३८ ॥
पुराणि ग्रामघोषांश्च विषयांश्चैव सर्वशः ।
जज्वाल तस्य सर्वाणि चित्रभानुर्दिधक्षया ॥ ३९ ॥
स तस्य पुरुषेन्द्रस्य प्रभावेण महात्मनः ।
ददाह कार्तवीर्यस्य शैलांश्चैव वनानि च ॥ ४० ॥
एक दिनकी बात है—भूखे-प्यासे अग्निदेवने राजा कार्त-वीर्यसे भिक्षा माँगी । तब उस वीर राजाने सातों द्वीप, नगर, गाँव, गोष्ठ तथा सारा राज्य अग्निदेवको भिक्षामें दे दिये । अग्निदेव सर्वत्र प्रज्वलित हो उठे और पुरुषप्रवर महात्मा कार्तवीर्यके प्रभावसे समस्त पर्वतों एवं वनोंको जलाने लगे ॥ ३८-४० ॥

स शून्यमाश्रमं रम्यं वरुणस्यात्मजस्य वै ।
ददाह वनवद् भीतश्चित्रभानुः सहैहयः ॥ ४१ ॥
कार्तवीर्यकी सहायतासे अग्निने दूसरे साधारण वनोंकी भाँति वरुणपुत्रके रमणीय आश्रमको भी सूना पाकर डरते-डरते जला दिया ॥ ४१ ॥

यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भ्राजन्तमुत्तमम् ।
वसिष्ठं नाम स मुनिः ख्यात आपव इत्युत ॥ ४२ ॥