विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
पूर्वकालमें वरुणने जिन तेजस्वी एवं श्रेष्ठ महर्षिको पुत्र-रूपमें प्राप्त किया था, उनका नाम वसिष्ठ है । वे ही मुनि आपव नामसे भी विख्यात हैं ॥ ४२ ॥
यत्रापवस्तु तं क्रोधाच्छप्तवानर्जुनं विभुः ।
यस्मान्न वर्जितमिदं वनं ते मम हैहय ॥ ४३ ॥
तस्मात् ते दुष्करं कर्म कृतमन्यो हनिष्यति ।
महर्षि वसिष्ठका सूना आश्रम जलाया गया था, इसलिये उन ऐश्वर्यशाली आपवने अर्जुनको क्रोधपूर्वक शाप दिया—'हैहय ! तूने मेरे इस वनको भी जलाये बिना न छोड़ा, इसलिये तेरे द्वारा जो विश्वविजय आदि यशोवर्द्धक दुष्कर कर्म किया गया है, उसे दूसरा वीर (तुझे पराजित करके) नष्ट कर डालेगा ॥ ४३½ ॥
रामो नाम महाबाहुर्जांमदग्न्यः प्रतापवान् ॥ ४४ ॥
छित्त्वा बाहुसहस्रं ते प्रमथ्य तरसा बली ।
तपस्वी ब्राह्मणश्च त्वां वधिष्यति स भार्गवः ॥ ४५ ॥
'जमदग्निके प्रतापी पुत्र महाबाहु परशुराम बलवान् और तपस्वी ब्राह्मण हैं । वे भृगुवंशी वीर तुझे बलपूर्वक मथ डालेंगे और तेरी इन सहस्र भुजाओंको काटकर तुझे भी मौतके घाट उतार देंगे' ॥ ४४-४५ ॥
वैशम्पायन उवाच
अनष्टद्रव्यता यस्य बभूवामित्रकर्शन ।
प्रभावेण नरेन्द्रस्य प्रजा धर्मेण रक्षतः ॥ ४६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—शत्रुसूदन जनमेजय ! धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करनेवाले राजा कार्तवीर्यके प्रभावसे उसके राज्यमें किसीकी धन-सम्पत्ति या दूसरी कोई वस्तु नष्ट नहीं होती थी ॥ ४६ ॥
रामात् ततोऽस्य मृत्युर्वै तस्य शापान्मुनेर्नृप ।
वरश्चैष हि कौरव्य स्वयमेव वृतः पुरा ॥ ४७ ॥
कुरुवंशी नरेश ! वसिष्ठ मुनिके शापसे ही परशुरामके हाथसे उसकी मृत्यु हुई थी । उसने स्वयं ही पहले इसी तरहका वर माँगा था ॥ ४७ ॥
तस्य पुत्रशतस्यासन् पञ्च शेषा महात्मनः ।
कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो यशस्विनः ॥ ४८ ॥
महामना कार्तवीर्यके सौ पुत्र थे, किंतु उनमें पाँच ही शेष बचे । वे सभी अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, बलवान्, शूर, धर्मात्मा और यशस्वी थे ॥ ४८ ॥
शूरसेनश्च शूरश्च धृष्टेक्तुः कृष्ण एव च ।
जयध्वजश्च नाम्नाऽऽसीदावन्त्यो नृपतिर्महान् ॥ ४९ ॥
उनके नाम ये हैं—शूरसेन, शूर, धृष्ट, कृष्ण और जयध्वज । इनमें जयध्वज अवन्तीदेशके महाराज थे ॥ ४९ ॥
कार्तवीर्यस्य तनया वीर्यवन्तो महारथाः ।
जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजङ्घो महाबलः ॥ ५० ॥
कार्तवीर्यके ये सभी पुत्र बलवान् और महारथी थे । जयध्वजके पुत्र महाबली तालजङ्घ हुए ॥ ५० ॥
तस्य पुत्राः शतं ख्यातास्तालजङ्घा इति श्रुताः ।
तेषां कुले महाराज हैहयानां महात्मनाम् ॥ ५१ ॥
वीतिहोत्राः सुजाताश्च भोजाश्चावन्तयः स्मृताः ।
तौण्डिकेरा इति ख्यातास्तालजङ्घास्तथैव च ॥ ५२ ॥
भरताश्च सुता जाता बहुत्वान्नwork? बहुत्वान्ननुकीर्तिताः ।
वृषप्रभृतयो राजन् यादवाः पूर्णकर्मिणः ॥ ५३ ॥
तालजङ्घके सौ पुत्र थे, जो तालजङ्घ नामसे ही विख्यात थे । महाराज ! महामनस्वी हैहयोंके कुलमें वीतिहोत्र, सुजात, भोज, अवन्ति, तौण्डिकेर, तालजङ्घ तथा भरत आदि क्षत्रियोंके समुदाय उत्पन्न हुए । इनकी संख्या बहुत होनेके कारण इनके पृथक्-पृथक् नाम नहीं बताये गये । राजन् ! वृष आदि बहुत-से पुण्यात्मा यादव इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुए ये ॥ ५१-५३ ॥
वृषो वंशधरस्तत्र तस्य पुत्रोऽभवन्मधुः ।
मधोः पुत्रशतं त्वासीद् वृषणस्तस्य वंशभाक् ॥ ५४ ॥
उनमें वृष वंशप्रवर्तक हुए । वृषके पुत्र मधु थे। मधुके सौ पुत्र हुए, जिनमें वृषण वंश चलानेवाले हुए ॥ ५४ ॥
वृषणाद् वृष्णयः सर्वे मधोस्तु माधवाः स्मृताः ।
यादवा यदुना चाग्रे निरुच्यन्ते च हैहयाः ॥ ५५ ॥
वृषणसे जो सन्तान-परम्परा चली, उसके अन्तर्गत सभी क्षत्रिय वृष्णि कहलाये और मधुके वंशज माधव नामसे प्रसिद्ध हुए । इसी प्रकार यदुके नामपर उस वंशके लोग यादव कहलाते हैं तथा आगे होनेवाले हैहयके वंशज हैहय कहे जाते हैं ॥ ५५ ॥
न तस्य वित्तनाशोऽस्ति नष्टं प्रतिलभेच्च सः ।
कार्तवीर्यस्य यो जन्म कीर्तयेदिह नित्यशः ॥ ५६ ॥
जो यहाँ प्रतिदिन कार्तवीर्य अर्जुनके जन्मका वृत्तान्त कहता या सुनता है, उसके धनका नाश नहीं होता और उसकी खोयी हुई वस्तु भी उसे मिल जाती है ॥ ५६ ॥
एते ययातिपुत्राणां पञ्च वंशा विशांपते ।
कीर्तिता लोकवीराणां ये लोकान् धारयन्ति वै ॥ ५७ ॥
भूतानीव महाराज पञ्च स्थावरजङ्गमान् ।
प्रजानाथ ! इस प्रकार ये विश्वविख्यात वीर ययाति-पुत्रोंके पाँच वंश यहाँ बतलाये गये हैं । महाराज ! जैसे पाँचों भूत स्थावर, जङ्गम प्राणियोंके शरीरोंको धारण करते हैं, उसी प्रकार ये पाँचों वंश समस्त लोकोंको धारण करते हैं ॥ ५७½ ॥
श्रुत्वा पञ्चविसर्गं तु राजा धर्मार्थकोविदः ॥ ५८ ॥
वशी भवति पञ्चानामात्मजानां तथेश्वरः ।
इन पाँचों वंशोंकी सृष्टिका वर्णन सुनकर राजा धर्म और