विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 144, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] चतुस्त्रिंशोऽध्यायः १२१
अर्थके तत्त्वका ज्ञाता होता है, अपनी पाँचो इन्द्रियोंको वशमें रखता है तथा अपने पुत्रोंपर प्रभुत्व स्थापित कर लेता है ॥
लभेत् पञ्च वरांश्र्चैव दुर्लभानिह लौकिकान् ॥ ५९ ॥
आयुः कीर्तिं तथा पुत्रानैश्र्वर्यं भूमिमेव च ।
धारणाच्छ्रवणाच्चैव पञ्चवर्गस्य भारत ॥ ६० ॥
भरतनन्दन ! इन पाँचों वंशोंके श्रवण और धारणसे मनुष्य इस जगत्मे आयु, कीर्ति, पुत्र, ऐश्वर्य तथा भूमि—इन पाँच लोकोपयोगी दुर्लभ वरोंको प्राप्त कर लेता है ॥
क्रोष्टोस्तु शृणु राजेन्द्र वंशमुत्तमपौरुषम् ।
यदोर्वंशधरस्याथ यज्वनः पुण्यकर्मणः ॥ ६१ ॥
क्रोष्टुर्हि वंशं श्रुत्वेमं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
यस्यान्ववायजो विष्णुर्हरिर्वृष्णिकुलोद्वहः ॥ ६२ ॥
राजेन्द्र ! अब तुम उत्तम पुरुषार्थसे युक्त क्रोष्टुवंशका वर्णन सुनो । राजा क्रोष्टु यदुके वंशधर, यज्ञ करनेवाले तथा पुण्यकर्मा थे । उनके इस वंशका वर्णन सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । राजा क्रोष्टु वे ही हैं, जिनके कुलमें सर्वव्यापी भगवान् श्रीहरिने वृष्णिवंशावतंस श्रीकृष्णके रूपमें अवतार लिया था ॥ ६१-६२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
वृष्णिवंशका वर्णन—अक्रूर, वसुदेव, कुन्ती, सात्यकि, उद्धव, चारुदेष्ण, एकलव्य आदिका परिचय
वैशम्पायन उवाच
गान्धारी चैव माद्री च क्रोष्टोर्भार्ये बभूवतुः ।
गान्धारी जनयामास अनमित्रं महाबलम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! क्रोष्टाकी गान्धारी और माद्री नामकी दो भार्याएँ थीं। गान्धारीके गर्भसे महाबली अनमित्र उत्पन्न हुए ॥ १ ॥
माद्री युधाजितं पुत्रं ततोऽन्यं देवमीढुषम् ।
तेषां वंशस्त्रिधा भूतो वृष्णीनां कुलवर्धनः ॥ २ ॥
माद्रीके पुत्र युधाजित् और दूसरे पुत्र देवमीढुष हुए, वृष्णियोंके कुलको बढ़ानेवाला उनका वंश तीन शाखाओंमें बँट गया ॥ २ ॥
माद्र्याः पुत्रस्य जज्ञाते सुतौ वृष्ण्यन्धकावुभौ ।
जज्ञाते तनयौ वृष्णेः श्वफल्कश्चित्रकस्तथा ॥ ३ ॥
माद्रीके पुत्र ( युधाजित् ) के वृष्णि और अन्धक नामके दो पुत्र हुए और वृष्णिके पुत्र श्वफल्क तथा चित्रक हुए ॥ ३ ॥
श्वफल्कस्तु महाराज धर्मात्मा यत्र वर्तते ।
नास्ति व्याधिभयं तत्र नावर्षभयमप्युत ॥ ४ ॥
महाराज ! धर्मात्मा श्वफल्क जहाँ रहते थे, वहाँ व्याधि और अनावृष्टिका भय नहीं होता था ॥ ४ ॥
कदाचित् काशिराजस्य विभोर्भरतसत्तम ।
त्रीणि वर्षाणि विषये नावर्षत् पाकशासनः ॥ ५ ॥
भरतसत्तम ! एक समय शक्तिशाली काशिराजके देशमें इन्द्रने तीन वर्षतक पानी नहीं बरसाया ॥ ५ ॥
स तत्र वासयामास श्वफल्कं परमार्चितम् ।
श्वफल्कपरिवर्ते च ववर्ष हरिवाहनः ॥ ६ ॥
तब उन्होंने परम पूज्य श्वफल्कको बुलाकर अपने यहाँ ठहराया और श्वफल्कके पधारते ही इन्द्रने जल बरसाना आरम्भ कर दिया ॥ ६ ॥
श्वफल्कः काशिराजस्य सुतां भार्यामविन्दत ।
गान्दिनीं नाम सागां तु ददौ विप्रेषु नित्यशः ॥ ७ ॥
श्वफल्कका काशिराजकी गान्दिनी नामवाली पुत्रीसे विवाह हो गया । वह ब्राह्मणोंको नित्यप्रति गौओंका दान देती रहती थी ( इसीलिये उसका नाम गान्दिनी पड़ा था ) ॥ ७ ॥
सा मातुरुदरस्था तु बहून् वर्षगणान् किल ।
निवसन्ती न वै जज्ञे गर्भस्थां तां पिताब्रवीत् ॥ ८ ॥
वह अपनी माताके उदरमें बहुत वर्षोंतक रही थी और उत्पन्न नहीं होती थी, तब गर्भमें स्थित कन्यासे उसके पिताने कहा—॥ ८ ॥